सवर्णों को वोट नहीं देने का आह्वान वाले मोर्चे को राहुल ने किया निराश, छत्तीसगढ़ में चुनाव लड़ने की तैयारी

सवर्णों को वोट नहीं देने और उनकी दुकानों से सामान नहीं खरीदने का आह्वान छत्तीसगढ़ में असर दिखा रहा है। एससी, एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यक मोर्चा ने कांग्रेस के साथ गठबंधन की स्थिति में दस सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है। इस संबंध में मोर्चा के नेताओं ने दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से मुलाकात की। फारवर्ड प्रेस की खबर :

देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। इन विधानसभा चुनावों को अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के मद्देनजर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पूर्वोत्तर के मिजोरम राज्य को छोड़ दें तो छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान और तेलंगाना में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की साख दांव पर लगी है। वहीं पिछले 15 वर्षों से सत्ता से बाहर रही कांग्रेस को भी वापसी की उम्मीद है। लेकिन छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में इन दोनों दलों के मंसूबों पर एससी-एसटी-ओबीसी-अल्पसंख्यक संयुक्त मोर्चा पानी फेर सकता है। मोर्चा की ओर से चुनाव लड़ने की तैयारी युद्ध स्तर पर की जा रही है।

इसी मोर्चा के नेताओं ने बीते 23 सितंबर, 2018 को भोपाल में आयोजित सम्मेलन के दौरान सवर्णों को वोट नहीं देने और सवर्णों की दुकानों से सामान नहीं खरीदने का आह्वान किया था। इस आह्वान का असर छत्तीसगढ़ में भी देखा जा रहा है।

  • कांग्रेस करे गठबंधन तो दस सीटों पर चुनाव लड़ेगा मोर्चा

  • राहुल गांधी और शरद यादव ने दिया साथ चुनाव लड़ने का आश्वासन

  • छत्तीसगढ़ में ओबीसी की भूमिका निर्णायक

बताते चलें कि छत्तीसगढ़ में फिलहाल भाजपा की सरकार है और इस बार चुनाव में कांग्रेस वापसी के सपने संजो रही है। इसके लिए वह विभिन्न दलों व संगठनों के साथ गठबंधन भी करने का प्रयास कर रही है। हाल ही में एससी-एसटी-ओबीसी-अल्पसंख्यक संयुक्त मोर्चा के नौ नेताओं से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने दिल्ली में मुलाकात की। हालांकि बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकला। कांग्रेस आलाकमान उनकी बातों को सुना लेकिन कोई विशेष आवश्वासन नहीं दिया। 

बीते 26 सितंबर, 2018 को राहुल गांधी से मिलने वाले एससी-एसटी-ओबीसी-अल्पसंख्यक संयुक्त मोर्चा के नेताओं में रामकृष्ण जांगरे, विवेक कुमार सिंह, अखिलेश एडगर, रघुनंदन साहू, पूर्व सांसद टी. आर. खोटे, नवनीत चंद्रा, बलीराम कश्यप, डॉ. सत्येंद्र जायसवाल और डॉ. रामगोपाल घृतलहरे शामिल रहे।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से मिलते मोर्चा के नेतागण

इस मुलाकात के बारे में मोर्चा के संयोजकों में से एक विवेक कुमार सिंह ने फारवर्ड प्रेस से बातचीत में कहा कि “राहुल गांधी ने कांग्रेस की प्रांतीय इकाई जिसका नेतृत्व भूपेश बघेल कर रहे हैं और पी. एल. पुनिया जो कि छत्तीसगढ़ कांग्रेस प्रभारी हैं, से मिलकर आपसी समन्वय बनाने की बात कही।”

विवेक ने बताया कि “मोर्चा के नेताओं ने लोकतांत्रिक जनता दल के नेता शरद यादव से भी मुलाकात की। शरद यादव द्वारा मोर्चा को चुनाव में सहयोग करने व गठबंधन का आश्वासन दिया गया है।”

एससी-एसटी-ओबीसी-अल्पसंख्यक संयुक्त मोर्चा का दावा

विवेक बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में करीब 55 फीसदी ओबीसी हैं। इनमें दो जातियों कुर्मी और तेली की बड़ी हिस्सेदारी है। इसके अलावा अल्पसंख्यक भी चुनावों में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। वहीं अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का मत भी खासा मायने रखता है। पिछली बार ओबीसी के सहारे सत्ता में आने वाली भाजपा द्वारा हाल के दिनों में ओबीसी को लुभाने की कोशिशें की गयी हैं, लेकिन अपने पूरे कार्यकाल में रमन सिंह ने ओबीसी के लिए कुछ भी नहीं किया।

  • अजीत जोगी के साथ गठबंधन कर बसपा ने चुनी गलत राह

  • पांच सीटों पर मिल सकती थी आसान जीत

विवेक के मुताबिक वे और उनके साथी पिछले एक वर्ष से संविधान को मानने वाली सभी पार्टियों को एक मंच पर लाने की कोशिश में लगे हैं। लेकिन बहुजन समाज पार्टी (बसपा) जो स्वयं को बाबा साहब के बताये मार्ग पर चलने की बात कहती है, वह भी भविष्य के चुनौतियों के प्रति गंभीर नही है और संविधान व लोकतंत्र बचाने के लिए जो कदम उठाये जाने चाहिए, उनके बजाय विधानसभा चुनाव को बहुत हल्के में लेकर वोटों का बंटवारा कर भाजपा को मजबूत करने में लगी है। इस चुनाव में बसपा ने मोर्चा से अलग अजीत जोगी की पार्टी जनता कांग्रेस के साथ गठबंधन का एलान कर चुकी है। वह 35 सीटों पर चुनाव लड़ेगी।

मोर्चा के संयोजक विवेक कुमार सिंह

उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ में पांच ऐसी सीटें हैं जहां बसपा कांग्रेस के साथ गठबंधन करके सीधे-सीधे जीत सकती है। इन क्षेत्रों में सारंगगढ़, पामगढ़, जयजयपुर, जांजगीर चांपा और नावागढ़ शामिल है। लेकिन अब इन क्षेत्रों में बसपा को नुकसान उठाना पड़ सकता है। विवेक ने बताया कि ये वे इलाके हैं जहां मान्यवर कांशीराम ने अपना आंदोलन चलाया था। इसलिए यहां बसपा का कैडर वोट है। यदि बसपा प्रमुख मायावती ने सृझ-बूझ से काम लिया होता तो बहुजनों की हिस्सेदारी और बढ़ती।

विवेक ने कहा कि भाजपा 31 प्रतिशत वोट लेकर सत्ता पाने में कामयाब हो जाती है। इसकी वजह यह है कि 69 प्रतिशत विपक्षी जिनमें दलित-बहुजन ही शामिल हैं, आपस में एकता नहीं रख पाते हैं।

(कॉपी संपादन : राजन)

[संर्वद्धित : 28 सितंबर, अपराह्न 12.10]

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