जातीय उत्पीड़न से आहत होकर दलित छात्र ने खाया जहर

उच्च शिक्षा में आने वाले दलित व पिछड़े समुदाय के छात्रों को विश्वविद्यालय कैंपस एक जीतिविहीन स्वस्थ माहौल दे पाने में नाकाम साबित हुए हैं। यहीं कारण है कि जातीय उत्पीड़न की घटनाएं हो रही हैं और आहत होकर दलित-पिछड़े छात्र आत्महत्या जैसे कदम उठा रहे हैं। फारवर्ड प्रेस की रिपोर्ट :

रोहित वेमुला के अकादमिक हत्या का मामला सभी के जेहन में अभी ताजा है। 20 सितंबर, 2018 को इसकी फिर पुनरावृत्ति की गयी।

दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र विभाग के रिर्सच स्कॉलर दीपक कुमार ने लगातार जातीय और मानसिक उत्पीड़न ने तंग आकर जहर खा लिया, लेकिन उन्हें बचा लिया गया। जहर खाने से पहले दीपक कुमार ने सुसाइड पत्र में लिखा कि “प्रो. द्वारिका नाथ श्रीवास्तव व प्रो. चंद्र प्रकाश श्रीवास्तव के द्वारा लगातार मुझे जातिसूचक व मां-बहन की गालियां देकर सामाजिक व मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा था। इसकी सूचना मैंने स्वयं गोरखपुर यूनिवर्सिटी के कुलपति वी.के. सिंह को दी थी। लेकिन विश्विद्यालय प्रशासन द्वारा मामले को गंभीरता से न लेने के कारण आहत होकर मैंने ज़हर खा लिया।”

दीपक गोरखपुर में किराए के घर में रहते हैं, उसी घर में कुछ और भी दलित छात्र किराए पर रहते हैं। दीपक द्वारा जहर खाने की सूचना मिलते ही आनन-फानन में अन्य दलित छात्रों ने दीपक कुमार को जिला अस्पताल ले गये, जहां से डॉक्टरों ने गोरखपुर मेडिकल कॉलेज के लिए रेफर कर दिया। फिलहाल दीपक कुमार की जान बच गयी है और वह खतरे से बाहर हैं। हालाँकि डॉक्टरों का कहना है कि 72 घंटे से पहले उनको अस्पताल से डिस्चार्ज नहीं किया जा सकता है।

वहीं स्थानीय पुलिस ने दीपक कुमार का बयान अस्पताल जाकर दर्ज कर लिया है। पीड़ित छात्र ने अपने बयान में पुलिस को बताया है कि मुझे चंद्र प्रकाश और द्वारिका नाथ श्रीवास्तव द्वारा प्रताड़ित किया जा रहा था एवं पीएचडी नहीं पूरा करने दिया जा रहा था।

बेसुध अवस्था में अस्पताल में भर्ती दीपक कुमार

क्या है मामला

बता दें कि दीपक कुमार प्रोफेसर दीप नारायण यादव के गाइडेंस में पीएचडी करना चाहते थे। प्रोफेसर दीप नारायण यादव ने उनके रजिस्ट्रेशन के लिए साइन कर दिया था। लेकिन दर्शन शास्त्र विभाग के हेड द्वारिका नाथ श्रीवास्तव और डीन चंद्र प्रकाश श्रीवास्तव ने साजिश के तहत पिछले 3 महीने में उनका नामांकन नहीं किया। इसके अलावा जातिसूचक शब्द और गालियों द्वारा उनका काफी उत्पीड़न किया गया। इस मामले को लेकर पीड़ित छात्र दीपक कुमार ने 6 सितंबर को कुलपति को लिखित शिकायत की। कुलपति ने अलोकतांत्रिक ढंग से द्वारिकानाथ श्रीवास्तव और चंद्र प्रकाश श्रीवास्तव के खिलाफ द्वारिकानाथ श्रीवास्तव को ही जांच करने का जिम्मा सौंप दिया।

बताया जाता है कि जांच का जिम्मा पाने के बाद द्वारिका नाथ श्रीवास्तव भड़क गया और अगले दिन शाम को गुंडे भेजकर छात्र संघ चौराहे पर दीपक कुमार की पिटाई करायी और शिकायत वापस लेने का दबाव बनाया। प्रो. द्वारका नाथ ने धमकी दी कि अगर ज्यादा बोलोगे तो तुमको फर्जी मामला में फंसा दूंगा। इसके अगले दिन 18 सितंबर, 2018 को दीपक ने पुन: कुलपति वी. के. सिंह से मिलकर अपनी लिखित शिकायत दी। दो दिन तक कोई सुनवाई न होने के कारण पूरे प्रकरण से क्षुब्ध और हताश होकर दीपक ने 20 सितंबर को जहर खा लिया।

दीपक कुमार का सुसाइड नोट

जहर खाने से पहले दीपक ने सुसाइड पत्र लिखकर और मोबाइल में वीडियो रिकॉर्डिंग में अपनी पीड़ा रिकॉर्ड कर उक्त दोनों प्रोफेसरों को आत्महत्या के लिए जिम्मेदार बताया।

पुलिस ने नहीं दर्ज किया धारा 306 के तहत मामला

वहीं पुलिस ने दोषी प्रोफेसरों के खिलाफ दीपक कुमार द्वारा कुलपति वी.के. सिंह को 18 सितंबर को लिखे शिकायत पत्र के आधार पर धारा 504 व 505 के अंतर्गत मामला दर्ज किया है, लेकिन आत्महत्या के लिए विवश करने की धारा 306 नहीं लगाई गयी है। जबकि पीड़ित छात्र दीपक ने अपने सुसाइड नोट और वीडियो के माध्यम से पुलिस को दिए इकबालिया बयान में साफ-साफ दोषी प्रोफेसरों का नाम लेकर कहा है कि मैंने इन लोगों की प्रताड़ना से तंग आकर आत्महत्या की कोशिश की है।

दूसरी तरफ आरोपी प्रोफेसर द्वारिकानाथ श्रीवास्तव व चंद्र प्रकाश श्रीवास्तव ने पीड़ित छात्र दीपक कुमार द्वारा आत्महत्या के प्रयास के लिए यूनिवर्सिटी गोरखपुर के ही एक अन्य प्रोफेसर दीप नारायण यादव को जिम्मेदार बताया है।  

दोनो आरोपी प्रोफेसर पहले भी छात्रों का कर चुके हैं उत्पीड़न

इस मामलेे में मैंने दीनदयाल उपाध्याय यूनिवर्सिटी गोरखपुर के कुछ छात्रों से संपर्क किया तो उन्होंने भी अपनी व्यथा-कथा सुनाते हुए दोनों आरोपी प्रोफेसरों पर गंभीर आरोप लगाये। पूर्व में एक और दलित छात्र अमर सिंह पासवान के खिलाफ छेड़छाड़ का फर्जी आरोप लगाते हुए निलंबित कर दिया गया था। बाद में जिन लड़कियों से छेड़छाड़ का आरोप लगाया गया था उन्ही लड़कियों ने मना कर दिया था कि नहीं उनके साथ कोई छेड़छाड़ नहीं हुई है। मामले की जांच के लिए एक फैक्ट फाइंडिंग टीम गठित की गई थी। तब से चार साल हो गए हैं, फैक्ट फाइंडिंग टीम ने अब तक अपनी रिपोर्ट ही नहीं दी।       

 

वहीं एक दूसरे छात्र हितेश कुमार सिंह से बात हुई। हितेश ओबीसी वर्ग से ताल्लुक़ रखते हैं। हितेश बताते हैं कि उन्होंने पीएचडी में सन 2008 में एडमीशन लिया था। और प्रोफेसर केसी पांडेय के सुपरवाइजिंग में रिसर्च कर रहा था। सन 2010 में केसी पांडेय का तबादल लखनऊ हो गया और 2011 में चंद्रप्रकाश श्रीवास्तव विभागाध्यक्ष बना दिए गए। चंद्र प्रकाश श्रीवास्तव ने हितेश के किसी भी एसाइनमेंट पर साइन नहीं किया और यह कहते हुए रजिस्टर से हितेश का नाम काट दिया कि तुम्हारा पीएचडी केसी पांडेय के सुपरविजन में ही होगा इसके लिए तुम्हें लखनऊ जाना होगा। इस बीच हितेश लखनऊ और गोरखपुर के बीच पेंडुलम सा झूलता रहा। हितेश ने वीसी से लेकर राज्य और केंद्र ओबीसी कमीशन, राज्यपाल, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, राज्य व केंद्र मानवाधिकार आयोग को पत्र लिखकर इंसाफ की गुहार लगाई पर कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई। हालांकि बाद में ओबीसी कमीशन ने हितेश के पक्ष में संस्तुति कर दी। हितेश कहते हैं कि “जब सुरेंद्र कुमार वीसी बने तो उन्होंने चंद्रप्रकाश श्रीवास्तव को विभागाध्यक्ष के पद से हटाते हुए अपने सुपरविजन में मेरा पीएचडी पूरी कराने का आदेश दिया, लेकिन चंद्रप्रकाश श्रीवास्तव नहीं माने। उन्होंने मेरी फेलोशिप रोक दी। जोकि गैरकानूनी था, जबकि मैं जेआरएफ से गया था। बावजूद इसके मुझे आज तक फेलोशिप की रकम नहीं दी गई। मुझे चार साल तक चंद्र प्रकाश श्रीवास्तव के द्वारा बहुत बुरी तरह से परेशान किया गया। बाद में अशोक कुमार वीसी बने तो उन्होंने चंद्रप्रकाश श्रीवास्तव को फिर से विभागाध्यक्ष बना दिया।” हितेश कुमार सिंह वर्तमान में मेरठ में असिसटेंट प्रोफेसर हैं।

क्या विश्वविद्यालय कैंपस ‘अकादमिक हत्या’ के केंद्र बन रहे हैं?

सरकारी दावे चाहे जो किये जाएं पर हक़ीकत यही है कि उच्च शिक्षा के लिए विश्वविद्यालय कैंपस आने वाले दलित व पिछड़े समुदाय के छात्रों को यूनिवर्सिटी कैंपस एक जीतिविहीन स्वस्थ माहौल दे पाने में नाकाम साबित हुए हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गृहनगर गोरखपुर के दीनदयाल विश्वविद्यालय का कैंपस घोर जातिवादी सवर्ण शिक्षकों से भरा पड़ा है। खुद कुलपति वी.के. सिंह पर भी संघ की नस्लवादी विचारधारा को यूनिवर्सिटी के कैंपस में थोपने का आरोप लगते रहे हैं। जैसा कि पीड़ित छात्र दीपक ने दावा किया है कि वह दो बार कुलपति वी.के. सिंह से उपरोक्त दोषी प्रोफेसरों के खिलाफ शिकायत कर चुका है, बावजूद इसके वीसी द्वारा दोषियों के खिलाफ कोई कार्रवाई न करना इस बात का साफ इशारा है कि सबकुछ कुलपति वी.के. सिंह की मर्जी और जानकारी में किया जा रहा था एवं कुलपति वी.के. सिंह भी आरोपी प्रोफेसरों के दलित-विरोधी अपराध में बराबर के भागीदार हैं।  

वहीं पूर्वांचल सेना के अध्यक्ष धीरेंद्र प्रताप का कहना है कि “पीड़ित दलित छात्र दीपक कुमार को आत्महत्या की हद तक प्रताड़ित करने और जातिबोधक गालियां देने वाले दोनों प्रोफेसरों और उनके सहयोंगियों के खिलाफ प्रशासन की तरफ से कोई कार्रवाई नहीं की जाती तो फिर हम यूनिवर्सिटी और गोरखपुर प्रशासन के खिलाफ आंदोलन करेंगे।”  

(कॉपी-संपादन : राजन)


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