किसानों के सवाल पर बनारस में भड़की एबीवीपी, बोला हमला

बीते 28 सितंबर 2018 को वाराणसी में एबीवीपी के सदस्यों ने सुभाष चन्द्र कुशवाहा की चर्चित पुस्तक ‘अवध का किसान विद्रोह’ पर आधारित एक विचार गोष्ठी के दौरान उत्पात मचाया। वे मारपीट करने के साथ ही आयोजकों और आमंत्रित वक्ताओं को जातिगत गालियां भी दे रहे थे। इस फारवर्ड प्रेस की खबर :

आदिवासियों की बात करनेवालों को अर्बन नक्सली, अल्पसंख्यकों की बात करने वालों को पाकिस्तानी, दलितों की बात करनेवालों को हिंदू विरोधी और महिलाओं की बात करनेवालों को संस्कृति विरोधी बोलकर प्रशासनिक गैर-प्रशासनिक और भीड़ द्वारा हत्या हमला करवाकर पहले ही वंचित तबके के लोगों के हक़ में बोलने पर पूर्ण या आंशिक प्रतिबंध लगा चुके हैं। वे अब किसानों के हक़ में बोलने पर भी हमला कर रहे हैं। पहले मंदसौर में इस तरह की एक घटना सामने आयी थी। अब ऐसी ही घटना बीते 28 सितंबर 2018 को वाराणसी में घटित हुई है।

तो क्या फासीवादी सत्ता अब किसानों को भी अपना प्रतिरोधी मान चुकी है? क्या असहमति की तमाम संभावित आवाज़ों का गला इसी प्रकार घोंट दिया जायेगा और वंचित समाज हाथ पर हाथ धरे सब देखते रह जायेगा?

विचार गोष्ठी के दौरान सुभाष चन्द्र कुशवाहा की चर्चित पुस्तक ‘अवध का किसान विद्रोह’ का हुआ विमोचन

बता दें कि 28 सितंबर 2018 को ‘गांव के लोग’ पत्रिका एवं उदय प्रताप महाविद्यालय, वाराणसी के हिन्दी विभाग द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित और ‘साम्राज्यवादी बाज़ारवाद के दौर में भारतीय किसान और अतीत के निशान’ विषय पर केन्द्रित विचार-गोष्ठी का आयोजन किया गया था। यह आयोजन प्रख्यात कथाकार और इतिहासकार सुभाष चन्द्र कुशवाहा की चर्चित पुस्तक “अवध का किसान विद्रोह” के सन्दर्भ में था। इसके उद्घाटन सत्र में भाजपा के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के तथा कुछ अन्य अज्ञात गुण्डों द्वारा जमकर उपद्रव करके कार्यक्रम में व्यवधान डाला गया और आयोजन को न होने देने की हर मुमकिन कोशिश की गई।

ग़ौरतलब है कि इसके आयोजन के लिये न केवल महाविद्यालय के प्राचार्य से पूर्व में अनुमति ले ली गयी थी, बल्कि महाविद्यालय का हिन्दी विभाग स्वयं इसका सह-आयोजक भी था। आयोजन शुरु होते ही भगवा गमछा वाले कुछ छात्र आकर शोर-शराबा करने लगे और उन्होंने माइक दूर हटा दिया। मंच पर मौज़ूद मुख्य वक्ता और इतिहासकार प्रोफेसर कपिल कुमार ने उग्र छात्रों की भीड़ को यह समझाने की कोशिश भी की कि आयोजन की पहले अनुमति ली गयी थी, पर वे नहीं मान रहे थे। फिर इस शोर-शराबे के बीच उनके दो गुट बन गये और उन्होंने एक-दूसरे पर भी कुर्सियों से हमला कर दिया। और साथ ही जूते-चप्पल व बेल्ट से मारपीट की। उन्होंने आयोजकों और आमंत्रित वक्ताओं को लक्ष्य कर जाति से संबंधित भद्दी टिप्पणियां कीं और कहा कि यहां कोई प्राचार्य नहीं है और वे किसी की परवाह नहीं करते।

विचार गोष्ठी में मौजूद गणमान्य

सवाल उठता है कि जब महाविद्यालय प्रशासन और हिन्दी विभाग ने इस आयोजन के लिये सहमति देते हुए इसका सह-आयोजक होने की ज़िम्मेदारी ली थी तो क्या छात्रों को इसकी सूचना देना उनका काम नहीं था? जबकि विद्यालय प्रशासन का कहना है कि हमने कॉलेज के नोटिस बोर्ड पर सूचना दी थी. जिन्हें आना हो आये किसी के लिए मनाही नहीं थी।

तो ये लोग कौन थे और किसके इशारे पर उन्होंने आयोजन को बाधित कर दिया? हंगामे के बाद जब पुलिस आयी तो उसने भी उत्पातियों को पकड़ने के बजाय आयोजकों से ही कार्यक्रम बंद करने को कहा। इस बात से भी यह सन्देह उत्पन्न होता है कि घटना सुनियोजित थी और पुलिस को पहले ही समझा दिया गया था कि उसे छात्रों का कुछ नहीं करना है। यह सवाल भी अपनी जगह है कि यदि प्रशासन को आयोजन से कोई दिक्कत थी तो उन्होंने अनुमति दी ही क्यों थी?

घटना पर अपनी प्रतिक्रिया में लेखक सुभाष चंद्र कुशवाहा ने कहा कि हम तो दंग रह गये। एक बार में तो समझ में ही नहीं आया कि क्या हो रहा है। इतिहास की किताब पर क्यों हमला किया जा रहा है।  हम तो साहित्यकार लोग हैं।

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सोशल मीडिया पर इस घटना की कई बुद्धिजीवियों ने निंदा की है। वरिष्ठ कवि अरुण कमल हमले के खिलाफ प्रतिक्रिया देते हुए कहते हैं कि – “मैं हमलों के विरोध में पीड़ितो के साथ हूँ।पूरी दुनिया में  हर जगह।” वहीं जनवादी लेखक संघ, इलाहाबाद के सचिव कवि व अनहद पत्रिका के संपादक संतोष चतुर्वेदी ने इसे हमले की निंदा करके हुए कहा कि यह फासीवादी कृत्य है जो इस तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रमों और आयोजनों का एक ठोस प्रतिवादी आधार होता जो इनकी सत्ता को स्थिर नहीं होने देगा। मैं इस हमले का कड़ा प्रतिवाद करते हुए अपना विरोध दर्ज करता हूँ।

वहीं रंग एक्टिविस्ट  कवि व संपादक राजेश चंद्र ने हमले के प्रति अपने गुस्से का इज़हार करके हुए कहा, “यह छिपी हुई बात नहीं हे कि आज देश में किसानों, दलितों, आदिवासियों, स्त्रियों एवं छात्रों के सुलगते सवालों को लेकर काम करने वाले लोगों से किस विचारधारा और संगठन को परेशानी है और कौन से लोग असहमति की तमाम आवाज़ों को डराने-धमकाने और चुप कराने का देशव्यापी अभियान चला रहे हैं। ऐसे लोगों को मुंहतोड़ जवाब अब नहीं तो कब दिया जायेगा?”

बहुजन विमर्श को विस्तार देतीं फारवर्ड प्रेस की पुस्तकें

स्त्रीकाल पत्रिका के संपादक संजीव चंदन ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “यह सरकार द्वारा दक्षिणपंथी संगठनों, समूहों की हौसला आफजाई से पैदा साहस से हो रहा है। इन हमलावरों, हत्यारों पर कार्रवाई नहीं होती। मंत्री इन्हें सम्मानित कर रहे हैं। इससे इन्हें एक स्पष्ट संदेश है। यह देश के शीर्ष से हो रहा है। झूठे बुनियाद पर बनाई जा रही आक्रामकता में देश की बड़ी पार्टी के मुखिया की खुलेआम सहमति है”

साहित्यकार पत्रकार कुमार मुकुल ने संस्‍कृति तक्षकों की मूढतापूर्ण कार्रवाई की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि, ‘गांव के लोग’ पत्रिका और उदय प्रताप महाविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा सुभाषचंद्र कुशवाहा की पुस्‍तक ‘अवध का किसान विद्रोह’ पर यूपी कालेज वाराणसी के सभागार में आयोजित विचार गोष्‍ठी में जिस तरह से स्‍थानीय समाज कंटकों ने उपद्रव किया वह शर्मनाक है। इस कार्यक्रम के मुख्‍य वक्‍ता अतीत के प्रति संघ के दृष्टिकोण के समर्थक माने जाते हैं और हंगामा करने वाले लोग भी संस्‍कृति रक्षा के नाम पर ही हंगामा कर रहे थे। हम लेखकगण इन संस्‍कृति तक्षकों की मूढतापूर्ण कार्रवाई की निंदा करते हैं।”

दिल्ली जलेस के सचिव व साहित्यकार प्रेम तिवारी ने कहा कि यह हिंसा सिर्फ और सिर्फ भय फैलाने के लिए की जा रही है। इसके पीछे कोई धार्मिक कारण नहीं बल्कि राजनीतिक एजेंडा है। भय के जरिये अपनी सत्ता बरकरार रखने का। इसके पहले की भी सूबे में सपा और बसपा सरकारें रही हैं पर कभी किसी सांस्कृतिक आयोजन पर हमला नहीं हुआ। एबीवीपी पुराना संगठन है और कई वर्षों से तमाम विद्यालयों, महाविद्यालयों में छात्र राजनीति करती रही है। पर सत्ता के शह से वह हिंसक चरित्र धारण कर चुकी है, जो अब किसी भी असहमति को विमर्श से नहीं बल्कि हिंसा ले निपटाना चाहती है।”

गोरखपुर जन संस्कृति मंच के सचिव व पत्रकार मनोज सिंह और उदय प्रताप कॉलेज इतिहास विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. महेंद्र प्रताप आदि ने भी एबीवीपी के सदस्यों द्वारा उत्पात मचाये जाने की घटना की निंदा की है।

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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