प्रकाश संग ओवैसी : बहुजन राजनीति के बदले चुनावी समीकरण पर जोर

असदुद्दीन ओवैसी के साथ प्रकाश आंबेडकर का गठबंधन क्या गुल खिलायेगा, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। लेकिन एक बात तो साफ है कि ओवैसी की धर्म आधारित राजनीति प्रकाश आंबेडकर की दलित राजनीति के लिए दोधारी तलवार साबित होगी

राजनीति संभावनाओं का खेल है। इसके नये उदाहरण हैं हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी और भारतीय रिपब्लिकन पार्टी बहुजन महासंघ के अध्यक्ष प्रकाश आंबेडकर। खबर यह है कि दोनों मिलकर 2019 में महाराष्ट्र में चुनाव लड़ेंगे। हालांकि इसकी अभी औपचारिक घोषणा नहीं की गयी है।

ओवैसी ने कहा है कि 2 अक्टूबर, 2018 को महाराष्ट्र के औरंगाबाद में इसकी औपचारिक घोषणा कर दी जाएगी। वहीं प्रकाश आंबेडकर ने भी सीटों के बंटवारे को लेकर बातचीत की प्रक्रिया जारी रहने के संकेत दिये हैं। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन(एआईएमआईएम) के विधायक इम्तियाज जलील ने बताया है कि एआईएमआईएम और भारिपा बहुजन महासंघ के बीच गठबंधन का फैसला पुणे स्थित प्रकाश आंबेडकर के घर पर दोनों नेताओं के बीच हुई बैठक में किया गया। दोनों पार्टियां महानगरपालिका, लोकसभा और विधानसभा चुनाव मिलकर लड़ेंगी।

माना जा रहा है कि इन दोनों के साथ आने से कांग्रेस के नेतृत्व में बनने वाले महागठबंधन की संभावनायें महाराष्ट्र में धुमिल हो जाएंगी। एक वजह राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का कांग्रेस के साथ मतभेद पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। शरद पवार ने अपने पत्ते अभी नहीं खोले हैं।

महाराष्ट्र की राजनीति की बात करें तो वहां की राजनीतिक लड़ाई और सामाजिक लड़ाई कमोबेश एक जैसी है। बाबा साहेब आंबेडकर द्वारा चलाए गए आंदोलन और बाद में सत्तर के दशक में दलित पैंथर्स आंदोलन ने वहां दलित राजनीति को स्थापित कर दिया है। इसी राजनीतिक ताकत की मुखर अभिव्यक्ति इस वर्ष 1 जनवरी 2018 को हुई जब बड़ी संख्या में दलित भीमा-कोरेगांव पहुंचे। वह मौका था महार सैनिकों द्वारा पेशवा सैनिकों पर जीत के दो सौ साल के जश्न का। प्रकाश आंबेडकर की पार्टी भारिपा बहुजन महासंघ की बड़ी भूमिका थी। हिंसा के बाद जब महाराष्ट्र बंद का आह्वान उन्होंने किया तब पूरा का पूरा महाराष्ट्र थम गया था।

प्रकाश आंबेडकर और असदुद्दीन ओवैसी : दलित-मुसलमान वोटरों पर नजर

वहीं एआईएमआईएम के राष्ट्रीय अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी की पहचान धर्म के आधार पर राजनीति करने वाले नेता की रही है। उनके निशाने पर जाहिर तौर पर आरएसएस और भाजपा ही होती है। उनके सच्चे लेकिन कटू बयान उन्हें हमेशा सुर्खियों में बनाये रहते हैं। उनके उपर मुसलमानों को भड़काने का आरोप भी लगता रहा है।

प्रकाश आंबेडकर के साथ उनकी नजदीकी भीमा-कोरेगांव हिंसा के बाद बढ़ी है। ओवैसी ने अपने बयान में दलितों के साथ खड़े होते हुए तब कहा था – ‘अगर दलित मुसलमानों के साथ मिल जाये, तो वो सवर्ण हिन्दुओं से जूते साफ़ करवाएंगे।’

उनके इस बयान को लेकर तब भाजपा और शिवसेना ने खूब बवाल काटा था। उनपर दलितों को भड़काकर हिन्दू एकता  को तोड़ने की साजिश रचने का आरोप लगाया गया।

महाराष्ट्र में  प्रकाश आंबेडकर और ओवैसी की राजनीति

जहां तक प्रकाश आंबेडकर और ओवैसी के बीच गठबंधन की पृष्ठभूमि का सवाल है, वह पूरी तरह दलितों और मुसलमानों पर आधारित है। इस चुनावी समीकरण का असर पहले भी महाराष्ट्र में देखा जा चुका है जब 2013 में नांदेड़ नगरपालिका चुनाव में एआईएमआईएम ने 11 स्थानों पर जीत हासिल कर हलचल पैदा कर दी थी। हालांकि इस जीत में भी उसे दलित संगठनों का साथ मिला था।

बहरहाल, लोकसभा चुनाव के मद्देनजर पहले यह कयास लगाया जा रहा था कि प्रकाश आंबेडकर और ओवैसी दोनों महागठबंधन के हिस्सा बनेंगे। इस संबंध में कांग्रेस की तरफ से पहल भी की गयी। वहीं राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी भी इसके पक्ष में थी कि भाजपा विरोधी मतों में बिखराव रोकने के हर संभव प्रयास किये जाने चाहिए। ऐसे में असदुद्दीन ओवैसी के साथ प्रकाश आंबेडकर का गठबंधन क्या गुल खिलायेगा, यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। लेकिन एक बात तो साफ है कि ओवैसी की धर्म आधारित राजनीति प्रकाश आंबेडकर की दलित राजनीति के लिए दोधारी तलवार साबित होगी।

(कॉपी संपादन : रंजन)


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