पदोन्नति में आरक्षण : सुप्रीम कोर्ट के फैसले की दस महत्त्वपूर्ण बातें

संविधान पीठ के फैसले से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को पदोन्नति में आरक्षण का मार्ग प्रशस्त हो गया है। लेकिन साथ ही कोर्ट ने क्रीमी लेयर लगाने को लेकर अपनी बात कही है। इसके अलावा कार्य कुशलता के सवाल को भी कोर्ट ने एकबार फिर दुहराया है। जानें फैसले की दस महत्वपूर्ण बातें

बीते 26 सितंबर 2018 को सर्वोच्च न्यायालय की पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ के फैसले ने पदोन्नति में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण का रास्ता साफ कर दिया है। 2006 में एम. नागराज मामले में सर्वोच्च न्यायालय की पांच सदस्यीय पीठ ने अपने फैसले में पिछड़ेपन के बारे में आंकड़े जुटाने की जो शर्त लगा दी थी उसके बाद पदोन्नति में आरक्षण पर रोक लग गयी थी।

मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा समेत जस्टिस कुरियन जोसेफ, जस्टिस रोहिंग्टन नरीमन, जस्टिस संजय कौल और जस्टिस इंदु मल्होत्रा की पांच जजों की संविधान पीठ के समक्ष यही सवाल था कि 2006 के ‘एम नागराज बनाम भारत सरकार’ मामले में तत्कालीन संविधान पीठ ने ‘प्रोमोशन में आरक्षण’ पर जो फैसला दिया था उस पर पुनर्विचार की ज़रूरत है या नहीं।

सवाल है कि संविधान पीठ के फैसले में वह कौन सा पेंच है जिसे लेकर सवाल उठाया जा रहा है। यह कहा जा रहा है कि इससे अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति को जितना लाभ मिलना चाहिए था, नहीं मिल सकेगा।

हम आपको बताते हैं सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के दस महत्वपूर्ण तथ्य –  

1. संवैधानिक पीठ ने साफ कहा कि सरकारी नौकरियों में संविधान की धारा 16(4) के प्रावधानों के अनुसार प्रमोशन में भी आरक्षण दिया जा सकता है।

2. अदालत ने कहा कि प्रदेश सरकारों को एससी-एसटी कर्मचारियों को प्रमोशन देने के लिए अब पिछड़ेपन का आंकड़ा जुटाने की ज़रूरत नहीं है।

3. हालांकि कोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक क्षमता का सवाल महत्वपूर्ण है। इसे ध्यान में रखा जाना चाहिए। इस प्रकार कोर्ट ने एम. नागराज मामले में दिये गये फैसले में निर्धारित इस शर्त को बरकरार रखा है।  

4. सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि एम. नागराज मामले में दिये गये फैसले को सात जजों के बेंच में भेजे जाने की जरुरत नहीं है। 12 साल पहले दिये गये फैसले में कोर्ट ने पदोन्नति में आरक्षण देने को लेकर पांच शर्त निर्धारित किया था। इस प्रकार पिछले 12 वर्षों से चले आ रहे मामले का पटापेक्ष हो गया है।

सुप्रीम कोर्ट, नई दिल्ली

5. संविधान पीठ ने केंद्र सरकार के इस अपील को खारिज कर दिया कि पदोन्नति में आरक्षण के लिए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की कुल आबादी को ध्यान में रखा जाय।

6. संविधान पीठ ने साफ कहा कि नागराज मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 2006 में दिया गया फैसला कि आरक्षण के लिए मात्रात्मक आंकड़ों को जुटाना होगा गलत फैसला था।

7. संविधान पीठ ने कहा कि ओबीसी के तर्ज पर एससी और एसटी पर भी क्रीमी लेयर लागू हो ताकि पिछड़ा वर्गों के सभी समूहों की उचित भागीदारी हो सके।

8. संविधान पीठ ने कहा कि आरक्षण का मूल मकसद पिछड़े वर्गों के सभी सदस्यों को आगे बढ़ाने के लिए है ताकि वे भारत के अन्य वर्गों के नागरिकों के साथ हाथ से हाथ मिलाकर आगे बढ़ सकें। यह संभव नहीं होगा यदि क्रीमी लेयर की सीमा में आने वाले लोगों को ही बार-बार अवसर मिलता रहे और शेष लोग पीछे रह जायें।

9. संविधान पीठ ने साफ कहा कि एससी और एसटी पर क्रीमी लेयर का लागू किया जाना धारा 341 और 342 के खिलाफ नहीं है और न ही राष्ट्रपति द्वारा अनुमोदित उस सूची का उल्लंघन है जिसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की व्याख्या की गयी है। क्रीमी लेयर केवल उन लोगों को आरक्षण से बाहर करेगा जो आरक्षण का लाभ पूर्व में पा चुके हैं और अस्पृश्यता व पिछड़ेपन से बाहर निकल चुके हैं।

10. संविधान पीठ ने कहा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की सूची जस की तस रहेगी। क्रीमी लेयर का संबंध केवल उन लोगों से है जो समूह अथवा उप समूहों में अस्पृश्यता व पिछड़ेपन से बाहर निकल चुके हैं। उन्हें आरक्षण की आवश्यकता नहीं है।

सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ द्वारा दिये गये पूरे फैसले को यहां देखें।

बारह साल पहले का वह फैसला जिसे सुप्रीम कोर्ट ने बदल दिया

दरअसल 2006 में ‘एम. नागराज बनाम भारत सरकार’ मामले की सुनवाई करते हुए पांच जजों की ही संविधान पीठ ने तब फैसला दिया था कि सरकारी नौकरियों में प्रमोशन के मामले में एससी-एसटी वर्गों को संविधान के अनुच्छेद 16 (4) और 16 (4 ख) के अंतर्गत आरक्षण दिया जा सकता है। लेकिन आरक्षण के इस प्रावधान में कुछ शर्तें जोड़ते हुए अदालत ने यह भी कहा कि प्रमोशन में आरक्षण देने के लिए किसी भी सरकार को समुदाय का पिछड़ापन, प्रशासनिक हलकों में उनका अपर्याप्त प्रतिनिधित्व एवं कुल प्रशासनिक कार्यक्षमता आदि मानदंडों का अनुपालन करना होगा। साथ ही यह भी कहा था कि पदोन्नति में आरक्षण देने से पहले सरकारों को मात्रात्मक आंकड‍़े जुटाने होंगे।

(कॉपी संपादन : अशोक/सिद्धार्थ)


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