यूजीसी के कामकाज से सरकार ही बदनाम हुई

प्रगतिशील पत्र-पत्रिकाओं व शोधपरक जर्नल्स को ब्लैकलिस्ट करके सरकार खुद अपने को बदनाम कर रही है। आने वाले समय में नई पीढ़ी, बच्चे और लोग क्या कहेंगे? क्या सरकार दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों की आवाज नहीं सुनना चाहती

यूजीसी के भीतरी तंत्र में असल दिक्कत कहां है? यह सवाल अकादमिक जगत को सबसे ज्यादा परेशान कर रहा है और जाहिर है वह इसका जवाब भी चाहता है। वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के जाने माने पूर्व वैज्ञानिक प्रोफेसर बापूजी एम. कहते हैं कि मूल बात यह है कि सरकारी तंत्र ने यूजीसी की फंक्शनिंग (कामकाज) को ही नष्ट कर डाला है।

प्रोफेसर बापूजी ने सीएसआईआर में 1973 से 2002 तक भुवनेश्वर में कार्य किया। इन दिनों कई नामी विश्वविद्यालयों की विजिटिंग फैकल्टी हैं। वह कहते हैं, “सारी अकादमिक बिरादरी जान रही है कि कहां क्या हो रहा है। उनमें कई ने मुंह नहीं खोला लेकिन सबको पता है। गंभीर शोध और खोजों के लिए आज पैसा नहीं मिल रहा है। दुनिया के उच्च स्तरीय शोध के सामने भारतीय वैज्ञानिक कैसे टिक सकते हैंदूसरी तरफ जो लोग ठीकठाक कुछ काम कर रहे हैं उनको चुप कराया जा रहा है। इस तरह (पत्रिकाओँ को ब्लैकलिस्ट करने) की कार्रवाई की क्यों जरूरत पड़ रही है सरकार कोबहुत मूल्यवान पत्रिकाओँ को यूजीसी ने डिलिस्ट किया है। मैं पूरे अकादमिक समाज आह्वान कर रहा हूं तथा अपने समय और नई पीढ़ी के सभी वैज्ञानिक साथियों और स्कॉलर्स का ध्यान इस ओर दिला रहा हूं। यूजीसी की कार्रवाई को देखते हुए सभी को चाहिए कि इन पत्रिकाओँ का और ज्यादा प्रचार करें, नए सिरे से ग्राहक बने और बनाएंसब्सक्राइव भी करें।”

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