बिहार में महिषासुर शहादत दिवस की तैयारियां जोरों पर

हाल के वर्षों में अब बिहार में भी मूलनिवासियों में सांस्कृतिक बोध का प्रसार हुआ है और द्विजों के वर्चस्ववादी परंपराआें का प्रत्यक्ष विरोध कर रहे हैं। बिहार में इस वर्ष भी महिषासुर शहादत दिवस की तैयारियां जोरों पर है। फारवर्ड प्रेस की खबर :

बिहार के वैशाली के महुआ में इस बार भारतीय मूलनिवासी सांस्कृतिक मंच द्वारा बड़े स्तर पर 19 अक्टूबर 2018 को महिषासुर शहादत दिवस आयोजित किया जा रहा है। बिहार में विभिन्न जगहों जिनमें महनार, बहरानपुर, लालगंज शामिल हैं, समेत कई अन्य जगहों पर भी पिछले कई सालों से छोटे स्तर पर महिषासुर शहादत दिवस आयोजित होता आ रहा है और इस बार भी बिहार में लगभग 10 जगहों पर बहुजनों द्वारा  भारतीय मूलनिवासी सांस्कृतिक मंच के बैनर तले यह आयोजन किया जाएगा।

‘भारतीय मूलनिवासी सांस्कृतिक मंच’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवाजी राय यादव जोकि बिहार के वैशाली जिले के मुख्यालय हाजीपुर में तकरीबन 22 सालों से महिषासुर शहादत दिवस आयोजित करते आ रहे हैं, अपने सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति बहुजनों को जागरुक कराने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ हैं। 75 वर्षीय शिवाजी राय जो 2015—16 में बामसेफ के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे, कहते हैं, ‘ब्राह्मणवाद और मनुवाद की मुखालफत हमने सबसे पहले 1984 में की थी, जब घर में भी तमाम विरोधों के बावजूद बिना ब्राह्मण के अपनी बेटी की शादी की थी। उसके बाद तो यह सिलसिला शुरू होकर हमारे घर का रिवाज बन गया है कि हम किसी भी आयोजन में ब्राह्मण से धार्मिक कर्मकांड नहीं करवाते। हालांकि जब बेटी की शादी बिना पंडित के धार्मिक पोंगापंथ की मुखालफत करते हुए की थी, तब समाज में बहिष्कार हुआ था, तब वहां काम कर रहे संगठन माले ने हमारी मदद की थी। बामसेफ से पृथक एक सांस्कृतिक मंच गठित करने की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि वह सिर्फ राजनीतिक स्तर पर पहलकदमी लेकर खुद को स्थापित करने का काम कर रहा था। मगर हमारा मूल उद्देश्य बहुजनों को अपनी संस्कृति से परिचित करा ब्राह्मणवाद—मनुवाद का अनुयायी बनने से रोकना था।’

महिषासुर शहादत दिवस समारोह को लेकर लगाये जा रहे हैं बैनर

शिवाजी राय यादव ने हालांकि महिषासुर शहादत दिवस के आयोजन की शुरुआत अपने घर पर बहुत छोटे स्तर से की थी, मगर आज यह किसी पहचान का मोहताज नहीं है। तकरीबन पांच सालों से तो बिहार के वैशाली जिले में भव्य रूप में महिषासुर शहादत दिवस आयोजित किया जा रहा है जिसमें हजारों की संख्या में बहुजन भागीदारी करते हैं। वो कहते हैं, ‘हमारा संगठन महिषासुर शहादत दिवस के अलावा अपने अन्य महापुरुषों की जयंतियां भी मनाता रहता है। बहुजनों को ब्राह्मणवाद-मनुवाद की गुलामी से मुक्ति दिलाना हमारे संगठन का मुख्य ध्येय है, और यह तभी होगा जब हम अपने नायकों को याद कर गौरवान्वित होंगे, जानेंगे कि षड्यंत्रपूर्वक ब्राह्मणों ने किस तरह बहुजनों को आज भी विभिन्न मान्यताओं, रीति-रिवाजों, कर्मकांडों के माध्यम से अपना मानसिक गुलाम बनाकर रखा है।’

शिवाजी राय

महिषासुर दिवस का उच्च जातियों द्वारा किसी तरह का विरोध किए जाने के बाबत वो बताते हैं, ‘अब तो हमें किसी तरह का विरोध नहीं झेलना पड़ता क्योंकि बहुजन अब ताकत में हैं। नहीं तो पहले यह हालत थी कि हम अपने महापुरूषों के बारे में बातचीत भी  छिपकर किया करते थे। तब भी उद्देश्य यही था कि थोड़ी-थोड़ी संख्या में ही सही लोग अपने सांस्कृतिक मूल्यों को जानें, मोटिवेट हों और यह हो रहा है। हमने तो यह शुरुआत तभी कर दी थी जब लोग इसके बारे में जानते भी नहीं थे। जेएनयू के शोधार्थियों ने तो महिषासुर शहादत दिवस की शुरूआत हमसे बहुत बाद में की। अब हमारी कोशिश है कि पूरे भारतवर्ष में बहुजन अपने सांस्कृतिक बोधों के प्रति जागरुक हों, अपने पूर्वजों-आदर्शों की जयंतियां मना ब्राह्मणवाद-मनुवाद की मान्यताओं को रद्द करें। हमारा उद्देश्य है कि हमारी जितनी भी शोषित जातियां हैं, उसको अपने महापुरुषों के नाम पर एक बैनर-संगठन तले लायें और अपने समाज को उनके सामाजिक और मानसिक गुलामी से मुक्ति दिलाएं।’

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भारत के अलावा नेपाल में भी मूल निवासियों यानी पिछड़ों-आदिवासियों की जागरुकता के लिए भारतीय मूल निवासी सांस्कृतिक मंच कार्यक्रम आयोजित कर चुका है।

अभी तक दुर्गा पूजा में महिषासुर वध और विजयादशमी में रावण दहन का विरोध नहीं किए जाने के बारे में संगठन की रणनीति के बाबत शिवाजी राय कहते हैं, ‘पहले हम अपने बहुजनों का पूर्ण विश्वास व समर्थ हासिल करना चाहते हैं, फिर खुलकर दुर्गा पूजा में महिषासुर वध न किए जाने और रावण दहन का विरोध कर सकते हैं।’

जानकारी के अभाव में बहुजन कर रहे अपने पूर्वजों के हत्यारों की पूजा : रवि

लंबे समय से बामसेफ के विंग राष्ट्रीय मूलनिवासी संघ से जुड़े रहे रवि कुमार यादव पिछले कुछ साल पहले गठित भारतीय मूलनिवासी सांस्कृतिक मंच के प्रदेश अध्यक्ष हैं, कहते हैं, ‘2011 से जेएनयू में जोर-शोर से आयोजित किए गए महिषासुर शहादत दिवस के बाद यह चेतना वृहद स्तर पर फैल रही है कि बहुजनों को अपने सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति जागृत किया जाए। बहुजनों को अपने पूर्वजों, इतिहास के बारे में जानकारी देना हमारे संगठन का मुख्य उद्देश्य है। इतिहास की जानकारी के अभाव में बहुजन उनको पूज रहे हैं जो हमारे पूर्वजों के हत्यारे थे। उन्हें दोस्त&दुश्मन की पहचान नहीं है।

रवि कुमार यादव

पेशे से एलआईसी एडवाइजर रवि कहते हैं, ‘हमारे संगठन का मुख्य उद्देश्य यही है कि चेतना के स्तर पर बहुजनों को जगाया जाए, उनमें सांस्कृतिक मूल्यबोध जगाए जाएं जिससे वे अच्छे-बुरे की पहचान कर पाएं। हमारा संगठन अपने लोगों को अपने पूर्वजों के बारे में बताने के लिए महिषासुर शहादत दिवस जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। वामसेफ से इतर इस संगठन का गठन किया ही इसलिए गया है कि बहुजनों में सांस्कृतिक बोध जगाया जाए। मनुवादी व्यवस्था द्वारा थोपी गई मानसिक गुलामी तोड़ने के लिए लोगों को सांस्कृतिक परिवर्तन के माध्यम से जागृत करने की जरूरत महसूस की गई और महिषासुर दिवस जैसे आयोजन उसकी की एक कड़ी हैं।’

अपनी संस्कृति को जानें बहुजन : रंजीत

‘भारतीय मूलनिवासी सांस्कृतिक मंच’ के प्रदेश सचिव रंजीत पासवान महिषासुर शहादत दिवस आयोजित ​किए जाने के बारे में कहते हैं, ‘बिहार के वैशाली जनपद के महुआ में केहराकला खुर्द प्राथमिक विद्यालय के प्रांगण में बड़े स्तर पर इस बार महिषासुर शहादत दिवस आयोजित किया जाएगा। हम लोग अपने इतिहास के बारे में जान रहे हैं और अपने लोगों को इससे परिचित करा रहे हैं, अपने महापुरुषों का सम्मान दिवस आयोजित कर रहे हैं।’

रंजीत

बामसेफ के विंग राष्ट्रीय मूलनिवासी संघ से 2012 में जुड़े रंजीत पासवान कहते हैं, ‘जहां तक दुर्गा पूजा में महिषासुर वध के विरोध का सवाल है तो जब हम महिषासुर शहादत दिवस आयोजित कर रहे हैं तो यह स्वाभाविक रूप से दुर्गा पूजा का विरोध है। हमारा संगठन का मूल उद्देश्य यह है कि 85 प्रतिशत मूल निवासियों को यह बताया जाए कि अब तक हम लोग अज्ञानतावश अपने पूर्वजों के अलावा दूसरों का सम्मान करते आ रहे हैं, अपने पूर्वजों के वध को सेलिब्रेट करते आ रहे हैं वो बंद करें। अपनी संस्कृति-इतिहास को जानें और अपने आदर्शों-महापुरुषों का सम्मान करें। यह मानसिक गुलामी हजारों-हजार सालों से बहुजनों को कैद किये हुए है, जिसका नतीजा है कि मनुवादी व्यवस्था हम पर अब तक हावी है, हमारा शोषण किया जा रहा है या कहें कि शोषित होने को बाध्य हैं।’

रंजीत कहते हैं 2012 तक मुझे भी अपने इतिहास के बारे में जानकारी नहीं थी तो अपने आदर्शों का अपमान करने वाले कार्यक्रम विजयादशमी के रावण वध और दुर्गा पूजा में हिस्सेदारी करता था। पेशे से शिक्षक रहे रंजीत ने 9 मार्च 2006 को नौकरी छोड़ जिला परिषद का चुनाव लड़ा मगर तब चुनाव हार गए। उसके बाद उन्होंने दोबारा जिला परिषद के लिए निर्दलीय चुनाव लड़ा और 2011 से 2016 तक जिला परिषद सदस्य रहे।

भारतीय मूलनिवासी सांस्कृतिक मंच के आयोजन को समाज के परिवर्तन के लिए बहुत जरूरी बताने वाले इसके समर्थक जयप्रकाश जोकि धोबी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं, कहते हैं, ‘समाज में अंधविश्वास और कुरीतियों, गलत परंपराओं, ढोंग-पाखंड से बहुजनों को दूर कर उन्हें समझाने का जमीनी स्तर पर काम कर रहा है यह संगठन। हमारे नायकों को राक्षस के तौर पर गढ़ने का जो काम मनुवादियों ने किया है उसके खिलाफ लोगों को जागृत करने के लिए महिषासुर शहादत दिवस जैसे आयोजन किये जाते हैं, जिससे कि बहुजन न केवल अपने आदर्शों-नायकों के बारे में जाने बल्कि ब्राह्मणवादी व्यवस्था के छल-कपट और गलत परंपराओं से भी चेत अपने आदर्शों को पूजें।’

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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