सीसीएस के बाद एस्मा, यूजीसी का फरमान, अब राष्ट्रीय एकता की कसम खायें शिक्षक

उच्च शिक्षा के आईने में यूजीसी का चेहरा पूरी तरह निर्लज्ज दिख रहा है। पहले उसने केंद्रीय सेवा नियमावली (सीसीएस) और अब एस्मा थोपने की बेशर्मी दिखाई। लेकिन देश के केंद्रीय विश्वविद्यालयों और अन्य शिक्षण संस्थानों के लिए राहत है कि दिल्ली में डीयू और जेएनयू की जागरूकता से यूजीसी कामयाब नहीं हो सकी है। फारवर्ड प्रेस की रिपोर्ट :

आगामी 31 अक्टूबर को शिक्षकों को राष्ट्रीय एकता की शपथ लेने का निर्देश

देश में अब तक एस्मा को सिर्फ बिजली और अन्न-जल से जुड़ी हड़तालों पर सरकारें इस कानून को लागू करती रही हैं लेकिन जल्द ही उसे विचारों की अभिव्यक्ति से लेकर शिक्षा के सवालों को उठाने के खिलाफ भी इस्तेमाल किया जा सकता है। वह तो शुक्र कीजिए कि डीयू के जागरूक शिक्षक समुदाय का, उसने मामले को फौरन लपका, बैठक की और सरकार को बयान देने पर बाध्य होना पड़ा। हालांकि इस बारे में गठित की गई कमेटी आधिकारिक तौर पर भंग नहीं की गई है।

हाल के दिनों में यह दूसरा मामला है जब उच्च शिक्षा में दमन के लिए नई कवायद हुई है। याद होगा आपको कि कॉलेज विश्वविद्यालयों के शिक्षक समुदाय पर हाल में केंद्रीय सेवा नियमावली (सीसीएस) लागू करने की कोशिश की गई थी, जिसमें किसी रिसर्च जर्नल में लिखने से लेकर मंच तक में इन मामलों का जानकार कोई शिक्षक और प्रोफेसर सरकार की सामाजिक-आर्थिक नीतियों की आलोचना नहीं कर सकते, लेकिन इसका भी जेएनयू के शिक्षक समुदाय ने जोरदार विरोध किया तो सरकार ने अपने कदम पीछे खींचे।

योगी सरकार की राह पर मोदी सरकार, सभी विश्वविद्यालयों को निर्देश जारी

जाहिर तौर पर सरकार की लगातार कोशिश है कि अकादमिक समुदाय में किसी ना किसी रूप में भय का वातावरण बना रहे ताकि वो अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के इस्तेमाल से किसी ना किसी तरह महरूम रहें। दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक एसोसिएशन (डूटा) ने सरकार के इस कदम पर बयान जारी करके सरकार पर हमला बोला है। शिक्षक समुदाय के तीव्र विरोध के बीच सरकार ने 23 अक्टूबर 2018 को एक और सर्कुलर जारी किया है जिसमें कहा गया है कि विश्वविद्यालय परिसरों में सभी शिक्षक प्रोफेसर और कर्मचारी सरदार बल्लभ भाई पटेल की याद में 31 अक्टूबर को विशेष कार्यक्रम में शामिल हों और देशभक्ति के लिए राष्ट्रीय एकता दिवस की शपथ लें, सभी को ये शपथ दिलाएं और क्षेत्र के स्वतंत्रता सेनानियों को बुलाकर उनके भाषण सुनें और छात्रों को भी सुनवाएं। हर परिसर में ये कार्यक्रम हों। लेकिन इस सर्कुलर से भला किसको एतराज हो सकता है! ये अलग बात है कि आज तक इस तरह का पहला आदेश यूपी में योगी सरकार ने प्राइमरी के स्कूलों को दिया था कि किसी भी जयंती या पुण्यतिथि में सभी जगह कार्यक्रम हों और जिनमें संबंधित शख्सियत के जीवन पर निबंध प्रतियोगिताएं आयोजित कराई जाएं।

निर्लज्जता की सारी हदें पार कर रहा यूजीसी

बहरहाल, मानव संसाधन विकास मंत्रालय की तरफ से एक समिति का गठन किया गया है जिसकी जानकारी 4 अक्टूबर 2018 को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के संयुक्त सचिव जितेंद्र कुमार त्रिपाठी ने एक अधिसूचना में दी। इसमें समिति के गठन का जिक्र करते हुए कहा गया कि यह समिति शिक्षण, अभ्यास, मूल्याकंन और परीक्षा जैसे मामलों को एस्मा के तहत लाने के लिए अध्ययन करेगी और समिति को 30 दिन के अंदर मंत्रालय को रिपोर्ट सौंपेगी। मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा गठित समिति पर डीयू के एकेडमिक्स फॉर एक्शन एंड डेवलपमेट (एएडी) के अध्यक्ष डॉक्टर आदित्य नारायण ने विश्वविद्यालय में प्रेस कान्फ्रेंस बुलाई और इस समिति के बारे में ना सिर्फ मूल जानकारी दी बल्कि कई सवाल भी उठाए। साथ ही कहा कि डीयू में बने नियमों को बदलने के लिए सरकार कोशिश कर रही है। यह भी कहा गया कि इस तरह के मामलों में डीयू की सर्वोच्च परिषद ईसी (कार्यकारी परिषद) की बैठकों में चर्चा जरूरी होती है, लेकिन डीयू प्रशासन ने इस मामले में कोई चर्चा नहीं की। डीयू के ओएसडी की इस समिति के सदस्य नियुक्त किए गए लेकिन विश्वविद्यालय ने ये जानकारी भी साझा नहीं की क्योंकि इससे सरकार की मंशा पर सवाल उठ सकते थे।

शिक्षक कर रहे पुरजोर विरोध

तीन बार दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (डूटा) के अध्यक्ष रहे डॉक्टर आदित्य ने कहा कि एस्मा डीयू के अधिनियम में शामिल किया जा रहा है। यह लागू होता है तो भविष्य में शिक्षक केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ कुछ भी नहीं बोल सकेंगे। अगर बोलेंगे तो उन पर एस्मा नियम के तहत बिना किसी वारंट के गिरफ्तार कर लिया जाएगा। यही नियम छात्रों पर भी लागू होगा। उन्होंने कहा कि 1903 में तत्कालीन साम्राज्यवादी शासन की तरफ से विश्वविद्यालयों के केंद्रीयकरण और उसमें नौकरशाही के हस्तक्षेप के विरोध में पंडित मंदन मोहन मालवीय ने भी आवाज उठाई थी।

समिति में यूजीसी के पूर्व सदस्य प्रो. वी.एस. चौहान को अध्यक्ष नियुक्ति किया गया। यूजीसी के संयुक्त सचिव डॉ. जितेंद्र कुमार त्रिपाठी, भोपाल के नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी के निदेशक प्रो वी. विजया कुमार, तेजपुर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. वी.के. जैन, मुंबई के टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के रजिस्ट्रार डॉ. सी.पी. मोहन कुमार, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व रजिस्ट्रार डॉ. एन. सुंदरम और डीयू के ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी (ओएसडी) डॉ. सतीश कुमार को समिति का सदस्य नियुक्त किया गया।

विरोध से नरम पड़े जावड़ेकर, ट्वीट कर किया इजहार

इसी बीच मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने दिल्ली विश्वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय को एस्मा के दायरे में लाने की संभावना पर विचार करने वाली समिति को भंग करने का आदेश दिया। डीयू के शिक्षकों के भारी विरोध के बाद जावेड़कर के इस कदम की जानकारी बीजेपी समर्थक एक शिक्षक गुट ने सबसे पहले दी। जावेड़कर ने एस्मा लगाने के आरोपों पर सफाई देते हुए कहा है कि सरकार का इरादा शिक्षकों की अभिव्यक्ति की आजादी को रोकने का नहीं है। जावेड़कर ने ट्वीट करके कहा कि सरकार दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू), जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) या किसी अन्य विश्वविद्यालय में शिक्षकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को रोकना नहीं चाहती है। इसी दौरान उच्च शिक्षा सचिव आर. सुब्रमण्यम ने भी ट्वीट करके कहा कि दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ की हड़ताल के दौरान छात्रों का सुझाव था कि हड़ताल को प्रतिबंधित किया जाए। हमने इसकी जांच की लेकिन सुझाव को आगे नहीं बढ़ाया।

 



उधर, दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के अध्यक्ष राजीव रे तथा पूर्व अध्यक्ष आदित्य नारायण मिश्र ने आरोप लगाया कि सरकार एस्मा लगाना चाहती है और इसके लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने चार अक्टूबर को एक समिति गठित की है जिसका काम दिल्ली विश्वविद्यालय कानून 1922 में संशोधन करके एस्मा के प्रावधानों को शामिल करने की संभावनाओं पर विचार करना है। इस समिति को एक माह के भीतर अपनी रिपोर्ट देनी है।

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दिल्ली विश्वविद्यालय के भारतीय जनता पार्टी समर्थक शिक्षक संगठन के नेता ए.के. भागी ने भी एस्मा लगाने के प्रस्ताव का विरोध किया। शिक्षक नेताओं का कहना है कि शिक्षकों के दबाव में सरकार ने यह कदम वापस ले लिया। इसका वे स्वागत करते हैं लेकिन सरकार केन्द्रीय कर्मचारी सेवा नियमावाली को वापस ले अन्यथा उनका आंदोलन जारी रहेगा। भागी ने जावड़ेकर को पत्र लिखकर एस्मा लगाने के प्रयास का विरोध किया था। भागी के अनुसार, जावड़ेकर ने इंद्र मोहन कपाही को भेजे ईमेल में जानकारी दी है कि उन्होंने यूजीसी की समिति को भंग करने का आदेश दे दिया है।

डूटा का पूरा बयान

डूटा का कहना है कि सरकार लगातार ये कोशिश कर रही है कि अकादमिक समुदाय की बौद्धिक स्वायत्तता को कैसे खत्म किया जाए ताकि मुक्त सोच और लोकतांत्रिक मूल्यों को भी खत्म किया जा सके। संगठन ने सरकार की इस कार्रवाई को शातिर हमला कहा। डूटा ने कहा कि  नैतिक विशेषाधिकार के उल्लंघन करने के इस कोशिश की हम कड़ी निंदा करते हैं। संगठन ने कहा कि सरकार आक्रामक ढंग से उच्च शिक्षा में व्यावसायीकरण और निजीकरण की नीतियों को थोपने की फिराक में हैं लेकिन डूटा जैसे शिक्षक संघ इसके विरोध में अग्रणी रहे हैं और आगे भी रहेंगे। हमारी कोशिश है कि इसका जिसका जितना भी विरोध हो वह कम है क्योंकि हमारा एक काम ये भी है कि जनता राय बना सके कि सरकार किस तरह की नीतियों को लागू करने की कोशिश कर रही है।

डूटा ने कहा, “सरकार निर्लज्ज ढंग से उच्च शिक्षा का बाजारीकरण करने की कोशिश में है ताकि समाज में हाशिए में छिटके पिछड़े और गरीब तबके के छात्र शिक्षा से वंचित हो जाएं। डूटा इसे लेकर पहले भी सरकार की कोशिशों का विरोध कर चुकी है और अब जब लोगों को उसकी इस हरकत का पता चल गया और लोग सार्वजनिक तौर पर जान गए हैं तो सरकार नतीजतन उन हथकंडों का सहारा ले रही है ताकि डूटा खामोश हो जाए और शिक्षक समुदाय भी चुपचाप सरकार के थोपे वर्चस्व से डरकर उसे मानने पर मजबूर हो जाएं। एस्मा को 1968 में ये सुनिश्चित करने के लिए लाया गया था कि लोगों की दैनिक जीवन से जुड़ी अति-गंभीर और महत्वपूर्ण सेवाओं को खत्म ना किया जा सके। एस्मा को विश्वविद्यालयी शिक्षकों को आजमाने की कोशिश कठोर ही नहीं मूर्खतापूर्ण कदम है क्योंकि शिक्षक महज सेवा नहीं देते ज्ञान-सर्जन भी करते हैं।”

क्या है एस्मा?

आपको बता दें कि एसेंशियल सर्विसेज मैनेजमेंट एक्ट यानी ‘अत्यावश्यक सेवा अनुरक्षण कानून, 1968’ जब कभी भी कर्मचारी हड़ताल पर बैठते हैं तो इसकी चर्चा होती है। एस्‍मा हड़ताल को रोकने के लिये लगाया जाता है। कानूनन एस्‍मा अधिकतम छह महीने के लिए लगाया जा सकता है और इसके लागू होने के बाद अगर कोई कर्मचारी हड़ताल पर जाता है तो वह अवैध‍ और दंडनीय है। इसके तहत जिस सेवा पर एस्मा लगाया जाता है, उससे संबंधित कर्मचारी हड़ताल नहीं कर सकते, अन्यथा हड़तालियों को छह माह तक की कैद या आर्थिक दंड अथवा दोनों हो सकते हैं।

जाहिर है, एस्मा के रूप में सरकार के पास एक ऐसा हथियार है जिससे वह जब चाहे कर्मचारियों के आंदोलन को कुचल सकती है, विशेषकर हड़तालों पर प्रतिबंध लगा सकती है और बिना वारंट के कर्मचारी नेताओं को गिरफ्तार कर सकती है। वैसे तो एस्मा एक केंद्रीय कानून है जिसे 1968 में लागू किया गया था, लेकिन राज्य सरकारें इस कानून को लागू करने के लिये स्वतंत्र हैं। थोड़े-बहुत परिवर्तन कर कई राज्य सरकारों ने स्वयं का एस्मा कानून भी बना लिया है और अत्यावश्यक सेवाओं की सूची भी अपने अनुसार बना दी है।

‘इकॉनॉमिक टाइम्स’ में सुप्रिया चौधरी ने ठीक ही लिखा है कि ऐसे हालात और माहौल में हमारे देश के विश्वविद्यालय प्रतिवाद और संघर्ष के अखाड़े बन चुके हैं। हमारी उच्च शिक्षा तो वैसे ही कोई उच्च स्तरीय नहीं रही। ऊपर से रोहित वेमुला की मृत्यु को देखें या नजीब अहमद के लापता होने को या जादवपुर विश्वविद्यालय या फिर रामजस कॉलेज की घटनाएं- इन सबके केंद्र में एक ही बात है। ये सभी घटनाएं और इधर सरकार के रोज-रोज के फरमान सार्वजनिक विश्वविद्यालयी प्रणाली के उद्देश्य और समालोचनात्मक दृष्टिकोण का गला घोंटने के लिए अंजाम दिए गए हैं।

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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