‘दलित’ शब्द के बचाव में एक आदिवासी का विचार

पालि व्याकरण के अनुसार, ‘दलित’ शब्द दल+इत से बना है। अगर हम ऐसे ही उच्चारण वाले कुछ शब्दों को देखें। मसलन, ‘दमित’,’शोषित’, ‘शोभित’, ‘रक्षित’और ‘पतित’ तथा इसका व्युत्पत्तिक अर्थ निकालें तो हम पाएंगे कि इनमें ‘इत’ का मतलब ‘होना’ या ‘का हिस्सा होना’ है। इस प्रकार दलित ‘दल का हिस्सा होना’ का अर्थ सूचित करता है

“निम्न-कुल में जन्मे इस बच्चे ने तुमसे अधिक अंक हासिल किए हैं इसलिए तुमने अपनी और हमारे परिवार की प्रतिष्ठा खो दी है।” इस कथन में जिस निम्न-कुल के बच्चे का जिक्र है वह मेरे पिता हैं। एक बार मेरे पिता मुझे अपने स्कूल के दिनों की एक घटना के बारे में बता रहे थे कि किस तरह उनके मित्र के पिता ने उनके मित्र को डांटा था। मेरे पिता तब वहां खड़े भय से काँप रहे थे जब पूरे इलाके में अव्वल आने की खबर से उन्हें प्रसन्न होना चाहिए था, वह दहशत में थे। उनका अपराध यह था कि एक आदिवासी परिवार में पैदा होने के बावजूद उन्होंने पढ़ाई-लिखाई में उत्कृष्टता हासिल की थी!

मेरा जन्म एक ऐसे गांव में एक आदिवासी परिवार में हुआ, जहाँ उच्च जातियाें का वर्चस्व था। मेरे पिता, जो अपने स्कूल में अव्वल थे, को हमेशा उच्च जातियों और गैर-आदिवासी लड़कों से अलग बैठने के लिए कहा जाता था। हालांकि शिक्षक उनसे प्रभावित थे। उन्होंने मेरे पिता को राह दिखायी और उनका समर्थन किया। कई ब्राह्मण छात्रों के साथ भी उनकी मित्रता आजीवन अच्छी रही।

प्रत्येक दलित और परिवार की मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु जमीन पर समुचित हिस्सेदारी की मांग को लेकर प्रदर्शन करते आदिवासी दलित मुनेत्र समिति के सदस्य

वह हर रोज 18 किलोमीटर दूर अपने कॉलेज जाते थे ताकि वहाँ पास में किराए पर कमरा न लेना पड़े। उस समय, कोई भी एक दुबले-पतले, गहरी/काली त्वचा वाले आदिवासी लड़के को किराए पर एक कमरा देने के लिए तैयार नहीं था। उन्होंने एक सामान्य उम्मीदवार के रूप में नौकरी पायी। अपने गृह जिले से काफी दूर उनकी पोस्टिंग हुई। अपने पूरे कामकाजी जीवन में वह राजपूत बनकर रहे ताकि रहने के लिए किराए का एक घर ले सकें। उन्होंने आरक्षण के ठप्पे और इससे जुड़े जातिगत भेदभाव से बचने के लिए आरक्षण के संवैधानिक प्रावधान को कभी भी नहीं अपनाया। एक मेहनती, ईमानदार और ध्यान रखने वाला व्यक्ति होने के कारण वरिष्ठों और सहकर्मियों के बीच उनका खासा सम्मान था।

हर सुबह, मेरी मां मेरे दिमाग में यह भरने से कभी नहीं चूकीं कि “मैं एक राजपूत हूँ और जब कभी कोई मेरी जाति के बारे में पूछे तब मुझे यही कहना चाहिए।”  एक दिन किसी ने यह भेद खोल दिया और मेरे पिता के कार्यालय में उनके प्रति हर किसी का व्यवहार बदल गया, वे लोग अपशब्दों का इस्तेमाल कर उनके साथ मौखिक दुर्व्यवहार करने लगे। दुआ-सलाम भी बंद हो गया।

कॉलोनी के लड़कों ने मेरे साथ खेलना बंद कर दिया। मुझे पता चल गया कि कुछ गड़बड़ हो चुकी है। मैंने अपने पिता से पूछा, “जाति क्या होती है?” वह चिल्लाये,”जाति वही है जो कभी नहीं जाती।”

कॉलेज में मुझे एक नयी पहचान मिली, ‘सिद्दू’- यह उपनाम आरक्षित श्रेणी से आने वाले छात्रों के लिए इस्तेमाल किये जाने वाले ‘शेड्यूल’ (अनुसूचित) शब्द से निकला था। शिक्षकों और छात्रों ने समान रूप से इस उपनाम का प्रयोग किया। रोजाना होने वाले इस भेदभाव के विरुद्ध हमारे प्रतिरोध और ज्ञान के संपर्क ने हमें ‘दलित’ बना दिया। दलित अर्थात दबे हुए लोगों की मैत्री।

बीते 2 अप्रैल को भारत बंद के दौरान झारखंड की राजधानी रांची में मशाल जुलूस निकालते दलित, आदिवासी और ओबीसी

‘दलित’ शब्द कभी अवैध या अनैतिक कैसे हो सकता है? खैर, मेरा अंदाजा है कि यह इस पर निर्भर करता है कि कोई इस शब्द का क्या मतलब लगाता है। एक शब्द किसी कथन या लेखन में सबसे छोटी इकाई होता है, लेकिन इसका मान और महत्व गैर-आनुपातिक रूप से सर्वाधिक महत्वपूर्ण होता है। शब्द न केवल अतीत को बल्कि भविष्य को, भविष्य के लिए अतीत की स्मृतियों और आकांक्षाओं को भी अपने भीतर धारण करते हैं। ‘दलित’ निश्चय ही केवल एक शब्द मात्र नहीं है।

अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) से आने वाले विद्वान कांचा इलैया ने दलित शब्द के क्रमिक विकास की व्याख्या की है। दलित शब्द पालि भाषा के ‘दल’ शब्द से आया है, जैसा कि ‘कमल-दल’ में है। ‘दल’ का अर्थ है ‘करीब से जुड़ी चीजों का समूह’। पालि व्याकरण के अनुसार, ‘दलित’ शब्द दल+इत से बना है। अगर हम ऐसे ही उच्चारण वाले कुछ शब्दों को देखें, मसलन, ‘दमित’,’शोषित’, ‘शोभित’, ‘रक्षित’और ‘पतित’ तथा इसका व्युत्पत्तिक का अर्थ निकालें तो हम पाएंगे कि इनमें ‘इत’ का मतलब ‘होना’ या ‘का हिस्सा होना’ है। इस प्रकार दलित ‘दल का हिस्सा होना’(किसी समूह या जनजाति का सदस्य होना) का अर्थ सूचित करता है।

एससी-एसटी एक्ट को कमजोर किये जाने के विरोध में बीते 2 अप्रैल 2018 को संभलपुर, ओडिशा में विरोध प्रदर्शन करते ओडिशा आदिवासी दलित सेना के सदस्य

मार्क्स ने कहा, “इतिहास अपने आप को दुहराता है, पहली बार त्रासदी के रूप में और दूसरी बार प्रहसन के रूप में।” दबे-कुचले लोगों को दिये गये तमाम नामों की तरह, आर्यों ने संभवतः गैर-आर्य जनजातियों और जाति की सीमा से परे के लोगों को ‘दलित’ नाम दिया। डॉ. बी. आर. आंबेडकर ने कहा कि दलित वर्ग टूटी हुई, पराजित जनजातियों से निर्मित हुए थे। आज भी ‘दलम’ शब्द घुमंतू जनजातीय लोगों के एक समूह को दर्शाता है। प्राचीन काल में ये घुमंतू लोग कौन थे? उन्हें किसने पराजित किया? उन्हें किसने खंडित किया? क्या पौराणिक ‘अनार्य’ आक्रामक, लुटेरे आर्यों द्वारा दलित, पराजित, तिरस्कृत और अपमानित किये गए थे? नयी तकनीक के सहयोग से सच धीरे-धीरे लेकिन निश्चित रूप से उजागर हो रहा है। बशर्ते इसके लिए हम अपने आँख-कान खोलने को तैयार हों। विभिन्न युगों में बिखरे दलित अरसे से विस्मृत अपनी कहानियां बयान कर रहे हैं।

जेम्स जॉयस ने कहा, “इतिहास एक दुःस्वप्न है, जिससे मैं जगने का प्रयास कर रहा हूँ।” आज दलित वर्गों के बीच स्पष्ट जागृति है, जिसे जीवन के तमाम क्षेत्रों में अभिव्यक्ति मिली है। यह खोयी हुई प्रतिष्ठा और पहचान/अस्मिता को पुनः प्राप्त करने की प्रबल इच्छा है। दलित वर्गों के एक दृढ़निश्चयी हिस्से ने खुद को ‘दलितों’ के रूप में पहचाना है। इन समुदायों की ओर से ‘दलित’ शब्द का पहले कभी विरोध नहीं किया गया है, क्योंकि यह शब्द आत्म-सशक्तिकरण, आत्म-सम्मान, एकजुटता और गौरव की भावना को सूचित करता है। अपने नकारात्मक इस्तेमाल के साथ अस्तित्व में आया यह शब्द उम्मीद के प्रतीक के रूप में विकसित हो चुका है।

‘दलित’ शब्द को गैरकानूनी बनाने सम्बन्धी सरकार की हालिया सलाह अपनी प्रकृति में कुविचारित, कुकल्पित और दुर्भावनापूर्ण है। ऐसा कानून क्यों तैयार करते हैं जिसे आप कार्यान्वित नहीं कर सकते? हम खुद को जो कहते हैं उसकी दुहाई देना सरकार का काम नहीं है। नौकरशाही का मुहावरा सरकार के मुताबिक है लेकिन इसका हमला हमारे ऊपर बिल्कुल नहीं होना चाहिए।

इस बात पर विश्वास करने के तमाम कारण हैं कि इस सलाह में समकालीन राजनीति के कुटिल निहितार्थ हैं। हिंदुत्व परियोजना एक न्यायसंगत और उचित समाज मे विश्वास नहीं करती। अनुसूचित जातियाँ और जनजातियाँ, महिलाएँ,गरीब किसान और अल्पसंख्यक इस देश में रह सकते हैं लेकिन दूसरे दर्जे के नागरिक के रूप में।

(अंग्रेजी से अनुवाद : दिव्या, कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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