गोरखपुर विश्वविद्यालय : नियुक्ति में अनियमितता पर सवाल उठाने वाले ओबीसी शिक्षकों पर कार्रवाई

बीते दिनों गोरखपुर विश्वविद्यालय के ओबीसी शिक्षकों ने नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़ा किया था। उनका कहना था कि चहेतों को नौकरियां बांटी जा रही है। इस मामले में विश्वविद्यालय प्रबंधन द्वारा उनके खिलाफ ही अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा रही है। फारवर्ड प्रेस की खबर :

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर विश्वविद्यालय में शिक्षकों की नियुक्तियों का मामला अभी तक गरमाया हुआ है। शिक्षक भर्ती में हुई अनियमितता पर सवाल उठाने वाले ओबीसी वर्ग के शिक्षकों पर ही कार्रवाई हो रही है। इसे लेकर एक बार फिर विश्वविद्यालय प्रशासन व ओबीसी शिक्षकों के बीच तनातनी की स्थिति बन गयी है।

ताजा मामला विश्वविद्यालय के कार्य परिषद सदस्य प्रोफेसर अजेय कुमार गुप्ता का है। विश्वविद्यालय प्रशासन की तरफ से इन्हें कारण बताओ नोटिस भेजकर इनसे सवाल किया गया है कि छुट्टी लिए बिना वह कैसे विश्वविद्यालय व शहर से बाहर रहे, विश्वविद्यालय के पिछड़ा वर्ग कल्याण परिषद की मानें तो प्रो. गुप्ता यूजीसी की नैक कमेटी की बैठक में शामिल होने के लिए वह शहर से बाहर गए थे और छुट्टी के लिए लिखित आवेदन देकर गए थे। इसलिए आवेदन नहीं देने की बात कहां से उठती है।

पिछड़ा वर्ग कल्याण परिषद के मुताबिक प्रो. गुप्ता ने छुट्टी के लिए एक हफ्ते पहले आवेदन किया था और विभागाध्यक्ष द्वारा उनके आवेदन को अग्रसारित भी किया जा चुका था। ऐसे में इस तरह की नोटिस का मतलब समझ से परे है क्योंकि व्यावहारिक रूप से ऐसा ही होता चला आया है। सामान्यतया विभागाध्यक्ष की स्वीकृति के बाद चाहे वह कर्तव्य अवकाश हो या फिर व्यक्तिगत अवकाश हो, छुट्टी स्वीकृत मान ली जाती है क्योंकि विश्वविद्यालय से अगली प्रक्रिया पूरी होने में 60 दिन तक का समय लग जाता है।

गोरखपुर विश्वविद्यालय, उत्तर प्रदेश के मुख्य द्वार पर शिक्षक नियुक्ति में अनियमितता के खिलाफ प्रदर्शन करते विश्वविद्यालय के पिछड़ा वर्ग कल्याण परिषद के सदस्य

होना तो यह चाहिए था कि नोटिस विभागाध्यक्ष को भेजी जाती क्योंकि विभागाध्यक्ष ने संतुष्ट होने पर ही आवेदन अग्रसारित किया था। वहीं इस बाबत जब विश्वविद्यालय के कुलपति वी. के. सिंह से संपर्क करने की कोशिश की गई तो नहीं हो सका। उनका मोबाइल भी स्वीच ऑफ चल रहा था जिससे आधिकारक बयान नहीं मिल पाया। इस प्रकार यह पूरा मामला नोटिस व उसके जवाब के बीच फंसा हुआ है। वहीं विश्वविद्यालय का ही एक वर्ग इस तरह के मामले से नाराज है और उनका साफ कहना है कि ‘पिक एंड चूज’ की तर्ज पर कार्रवाई कतई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

प्रो. चंद्रभूषण गुप्त : अनियमितता के संबंध में सवाल उठाने पर पूछे जा रहे सवाल

विश्वविद्यालय के पिछड़ा वर्ग कल्याण परिषद की मानें तो उन सबों का कसूर केवल इतना है कि उन लोगों ने नियमों को ताक पर रखकर की गई नियुक्तियों का विरोध किया है और इस तरह की नोटिस के जरिए उन्हें अहसास कराने की कोशिश की जी रही है कि नियुक्तियों का विरोध करना बंद कर दो वरना कार्रवाई के लिए तैयार रहो। कल्याण परिषद अध्यक्ष प्रोफेसर चंद्रभूषण गुप्त व मंत्री प्रोफेसर अनिल कुमार यादव के मुताबिक कार्य परिषद सदस्य प्रो. अजेय कुमार गुप्ता का ही केवल मामला नहीं है बल्कि शिक्षक चयन प्रक्रिया पर जिसने भी अंगुली उठायी, उन सभी पर कार्रवाई की गई।

प्रो. अजेय गुप्त पर इससे पहले भी कार्रवाई हो चुकी है जब प्रो. गुप्त ने शिक्षकों की चयन प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए अपना विरोध दर्ज कराया था। कार्य परिषद की बैठक में उन्होंने अपना विरोध पत्र (लेटर आफ डिसेंट) दिया था। इसके बाद ही विश्वविद्यालय प्रशासन ने उन्हें इलेक्ट्रानिक डेटा प्रोसेसिंग (ईडीपी) सेल के प्रभारी पद से हटा दिया था। यह सेल काफी महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि ईडीपी सेल में ही परीक्षा के अंकों का कम्प्यूटर डाटा तैयार किया जाता है। विश्वविद्यालय प्रशासन की तरफ से इस पर कुछ भी बताने से इनकार किया गया और तत्कालीन रजिस्ट्रार ने भी कोई भी प्रतिक्रिया नहीं दी।

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इसी तरह एक और मामला उत्तर प्रदेश सरकार में निजी सचिव रहे अमर सिंह पटेल का है जिन पर भी कार्रवाई के आदेश दिए गए थे। निजी सचिव पर यह आरोप था कि उन्होंने अपने ट्विटर अकाउंट से गोरखपुर विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर की नियुक्ति प्रक्रिया में एक खास जाति के लोगों का चयन करने को लेकर मुख्यमंत्री अदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा पर सवाल उठाया था। आरोप है कि अमर सिंह ने अपने ट्विटर पोस्ट में लिखा था कि सहायक प्रोफेसर के 71 पदों में से 52 पद पर एक ही जाति के अभ्यर्थी का चयन किया गया है। इसे लेकर मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने सचिवालय प्रशासन के अपर मुख्य सचिव महेश गुप्ता को उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई करने तक के आदेश दे दिया। इसी तरह पिछड़ा वर्ग कल्याण परिषद के प्रोफेसर चंद्रभूषण व अनिल कुमार यादव को भी विश्वविद्यालय ने नोटिस जारी किया गया था कि जिस तरह उनलोगों ने विरोध प्रदर्शन की अगुवायी की वह सीधे-सीधे अनुशासनहीनता है और क्यों ना उन पर कार्रवाई की जाए। जबकि इसके जवाब में लिखा गया कि 19 जुलाई को यूजीसी द्वारा निर्गत आदेश कि तत्काल प्रभाव से विश्वविद्यालयों व कालेजों में नियुक्ति प्रक्रिया तत्काल रोक दी जाए, इसे विश्वविद्यालय प्रशासन को बताना और आगाह करना अनुशासनहीनता कैसे हो सकता है। विश्वविद्यालय के हित में प्रदर्शन करना मजबूरी थी।

इस संबंध में विश्वविद्यालय की तरफ से एक और नोटिस जारी कर सवाल किया गया कि नोटिस का जवाब व उसकी भाषा चुनौतीपूर्ण है।

नहीं सहेंगे विश्वविद्यालय की मनमानी : डॉ. दुर्गा प्रसाद यादव

संविधान संरक्षण मंच के अध्यक्ष डाॅ. दुर्गा प्रसाद यादव का तो साफ कहना है कि सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने वालों के खिलाफ एक तरह से विश्वविद्यालय प्रशासन ने मुहिम छेड़ रखा है और नोटिस भेजने का सिलसिला उसका ही प्रतिफल है। अघोषित आपातकाल जैसी स्थिति से हम सबों की आवाज नहीं दबायी जा सकती है और संविधान के तहत अगर अधिकार की पूर्ति नहीं होती है तो, आवाज उठाएंगे और जरूरत पड़ने पर सड़कों पर उतरने से भी परहेज नहीं करेंगे। गैर संवैधानिक कार्य के विरोध में सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ी जा रही है, कोई व्यक्तिगत लड़ाई नहीं है, इसलिए प्रशासन अगर यह सोच रहा है कि ऐसे लोगों को एक-एक कर नोटिस जारी कर कमजोर किया जाए, तो उसका सोचना गलत है और समय रहते इस पर सकारात्मक रुख नहीं अपनाया गया तो इसका परिणाम अच्छा नहीं होगा। गलतियां विश्वविद्यालय प्रशासन करे और जब उस पर अंगुली उठायी जाए तो सुधार करने की बजाय अंगुली तोड़ने की कोशिश हो, तो यह बिल्कुल बर्दाश्त नहीं की जाएगी।    

क्या-क्या है प्रमुख आरोप

शिक्षक नियुक्ति मामले पर कई तरह के गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं। आरोप लगाया जा रहा है कि कई ऐसे लोगों की नियुक्ति की गई है जो योग्यता के मुकाबले कम हैं और उनका विश्वविद्यालय से किसी ना किसी तरह संबध है चाहे अभ्यर्थी के रिश्तेदार विश्वविद्यालय में हों या रहे हों या फिर अन्य कोई कनेक्शन हो। कुछ एक नियुक्तियों का जिक्र भी किया गया है जिसमें शिक्षा विभाग में राजेश कुमार सिंह की नियुक्ति को लेकर कहा जा रहा है कि उनसे ज्यादा अहर्ता रखने वाले अभ्यर्थी का चयन नहीं हो सका क्योंकि राजेश कुमार सिंह प्रो. रामदेव सिंह के बेटे हैं। बता दें कि रामदेव सिंह शिक्षा विभाग के एचओडी और डीन रह चुके हैं। वहीं नियुक्ति पाए दुर्गेश पाल प्रो. शोभा गौड़ के शोध छात्र हैं। अनुपम सिंह एबीवीपी के भी सदस्य हैं और उनके फेसबुक पेज पर लिखा है कि वे एबीवीपी के युवा कार्यकर्ता हैं। इसके अलावा पूर्व में डीन और एचओडी रहीं स्नेहलता शाही की शोध छात्र ममता चौधरी हैं जिनका चयन शिक्षा विभाग में एससी वर्ग में किया गया है जबकि उन्होंने सामान्य वर्ग से आवेदन किया था।

शिक्षक भर्ती के इंटरव्यू के लिए बुलाए गए छात्र-छात्राओं की सूची से पता चलता है कि शिक्षा विभाग में सहायक प्रोफेसर के लिए ममता चौधरी नाम की एक अभ्यर्थी का इंटरव्यू सामान्य वर्ग में हुआ था लेकिन उनकी नियुक्ति अनुसूचित जाति कोटे से की गई है। ममता चौधरी के आवेदन फार्म की कापी से स्पष्ट होता है कि उन्होंने सामान्य वर्ग में नौकरी के लिए आवेदन किया था और 1500 रुपए की आवेदन राशि जमा की थी लेकिन आवेदन फार्म में जहां पर जनरल लिखा है उसे काटकर बाद में पेन से एससी लिख दिया गया।

इसी तरह जहां पर 1500 रुपए जमा राशि लिखी है, उसे काटकर 1000 रुपए कर दिया गया है क्योंकि एससी वर्ग के लिए आवेदन शुल्क 1000 रुपए था। ममता चौधरी के आवेदन फार्म में जिन जगहों पर बदलाव किया गया है वहां पर न तो किसी संबंधित व्यक्ति का हस्ताक्षर है और ना ही विश्वविद्यालय का स्टाम्प लगा हुआ है।

ऐसा ही मामला लाॅ डिपार्टमेंट में सहायक प्रोफेसर के पद के लिए वंदना सिंह के चयन से जुड़ा है। वंदना सिंह का इंटरव्यू सामान्य वर्ग में हुआ था लेकिन उसका चयन अन्य पिछड़ा वर्ग में हुआ है। वंदना सिंह के आवेदन फार्म में भी यह साफ-साफ शब्दों में लिखा है कि उन्होंने सामान्य वर्ग से आवेदन किया था।

सवाल यह है कि जब आवेदन की प्रक्रिया आॅनलाइन हुई थी और कम्प्यूटराइज्ड पद्धति से की गई प्रक्रिया के साथ आॅफलाइन छेड़छाड़ आखिर क्यों। क्या इससे पारदर्शिता प्रभावित नहीं होती है? विश्वविद्यालय प्रशासन को इस पर जवाब देना चाहिए।

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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