जेएनयू में सीसीएस लागू करने की तैयारी, भड़के शिक्षक

जेएनयू में केंद्रीय सेवा नियमावली लागू करने की तैयारी हो चुकी है। मामला क्योंकि जेएनयू का है इसलिए यह कार्रवाई सिर्फ असहमति व्यक्त करने से रोकने की नहीं है। सामाजिक-शैक्षणिक चेतना के स्तर पर प्रहरी की भूमिका में यह उच्च शिक्षण संस्थान रहा है, अब उसका मुंह बंद किया जा रहा है। फारवर्ड प्रेस की रिपोर्ट :

22 अक्टूबर को होगी जेएनयू कार्यकारी समिति की बैठक 

केंद्र सरकार के कर्मचारियों पर लागू होने वाली नियमावली को थोपकर सरकार जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय(जेएनयू) के मुंह पर ताला जड़ना चाहती है लेकिन शिक्षकों में इसका जोरदार विरोध शुरू हो गया है। सीसीएस (सेंट्रल सिविल सर्विस) नियमावली केंद्र सरकार के कर्मचारियों पर लागू होती है। ये नियम लागू होने के बाद सरकारी कर्मचारी सरकार की नीतियों के खिलाफ आपत्ति दर्ज नहीं कर सकते हैं और न ही विरोध कर सकते हैं। यदि यह कानून जेएनयू में लागू की गयी तो इसका असर यहां के लोकतांत्रिक वातावरण पर पड़ेगा।

जेएनयू, नई दिल्ली

अंकुश लगाने के लिए उठाया सरकार ने कदम – शिक्षक संघ

शिक्षकों का कहना है कि विश्वविद्यालय कानूनों को धत्ता बताते हुए शिक्षकों पर यह नियम लादा जा रहा है। जेएनयू की कार्यकारी परिषद के सदस्य सुरजीत मजूमदार ने कहा कि इस कानून के लागू होने पर कर्मचारी न तो हड़ताल कर सकते हैं और न किसी प्रदर्शन में हिस्सा ले सकते हैं।

माना जा रहा है कि देश में सरकार की नीतियां जो खासकर शैक्षणिक, बौद्धिक और अकादमिक समाज की आजादी को खत्म करती हैं या किसी दूसरी तरह से प्रभावित करती हैं, उन्हें लेकर जिस तरह से देश की राजधानी में जेएनयू का अकादमिक समुदाय सक्रिय रहता है और मुखालफत का माहौल बनता है, उस पर अंकुश लगाने के लिए सरकार ने यह कदम उठाया है।

बीते 6 अक्टूबर 2018 को जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की अकादमिक परिषद (एसी) की बैठक हुई। बैठक में केंद्र सरकार के सेंट्रल सिविल सर्विस नियम को विश्वविद्यालय के ऑर्डिनेंस (नियम) में शामिल करने का प्रस्ताव पास किया गया। एजेंडा पास होने के बाद इस पर 22 अक्टूबर को जेएनयू की कार्यकारी परिषद (ईसी) में चर्चा होनी है। लेकिन इससे पहले ही शिक्षक मैदान में आ गए हैं। जेएनयू शिक्षक संघ ने सीसीएस नियम का विरोध करते हुए कहा है कि जेएनयू प्रशासन शिक्षकों के अधिकारों का हनन कर रहा है। एसी की बैठक में जब सीसीएस नियम को विश्वविद्यालय के ऑर्डिनेंस में शामिल करने का एजेंडा लाया गया तो कई सदस्यों ने आपत्ति दर्ज कराई। लेकिन, उनकी आपत्ति को दरकिनार कर इसे पास कर दिया गया। इस पर जेएनयू शिक्षक संगठन ने भी आपत्ति जाहिर की है। उसने जेएनयू प्रशासन पर कई आरोप लगाए हैं।

जेएनयू शिक्षक संगठन के पदाधिकारी वीसी कार्यालय के बाहर

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय शिक्षक संगठन (जेएनयूटीए) ने कहा, शिक्षकों को सीसीएस नियमों में बांधने का मतलब है शिक्षकों की समाज निर्माण की भूमिका को खत्म करना। शिक्षाविदों से नागरिक समाज के कल्याण में जो भूमिका निभाने की अपेक्षा की जाती है,  वह रुक जाए और ऐसा करने वालों को अपराधी करार दिया जा सके। शिक्षक संगठन ने कहा कि मौजूदा प्रशासन ने ऐसे नियमों को थोपने का फैसला असहमति व्यक्त करने से रोकता है।

शिक्षकों का कहना है कि सीसीएस नियम “विश्वविद्यालय की भावना के खिलाफ है क्योंकि विश्वविद्यालय एक स्वायत्त निकाय है।” दरअसल ये जेएनयू की शैक्षणिक परिषद की यह 147वीं बैठक थी जब सरकार ने सीसीएस की आड़ में शिक्षकों और कर्मचारियों के लिए “आचरण” और “सेवा” के लिए नए कायदे कानून थोपने की कोशिश हुई। शिक्षक कहते हैं कि सीसीएस जो उसने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन (आईआईएमसी) जैसे मीडिया स्कूल में लागू किया है और उसकी बड़े स्तर पर आलोचना भी हुई- उसके बाद भी इस नियम को विश्वविद्यालय पर थोपा जा रहा है।

जेएनयू शिक्षक संघ के सचिव सुधीर कुमार ने कहा, “विश्वविद्यालय कानून के तहत अकादमिक परिषद की बैठक से दस दिन पहले सभी सदस्यों के पास एजेंडे की कॉपी भेजी जाती है। इसके बाद बैठक में उन मुद्दों का जिक्र होता है। लेकिन, एजेंडे की कॉपी पहली अक्टूबर को ही कई सदस्यों के पास भेजी गई, जो गलत है। उन्होंने आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय के छात्र संघ के पदाधिकारियों और एसी के कई अन्य सदस्यों को बैठक में शामिल नहीं होने दिया जा रहा है। बैठक में मौजूद सदस्य प्रशासन की नीतियों पर सवाल उठाते हैं तो उनकी आवाज को भी दबाया जा रहा है।”

शिक्षकों पर जेएनयू प्रशासन का पलटवार

इसके जवाब में जेएनयू प्रशासन ने शिक्षक संगठन के कुछ सदस्यों पर आरोप लगाया कि वे यूनिवर्सिटी में सेवा मामलों पर सीसीएस के नियमों पर अमल से जुड़े अध्यादेश को अकादमिक परिषद की मंजूरी के खिलाफ गलत सूचनाएं फैला रहे हैं। जेएनयू प्रशासन ने कहा कि पांच अक्टूबर को अकादमिक परिषद की ओर से प्रस्ताव मंजूर किया गया और यह इस साल एक मई को यूजीसी की ओर से जारी एक पत्र के अनुरूप है।      

बैठक में क्या हुआ था?

शिक्षकों ने बैठक में इस मुद्दे पर पर्याप्त अध्ययन करने और कुछ नियमों को पास ना करने की बात कही और उनको वापस लेने का दबाव डाला लेकिन जेएनयू टीचर्स एसोसिएशन ने कहा कि “इसके बावजूद,  उसे वापस नहीं लिया गया।” एसोसिएशन ने कहा कि सीसीएस नियम “सरकार के प्रशासनिक अधिकारियों” पर लागू करने के लिए हैं। जेएनयू जैसे विश्वविद्यालयों में उसे लागू करने का मतलब है संस्थान को शैक्षणिक, सामाजिक लाभों से वंचित कर देना।” विश्वविद्यालय ज्ञान सृजन का काम करता है और शिक्षक समुदाय इसी अनुभव से सिखाते हैं।

सड़कों पर जेएनयू शिक्षक संघ के सदस्य

शिक्षकों ने कहा कि जेएनयू में प्रतिरोध की भावना को कुचलने और के लिए ऐसा किया जा रहा है लेकिन प्रशासन का यह प्रयास विफल हो जाएगा। स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के प्रोफेसर सुरजीत मजूमदार ने कहा, “इन नियमों के तहत, आर्थिक नीति पर चर्चा के लिए अर्थशास्त्र के प्रोफेसरों को दंडित किया जा सकता है; राजनीति पर चर्चा के लिए राजनीतिक वैज्ञानिकों को दंडित किया जा सकता है; पर्यावरण नीति पर चर्चा के लिए प्रोफेसरों को दंडित किया जा सकता है; सरकार की विज्ञान नीति पर चर्चा करने पर वैज्ञानिकों को दंडित किया जाने के रास्ते खुल जाएंगे।”

जाहिर है शिक्षकों और स्कॉलर्स के लिए किसी भी जर्नल और पत्र-पत्रिका में लिखना मुश्किल हो जाएगा क्योंकि अगर आलेख समालोचना है और उसमें नीतिगत मामलों की समीक्षा की गई है जो संबंधित के गलत होने या अप्रासांगिक होने की बात कहता है, सरकार की नीतियों में दोष होने के पहलू पर प्रकाश डालता है तो यह सीसीएस के प्रावधानों और उसकी भावनाओं के विरुद्ध जाएगा ही। और पर अकादमिक समाज के लोगों फंसाना आसान हो जाएगा।

विश्वविद्यालय प्रशासन ने बताया अफवाह

सीसीएस नियम और यूजीसी क्लॉज पर सवाल उठना स्वाभाविक है। शिक्षक संगठन के एक पदाधिकारी ने कहा, “इस तरह की कानूनी किस्म की चीजें जेएनयू में नहीं थी। वे औपचारिक नहीं थे। इस बार, अकादमिक परिषद ने सातवें वेतन आयोग के मुताबिक शिक्षक सेवा शर्तों में नए यूजीसी नियमों के तहत बदलाव किए। लेकिन 2018 यूजीसी नियम सीसीएस नियमों को लेकर किसी तरह भी स्थिति साफ नहीं करता।” उन्होंने कहा कि जेएनयू ने एक क्लॉज को लागू किया जहां उसे ये मनमाफिक लगा। लेकिन दूसरी ओर, रेक्टर चिंतमणि महापात्रा ने शिक्षक संगठन के बयान में किए गए दावों को खारिज कर दिया। उन्होंने बताया कि “ये सभी अफवाहें हैं। 2011 में ईसी ने एक प्रस्ताव पारित किया कि अगर किसी स्थिति में कोई नियम साफ नहीं है, तो सीसीएस नियम लागू होंगे।”

शिक्षकों का कहना है, “यूजीसी नियम बौद्धिक विमर्श और नागरिक अधिकारों की हिफाजत करते हैं।” वास्तव में,  नए यूजीसी नियमों में साफ है कि शिक्षकों को पेशेवर बैठकों, संगोष्ठियों और सभा-सम्मेलनों “स्वतंत्र और बेबाक राय” व्यक्त करनी चाहिए जो ज्ञान सृजन में योगदान के लिए जरूरी है।

क्या कहता है यूजीसी का फरमान?

अब हम उस पत्र की ओर आते हैं जो यूजीसी ने ‘सभी’ विश्वविद्यालयों को लिखा और जिस पर जेएनयू प्रशासन ने बिना वक्त गंवाए उसे लागू करने की फूर्ति दिखाई। इस पत्र का सार कुल मिलाकर ये है कि सरकार की ओर से केंद्रीय विश्वविद्यालयों के शिक्षकों और कर्मचारियों को सरकार के विरोध में बयान देना करने या उसके खिलाफ प्रदर्शन में शामिल होने पर सीधे-सीधे दंडित किया जाएगा। केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों की तर्ज पर केंद्रीय सिविल सेवा नियमावली लागू होगी, जिसका उल्लंघन करने वाले को निलंबित या बर्खास्त करने का अधिकार केंद्र सरकार को मिल जाएगा। यह नियमावली केंद्र सरकार से अनुदान लेने वाले सभी उच्च शिक्षा संस्थानों में लागू की जाएगी।

पत्र के मुताबिक, नियमावली के लागू होने पर काम नहीं करने वाले शिक्षकों-कर्मचारियों को समय से पहले सेवानिवृत्ति देने का अधिकार केंद्र के पास होगा। बताया जा रहा है कि केंद्रीय विश्वविद्यालय और आईआईएम समेत अन्य केंद्रीय शिक्षण संस्थान इसके दायरे में आएंगे। पत्र में लिखा गया है कि केंद्र सरकार से फंड लेने वाले उच्च शिक्षण संस्थानों में यह नियम लागू कर दिया गया है। इस नियमावली के तहत शिक्षक या कर्मी का सरकार के खिलाफ बयानबाजी व विरोध प्रदर्शन अवैध माना जाएगा। समय-समय पर शिक्षकों और कर्मचारियों की काम की समीक्षा भी की जाएगी। इसके अलावा यदि कोई गंभीर रूप से बीमार होगा तो उसे समयपूर्व रिटायरमेंट (वीआरएस) दिया जाएगा।

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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