मैसूर के चामुंडी हिल्स में इस बार ‘महिषा दसरा उत्सव समिति’ के बैनर तले बड़े स्तर पर महिषा दसरा 7 अक्टूबर, 2018 को आयोजित किया जा रहा है, जिसमें बड़े उत्साह के साथ दलित–प्रगतिशील बुद्धिजीवी–छात्र और आम लोग बड़ी संख्या में हिस्सेदारी करेंगे। इस मौके पर सिद्धास्वामी की पुस्तक बुद्धिस्ट किंग महिषासुर का विमोचन किया जाएगा। साथ ही बड़ी संख्या में दलित-बहुजन हिंदू धर्म का परित्याग कर बौद्ध धर्म स्वीकार करेंगे। इस आयोजन को खास बनाने के लिए दर्जनों संगठनों द्वारा जोर-शोर से तैयारी की जा रही है।
राक्षस नहीं, बौद्ध भिक्खु के रूप में स्थापित हो महिषासुर की प्रतिमा
महिषा दसरा की तैयारियों के मद्देनजर पठराकरतारा भवन में आयोजकों द्वारा एक बैठक की गयी, जिसमें तय किया गया कि 7 अक्टूबर की सुबह 10 से 12 बजे तक मैसूर के टाउनहॉल से चामुंडी हिल तक ‘महा बौद्धा बिकु महिषा’ नाम से एक रैली निकाली जाएगी, जिसमें बड़ी संख्या में लोगों केे शामिल होने की उम्मीद है। उसके बाद चामुंडी हिल के टॉप पर महिषा पर एक संगोष्ठी भी आयोजित की जाएगी, जिसका उद्घाटन ख्यात कन्नड़ लेखक और शोधार्थी बंजागेरे जयप्रकाश करेंगे। वहीं पूर्व मंत्री और बेलगावी से विधायक सतीश जरकीहोली 12 बजे से आयोजित होने वाले मुख्य कार्यक्रम ‘महिषा दसरा’ का उद्घाटन करेंगे। मुख्य वक्ता ख्यात विचारक-तर्कशास्त्री के. एस. भगवान और प्रोफेसर बी.पी. महेश चंद्र गुरु हैं, जो महिषासुर को लेकर ब्राह्मणवादियों द्वारा फैलायी जा रही भ्रांतियों और उन्हें जनप्रिय बौद्ध राजा से राक्षस बनाने के षड्यंत्र रचने समेत तमाम मसलों पर अपनी बातचीत रखेंगे।

इस बार का महिषा दसरा इस मायने में भी अलग है कि इसमें आयोजक और देश के अलग-अलग हिस्सों से आए प्रगतिशील दलित विचारक मैसूर के चामुंडी हिल पर महिषासुर की जो राक्षसी रूप में मूर्ति स्थापित की गयी है उसे शासन–प्रशासन से बदले जाने की मांग ख्यात लेखक और शोधार्थी बंजागेरे जयप्रकाश की अगुवाई में करेंगे, क्योंकि उनका मानना है कि मैसूर राजा महिषा का ही राज्य था और उन्हीं के नाम पर इस जगह का नाम मैसूर पड़ा था और महिषासुर को एक राक्षस के रूप में दर्शाना उनका अपमान है। अत: महान शासक रहे महिषासुर की मूर्ति बौद्ध भिक्षु के रूप में स्थापित की जाए, जिससे अनार्यों को गर्व की अनुभूति हो।
महिषासुर यदि राक्षस थे तो मैसूर का नाम उनके नाम पर क्यों?
कन्नड़ लेखक बंजागेरे जयप्रकाश मानते हैं कि “मैसूर के पूर्व महाराजा ने ब्राह्मणवादियों के प्रभाव में आकर हमारे आदर्श महिषासुर को राक्षसी रूप में यानी एक हाथ में तलवार और एक हाथ में सांप लिए इसलिए दर्शाया है कि उन्हें राक्षस के बतौर स्थापित किया जा सके। महिषासुर बुद्ध के महान अनुयायी थे। इतिहास पलटकर देखेंगे तो महिषासुर एक उदार शासक थे जो समाज के सभी वर्गों और मानवता के कल्याण के लिए कृत संकल्पित थे। वे सवाल करते हैं कि अगर वह राक्षस थे तो उनके नाम पर मैसूर का नाम क्यों रखा जाता। समाज आखिर अपने आदर्शों को ही तो गढ़ता है, इससे साफ झलकता है कि उन्हें राक्षस के तौर पर स्थापित करना अगड़ों और ब्राह्मणवादियों की चाल थी।”

बार-बार दमन के बाद भी बुलंद है प्रो. गुरु का हौसला
राम के कथित अपमान के मामले में पहले ही सलाखों के पीछे जा चुके और ‘महिषा दसरा’ के प्रमुख आयोजकों में शुमार बी.पी महेशचंद्र गुरू को जेल का तनिक भी डर नहीं हैं, वह पूरे आत्मविश्वास से लबरेज हैं अपने कार्यक्रम को लेकर, कहते हैं हमारा इरादा इस कार्यक्रम में हिंसा फैलाने का नहीं बल्कि शांतिपूर्ण तरीके से अपना मैसेज समाज और युवा पीढ़ी तक पहुंचाना है। हम यह पिछले कई सालों से करते आ रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे।
गुरू बताते हैं, ‘इस साल देशभर के करीब दस हजार लोग मैसूर में महिषा दसरा मनाएंगे। हमारी योजना इस कार्यक्रम को शांतिपूर्ण तौर पर आयोजित करने की है। इस आयोजन में देशभर के प्रगतिशील, दलित समर्थक, बहुजनवादी संगठन मिलकर व्यापक स्तर पर इसमें हिस्सेदारी करेंगे और दलित–प्रगतिशील बुद्धिजीवी ही इसमें बतौर वक्ता शामिल होंगे। हम लोग बहुत उत्साह के साथ इसकी तैयारियों में लगे हुए हैं।’

गौरतलब है कि मैसूर विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में प्रोफेसर महेश गुरू उस दौरान विश्वविद्यालय से निलंबित थे, जब उन्हें राम का अपमान करने के आरोप में सरकार ने जेल में डाल दिया था। महिषा दसरा का मुख्य आयोजक महिषा प्रतिष्ठान संस्थान है, जबकि मैसूर यूनिवर्सिटी रिसर्च स्कॉलर एसोशिएसन, इंडिजिनियस पीपुल आफ मैसूर और अन्य प्रगतिशील समूहों का व्यापक समर्थन प्राप्त है। यहां के सभी प्रगतिशील–दलित विचारकों के संगठनों ने मिलकर ‘महिषा दसरा उत्सव समिति’ गठित की है, जिसके बैनर तले यह आयोजन किया जा रहा है।
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महिषासुर को बौद्ध शासक मानने वाले प्रोफेसर गुरू कहते हैं “मैसूर का नाम महिषासुर के नाम पर ही पड़ा था। मैसूर को अलग-अलग स्थानों में महिष मंडल, महिषुरानाडू, महिषानाडू व महिषापुरा कहा गया है। इतिहास का हवाला देते हुए वे बताते हैं 245 ईसा पूर्व बौद्ध सम्राट अशोक ने महादेवा नाम के बौद्ध भिक्षु को कर्नाटक के ‘महिषामंडल’ में भेजा था, वही बाद में वहां का महिषा नामक राजा बना और महिषामंडल राज्य की स्थापना की। महिषा के शासन के प्रमाण के बतौर क्षेत्र में कई ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध हैं। मगर महिषा की दुर्गा के दूसरे रूप चामुन्डेश्वरी द्वारा उनकी हत्या का कोई प्रमाण नहीं मिलता। यह हिंदुवादियों द्वारा स्थापित किया गया है, इन्हीं लोगों ने महिषा को असुर के बतौर स्थापित कर दिया। इसीलिए हम मांग कर रहे हैं कि महिषासुर को राक्षसी रूप में दर्शाना बंद किया जाए।”
बताते चलें कि प्रोफ़ेसर मीडिया के पहले दलित–बौद्ध प्रोफ़ेसर महेश गुरू पिछले तीन दशकों से न सिर्फ पत्रकारिता की शिक्षा–दीक्षा दे रहे हैं, बल्कि कर्नाटक और देश के कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर भी रहे हैं। वे हिंदूवादी ताकतों के हमले झेल चुके हैं। उन्हें देश में आसीन पार्टी विशेष के इशारे पर ब्राह्मणवादियों ने 17 जून, 2016 को मैसूर की अदालत ने डेढ़ साल पुराने एक मुक़दमे में जेल भेज दिया था। उनके खिलाफ 3 जनवरी, 2015 को एक हिंदूवादी संगठन ने मामला दर्ज कराया था कि उन्होंने हिंदुओं के आदर्श भगवान राम का अपमान किया। साथ ही भारतीय जनता पार्टी के अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ के कर्नाटक राज्य उपाध्यक्ष चीना रामू द्वारा उन पर मामला दर्ज करवाया गया था कि उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी और तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री के खिलाफ बदजुबानी की थी।

हम पीछे हटने वाले नहीं
महिषा दसरा की तैयारियों के बाबत मैसूर यूनिवर्सिटी के मीडिया रिसर्च छात्र, अकादमिशियन, फ्रीलांस लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता दिलीप नरसैया एम कहते हैं, “हमारी योजना इस कार्यक्रम में सेमिनार, कंजर्वेशन समेत शांतिपूर्ण ढंग से अपना मैसेज समाज को देने की है कि महिषासुर असुर नहीं, बल्कि हम सबका आदर्श थे। अगड़ों ने हमारी संस्कृति को जिस तरह इतिहास में लिखा, हमारे आदर्शों-अनार्य राजाओं को असुर के बतौर प्रस्तुत किया, उससे हमारी भावनाएं आहत होती हैं, इसीलिए हमने मैसूर में महिषा दसरा मनाने का निर्णय लिया। हालांकि हम यह पिछले कई सालों से करते आ रहे हैं जिसके लिए शासन–प्रशासन के निशाने पर भी रहते हैं, मगर इससे पीछे डरकर हम पीछे हटने वाले नहीं हैं। न ही हम कभी यह स्वीकारेंगे कि महिषासुर बुराई के प्रतीत थे। न केवल महिषासुर बल्कि अन्य कई अनार्य राजा जिन्हें विलेन के बतौर इतिहास में दर्शाया गया है वे भारतीय संस्कृति और सभ्यता के महान लोग रहे हैं। सही मायनों में देखा जाए और इतिहास उठाकर देख लें, असुर ही भारत के मूल निवासी थे और अब उन्हीं के प्रतीकों को इस तरह दर्शाकर उनका अपमान किया जा रहा है, जो नहीं किया जाना चाहिए, हमारी पहल इसीलिए है कि एक दिन सभी मानने लगेंगे कि महिषासुर हम असुरों के आदर्श थे।”
(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क/राजन)
(आलेख परिवर्द्धित : 14 अक्टूबर 2018, 11:13 AM)
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