यूजीसी का कदम विनाशकारी : सूसी थारू

सूसी थारू यूजीसी द्वारा फारवर्ड प्रेस, ईपीडब्ल्यू और हंस जैसी पत्रिकाओं को अनुमोदन सूची से बाहर निकाले जाने का विरोध कर रही हैं। उनका कहना है कि मानविकी और समाज विज्ञान के क्षेत्र में विद्वता का विस्तार हो, इसके लिए समाज के नये वर्गों और नये मुद्दों को अकादमिक विमर्श का हिस्सा बनाया जाना जरुरी है। इसलिए यह फैसला बहुत विनाशकारी है

यूजीसी की मौजूदा रीति-नीति को लेकर खड़े हुए विवाद पर अग्रणी लेखिका, समाज विज्ञानी और महिला अधिकार कार्यकर्ता सूसी थारू का कहना है,”पिछले दो दशकों में ‘पीयर रिव्यूड‘ (संबंधित विषयों के तथाकथित विद्धानों की यूजीसी की समिति जो पत्रिकाओं और जर्नल्स को लेकर समीक्षा करती है और अपनी सिफारिश देती है), जिसकी यूजीसी के भीतर आजकल ‘सहकर्मी समीक्षक‘ के तौर पर खासी चर्चा रहती है, उसका काफी प्रसार हुआ है।” यह इस स्वायत्त संस्था के भीतर ऐसा जाल है जहां से मनमर्जी के मुताबिक पत्रिकाओं को बाहर करने या सूची में रखने के लिए पिछले दरवाजे से रास्ता खुलता है। उनके मुताबिक, “इस रास्ते से यूजीसी की अनुमोदित पत्रिकाओं की सूची में किसी भी पत्रिका और जर्नल्स के लिए जगह बनाना आसान हो जाता है।”

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