दलित-बहुजनों का शोध-प्रबंध स्वीकार करने में अानाकानी, छात्र कर रहे हैं अनशन

चन्द्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रोद्योगिकी विश्वविद्यालय, कानपुर के कई दलित-बहुजन शोधार्थी आमरण अनशन कर रहे हैं। उनका कहना है कि जातिगत दुर्भावना के तहत उनके शोध प्रबंध स्वीकार नहीं किये जा रहे हैं। फारवर्ड प्रेस की खबर :

भारतीय संविधान के तमाम प्रावधानों के बावजूद देश में दलित-बहुजन छात्रों के साथ नाइंसाफी हो रही है। एक उदाहरण चन्द्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रोद्योगिकी विश्वविद्यालय, कानपुर का है। इस विश्वविद्यालय में कई दलित-बहुजन छात्र हैं जिनकी पीएचडी  तैयार है, लेकिन उसे स्वीकार नहीं किया जा रहा है। छात्रों के मुताबिक शिक्षक जातिगत दुर्भावना के तहत ऐसा कर रहे हैं। वे नहीं चाहते हैं कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में दलित-बहुजन समाज के युवा आयें। शिक्षकों और विश्वविद्यालय के इसी रवैये को देखते हुए बीते 19 नवंबर 2018 से छात्र आमरण अनशन पर बैठ गये हैं। उनका कहना है कि जबतक उनके शोध-प्रबंध को स्वीकार नहीं किया जाएगा, तबतक वे अनशन नहीं तोड़ेंगे।

अनशन कर रहे छात्र आरोप लगा रहे हैं कि विश्वविद्यालय के कई प्रोफ़ेसर ‘बिजी विदाआऊट वर्क’ वाली कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं। वे ऐसा तभी करते हैं जब मामला दलित-बहुजन छात्रों से जुड़ा होता है। इसका एक प्रमाण यह है कि शोध छात्रों  का शोध-प्रबंध ट्रायल उनके मुख्य शोध सलाहकारों द्वारा समय पर नहीं लगवाये जाते हैं और न ही समय पर साक्षात्कार कराया जाता है।

आमरण अनशन कर रहे चन्द्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रोद्योगिकी विश्वविद्यालय,के दलित-बहुजन छात्र

सवाल उठाने पर बैक डेट का दिया जाता है आश्वासन

मसलन गृह विज्ञान की शोध छात्रा दीपिका सचान (2015 मे पंजीकृत) का साक्षात्कार देर से करवाये जाने के कारण अतिरिक्त पंजीकरण कराना पडा। दीपिका ओबीसी (कुर्मी) जाति से हैं।  ऐसा ही मामला मृदा विज्ञान विभाग के शोध छात्र अशोक कुमार (दलित) व अनुराग धनगड (ओबीसी) (दोनों 2015 मे पंजीकृत) का भी है। इसी प्रकार पादप रोग विज्ञान विभाग के ही शोध छात्र नरेन्द्र कुमार (ओबीसी) का शोध कार्य अगस्त, 2016 मे ही पूरा हो गया था लेकिन उनके मुख्य शोध सलाहकार डॉ. उमा कान्त त्रिपाठी ने उनका शोध प्रबंध जानबूझकर समय (जून-जुलाई, 2017 तक) जमा नही कराया। नरेंद्र  को बार-बार कहा गया कि उनका शोध प्रबंध बैक डेट में स्वीकार कर लिया जाएगा। इसी बीच सातवें सेमेस्टर की पंजीकरण की तिथि समाप्त हो गयी। इसके बाद 25 हजार रुपए के आर्थिक दंड के साथ दुबारा पंजीकरण करवाना पड़ा।

अनशन कर रहे छात्रों का कहना है कि विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा इस दिशा में कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है। इस कारण उनका समय बर्बाद हो रहा है।

शिक्षक कर रहे हैं आरोपों को खारिज

वहीं विश्वविद्यालय के डीन, एग्रीकल्चर प्रो. पूनम सिंह अनशरत छात्रों के द्वारा उठाये जा रहे सवालों को खारिज करती हैं। उनका कहना है कि छात्रों ने अपनी थीसिस पूरी नहीं की है। उन्हें कई बार समझाया गया, लेकिन वे नहीं मान रहे हैं। हमसब अधिकारी उनके पास गये थे। विश्वविद्यालय में प्लांट पैथोलॉजी विभाग के अध्यक्ष प्रो. वेद रतन का कहना है कि किसी भी छात्र के साथ उत्पीड़न की कोई बात नहीं है। छात्र ही गलतियां कर रहे हैं। वे ही समय पर अपनी थीसिस पूरी नहीं करते हैं। ऐसे में प्रोफेसर क्या करें। उन्होंने छात्रों के अनशन को भी गलत ठहराया है।

बहरहाल, विश्वविद्यालय के प्रावधानों के मुताबिक साक्षात्कार के नौ महीने बाद शोध प्रबंध जमा कराना होता है। लेकिन विश्वविद्यालय में शिक्षकों की शिथिलता (दलित-बहुजन छात्रों के मामले में) के कारण बहुत से शोध छात्रों का साक्षात्कार देर से होता है। वहीं नौ महीने की अवधि पूरा करने के नियम के चलते शोध कार्य पूर्ण होने के बावजूद शोधार्थियों को अतिरिक्त पंजीकरण कराना पड़ता है, जिसके चलते उन्हे आर्थिक नुकसान तो होता ही है, समय का भी नुकसान होता है।

(कॉपी संपादन : सिद्धार्थ)


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