महिषासुर के सम्मान में निकाली दो सौ किलोमीटर लंबी यात्रा

छत्तीसगढ़ के कवर्धा जिले में आदिवासी युवाओं ने महिषासुर-रावण वध का विरोध करते हुए यात्रा निकाली। इस दौरान ब्राह्मणवादियों द्वारा थोपी जा रही परंपराओं का विरोध व पेसा कानून, वनाधिकार कानून और पांचवीं अनुसूची को लेकर जागरूकता अभियान चलाया गया। फारवर्ड प्रेस की खबर

(संपादकीय स्पष्टीकरण : फारवर्ड प्रेस ने महिषासुर दिवस पर आयोजित कार्यक्रमों व इससे संबंधित मुद्दों पर निरंतर सामग्री प्रकाशित की है, तथा इससे संबंधित पुस्तकें भी प्रकाशित की हैं। महिषासुर बहुजन के पुरखा नायक हैं। पुरखा-नायकों के सम्मान की परंपरा में मूर्तिपूजा का स्थान नहीं रहा है। इसलिए हम मानते हैं कि इन नए आयोजनों को संकल्प सभा-गोष्ठियों के रूप में किया जाना चाहिए, जिसमें मूर्ति पूजा का पूर्ण निषेध शामिल होमहिषासुर दिवस को मनाए जाने संबंधित सामग्री यहां देखें – महिषासुर शहादत दिवस : जिज्ञासाएं और समाधान।)

रावण हमारे देवता हैं, इन्हें जलाओगे तो जेल जाओगे

बीते दिनों जब पूरे देश में कथित दुर्गा पूजा के मौके पर द्विजवादी रावण और महिषासुर काे खलनायक के रूप में प्रस्तुत कर उनकी हत्या का जश्न मना रहे थे, उसी समय छत्तीसगढ़ के कवर्धा जिले में आदिवासियों ने दो सौ किलोमीटर लंबी यात्रा निकाली। आदिवासियों ने इसे जन-जागृति यात्रा की संज्ञा दी। इस दौरान “रावण हमारे देवता हैं, इन्हें जलाओगे तो जेल जाओगे” का नारा भी लगाया गया। यात्रा में सैकड़ों की संख्या में आदिवासी युवा शामिल थे।

इस यात्रा का आयोजन कोयतुर युवा समिति और गोंडवाना स्टूडेंट्स यूनियन के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। इसकी शुरुआत बीते 22 अक्टूबर 2018 को कवर्धा जिले के रेंगाखार गांव से हुई तथा इसका समापन बीते 4 नवंबर 2018 को कवर्धा शहर में विशाल रैली के रूप में हुई।

महुआ के फूल से रावण-महिषासुर को दी श्रद्धांजलि

इससे पहले 22 अक्टूबर को जब यात्रा की शुरुआत की गई थी, तब कोयतुर समाज के लोगों ने अपने पारंपरिक उत्सव गोंगो का आयोजन किया था। इस उत्सव का आयोजन वे अपने पुरखाें- रावण और महिषासुर को याद करने के लिए करते हैं। इस मौके पर वे महुआ का फूल अर्पित करते हैं।

महिषासुर के सम्मान में आदिवासियों ने निकाली यात्रा़

यात्रा के दौरान समनापुर, शितलपानी, चिल्फीघाटी, तरेगांव, बोड़ला, दलदली, कुईकुकदूर, कामठी, पंडरिया, पोंडी पांडातराई, जोराताल,जरती, पिपरिया आदि गांवों में आदिवासी युवाओं ने आम सभाओं का आयोजन किया। इस दौरान उन्हाेंने संदेश दिया कि किस तरह ब्राह्मणवादियों ने जल-जंगल-जमीन हड़पने के लिए षड्यंत्र किया और अपनी वर्चस्ववादी संस्कृति को थोपा। वे हमारे पुरखों का अपमान कर रहे हैं। अब ऐसा नहीं चलेगा। भारत के संविधान में इसका प्रावधान है कि हम उनका विरोध कर सकते हैं। इसलिए, हम उन्हें बता रहे हैं कि यदि उन्होंने हमारे पुरखों का अपमान करना बंद नहीं किया, तब उनके खिलाफ मुकदमे किए जाएंगे और उन्हें जेल जाना होगा। इसके अलावा वनाधिकार कानून, पेसा एक्ट, पांचवीं अनुसूची को लागू करने संबंधी जानकारियां भी दी गईं।

यात्रा का समापन 4 नवंबर 2018 को कवर्धा शहर में हुआ, जहां हजारों की संख्या में कोयतुर समाज के लोग जुटे।

बताते चलें कि इस वर्ष भी कवर्धा जिले में ही कोयतुर युवा समिति ने सभी प्रखंडों में दुर्गा की प्रतिमा के साथ महिषासुर वध दिखाने पर थाने में शिकायतें दर्ज कराई थीं। साथ ही जिला प्रशासन से ऐसे आयोजनों पर रोक लगाने की मांग की थी।

अब हर साल निकालेंगे यह यात्रा

यात्रा के बारे में नारायण मरकाम उर्फ लिंगो ने बताया, “ब्राह्मणों के ग्रंथों में हमारे पेन महिषासुर और रावण को गलत तरीके से पेश कर अपमान किया जाता है। हमारी यात्रा का उद्देश्य अपने लोगों को अपने पुरखों के बारे में सही जानकारी देना था। साथ ही हमारे पुरखों को लेकर जो दुष्प्रचार किया जा रहा है, उसे बंद कराना भी हमारी यात्रा का मकसद था। यह यात्रा हम लोगों ने पहली बार शुरू की। अब यह यात्रा हम हर साल निकालेंगे और ब्राह्मणवादी परंपराओं का विरोध करेंगे।”

आदिवासी युवाओं ने मनाया महिषासुर शहादत दिवस समारोह

मरकाम ने बताया, “यात्रा के दौरान रावण के पुतले और महिषासुर की तस्वीर को गाड़ी में रखा गया था। इस यात्रा में किसी भी प्रकार का व्यवधान नहीं हुआ। प्रशासन ने यात्रा के दौरान सहयोग दिया। पूरी यात्रा में पुलिस के 12 जवान हमारे साथ थे।”

बहरहाल, कवर्धा में रावण व महिषासुर की स्मृति में गोंगो उत्सव का आयोजन तीन साल से किया जा रहा है। पहली बार यात्रा निकालकर आदिवासियों ने यह जता दिया है कि अब अपने पुरखों का अपमान वे बर्दाश्त नहीं करेंगे।

(कॉपी संपादन : प्रेम/एफपी डेस्क)


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