उत्तर प्रदेश : इलाज के लिए गिरवी रखनी पड़ी पायल, नहीं बच सकी नवजात की जान

सरकारी अस्पतालों में इलाज के इंतजाम सरकारी दावों को मुंह चिढ़ा रहे हैं। उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में एक घटना बीते 29 अक्टूबर को घटित हुई। इलाज के लिए राजकुमार यादव को अपनी पत्नी की पायल गिरवी रखनी पड़ीं। लेकिन वे अपनी नवजात बच्ची को नहीं बचा सके। फारवर्ड प्रेस की खबर

प्रधानमंत्री स्वास्थ्य बीमा याेजना के बाद भी अस्पतालों की हालत हुई और बदतर

केंद्र सरकार ने भले ही देश भर में प्रधानमंत्री स्वास्थ्य बीमा याेजना चलाकर हर गरीब काे वीआईपी इलाज देने का दावा किया हो, लेकिन वास्तविक हालात यह हैं कि लोगों को बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं भी नहीं मिल पा रही हैं। बीते 29 अक्टूबर 2018 को उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (योगी आदित्यनाथ की सरकार ने इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज कर दिया है) के सरgiraviकारी अस्पताल में एक नवजात की मौत हो गई। वजह यह रही कि अस्पताल के आॅपरेशन थियेटर में न तो आवश्यक दवाएं थीं और न ही इंतजाम। इस बदइंतजामी का शिकार हुए उतरांव थाना क्षेत्र के सैदाबाद निवासी राजकुमार यादव।

उन्होंने पत्नी की पायल तक दवा दुकान में गिरवी रख दी, लेकिन वे अपनी बच्ची को नहीं बचा सके।

दरअसल, हुआ यह कि राजकुमार यादव पत्नी रिंकी का प्रसव करवाने प्रयागराज मेडिकल कॉलेज पहुंचे। वहां स्त्री रोग विशेषज्ञ डाॅ. उर्वशी शर्मा ने उनसे सर्जरी किए जाने की बात कही। यह कहते हुए उन्होंने दवाओं की एक पर्ची थमा दी। ये वे दवाएं थीं, जो सर्जरी के लिए आवश्यक थीं। नियमत: ये दवाएं अस्पताल प्रशासन को समय रहते मुहैया कराई जानी चाहिए थीं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

सरकारी बदइंतजामी की शिकार हुई रिंकी व उसके परिजन

दवाओं के लिए पायल गिरवी रखनी पड़ीं

राजकुमार यादव दवा की पर्ची लेकर ‘देव एंड संस’ नामक दवा दुकान में गए, जहां पैसे कम पड़ने पर दुकानदार ने दवा देने से इनकार कर दिया। साथ ही उसने कोई गहना-जेवर गिरवी रखने पर दवा देने की बात कही। मजबूर राजकुमार यादव भागा-भागा अस्पताल पहुंचा और आॅपरेशन थियेटर में पड़ी अपनी पत्नी के पैर से पायल लेकर वापस दवा दुकान पर पहुंचा। और फिर वहां से आॅपरेशन थियेटर, जहां चिकित्सक दवाओं का इंतजार कर रहे थे।

दवाओं के लिए दुकानदार ने पायल को रखीं गिरवी

समय पर दवाएं मिल जातीं, तो बच जाती नवजात की जान

लेकिन, उसका यह प्रयास भी बेकार साबित हुआ। इससे पहले कि राजकुमार और रिंकी के चेहरे पर खुशी दाैड़ती, डॉक्टराें ने सर्जरी के बाद बताया कि बच्ची की हालत गंभीर है। बच्ची के हृदय की गति बहुत धीमी थी। उसकी हालत को देखते हुए डॉक्टरों ने इलाज के लिए तत्काल सरोजिनी नायडू चिल्ड्रेन अस्पताल के लिए रेफर कर दिया। लेकिन, वहां पहुंचते ही बच्ची की मौत हो गई।

पीड़ित राजकुमार यादव का आरोप है कि दवा मिलने में देरी के चलते इलाज देर से शुरू हुआ। अगर समय से दवा मिल जाती और समय से ऑपरेशन हो जाता, तो शायद मेरी बच्ची बच जाती।

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जांच कमेटी गठित

जब यह खबर राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की पूर्व सदस्य निर्मला यादव तक पहुंची, ताे उन्हाेंने 01 नवंबर को अस्पताल पहुंचकर पीड़ित दंपत्ति से मुलाकात की। साथ ही मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल से मामले की जांच करके कार्रवाई करने काे कहा। इसके बाद प्रिंसिपल डाॅ. एस.पी. सिंह ने तीन सदस्यीय जांच कमेटी गठित करके पांच दिन में रिपोर्ट सौंपने का आदेश दिया है। इस कमेटी में अस्पताल के प्रमुख डाॅ. ए.के. श्रीवास्तव, डाॅ. अरविंद गुप्ता व डाॅ. अमृता चौरसिया शामिल हैं।

चिकित्सक ने स्वीकारा, आॅपरेशन थियेटर में नहीं थीं दवाएं

वहीं, पीड़िता का इलाज करने वाली डॉ. उर्वशी का कहना है- कुछ दवाएं ओटी में नहीं थीं, इसलिए बाहर से मंगवानी पड़ीं। इस मामले को कुछ लोग बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं।

लेकिन सवाल तो उठता ही है कि जरूरी दवाइयां सरकारी अस्पताल में क्यों नहीं थीं? इसके लिए कुछ आंकड़ों पर नजर डाल लेते हैं।

सरकारी अस्पतालाें में दवाओं की किल्लत, जिम्मेदार कौन?

‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, ‘यूपी के 14 मेडिकल कॉलेजों के लिए 2016-17 में 2,344 करोड़ रुपए का बजट था, जिसे 2017-18 में योगी सरकार ने घटाकर 1,148 करोड़ कर दिया; मतलब आधे से भी कम। जबकि, इलाहाबाद मेडिकल कॉलेज का बजट 15.9 करोड़ से घटाकर 4.2 करोड़ कर दिया गया। (यानी लगभग चाैथाई)

वहीं, स्वास्थ्य विभाग की रेट कांट्रेक्ट लिस्ट (आरसी लिस्ट) से जरूरी दवाइयां भी गायब कर दी गईं। लिस्ट में सिर्फ 1,100 दवाएं ही शामिल हैं। जबकि पिछले साल 4,000 से ज्यादा दवाओं को इस लिस्ट में शामिल किया गया था। ऐसे में कहीं न कहीं जीएसटी ने संकट पैदा कर दिया है। अधिकारियों का कहना है कि जीएसटी लागू होने से दवाओं की कीमतों में 12 से 18 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है। अतः कायदे से तो बजट पिछले साल की अपेक्षा 10 से 15 तक प्रतिशत बढ़ाकर देना चाहिए था, लेकिन सरकार ने उलटे उसमें भी कटौती कर दी। सरकारी आंकड़ों के हिसाब से पिछले पांच वर्षाें में इस बीमारी से 4,000 से अधिक बच्चों ने दम तोड़ा है।’

मेडिकल जर्नल द लैनसेट में प्रकाशित ग्लोबल बर्डेन ऑफ डिजीज स्टडी के मुताबिक, ‘स्वास्थ्य सेवा से जुड़ी 195 देशों की सूची में भारत 154वें स्थान पर है जबकि रक्षा बजट में खर्च के मामले में भारत छठे स्थान पर है।’

बहरहाल, राजकुमार यादव और रिंकी के साथ हुई घटना सरकारी इंतजामों की पोल खोलती है। यह विडंबना ही है कि सरकारी अस्पतालों में गरीबों के लिए जेनेरिक दवाइयां तक उपलब्ध नहीं हैं। यह हालत तब है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 3000 करोड़ रुपए से अधिक ‘स्टेचू ऑफ यूनिटी’ बनवाने में लगा दिए और स्वास्थ्य बजट में 20 प्रतिशत की कटौती कर दी।

(काॅपी संपादन : प्रेम/एफपी डेस्क)


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