आखिर क्यों नहीं थी गांधी के पास डॉ. आंबेडकर जैसी दृष्टि?

बीते 24-25 अक्टृूबर 2018 को केरल के कन्नूर में ‘हिंदी दलित कविता और आंबेडकरवादी चिंतन’ विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार भाषागत खाई को भरने का सफल प्रयास तो साबित हुआ ही, साथ ही आधुनिक साहित्य में वंचितों के साहित्य को मिल रहे महत्व को भी रेखांकित करने में सफल हुआ

केरल में हिंदी दलित कविता और आंबेडकरवादी दर्शन विषयक गोष्ठी का आयोजन

कहने की आवश्यकता नहीं है कि बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के पास समाज के लिए जो दृष्टि थी, वह गांधी की दृष्टि से अधिक व्यापक व कल्याणकारी थी। इसका परिणाम हमें भारतीय संविधान में देखने को मिलता है। किस तरह बाबा साहेब ने एक ऐसे समाज के निर्माण का आधार तैयार किया जिसमें जाति व्यवस्था के आधार पर सदियों से चले आ रहे वर्चस्ववाद का खात्मा हो और राष्ट्र निर्माण में वे भी शामिल हो सकें, जिन्हें हाशिए पर रखा गया था। सवाल उठता है कि क्यों एक वकील होकर भी अस्पृश्यता जैसे भ्रष्टाचार को कानून की दृष्टि से गांधी देख नहीं पाए और आंबेडकर ने यह देख लिया। ये बातें दलित साहित्यकार जय प्रकाश कर्दम ने केरल के कन्नूर जिले के थलश्शेरी स्थित गवर्नमेंट बेण्णन कॉलेज के सभागार में 24-25 अक्टूबर,2018 को आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी में कही।

गोष्ठी में देश भर से हिंदी साहित्यकार व बुद्धिजीवी शामिल हुए। गोष्ठी का मुख्य विषय ‘हिंदी दलित कविता और आंबेडकरवादी दर्शन’ था।

सेमिनार को संबोधित करते जे. पी. कर्दम

बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर की नजर में धर्म

इस मौके पर फारवर्ड प्रेस के प्रबंध संपादक प्रमोद रंजन ने ‘डॉ. आंबेडकर की नज़र में धर्म’ विषय पर लिखित बीज व्याख्यान दिया का पाठ किया। उन्होंने कहा कि डॉ. आंबेडकर ईश्वर को धर्म का अनिवार्य हिस्सा नहीं मानते, लेकिन वे नैतिकता को धर्म का अनिवार्य हिस्सा मानते हैं। आंबेडकर का कहना है- “यद्यपि धर्म और ईश्वर का सर्वथा अभिन्न संबंध नहीं है, परंतु धर्म और नैतिकता का आपस में अभिन्न संबंध है। सामाजिक जीवन का संचालन मुख्यत: कानून से नहीं, बल्कि नैतिकता से होता है। समाज का वास्तविक नियंत्रक और संचालक कानून नहीं, बल्कि नैतिकता होती है। इस नैतिकता का स्रोत धर्म होता है।” वे लिखते हैं कि- “समाज को अपनी एकता बनाए रखने के लिए या तो कानून का आश्रय लेना पड़ेगा या फिर नैतिकता का। दोनों के बिना समाज टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा। सभी समाजों में कानून का हस्तक्षेप बहुत कम होता है। कानून का उद्देश्य है- थाेड़े लाेगाें को सामाजिक अनुशासन की सीमा में रखनाबहुलांश लाेगाें को अपना सामाजिक जीवन बिताने के लिए नैतिक संबंधाें, मौलिक सिद्धांताें और नैतिकता के अनुमोदन पर छोड़ दिया जाता है, और छोड़ देना पड़ता है। इसलिए धर्म को नैतिकता के अर्थों में प्रत्येक समाज के संचालक के रूप में बने रहना चाहिए।”

सेमिनार को संबोधित करते फारवर्ड प्रेस के प्रबंध संपादक प्रमोद रंजन

प्रमोद रंजन ने कहा कि “डॉ. आंबेडकर किसी भी धर्म को आधुनिक विज्ञान, तर्क, लोकतंत्र और स्वतंत्रता, समता और बंधुता की कसौटियों पर कसने की वकालत करते हैं। वे साफ शब्दों में कहते हैं कि इन कसौटियों पर जो धर्म खरा नहीं उतरता है, उसे आधुनिक अर्थों में धर्म नहीं कह सकते, न तो वह नैतिक शक्ति के रूप में समाज का संचालक हो सकता है।” इस संदर्भ में वे कहते हैं- “किसी धर्म के लिए इतना ही पर्याप्त नहीं है कि उसमें नैतिकता हो। उस नैतिकता को जीवन के मूलभूत सिद्धांताें- स्वतंत्रता, समानता तथा बंधुताको मानना चाहिए। कोई धर्म जब तक इन सामाजिक सिद्धांताें को मान्यता नहीं देगा, उसका भविष्य अंधकारमय ही बना रहेगा।” वे धर्म को तर्क और बुदि्ध से परे मानने को बिलकुल तैयार नहीं हैं।

 

प्रमोद रंजन ने कहा कि डॉ. आंबेडकर का धर्म-दर्शन तर्क, विज्ञान और धर्म के बीच कोई अंतर्विरोध नहीं देखता है। नैतिकता, तर्क, विज्ञान, स्वतंत्रता, समता, बंधुता और लोकतंत्र की कसौटी पर उन्होंने सभी धर्मों को परखा है।

गोष्ठी का आयोजन डॉ. प्रभाकरन हेब्बार इल्लत के संयोजन में किया गया। इसके प्रथम सत्र की अध्यक्षता गवर्नमेंट बेण्णन कॉलेज की प्राचार्य प्रो. बीना एन. एल ने की। सत्र को वाणिज्य विभाग के उप प्राचार्य चंद्रभानु एम, पी टी ए सचिव डॉ प्रमोद सी , मलयालम विभागाचार्य उन्निकृष्णन के. वी. तथा छात्र संघ अध्यक्ष आश्विन राघवन, हिंदी विभाग सहायक आचार्य डॉ. जे. वासंती आदि  ने संबोधित किया।

सेमिनार को संबोधित करतीं डॉ. जे. वासंती

गोष्ठी में प्रो. एन. प्रभाकरन  ने मलयाली दलित कविताओं के संबंध में अपनी बात रखी। उन्होंने रस, ध्वनि आदि की अवधारणा की मुख्य बिन्दुओं पर चर्चा करते हुए भारतीय सौन्दर्यशास्त्र की भी आलोचना की। मलयालम के प्रमुख दलित कवि एस.जोसफ, सम्बशिवन, राजेश चिरप्पाड की कुछ कविताओं का उदहारण देकर उन्होंने यह स्पष्ट किया कि दलित कविताओं का सौंदर्यशास्त्र किसी भी मायने में अभिजनकी कविताओं से कमतर नहीं है।

सेमिनार को संबोधित करते प्रो. वी. रवींद्रन

संगोष्ठी के दूसरे दिन की शुरुआत मलयालम में दलित विषयों पर लेखन एवं समालोचना संबंधी विमर्श के साथ हुई। इस सत्र की अध्यक्षता गवर्नमेंट बेण्णन कॉलेज के दर्शन विभाग के आचार्य दिलीप राज ने की। इस मौके पर मलयालम दलित लेखक, आलोचक व सामाजिक कार्यकर्ता सण्णी एम. कपिक्काड़ ने ‘आंबेडकर : एक राजनीतिक विचारक’ विषय पर  व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि अम्बेडकर की कृतियों में इस बात का उल्लेख है कि किस तरह भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था लाने के लिए उन्हें पश्चिम की सहायता लेनी पड़ी।

सेमिनार को संबोधित करते सण्णी एम. कपिक्काड़

वहीं मद्रास विश्वविद्यालय, चेन्नई के प्रो. ओ.के संतोष ने ‘सामाजिक कल्पना और दलित शरीर : एक आलोचनात्मक अभिगम’ विषय पर आलेख प्रस्तुत किया। इसके जरिए उन्होंने मलयालम साहित्य में चित्रित नायकों से लेकर दलित रचनाओं के नायकों व उनके परिवेश संबंध में चर्चा की।

तिरूर मलयालम विश्वविद्यालय के डॉ. के. वी. शशि ने ‘मलयालम साहित्य में दलित विमर्श : संक्ल्पना एवं प्रयोग’ विषय पर अपना विचार प्रस्तुत किया। उन्होंने मलयालम साहित्य में दलितों के सवालों के विभिन्न आयामों को सामने रखा और इस बात पर जोर दिया कि आंबेडकर और पेरियार के विचारों से लैस होकर ही हम बेहतर समाज के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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