असिस्टेंट प्रोफेसरों की नियुक्ति प्रक्रिया में संशोधन, सूचनाएं कम, भ्रम ज्यादा

हाल के दिनों में कई ऐसी खबरें आई हैं जिनमें असिस्टेंट प्रोफेसर पदों पर बहाली हेतु नियमों में बदलाव की बात कही गई है। कहा तो यह भी जा रहा है कि इसके लिए स्नातकोत्तर में न्यूनतम 55 प्रतिशत अंक और नेट उत्तीर्णता की अनिवार्यता को भी समाप्त कर दिया गया है। लेकिन यह पूरा सच नहीं है

भारत में उच्च शिक्षण संस्थान शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं। इस बीच केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के द्वारा कई अवसरों पर ऐसे संकेत दिए गए कि शिक्षकों की कमी को दूर करने के लिए नियुक्ति प्रक्रिया में ढील दी जाएगी। मसलन असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर नियुक्ति के लिए पीएचडी डिग्री धारकों को राष्ट्रीय शिक्षक पात्रता परीक्षा उत्तीर्ण करने की अनिवार्यता को खत्म कर दिया जाएगा। वहीं, ये खबरें भी आईं कि पीएचडी डिग्रीधारकों के लिए स्नातकोत्तर में  न्यूनतम 55 प्रतिशत अंक की अनिवार्यता को भी खत्म किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त बीते 28 नवंबर को अनेक अखबारों ने यह खबर प्रकाशित की कि यदि किसी अभ्यर्थी ने मान्यता प्राप्त विदेशी संस्थानों से पीएचडी की डिग्री हासिल की है, तो उसकी सीधी नियुक्ति हो सकती है।

क्यों फैल रहा भ्रम?

इसी वर्ष 14 जून 2018 को आई यह खबर संभवत: पहली बड़ी खबर थी, जिसने भारतीय अकादमिक जगत में एक नई बहस को  जन्म दिया। इसे देश के अखबारों ने तो जगह दी ही, माइक्रोसॉफ्ट की आधिकारिक वेबसाइट ने भी तवज्जो दी। खबर का शीर्षक था – ‘अब असिस्टेंट प्रोफेसर बनने के लिए नहीं होगी नेट की जरूरत’।

खबर के मुताबिक, “मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने एक नियमावली को जारी करते हुए कहा कि 2021 के बाद विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति के लिए पीएचडी को अनिवार्य कर दिया गया है और कॉलेजों में भी सहायक प्रोफेसर (सिलेक्शन ग्रेड) की पदोन्नति के लिए भी पीएचडी को अनिवार्य किया गया है।”

इसी खबर के एक हिस्से में यह भी बताया गया कि “नई नियमावली में दुनिया के पांच सौ श्रेष्ठ रैंकिंग वाले विदेशी शैक्षणिक संस्थानों से पीएचडी करने वाले लोगों को भी सहायक प्रोफेसर की नियुक्ति में मान्यता दी जाएगी और उनकी नियुक्ति के लिए विशेष प्रावधान किए जाएंगे।”

केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर

खबर के अनुसार ही, “जावड़ेकर ने बताया कि कॉलेजों में शिक्षकों को शोध करने की जरूरत नहीं है ,बल्कि उन्हें छात्रों को बेहतर ढंग से पढ़ाने की आवश्यकता है। इसलिए, एपीआई प्रणाली को खत्म कर दिया गया है। एपीआई प्रणाली विश्वविद्यालय स्तर पर जारी रहेगी और विश्वविद्यालय के शिक्षकों को शोध कार्य पर अपना ध्यान केंद्रित करना होगा। उन्होंने कहा कि कॉलेजों में शिक्षकों के अध्यापन कार्य के मूल्यांकन के लिए एक नई आकलन प्रणाली विकसित की जाएगी।”

इसी खबर में जावड़ेकर के हवाले से कहा गया कि “कॉलेजों में बतौर शिक्षक नियुक्ति के लिए मास्टर डिग्री के साथ नेट या पीएचडी अनिवार्य रहेगी। जिन शिक्षकों के लेक्चर एमओओसी में होंगे, उन्हें पदोन्नति में महत्व दिया जाएगा।”

बहुजन विमर्श को विस्तार देतीं फारवर्ड प्रेस की पुस्तकें

इसी बीच यूजीसी ने 18 जुलाई 2018 को एक अधिसूचना गजट के जरिए सार्वजनिक की। इसे ‘विश्वविद्यालयाें और महाविद्यालयों में शिक्षकों और अन्य शैक्षिक कर्मचारियों की नियुक्ति हेतु न्यूनतम अर्हता तथा उच्च शिक्षा में मानकों के रख-रखाव हेतु अन्य उपाय संबंधी अधिनियम- 2018’ की संज्ञा दी गई।

इसी अधिसूचना के खंड-4 में कला, वाणिज्य, मानविकी, शिक्षा, विधि, सामाजिक विज्ञान, विज्ञान, भाषाओं, पुस्तकालय विज्ञान, शारीरिक शिक्षा और पत्रकारिता तथा जन संपर्क जैसी विधाओं के लिए असिस्टेंट प्रोफेसर के पद के लिए सीधी भर्ती के संबंध में जानकारी दी गई है।

इस खंड में सबसे पहले जानकारी दी गई है कि अभ्यर्थी ने किसी भी भारतीय विश्वविद्यालय से संबंधित/संगत/संबद्ध विषय में 55 प्रतिशत अंक के साथ निष्णात उपाधि (पीएचडी) अथवा जहां कहीं भी ग्रेडिंग प्रणाली लागू हो वहां प्वाइंट स्केल से समतुल्य ग्रेड अथवा किसी प्रत्यायित विदेशी विश्वविद्यालय से समतुल्य उपाधि ग्रहण की हाे।

यूजीसी, नई दिल्ली

भ्रम की दूसरी वजह इसी खंड के दूसरे हिस्से में है। 14 जून 2018 को प्रकाश जावड़ेकर यह कहते हैं, “कॉलेजों में बतौर शिक्षक नियुक्ति के लिए मास्टर डिग्री के साथ नेट या पीएचडी अनिवार्य है।” लेकिन अधिसूचना के मुताबिक, “पहली अर्हता यानी स्नातकोत्तर में  न्यूनतम 55 प्रतिशत अंकों के साथ पीएचडी की डिग्री की अर्हता को पूरा करने के साथ-साथ अभ्यर्थी ने यूजीसी अथवा सीएसआईआर द्वारा आयोजित राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (एनईटी) उत्तीर्ण की हो अथवा यूजीसी द्वारा प्रत्यायित इसी प्रकार की परीक्षा, यथा- एसएलईटी/एसईटी उत्तीर्ण की हो अथवा जिन्हें यूजीसी (एमफिल/पीएचडी उपाधि के लिए न्यूनतम मानक और प्रक्रिया) विनियम 2009 अथवा 2016 और समय-समय पर इनमें बाद में किए गए संशोधनों (जैसा भी मामला हो) के अनुसार पीएचडी की उपाधि प्रदान की गई हो, उन्हें एनईटी/एसएलईटी/एसईटी से छूट प्रदान की जाएगी।

बशर्ते, दिनांक 11 जुलाई 2009 से पूर्व एमफिल/पीएचडी कार्यक्रम के लिए पंजीकृत अभ्यर्थियों को उपाधि प्रदान करने वाली संस्थाओं के तत्कालीन विद्यमान अध्यादेशों/उपनियमों/विनियमों के उपबंधों द्वारा अभिशासित होंगे। ऐसे सभी पीएचडी धारक अभ्यर्थियों को निम्नलिखित शर्ताें को पूरा करने के अध्ययीन विश्वविद्यालयों/ महाविद्यालयों/संस्थाओं में असिस्टेंट प्रोफेसर अथवा समतुल्य पदों पर भर्ती और नियुक्ति के लिए एनईटी की अपेक्षा से छूट प्रदान की जाएगी।”

जाहिर तौर पर 14 जून 2018 को जो केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने घोषणा की, जैसा कि खबर प्रकाशित करने वाले अखबारों और वेबसाइटों का कहना है, तो 18 जुलाई 2018 को जो अधिसूचना यूजीसी ने जारी की, वह अलग कैसे है?

खैर, भ्रम की स्थिति इस वजह से भी है कि यूजीसी ने अभी तक जावड़ेकर की घोषणाओं को सीधे-सीधे सत्य साबित करने वाली कोई अधिसूचना सार्वजनिक नहीं की है। यहां तक कि फारवर्ड प्रेस ने जब मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अधिकारियों व मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के सरकारी आप्त सचिव डॉ. मनदीप कुमार भंडारी से जाानने के लिए (011-23782698, 23782387) पर फोन किया, तब जवाब दिया गया कि विभागीय मंत्री ने नियमावली बनाए जाने की बात कही है। उन्होंने ऐसा नहीं कहा है कि नियमावली बन गई है।

जावड़ेकर के सरकारी आप्त सचिव डॉ. मनदीप कुमार भंडारी का जवाब यह सत्यापित करता है कि सब कुछ विचाराधीन है। इन्हें घोषणाओं की संज्ञा दी जा सकती है।

बहरहाल, भ्रम फैलने की वजहों की कोई कमी नहीं है। बीते 28 नवंबर को राष्ट्रीय दैनिक ‘अमर उजाला’ ने एक खबर प्रकाशित की। शीर्षक था – “2021 से पीएचडी डिग्री होने पर ही मिलेगा टीचर्स को प्रमोशन, कम होगा नेट एग्जाम का महत्व”

कमोबेश इसी मनमिजाज की खबरें अन्य अखबारों ने भी प्रकाशित की हैं। इन खबरों में बताया गया है कि “केंद्र सरकार ने नेट परीक्षा के महत्व को खत्म करते हुए शिक्षक भर्ती और उनके प्रमोशन को लेकर बड़ा फैसला किया है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने साल 2021 से कॉलेजों में असिस्टेंट प्रोफेसर (चयन ग्रेड) के प्रमोशन के लिए पीएचडी डिग्री का होना अनिवार्य कर दिया है। वहीं, 2021 के बाद विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की सीधी नियुक्ति के लिए पीएचडी की डिग्री का होना जरूरी होगा। सरकार ने यह फैसला देश में उच्च शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने के मकसद से किया है। मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने बुधवार को यूजीसी के नए नियमों की जानकारी देते हुए कहा कि 01 जुलाई 2021 के बाद से विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर के सीधी नियुक्ति के लिए पीएचडी न्यूनतम योग्यता होगी। मंत्रालय ने आगे कहा कि 2021से कॉलेजों में असिस्टेंट प्रोफेसर पद की प्रत्यक्ष भर्ती के लिए शिक्षकों के लिए पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री और नेट अथवा पीएचडी ही न्यूनतम योग्यता रहेगी। जावड़ेकर के मुताबिक, नए प्रावधान के लागू होने के लिए हमने तीन साल का वक्त दिया है।”

खबरों में यह भी कहा गया कि “इससे पहले पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री और राष्ट्रीय योग्यता परीक्षा (नेट) को कॉलेज और विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर नियुक्ति के लिए न्यूनतम योग्यता मानी जाता था। मानव संसाधन विकास मंत्रालय के इस कदम से नेट परीक्षा का महत्व कम हो जाएगा। हालांकि, वरिष्ठ अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि यह प्रावधान केवल विश्वविद्यालय के लिए है। जावड़ेकर ने कहा कि नई गाइड लाइंस में दुनिया के पांच सौ टॉप रैंकिंग वाले विदेशी शैक्षणिक संस्थानों से पीएचडी करने वाले लोगों को भी सहायक प्रोफेसर की नियुक्ति में मान्यता दी जाएगी और उनकी नियुक्ति के लिए विशेष प्रावधान किए जाएंगे। मंत्रालय ने कहा कि अकादमिक पत्रिकाओं में शोध कार्य का प्रकाशन पदोन्नति के लिए अब मानदंड नहीं है। हालांकि, शिक्षक रिसर्च जारी रख सकते हैं।”

खबरों की रेस में यह खबर खूब आगे निकली। मसलन नवभारत टाइम्स ने खबर प्रकाशित की – “विदेशी संस्‍थान से PhD करने वालों की होगी सीधे भर्ती : यूजीसी”

इस खबर में बताया गया कि यूजीसी ने नई व्‍यवस्‍था लागू करते हुए विदेशी संस्‍थानाें से पीएचडी करने वालों के लिए खुशखबरी दी है। यूजीसी के अनुसार, वर्ल्‍ड की टॉप 500 विदेशी यूनिवर्सिटीज से पीएचडी करने वालों की भारतीय यूनिवर्सिटीज सीधे तौर पर असिस्‍टेंट प्रफेसर के पद पर भर्ती कर सकती हैं। रिक्रूटमेंट के नए नियमों में बताया गया है कि दुनिया भर की ये टॉप 500 रैंकिंग वे होंगी, जिन्‍हें वर्ल्‍ड फेमस रैंकिंग सिस्‍टम के द्वारा अनुमोदित किया गया हो। इन वर्ल्‍ड फेमस रैंकिंग सिस्‍टम में क्वाकरेली साइमंड्स, टाइम्स हायर एजुकेशन रैंकिंग और एकेडमिक रैंकिंग ऑफ वर्ल्ड यूनिवर्सिटीज ऑफ द शंघाई जिओ टोंग यूनिवर्सिटी जैसी नामी संस्‍थाएं शामिल हैं।

दिलचस्प यह कि इतनी महत्वपूर्ण खबर का स्रोत नहीं बताया गया है। खबर के अनुसार, “यूजीसी के एक वरिष्‍ठ अधिकारी ने बताया कि इंटरनेशनल पीएचडी धारकों के लिए डायरेक्‍ट रिक्रूटमेंट इलिजिबिलिटी आर्ट्स, कॉमर्स, ह्यूमनिटीज, एजुकेशन, लॉ, सोशल साइंसेज, साइंस, लैंग्‍वेज, लाइब्रेरी साइंस, फिजिकल एजुकेशन और जर्नलिज्‍म एंड मास कम्‍युनिकेशन जैसे विषयों में लागू होगी। ऐसा होने के बाद भारतीय छात्रों को ग्‍लोबल टैलेंट भी सीखने को मिलेगा।’’

इतना ही नहीं खबर में यह भी घोषणा कर दी गई कि, “इससे पहले तक नियम यह था कि कैंडिडेट्स के पास भारतीय यूनिवर्सिटी में लेक्‍चरर के पद पर आवेदन करने के लिए 55 फीसदी अंकों के साथ संबंधित विषय में मास्‍टर डिग्री का होना अनिवार्य था। या फिर इसी के बराबर कोई डिग्री विदेशी यूनिवर्सिटी से ग्रहण की होनी चाहिए थी। इसके अलावा कैंडिडेट्स को नेशनल इलिजिबिलिटी टेस्‍ट पास करना भी जरूरी होता है। या फिर यूजीसी के द्वारा कराए जाने वाले इसी के समान एसएलईटी, एसईटी टेस्‍ट पास करना अनिवार्य है।”

भ्रमों की फेहरिस्त

1. 16 अक्टूबर 2018 को एक नोटिस यूजीसी द्वारा जारी की गयी जिसके मुताबिक, शिक्षक एवं अन्य शैक्षिक कर्मियों की नियुक्ति के संबंध में 18 जुलाई 2018 को भारत के राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना को प्रभावी माना जाए। यूजीसी ने सभी विश्वविद्यालयों और संबद्ध महाविद्यालयों से इसका अनुपालन करने की बात कही है। जाहिर तौर पर यूजीसी के स्तर पर इस तरह के संशोधन फिलहाल तो नहीं किए गए हैं, जिनसे यह सत्यापित हो सके कि प्रोफेसर अथवा असिस्टेंट प्रोफेसर के पदों पर सीधी भर्ती के लिए पीएचडी डिग्री के साथ 55 प्रतिशत अंकों की न्यूनतम अर्हता समाप्त कर दी गई है।

2. खबरों में विश्व के जिन 500 टॉप संस्थानों का जिक्र किया जा रहा है, उनमें पांच शिक्षण ‘संस्थान’ भारत के भी हैं। इनमें इंडियन इंस्टीट्यूट अॉफ साइंस, इंडियन इंस्टीट्यूट अॉफ टेक्नाेलॉजी (इंदौर), इंडियन इंस्टीट्यूट अॉफ टेक्नाेलॉजी (मुम्बई), इंडियन इंस्टीट्यूट अॉफ टेक्नाेलॉजी (रुड़की) और जेएसएस अकेडमी अॉफ हायर एजुकेशन एंड रिसर्च (मैसूर) शामिल हैं। सनद रहे कि इनमें कोई भारतीय विश्वविद्यालय शामिल नहीं है। ऐसे में क्या सीधी नियुक्ति का लाभ उन पीएचडी डिग्री धारकों को भी मिलेगा, जो इन भारतीय संस्थानाें से संबद्ध हैं।

3.नेट की अनिवार्यता : यूजीसी द्वारा जारी नियमावलियों में यह स्पष्ट नहीं किया गया है नेट अथवा समतुल्य अन्य परीक्षा में उत्तीर्णता की अनिवार्यता से छूट क्या केवल उन्हें मिलेगी, जिन्होंने 2009 अथवा 2016 और समय-समय पर इनमें बाद में किए गए संशोधनों के अनुरूप पीएचडी डिग्री हासिल की। अंग्रेजी में जारी अधिसूचना में इस खंड में ‘मस्ट’ शब्द का इस्तेमाल किया गया है। भ्रम की स्थिति इस वजह से भी है।


(इनपुट : कमल चंद्रवंशी, कॉपी संपादन : प्रेम )


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। हमारी किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, संस्कृति, सामाज व राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के सूक्ष्म पहलुओं को गहराई से उजागर करती हैं। पुस्तक-सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें 

दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

महिषासुर एक जननायक

महिषासुर : मिथक व परंपराए

जाति के प्रश्न पर कबी

चिंतन के जन सरोकार

About The Author

One Response

  1. dr shiv Prasad panche Reply

Reply