काल्पनिक गाथाओं पर नहीं, खुदाई के दौरान मिले साक्ष्यों पर सुलझे अयोध्या विवाद
अयोध्या में मंदिर-मस्जिद विवाद के बीच एक तीसरा पक्ष भी उठ खड़ा हुआ है जो विवादित स्थल पर मंदिर, मस्जिद की बजाय बौद्ध स्मारक बनाए जाने की मांग कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस आशय की याचिका को स्वीकार कर लिया है और आगामी 3 जनवरी 2019 को सुनवाई के दौरान इस पर भी विचार किया जाएगा। आइए जानते हैं, इस संबंध में याचिकाकर्ता विनीत कुमार मौर्य से कि उनके दावे की बुनियाद क्या है।
फारवर्ड प्रेस (एफपी) : सबसे पहले आपसे यह जानना चाहेंगे कि आपको यह सब करने की प्रेरणा कहां से मिली?
विनीत कुमार मौर्य (वि.कु.म.) : देखिए, मैं अयोध्या में रहता हूं और विवादास्पद परिसर की बाउंड्री और हमारे घर की बाउंड्री एक है। बिल्कुल पड़ोस का मामला है, इसलिए वहां आना-जाना लगा रहता था, यानि वहां से लगाव शुरू से रहा है। हाईकोर्ट के आदेश पर साल 2002 में जब विवादास्पद परिसर का समतलीकरण किया जा रहा था, तब काम करने वालों में मैं भी एक था। ट्रैक्टर चालक के रूप में मैंने वहां काम किया था। समतलीकरण के दौरान भी कुछ अवशेष मिले थे, जिन्हें अनौपचारिक तौर पर तब तथागत (भगवान बुद्ध) से जुड़े अशोक काल का माना गया। पुरातत्व विभाग ने भी तब साफ तौर पर तो नहीं कहा लेकिन अवशेष को बुद्ध से जुड़े होने को नकारा भी नहीं था। हालांकि साल 2010 में बौद्ध अवशेष की बात हाईकोर्ट में पुरातत्व विभाग ने भी माना। लेकिन, समाज में सौहार्द्र नहीं बिगड़े, यह कहकर इसे उजागर नहीं किया गया।
एफपी : पुरातत्व विभाग के स्वीकार करने की बात का दावा आप कैसे कर सकते हैं?
वि.कु.म. : इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर 2002-03 में खुदाई शुरू की गई। उस दौरान मैंने खुद मजदूर के तौर पर वहां काम किया है और वहां की वस्तुस्थिति को काफी करीब से जाना और समझा है। खुदाई के दौरान की सर्वे रिपोर्ट जो जापान की कंपनी टोजो-विकास इंटरनेशनल व आर्केलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया(एएसआई) ने मिलकर तैयार किया है, उसमें बुद्ध काल के अवशेष होने का खुलासा हुआ है जो अभी कोर्ट के आदेश पर सील है। सील खुलते ही सच्चाई सामने आ जाएगी।
एफपी : खुदाई के दौरान आप खुद वहां काम रहे रहे थे, तब कोई ऐसी बात जिससे आपको लगा हो कि खुदाई वाली एजेंसी पर किसी तरह का दबाव था?
वि.कु.म. :स्पष्ट तौर पर तो नहीं कह सकता, लेकिन एक बात मुझे यह खटकी जरूर कि जब खुदाई के लिए 150 गड्ढों की खुदाई का ले-आउट तैयार किया गया था तो फिर 50 गड्ढों की खुदाई कर ही क्यों खुदाई का काम रोक दिया? क्या 50 गड्ढों की खुदाई से ही वो सभी जानकारियां हासिल हो गईं, जिसके लिए खुदाई की जा रही थी। ये सवाल आज भी अनुत्तरित हैं।
वि.कु.म. : खुदाई के दौरान मैं मौजूद रहा हूं और जो देखा और महसूस किया, उसी के आधार पर अयोध्या में बौद्ध स्थली होने की बात कर रहा हूं। उसी के आधार पर मैंने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका भी दायर किया है और मेरा तो स्पष्ट मानना है कि विवादास्पद राम जन्मभूमि स्थल बौद्धों का है, वहां हिन्दू-मुस्लिम खामख्वाह दावा ठोंक रह रहे हैं जबकि मैं इन सबों से पूछना चाहता हूं कि अगर 1528 में मस्जिद बनी तो मंदिर वहां कब बनी थी और मंदिर से पहले वहां की स्थिति क्या थी?
एफपी : देखने या महसूस करने भर से दावे को सही नहीं ठहराया जा सकता है। अदालत को ठोस सबूत की आवश्यकता होगी।
वि.कु.म. : मेरा व्यक्तिगत रूप से भी यही मानना है कि ऐतिहासिक दृष्टि से जो सच्चाई है, वह लोगों के सामने आए। जाति, धर्म के नाम पर खेल बंद हो और ऐतिहासिक साक्ष्य के आधार पर विवादास्पद भूमि पर निर्णय हो। हमें इस पचड़े में नहीं पड़ना चाहिए कि विवादास्पद भूमि राम जन्मभूमि है या फिर बाबरी मस्जिद। हम तो केवल साक्ष्य के आधार पर दावा कर रहे हैं। पचास गड्ढों की दस-दस फीट की खुदाई के बाद जो पुरातत्व विभाग को अवशेष मिले हैं, हम तो केवल उस आधार पर दावा कर रहे हैं। खुदाई के दौरान जो साक्ष्य मिले हैं, वह अशोक काल के हैं। ईंट, दीवारें, स्तूप, पिलर बौद्ध स्थल की तरफ इंगित करता है।
एफपी : आपके जवाब से स्पष्ट है कि आप विवादास्पद स्थल पर मंदिर, मस्जिद दोनों को नकार रहे हैं?
वि.कु.म. : देखिए, निर्णय तो सर्वोच्च न्यायालय को लेना है लेकिन जहां तक हमारा मामला है, हमने जो दावा किया है, उसके पक्ष में अपनी बात रखी है। दूसरा व तीसरा पक्ष जो दावा कर रहा है, वह पक्ष में अपनी बात रखे और न्यायालय के निर्णय का इंतजार करे। तर्कसंगत बने, अधिकार बनता है तो लें, धमकी ना दें।
एफपी : धमकी से आपका क्या आशय है?
वि.कु.म. : हमने जो सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है, उसमें किसी भी देवी, देवता या अल्लाह का अपमान नहीं किया गया है। तर्कों के सहारे अपनी बात को न्यायालय तक पहुंचाया है? सुप्रीम कोर्ट का मैटर है, हमारा या आपका, हिन्दू-मुस्लिम का मैटर नहीं है, इसलिए मार देंगे, काट देंगे जैसी भाषा का प्रयोग कर डराने से कोई फायदा नहीं है। इस गलतफहमी में ना रहें कि हिन्दू धर्म की ठेकेदारी केवल सवर्णों की ही है। जाति व्यवस्था खत्म करने की जरूरत है।
एफपी : विवाद पर विराम लगता हुआ नहीं दिखे तो फिर आपके पास कोई तोड़ है?
वि.कु.म. : साक्ष्य के आधार पर फैसला हो और खुदाई के दौरान किसी भी मंदिर या हिन्दू ढांचे के अवशेष नहीं मिले हैं। बौद्ध धर्म से जुड़े ढांचे मिले हैं, जिससे यह पता लगता है कि विवादित भूमि पर पुराने समय कोई बौद्ध विहार था। इसलिए विवादित स्थल को कपिलवस्तु, कुशीनगर और सारनाथ की तरह ही एक बौद्ध विहार घोषित किया जाए। इसमें तोड़ निकालने जैसी कोई बात नहीं। तथ्यों व साक्ष्यों के आधार पर फैसला हो तो विवाद कैसे हो सकता है?
एफपी : केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले के बाद बहराइच से भाजपा की सांसद सावित्री बाई फुले ने भी अयोध्या में बौद्ध मंदिर बनाने की मांग की है। इस पर आपका क्या कहना है?
वि.कु.म. : हमें राजनीति करनी नहीं है इसलिए राजनीतिक लोगों पर प्रतिक्रिया देना मुनासिब नहीं है। किसी भी राजनीतिक दल का स्टैंड समय-समय पर बदलता रहता है, इसलिए मुझे इन पर विश्वास नहीं होता कि सामने जो कह रहे हैं हकीकत में भी वैसा ही है। इसलिए माफ कीजिए, देश के नेताओं पर मैं कुछ नहीं बोलूंगा। साथ जनता का चाहिए, नेताओं का नहीं। हमें अयोध्या में बौद्ध धर्मावलंबियों का समर्थन प्राप्त है, हम उसी के सहारे यह लड़ाई आगे ले जाएंगे।
एफपी : आपसे एक व्यक्तिगत सवाल। आप अपने जीवन यापन पर होने वाले खर्चे की व्यवस्था कैसे करते हैं?
वि.कु.म. : बाबा साहेब आंबेडकर के विचारों को घर-घर तक पहुंचाते हैं और साथ ही शादी, मुंडन आदि संस्कार कराते हैं। इसके अलावा इलाके में जहां कहीं बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर को समर्पित कार्यक्रम होता है, वहां बाबा साहेब से संबंधित किताबों का स्टॉल लगाता हूं। इन सब कामों से इतना धन जरूर मिल जाता है जिसके सहारे एक आदमी का पेट पाला जा सके। मैं अविवाहित हूं और बाबा साहेब के बताए रास्तों पर चलने का संकल्प लिया है। मरते दम तक इससे कोई डिगा नहीं सकता।
(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)
फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्त बहुजन मुद्दों की पुस्तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्य, सस्कृति व सामाजिक-राजनीति की व्यापक समस्याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in
फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें