जाति, विमर्श और ज्ञान की दुनिया में हिंसा

‘दलित’ के बदले ‘बहुजन’ शब्द का प्रयोग और दिल्ली विश्वविद्यालय के शैक्षणिक मामलों की स्टैंडिंग कमिटी द्वारा स्नातकोत्तर स्तर के राजनीति विज्ञान पाठ्यक्रम से कांचा आयलैया शेफ़र्ड़ की तीन पुस्तकों को हटाने की सिफ़ारिश भारतीय सामाजिक संरचना और सत्ता के चरित्र के संदर्भ में गंभीर प्रश्न खड़े करती है। मुकेश कुमार बैरवा का विश्लेषण 

सत्तारूढ़ व्यवस्था द्वारा ‘दलित’ शब्द के बदले ‘बहुजन’ शब्द के प्रयोग पर ज़ोर देने का उन्मादी प्रयास और दिल्ली विश्वविद्यालय की शैक्षणिक मामलों की देख-रेख करने वाली स्टैंडिंग कमिटी द्वारा स्नातकोत्तर स्तर के राजनीति विज्ञान पाठ्यक्रम से कांचा आयलैया शेफ़र्ड की तीन पुस्तकों को हटाने की सिफ़ारिश कुछ व्याकुल करने वाले सवाल खड़ा करती है। भारत का शैक्षणिक समुदाय आखिर ‘दलित’ शब्द और दलित चिंतन को लेकर इतना असहज क्यों है? समिति का मानना ​​है कि आयलैया की किताबें हिंदू धर्म की भर्त्सना करती हैं। अतः ये छात्रों के लिए हानिकारक हैं और हिंदू धर्म का अपमान करती हैं। कोई उनके विचारों या दृष्टिकोण से सहमत या असहमत हो सकता है, लेकिन पाठ्यक्रम से उनके ग्रंथों को हटाना, यह अकादमिक स्वतंत्रता तथा इतिहास, संस्कृति और समाज के वैकल्पिक अध्ययन पर हमला है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे जाने-माने तथ्यों का प्रतिकार करने की सारी संभावनाओं पर रोक लगायी जा रही है। तथ्यों के वैकल्पिक पाठों के प्रति इस प्रकार की घृणा भारत की विविधता और तर्कमूलक वाद-विवाद की परंपरा के विरुद्ध है। भारतीय समाज ने गौतम बुद्ध, कबीर, रविदास, जोतीराव फुले, पेरियार और आंबेडकर जैसे गंभीर वैचारिकी से लैस विलक्षण विचारकों को जन्म दिया है। इसलिए, इस परंपरा को जारी रखने के लिए भारतीय चिंतन में भिन्न-भिन्न भाषाओं में वाद-विवाद की इस विविधता को भारतीय विश्वविद्यालयों तथा अन्य स्थानों पर फैलने-फूलने का अवसर दिया जाना चाहिए।

उच्च शिक्षा का मुख्य उद्देश्य मनुष्य को आलोचनात्मक तथा रचनात्मक रूप से सोचने-विचारने  में सक्षम बनाना है ताकि वह विभिन्न दृष्टिकोणों एवं विविध विचारों को सम्बोधित करने के लिए तैयार हो सके। आंबेडकर ने एक प्रासंगिक टिप्पणी के रूप में ज़ोर देकर कहा था कि मानस का विकास मानव अस्तित्व का प्रथम लक्ष्य होना चाहिए। बहस-मुबाहिसों और विचार-विमर्श के लिए स्वतंत्र मंच के बिना हम आलोचनात्मक दृष्टिकोण विकसित नहीं कर सकते। आयलैया शेफ़र्ड की किताबों पर लगाई गयी रोक के बारे में दिल्ली विश्वविद्यालय की स्टैंडिंग कमिटी द्वारा दिया गया तर्क बेतुका लगता है। इसमें नवीन ज्ञान, आलोचनात्मक चिंतन और दलित इतिहास के प्रति भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग का विरोध झलकता है।

दिल्ली विश्वविद्यालय की स्टैंडिंग कमिटी के निशाने पर प्रोफ़ेसर कांचा आयलैया शेफ़र्ड और उनकी तीन पुस्तकें

कांचा आयलैया शेफ़र्ड के लेखन ने भारतीय इतिहास और समाज को देखने का नया दृष्टिकोण प्रदान किया है। जिस प्रकार मुख्यधारात्मक विमर्श के तहत यह निर्धारित किया जा रहा है कि कौन सा ज्ञान विशुद्ध है और कौन सा नहीं, इससे शैक्षणिक जगत में सत्ता, राजनीति और ज्ञान के गंठजोड़ के बारे में काफ़ी कुछ पता चलता है। ‘हिस्ट्री ऑफ़ सेक्सुअलिटी’ के प्रथम खंड में  मिशेल फ़ुको लिखते हैं कि विमर्श के प्रसार से सत्ता का जन्म होता है। इसका मतलब है कि ज्ञान-उत्पादन सत्ता और विमर्श के साथ जुड़ा हुआ है। लोग जान-बूझकर सार्वजनिक क्षेत्र से कुछ  ख़ास तरह के ज्ञान या सत्य को बाहर रखते हैं।

कांचा आयलैया शेफ़र्ड की किताबों को हटाने की सिफ़ारिश को सत्ता, ज्ञान और विमर्श की सांठ-गांठ के सन्दर्भ में व्याख्यायित करने की ज़रूरत है। उनके लेखन ने वैश्विक स्तर के अकादमिक क्षेत्र में आलोचना तथा सबार्ल्टन स्टडीज़ के लिए नए प्रतिमान स्थापित किए हैं। उनके द्वारा  भारतीय इतिहास और संस्कृति की गैर-ब्राह्मणवादी व्याख्या ने दलित-बहुजन बुद्धिजीवियों तथा विद्वानों को अपना सामान्य बोध विकसित करने और तथ्यों को एक नयी दृष्टि से व्याख्यायित करने में समर्थ बनाया है। प्रोफ़ेसर एन. सुकुमार अपने लेख में कुशलतापूर्वक इस तथ्य की विवेचना करते हैं कि सत्ताधारी वर्ग के बीच दलित बुद्धिजीवियों द्वारा अपने नए शैक्षणिक हस्तक्षेपों के माध्यम से उठाए जा रहे तीक्ष्ण प्रश्नों से खलबली मची हुई है। चूंकि उनके शिक्षण का उनके अपमान, हिंसा और संघर्ष के ऐतिहासिक कटु अनुभव से गहन सम्बन्ध है, इसलिए दलित बुद्धिजीवी भारतीय इतिहास और संस्कृति के वैभव के महाख्यानों को विखण्डित कर उनको अस्वीकार करते हैं। उनकी भाषा-शैली,  मुहावरों और प्रतीकों से दलितों को वंचित करके, ब्राह्मणवादी ताकतें दलितों द्वारा भोगी गयी यंत्रणा, अवमानना और हिंसा तथा उनके द्वारा किये गए संघर्ष और प्रतिरोध की सामूहिक स्मृति को मिटा देना चाहती हैं। विडंबना तो यह है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में दलित-बहुजनों संबंधित पाठ्य-पुस्तकों को काफ़ी देर से सम्मिलित किया गया था। यह नवीन ज्ञान अभी छात्रों तक पहुंचा भी नहीं था कि इस पर रोक-टोक लगाने का सिलसिला शुरू हो चुका है। यह हमारे देश में शिक्षाविदों और शोध के भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं है।[1]

‘दलित’ शब्द का प्रयोग पहली बार जोतीराव फुले द्वारा किया गया था (फ़ोटो सौजन्य : Scroll.in)

वॉल्टर बेंजामिन ने लिखा  है,“हमारे सुख की छवि  का हमारे अतीत की छवि  के साथ अटूट सम्बन्ध है। [2]   इस उत्पीड़ित समुदाय के लिए ‘दलित’ शब्द का अभिप्राय क्या है, इसे हम उपरोक्त उद्धरण से समझ सकते हैं। ‘दलित’ को वर्ग के रूप में विश्लेषित करें तो उत्पीड़क द्वारा उत्पीड़ित के प्रति सामाजिक संरचनागत भेदभाव की प्रधानता दिखाई देगी। यह उस द्वंद्ववादी पद्धति की ओर संकेत करता है जिसने भारतीय समाज को वर्णवादी-जातिवादी सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना में ढाला है। यह भारतीय सभ्यता को पहुंची एक ऐतिहासिक क्षति का प्रतीक है जिसका सम्बन्ध जातिगत आधार पर वर्गीकृत समाज में दलितों के दमन से है। साथ ही, यह शब्द आत्म-निर्माण की संभावना का भी द्योतक है। दूसरे शब्दों में, एक दलित खुद को नए लोकतांत्रिक आचार और सिद्धांतों के अनुरूप पुनर्निर्मित कर सकता है।

 

इसके अतिरिक्त, यह प्रतिनिधित्व, गर्व और अधिकारों की दृढ़तापूर्वक दावेदारी का भी सूचक है। इस शब्द का एक ऐतिहासिक महत्व है। जोतीराव फुले ने सबसे पहले ‘दलित’ शब्द का प्रयोग किया था। बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने इसका इस्तेमाल  हिंदू समाज के दमघोंटू स्वरूप को व्याख्यायित करने के लिए किया। कालान्तर में, 70 के दशक में दलित पैंथर्स ने इसे एक नया क्रांतिकारी अर्थ और दृढ़ता प्रदान की। अतः यह शब्द संघर्ष और राजनीति के एक लंबे इतिहास से अस्तित्व में आया।

एलानॉर जिलियट के अनुसार, “भारत में जिन लोगों को पूर्व में अस्पृश्य माना गया, उन्होंने अपने ऊपर से अशुद्धता  या अपवित्रता का कलंक मिटाने के लिए खुदको ‘दलित’ नाम देकर अपनी एक नई पहचान बनायी है। ‘अस्पृश्य’, ‘अनुसूचित जाति’, ‘दमित वर्ग’ और गांधी की मृदुल भाषा में ‘हरिजन’ जैसा कोई भी शब्द न तो इसका समान द्योतक है और ना ही उसमें इसका अर्थ बराबर प्रतिध्वनित होता है।” [3] ‘दलित’ शब्द अपने आप में दूषण, कर्म और जाति-आधारित पदानुक्रम काे नकारता है। यह दासत्व की संस्कृति को अस्वीकार और जातिगत दमन के निराकरण का प्रतिनिधित्व करता है। ‘दलित’ की जगह ‘बहुजन’ शब्द के प्रयोग पर ज़ोर देने का प्रयास भारतीय शैक्षणिक जगत में सत्ताधारियों की मिलीभगत को दर्शाता है। यह दलितों द्वारा भोगे गए संताप और उनकी वास्तविकता को मिटा देने की मंशा है। यह एक यथार्थपूर्ण दलित जीवन व्यतीत करने वाले समाज को नकारना चाहता है जो कि अन्य सबाल्टर्न जीवन व्यतीत करने वाले समाजों से नितांत भिन्न है। शायद इसे पहचान कर, बाबासाहेब आंबेडकर ने वंचित जनसमूहों की आवश्यकताओं पर ध्यान देते हुए उनके लिए विशेषाधिकार और संवैधानिक श्रेणियां  तथा भारतीय संविधान में उनकी सुरक्षा और सशक्तीकरण के लिए कुछ ख़ास प्रावधान निर्धारित किए थे।

‘बहुजन’ शब्द का इससे भी व्यापक अर्थ है जो एक ख़ास ऐतिहासिक संदर्भ में उभरा है। यह दलित जीवन के परिवर्तनशील ऐतिहासिक सन्दर्भ और उसकी विशेषता को ग्रहण नहीं कर सकता। ‘दलित’ शब्द को ‘बहुजन’ शब्द से प्रतिस्थापित करने से दोनों शब्दों की व्युत्पत्ति के पीछे राजनीतिक और ऐतिहासिक सार-तत्वों को दबाने का खतरा है। दलित समुदाय की चेतना को समझने के लिए यह समझना ज़रूरी है कि वह ‘दलित’ शब्द से कितना सहज महसूस करता है। उनपर ज़बरदस्ती कुछ शब्द रूपों को थोपने की बजाय, उन्हें अपने प्रतिनिधिक संकेतों को तय करने का अवसर दिया जाना चाहिए। यहां, इस विशिष्ट संदर्भ में, ब्राह्मणवादी ताकतें अपने कपट से इस देश के उत्पीड़ित वर्गों द्वारा अपनायी गयी शब्दावली का प्रयोग कर रही हैं। गायत्री चक्रवर्ती स्पीवाक के शब्दों में कहूं तो यह दलित एपिस्टेमोलॉजी, अर्थात उनके ज्ञान-पद्धति शास्त्र में हिंसा को जन्म देता है, क्योंकि यह दलितों द्वारा दुनिया को समझने और उसके बारे में सोचने के ढंग को क्षीण कर देता है। इस चाल के पीछे चल रही राजनीति उत्पीड़ित तबके की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक चेतना को बदलने के लिए की जा रही है। इसका उद्देश्य मौलिक प्रतीकों को मिटाकर उनपर ब्राह्मणवादी एजेंडे के अनुकूल रंग चढ़ाना है।

ज्ञान की दुनिया में ब्राह्मणवादी हिंसा के इस विचार को कुछ अन्य उदाहरणों के माध्यम से भी समझा जा सकता है। आश्चर्य की बात है कि अत्यंत विवादास्पद सरदार सरोवर मेगा डैम के करीब, साधु बेट नामक नदी के द्वीप पर सरदार वल्लभभाई पटेल की 597 फीट (182 मीटर) ऊंची प्रतिमा ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ के निर्माण में लगे लगभग 3000 करोड़ रुपए को लेकर किसी ने अभी तक कोई आपत्ति नहीं जताई। मुंबई के तट पर प्रस्तावित शिवाजी की 695 फीट (212 मीटर) ऊंची प्रतिमा के पूर्ण निर्माण तक यह दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा होगी।

सवाल यह है कि इस बार पैसे की बर्बादी को लेकर कोई हो-हल्ला क्यों नहीं मचा? उत्तर प्रदेश में तो बसपा सुप्रीमो, बहन कुमारी मायावती की ‘दलित मेमोरियल’ परियोजना के नाम पर मुख्यधारा की मीडिया ने उनपर धावा बोल दिया था; इसे पैसे की बहुत भारी बर्बादी के रूप में अस्वीकार कर दिया गया था। ‘स्टेचू ऑफ़ यूनिटी’ के विपरीत, इसने वामपंथियों और दक्षिणपंथियों, दोनों की नाराज़गी मोल ली थी। आंबेडकर ने यह कहकर हमें इसके बारे में पहले ही आगाह कर दिया था कि ‘दलितों का कोई प्रेस नहीं होता।’ भारतीय मीडिया में दलितों की अनुपस्थिति के चलते उनकी यह आलोचना सर्वव्यापी बन गई है।  सार्वजनिक स्थलों पर दलित प्रतिमाओं की उपस्थिति दलितों की आकांक्षाओं, उनके आशावाद, आत्मविश्वास और गौरव को साकार करती है। वे दलितों की दावेदारी के प्रतीक हैं, जो जातिवादी ताकतों और ब्राह्मणवादी सत्ता के लिए निश्चित रूप से खतरा है। इसके अलावा, भीमा कोरेगाँव में ‘उच्च’ जाति के हिंदुओं द्वारा महारों के विजयोत्सव का विरोध दलितों की उभरती शक्ति और उनकी सामूहिक चेतना को लेकर ब्राह्मणवादी ताकतों की बेचैनी और चिंता को दर्शाता है। ये स्थल दलितों की ऐतिहासिक चेतना को मूर्त रूप देने के साथ ही उन्हें प्रचारित भी करते हैं।

आंबेडकर की कृति ‘एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट’ पर आधारित, अरुंधती रॉय ने अपनी ‘द डॉक्टर एंड द सेंट’ नामक रचना की भूमिका में यह लिखा है कि “दलित एस्पिरेशंस आर अ ब्रीच ऑफ़ पीस”, अर्थात ‘दलित आकांक्षाएं शांति भंजक हैं।” उनका यह कथन नामकरण, पुनर्नामकरण और अनाम करने के इस समूचे विवाद के मूल में निहित, सत्ता के लिए किये जा रहे संघर्ष को प्रतिपादित करता है। दलित समुदाय का पुनर्नामकरण वस्तुतः उसकी सामूहिकता को बेनाम करना है। यह संकेतों और प्रतीकों के अध्ययन और उनके प्रयोग या व्याख्या को एक ही रूप में समेकित करने के प्रयास की ओर इंगित करता है। यह केवल किसी सामाजिक यथार्थ को निरूपित करने वाले शब्दों को स्थापित करने की क्रिया या नाम-पद्धति ही नहीं है, बल्कि कई बार इसके द्वारा सामाजिक यथार्थ को बदलने की प्रक्रिया भी साथ-साथ चलती है। यह एक सामाजिक कृत्य है जिसके तहत जान-बूझकर संकेतों और प्रतीकों का लोप और उनका उन्मूलन किया जाता है। यहां एक बार फिर मिशेल फुको को उद्धृत करना प्रासंगिक होगा कि “शासन करना, इस अर्थ में, दूसरों के संभावित कार्य-क्षेत्रों को संरचित करना है।”

यहां यह समझा जा सकता है कि किस प्रकार प्रभुत्वशाली ताकतें अपने खिलाफ़ उठती आवाज़ों को दबाते हुए संघर्ष की सम्भावना को ही ख़त्म कर देना चाहती हैं। कांचा आयलैया का केस इसका उदाहरण है। दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम से द्विजों की नजर में आपत्तिजनक इन पुस्तकों को हटाकर ब्राह्मणवादी ताकतें सार्वजनिक क्षेत्र से ‘दलित-बहुजन’ शब्द की व्याख्या से सम्बन्धित पद्धति को हटाने की कोशिश कर रही हैं। अतः पुनर्नामकरण की इस राजनीति को भारतीय सभ्यता में दलितों द्वारा भोगी गयी व्यथा के इतिहास को मिटाने और भारतीय शैक्षणिक जगत में ज्ञान के स्रोतों और उसके विस्तार को नियंत्रित करने के प्रयास के रूप में देखा जाना चाहिए।   

(अनुवाद : डॉ. देविना अक्षयवर, कॉपी सम्पादन : एफपी डेस्क)

[1] व्हाई आई इंट्रोड्यूस्ड कांचा आयलैयाज़ बुक्स इन द डीयू पोलिटिकल सायंस कोर्स, एन.सुकुमार

[2] थीसिस ऑन द फिलाॅसफी ऑफ़ हिस्ट्री, वॉल्टर बेंजामिन

[3]फ्रॉम आम्बेडकर टू दलित : एसेज़ ऑन आंबेडकर मूवमेंट, एलिअनोर ज़ेलियट


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