आंखों-देखी : ओड़िशा के एक गांव में डॉ. आंबेडकर का महापरिनिर्वाण दिवस समारोह

बीते 6 दिसंबर 2018 को देश भर में डॉ. आंबेडकर का महापरिनिर्वाण दिवस मनाया गया। ओड़िशा की राजधानी भुवनेश्वर के एक गांव में दलित नौजवानों ने एक पहल की। बता रहे हैं उज्जवल विश्वास :

भारत में सामाजिक व्यवस्था ब्राह्मणवादी पितृसत्ता का संपोषण करनेवाली ताकतों के चंगुल में आज इक्कसवीं सदी के दूसरे दशक के अंत में कराह रही है। इसके प्रमाणों की कमी नहीं है। हिंदुत्व के नाम पर पूरे देश में हाय-तौबा मचायी जा रहा है। गाय और मंदिर जैसे गैर-जरूरी मुद्दों के जरिए बुनियादी मुद्दों को विमर्श से ही गायब कर दिया गया है। साथ ही उस संविधान पर सवाल उठाए जा रहे हैं जिसमें भारत के बहुजन समाज को सम्मान के साथ जीने से लेकर प्रतिनिधित्व तक का अधिकार सुनिश्चित किया गया है। जाहिर तौर पर ऐसे में डॉ. आंबेडकर और उनके विचार और अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं।

बीते 6 दिसंबर को पूरे देश में बहुजनों ने कृतज्ञतापूर्वक डॉ. आंबेडकर को उनके महापरिनिर्वाण दिवस के मौके पर याद किया। ओड़िशा में भी अवसर पर कई आयोजन हुए। वैसे भी आंबेडकर के जिन विचारों और सिद्धांतों का अनुसरण देश के बहुजन कर रहे हैं, उनसे ओड़िशा के दलित-बहुजन भला कैसे दूर रह सकते हैं?

राजधानी भुवनेश्वर के ए.जी. चौक पर डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा है। चाहे वह उनकी जयंती का मौका हो या फिर महापरिनर्वाण दिवस का, खूब भीड़ जुटती है। यहां मुख्य आयोजन होता है और लगभग सभी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि भाग लेते हैं। सत्तासीन बीजू जनता दल इससे अलग रहता है। 2014 के बाद जबसे भाजपा केंद्र में सत्तासीन हुई है, डॉ. आंबेडकर के नाम पर कुछ ज्यादा ही दिखावा करने लगी है। यह नजारा ओड़िशा में भी खूब दिखता है। जिन्होंने डॉ. आंबेडकर के विचारों को कभी माना ही नहीं, वे भी उनकी प्रतिमा के समक्ष प्रतिबद्धता का दिखावा करने चले आते हैं।

ओड़िशा की राजधानी भुवनेश्वर से करीब बीस किलोमीटर दूर आलिसी शासन गांव में डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा के अनावरण के मौके पर स्थानीय ग्रामीण

हालांकि डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा के पास जब वे भारत माता और वंदे मातरम का नारा खूब जोर से लगाने लगते हैं तो उनकी असलियत सामने आ जाती है।

धीरे-धीरे डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा के पास जुटी भीड़ छंटने लगती है। नेता और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. आंबेडकर की स्मृति में आयोजित कार्यक्रमों में शिरकत करने के लिए निकल पड़ते हैं।

हर साल ऐसा ही नजारा दिखता है। कभी उन्नीस कभी बीस। कोई खास फर्क नहीं। इस बार मैं भी मूलनिवासी समता परिषद के काफिले के साथ निकल पड़ा। करीब बीस किलोमीटर दूर एक गांव आलिसी शासन की ओर। इस गांव में ब्राह्मणों और हमारे मूलनिवासी लोगों की आबादी बराबर है, लेकिन गांव का नाम ब्राह्मणी है।

कार्यक्रम में ग्रामीणों ने ली आगे बढ़कर हिस्सेदारी

ओड़िशा में जिस गांव में ब्राह्मणों का बसेरा होता है, उस गांव का नाम मोटे तौर पर ‘शासन’ ही होता है। इस गांव के कुछ नौजवानों ने मिलकर बाबा साहेब की प्रतिमा की स्थापना की है। इसका अनवारण करने हमारा जत्था पहुंचा है। हम तय समय पर करीब 11 बजे पहुंच गए। आईपीएस सतीश गजविये और आईएमएमटी में कार्यरत मूख्य वैज्ञानिक भाग्यधर भोई ने संयुक्त रूप से प्रतिमा का अनवारण किया।

बहुजन विमर्श को विस्तार देतीं फारवर्ड प्रेस की पुस्तकें

इस प्रतिमा की खास बात यह है कि इसमें हुई लागत का वहन नौजवानों ने मिलकर किया। उनका जोश देखते बनता था। डॉ. आंबेडकर के प्रति उनका लगाव देख मन में यह सवाल उठा कि हमारे समाज के पढ़े लिखे लोग समाज मे प्रतिष्ठित और उंचे पद पर होते हुए भी क्यों नहीं अपने उद्धारकर्ता डॉ. आंबेडकर की तस्वीर लगा पाते हैं? उन्हें इन नौजवानों से सीखना चाहिए जो बिना किसी झिझक के पूरी श्रद्धा के साथ संविधान निर्माता डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा लगाते हैं। उनके द्वारा दिखायी गयी राह पर चलने का संकल्प लेते हैं।

मैं जिन नौजवानों की बात कर रहा हूं, वे बहुत पढ़े-लिखे नहीं हैं। इनकी संख्या दस-बारह है। ये डॉ. आंबेडकर के बारे में बहुत कुछ नहीं जानते हैं। सिवाय इसके कि उन्हें सम्मान के साथ जीने का मौका मिल रहा है तो ऐसा डॉ. अांबेडकर के कारण ही संभव हुआ है। यह जानकारी भी मूलनिवासी समता परिषद के एक कार्यकर्ता लिंगराज भोई से मिली जो इसी गांव के वासी हैं। बाद में कामकाजी नौजवानों ने अपनी मेहनत के पैसे बचाकर प्रतिमा की स्थापना की। है न उत्साहित करने वाली बात!

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मैं स्वयं इन सभी से परिचित नहीं हो सका हूं। अभी तक जिन नौजवानों से मिल पाया हूं, उनमें नरसिंह भोइ, मनोज भोइ, अनिल भोइ और देवव्रत भोइ शामिल हैं।

प्रतिमा के अनावरण के बाद विचार गोष्ठी का आयोजन हुआ। मंच पर सतीश गजविये, भाग्यधार भोइ, सेवानिवृत्त् प्रशासनिक अधिकारी बंधु सेठी, आलिसी गांव के सामाजिक कार्यकर्ता लक्ष्मीधर जेना, और मूलनिवासी समता परिषद का राज्य संयोजक अभिराम मल्लिक और समता परिषद के सम्पाद्क सैयद वरकत अली तनवीर थे। मंच संचालन की जिम्मेदारी लिंगराज भोई ने सम्भाला।

आलिसी गांव से भुवनेश्वर वापस लौटने मॆं दिन ढल चुका था। भुवनेश्वर में कार्यक्रमों का सिलसिला जारी था। इनमें से एक कार्यक्रम जिसका उल्लेख करना मैं जरूरी समझता हूं, वह कृष्णचंद्र सगरिया द्वारा किया गया आयोजन है। सगरिया ने हाल ही में विधायक पद से इस्तीफा दिया है और हिंदू धर्म का परित्याग कर बौद्ध धर्म अपनाया है। उनके द्वारा धर्म बदले जाने पर ओड़िशा में खूब शोर-शराबा हुआ।

भुवनेश्वर के स्वाधीनता संग्राम मैदान में आयोजित कार्यक्रम में फिल्म अभिनेता प्रकाश राज को सम्मानित करते पूर्व मंत्री श्रीकांत जेना व अन्य

खैर, कृष्णचंद्र सगरिया के नेतृत्व में सामाजिक न्याय अभियान के तत्वावधान में भुवनेश्वर के स्वाधीनता संग्राम मैदान में आयोजित इस कार्यक्रम में पांच हजार से अधिक बहुजनों ने भाग लिया और डॉ. आंबेडकर की राह पर चलने का संकल्प लिया। इस कार्यक्रम में दो पूर्व केंद्रीय मंत्री श्रीकांत जेना और भजमन बेहेरा भी शामिल हुए।  इस मौके पर सगरिया ने साफ कहा कि 6 दिसंबर बाबा साहेब आंबेडकर का महापरिनिर्वाण दिवस है। आम जनता के दिल-दिमाग से समाज के लिए उनके त्याग, संघर्ष, और बलिदान की बात मिटाने के लिए इसी दिन 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस किया गया। उन्होंने यह भी कहा कि देश में चारों ओर अराजकता है। संविधान पर हमले किए जा रहे हैं। ऐसे में सभी को संविधान बचाओ आन्दोलन में शामिल होना चाहिए।

‘संविधान बचाओ, देश बचाओ’ के नाम से उत्कल कला मण्डप में एक और शानदार कार्यक्रम का आयोजन हुआ। फिल्म जगत के मशहूर अभिनेता प्रकाश राज ने भी भाग लिया। रील लाइफ में विलेन का किरदार निभाने वाले प्रकाश राज रियल लाइफ में नायक के रूप में सामने आए। उन्होंने कहा कि किसी भी धर्म का ग्रंथ हमें हमारी सुरक्षा और हमारा अधिकार देने का बात नहीं करता है। लेकिन संविधान हमें जाति, धर्म, वर्ण और लिंग का विभेद को मिटाकर सभी भारतीयों को समान अधिकार प्रदान करता है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तंज भी कसा। उन्होंने कहा – सच बोलने के लिए थोड़ी सी हिम्मत चाहिए, लेकिन जो प्रधानमन्त्री के पद पर बैठ कर झूठ पर झूठ बोलते हैं, उन्हें कितनी हिम्मत की जरुरत पड़ती होगी?                        

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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