मायावती को अपशब्द कहने में क्यों एकजुट हो जाता है मीडिया और आरएसएस?

यूपी और बिहार में कुल मिलाकर 120 सीटें हैं, जो सपा-बसपा-राजद के गठबंधन के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं। इसके साथ ही मायावती भारतीय राजनीति के केंद्र में आ गई हैं और इस कारण उनके उपर हमले तेज हुए हैं  

उत्तर प्रदेश मायावती और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का मुख्य राजनीतिक कर्मक्षेत्र रहा है। जब यहां से 2014 लोकसभा चुनाव में बसपा एक भी सीट नहीं जीत सकी और 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में भी 19 सीटों के साथ तीसरे स्थान पर खिसक गई, तब बड़े-बड़े राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे मायावती के राजनीतिक खात्मे के तौर पर परिभाषित किया।

जून 2017 में पश्चिमी उत्तरप्रदेश के सहारनपुर में भड़की जातीय हिंसा के बाद वहां से निकलकर आए युवा दलित नेता चंद्रशेखर और जुलाई, 2016 में गुजरात के ऊना में हुए हिंसा के विरोध में आंदोलन से निकलकर आए जिग्नेश मेवाणी ने पिछले कुछ वर्षों में दलित मुद्दों को आगे बढ़कर नेतृत्व प्रदान किया जबकि इस दरमियान बतौर नेता मायावती नेपथ्य में रहीं। इसे भी मायावती की राजनीतिक सूरज के डूबने की संज्ञा दी गई। लेकिन इसे झूठ साबित किया फूलपुर और गोरखपुर में हुए उपचुनाव ने। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए दोनों सीट प्रतिष्ठा वाले थे। समाजवादी पार्टी (सपा) के साथ मिलकर बसपा ने एक साथ मुकाबला किया और परिणाम यह हुआ कि भाजपा औंधे मुंह गिरी। यहीं से सपा-बसपा गठबंधन की बुनियाद पड़ गई। इंतजार था तो सिर्फ औपचारिक एलान का।

यह इंतजार भी 12 जनवरी 2019 को खत्म हो गई जब बसपा प्रमुख मायावती और सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने संवाददाता सम्मेलन के जरिए गठबंधन का औपचारिक एलान कर दिया।

बीते 15 जनवरी 2019 को बसपा प्रमुख मायावती को उनके 63वें जन्मदिन के मौके पर बधाई देने पहुंचे सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव

इस गठबंधन का एक परिणाम सामने यह आया है कि मायावती भारतीय राजनीति के केंद्र में आ गई हैं। हर राज्य की क्षेत्रीय पार्टियां उनके साथ चुनावी गठबंधन करना चाहती हैं। राजद नेता तेजस्वी यादव द्वारा खुद लखनऊ आकर मायावती से मिलना और उनका पैर छूते हुए फोटो सोशल मीडिया में पोस्ट करना इसी का परिचायक है।

यही कारण है कि मीडिया से लेकर बीजेपी के   छोटे-बड़े नेता तक मायावती के खिलाफ लगातार हमले कर रहे हैं। मीडिया द्वारा भी इस गठबंधन पर हमला बोला जा रहा है। हाल ही में एक न्यूज चैनल ने  ‘साथ आये हैं यूपी-बिहार लूटने’ जैसे शीर्षक के साथ सपा-बसपा-राजद गठबंधन को लुटेरों का गठबंधन बताने की कोशिश की। इतना ही नहीं, मायावती से जुड़े सारे पुराने वीडियो और गॉसिप मीडिया द्वारा बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है।

मायवाती पर भाजपा विधायक साधना सिंह का अभद्र बयान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, नितिन गडकरी, जे. पी. नड्डा समेत सरकार व भाजपा के कई नेताओं ने सपा-बसपा गठबंधन को नापाक गठबंधन, कलंक का गठबंधन, मतदाताओं को धोखा देनेवाला आदि कहा। इसी कड़ी में मुगलसराय से भाजपा विधायक साधना सिंह ने हाल ही में एक कार्यक्रम में गेस्ट हाउस कांड की बात करते हुए बसपा अध्यक्ष मायावती के खिलाफ मंच से कहा- ‘‘हमको पूर्व मुख्यमंत्री न तो महिला लगती हैं और न ही पुरुष। इनको अपना सम्मान ही समझ में नहीं आता। एक चीरहरण हुआ था द्रौपदी का, तो उन्होंने दुशासन से बदला लेने की प्रतिज्ञा ली। वो एक स्वाभिमानी महिला थी, और एक आज की महिला है, सबकुछ लुट गया और फिर भी कुर्सी पाने के लिए अपने सारे सम्मान को बेच दिया। ऐसी महिला मायावती जी का हम इस कार्यक्रम के माध्यम से तिरस्कार करते हैं। जो नारी जात पर कलंक है।’

मुगलसराय, उत्तर प्रदेश से भाजपा की विधायक साधना सिंह और बसपा प्रमुख मायावती

साधना सिंह ने आगे कहा, ‘‘जिसे भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने बचाया, उस महिला ने सुख-सुविधा, अपने वर्चस्व को बचाने के लिए अपमान को पी लिया। जिस दिन महिला का चीरहरण होता है, उसका ब्लाउज फट जाए, पेटीकोट फट जाए, साड़ी फट जाए, वो महिला सत्ता के लिए आगे आती है तो वो कलंकित है। उसे महिला कहने में भी संकोच लगता है. वो किन्नर से  भी ज़्यादा बदतर है। क्योंकि, वो तो न नर है, न महिला है।”

बता दें कि उस वक्त साधना सिंह के साथ मंच पर भाजपा के प्रदेश महामंत्री पंकज सिंह भी मौजूद थे।

साधना सिंह के बयान पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ

राष्ट्रीय महिला आयोग ने बीजेपी विधायक साधना सिंह द्वारा बसपा प्रमुख मायावती को लेकर दिए विवादित बयान पर स्वतः संज्ञान लिया है। आयोग साधना सिंह को विवादित बयान पर नोटिस भेजेगा। जबकि इस मामले में बसपा के बनारस मंडल जोनल इंचार्ज रामचंद्र गौतम ने साधना सिंह के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट के तहत चंदौली थाने में मामला दर्ज कराया है।

राजनीति के केंद्र में फिर से मायावती। राजद नेता तेजस्वी यादव, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, कांग्रेस की पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी व वर्तमान अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ मायावती

वहीं, बसपा महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा ने कहा कि “बीजेपी विधायक ने हमारे पार्टी प्रमुख के लिए जिन शब्दों का इस्तेमाल किया, वह बीजेपी के स्तर को दर्शाता है। सपा-बसपा गठबंधन की घोषणा के बाद बीजेपी नेताओं ने अपना मानसिक संतुलन खो दिया है और उन्हें आगरा या बरेली के मानसिक अस्पतालों में भर्ती कराया जाना चाहिए।”

भाजपा सरकार के केंद्रीय मंत्री केंद्रीय राज्यमंत्री रामदास अठावले ने कहा कि “मायावती अगर दलित की हितैषी हैं तो बीजेपी के साथ आना चाहिए। बीजेपी ने जब मायावती को मुख्यमंत्री बनाया तो क्या बीजेपी उस समय जातिवादी नहीं थी?” उन्होंने यह भी कहा कि मायावती के खिलाफ अभद्र टिप्पणी करना सही नहीं है( इससे बीजेपी की इमेज खराब होगी।

वहीं सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने गठबंधन धर्म निभाते हुए प्रतिक्रिया दी – “बीजेपी विधायक ने जिस तरह से आपत्तिजनक शब्द मायावती के लिए कहे हैं] वह घोर निंदनीय है। यह बीजेपी के नैतिक दिवालियापन और हताशा का प्रतीक है। यह केवल मायावती का ही नहीं बल्कि देश की महिलाओं का भी अपमान है।”

साधना सिंह ने अपने बयान पर जाताया खेद

हालाँकि जिस मकसद से साधना सिंह ने बयान दिया या उनसे दिलवाया गया था वो अपना असर दिखा चुका है। इसके बाद अगले ही दिन भाजपा महिला विधायक साधना सिंह ने अपने बयान पर खेद जताया है। साधना सिंह की ओर से जारी किए गए बयान में उन्होंने लिखा कि मेरा मकसद किसी को अपमान करने का नहीं था। मैं बस 2 जून, 1995 को गेस्ट हाउस कांड के दौरान मायावती की बीजेपी नेताओं द्वारा की गई मदद को याद दिलाना चाहती थी।  

मायावती के खिलाफ़ अभद्र भाषा का इस्तेमाल क्यों करते हैं नेता?

यह कोई पहला मौका नहीं है जब मायावती के खिलाफ़ किसी भाजपा नेता ने अश्लील टिप्पणी की हो। इससे पहले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ठीक पहले तत्कालीन भाजपा यूपी उपाध्यक्ष दयशंकर सिंह ने भी खुले मंच से मायवती को गाली दी थी। जिसके बाद दलित समुदाय के लोग मुखर होकर सड़कों पर उतर आये थे। बाद में पार्टी ने 6 साल के लिए दयाशंकर सिंह को पार्टी से निकालकर उनकी पत्नी स्वाति सिंह को टिकट दे दिया था। लेकिन भाजपा ने जिस दिन यूपी का चुनाव जीता उसी दिन दयाशंकर सिंह की पार्टी में वापसी का एलान कर दिया था। और डेढ़ महीने के भीतर ही उन्हें पार्टी में दोबारा ले लिया गया। दरअसल, यह संघ की एक सायकोलॉजिकल चुनावी रणनीति है। इस तरह के जातीय, और लैंगिक बयानों के जरिए मायावती को निशाना बनाकर भाजपा सवर्णों के सामंतवादी मनोवृत्ति को तुष्ट करती है, जिनकी नज़रों में दलित और स्त्री तुच्छ हैं।

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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