विभागवार रोस्टर : उच्च शिक्षा से दलितों, आदिवासियों और ओबीसी को बाहर करने की साजिश

शिक्षकों की विभागवार भर्ती करने के लिए 13 प्वाइंट रोस्टर लागू करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ देशभर के विश्वविद्यालयों के एससी, एसटी, ओबीसी के शिक्षक और राजनीतिक दल प्रदर्शन कर इस सिस्टम को निरस्त करने के लिए अध्यादेश लाने की मांग रहे हैं

बीते 22 जनवरी 2019 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराए जाने के बाद देश भर के आदिवासी, दलित और ओबीसी छात्र व बुद्धिजीवी आक्रोशित हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद विश्वविद्यालयों में हाेने वाली नियुक्तियों में रोस्टर का आधार विश्वविद्यालय के स्थान पर विभाग होंगे। इसे 13 प्वाइंट रोस्टर कहा जाता है। इस रोस्टर के लागू होने से आरक्षित वर्गों का प्रतिनिधित्व बहुत कम हो जाएगा। यही वजह है कि पूरे देश में इसका विरोध किया जा रहा है और केंद्र सरकार से मांग की जा रही है कि वह अध्यादेश लाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को निरस्त करे।

गौरतलब है कि 7 मार्च 2017 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि विश्वविद्यालयों में नियुक्ति हेतु आरक्षण का आधार विश्वविद्यालय नहीं, बल्कि विभाग होंगे। इसी फैसले के आधार पर 5 मार्च 2018 को यूजीसी ने एक अधिसूचना जारी कर इसे केंद्रीय विश्वविद्यालयों में लागू करने का निर्देश जारी किया। तब इसके व्यापक विरोध को देखते हुए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल की थी, जिसे को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया।

हालांकि, यह पहला अवसर नहीं है जब इस तरह की मांग की जा रही है। पिछले वर्ष 20 अप्रैल 2018 को दिल्ली विश्वविद्यालय में आयोजित ‘सामाजिक न्याय युवा सम्मलेन’ में सरकार से मांग की गई थी कि विश्वविद्यालयों में नियुक्ति के लिए विश्वविद्यालय को इकाई मानने संबंधी कानून बनाया जाए। इस सम्मेलन में गुजरात के दलित युवा विधायक जिग्नेश मेवानी, विधायक पंकज पुष्कर, समाजवादी पार्टी के सांसद धर्मेंद्र यादव, पूर्व सांसद अली अनवर और शरद यादव सहित देश भर के दर्जनों विश्वविद्यालयों से छात्र और जनप्रतिनिधि शामिल हुए थे।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर विरोध प्रदर्शन करते दलित-बहुजन छात्र

इस सम्मेलन में सभी वक्ताओं ने एक स्वर में कहा था कि विश्वविद्यालय को इकाई मानने की जगह विभागवार इकाई मानने से उच्च शिक्षा संस्थानों के शिक्षा-पदों से आरक्षित वर्गों के लोग नियोजन की प्रक्रिया से ही बाहर हो जाएंगे। सम्मेलन में एक मांग-पत्र भी रखा गया था।

सम्मेलन में रखी गई मांगें

  • 5 मार्च 2018 को यूजीसी द्वारा जारी आरक्षण-विरोधी विभागवार रोस्टर के आदेश को तत्काल प्रभाव से वापस लिया जाए।
  • देश के सभी विश्वविद्यालयों में स्वीकृत सभी रिक्त पदों पर संवैधानिक आरक्षण प्रक्रिया के तहत तत्काल स्थाई नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू की जाए।
  • देश के सभी विश्वविद्यालयों में आरक्षित पदों के ‘शार्टफॉल’ और ‘बैकलॉग’ पदों को विज्ञापित करके उन पर तत्काल स्थाई नियुक्ति की जाए।
  • एम.फिल. व पीएच.डी. के प्रवेश में लिखित परीक्षा और साक्षात्कार के अकों का प्रतिशत क्रमशः 70 और 30 के अनुपात में किया जाए और संवैधानिक आरक्षण प्रक्रिया के पालन के साथ निष्पक्ष प्रवेश प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित किया जाए।
  • सार्वजनिक वित्त-पोषित विश्वविद्यालयों पर ग्रेडेड स्वायत्तता जैसी निजीकरण की नीतियों को तत्काल वापस लिया जाए।
  • कुल बजट का छठा हिस्सा शिक्षा के बजट के रूप में उपयोग किया जाए।

क्या है 13 प्वाइंट रोस्टर सिस्टम?

बताते चलें कि 13 प्वाइंट रोस्टर पर लागू करने के साथ ही देश के तमाम विश्वविद्यालयों में फैकल्टी नियुक्ति में ओबीसी, एससी, एसटी का आरक्षण करीब-करीब समाप्त कर दिया गया है। यहां यह जानने की जरूरत है कि रोस्टर आखिर है क्या?

दरअसल, रोस्टर पद की स्थिति बताने वाला सूत्र-क्रम है। उदाहरणार्थ, यदि किसी विश्वविद्यालय में 100 पदों की रिक्ति के संबंध पर विज्ञापन प्रकाशित होने हैं, तो 200 प्वाइंट रोस्टर के आधार पर आरक्षण का क्रम कुछ इस तरह होगा :

1- अनारक्षित (सामान्य); 2- अनारक्षित; 3- अनारक्षित; 4- ओबीसी; 5- अनारक्षित; 6- अनारक्षित; 7- एससी; 8- ओबीसी; 9- अनारक्षित; 10- अनारक्षित; 11- अनारक्षित; 12- ओबीसी; 13- अनारक्षित; 14- एसटी; 15- अनारक्षित; 16- अनारक्षित; 17- अनारक्षित; 18- ओबीसी; 19- अनारक्षित; 20- अनारक्षित; 21- एससी; 22- ओबीसी; 23- अनारक्षित; 24- अनारक्षित; 25- अनारक्षित; 26- ओबीसी; 27- अनारक्षित; 28- एसटी …इस तरह यह क्रम 200 पद तक चलता है। 200 प्वाइंट के बाद पुनः 1 नबंर से पद क्रम शुरू होता है। इसमें विश्वविद्यालय को यूनिट माना जाता है। विश्वविद्यालय के सभी विषयों को एक साथ जोड़ लिया जाता है।

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जबकि 13 प्वाइंट रोस्टर में विश्वविद्यालय के बजाय ‘विभाग’ को यूनिट माना जाता है। इसके अनुसार, 14 पद के बाद पुनः 1 से पद को गिना जाने का प्रावधान है। यथा :- 1- अनारक्षित (सामान्य); 2- अनारक्षित; 3- अनारक्षित; 4- ओबीसी; 5- अनारक्षित 6- अनारक्षित; 7- एससी; 8- ओबीसी; 9- अनारक्षित; 10- अनारक्षित; 11- अनारक्षित; 12- ओबीसी; 13- अनारक्षित; 14- एसटी; इसके बाद फिर 14 के बाद 1 नंबर से क्रम शुरू होगा। इस सिस्टम में सबसे बड़ा दोष यह है कि यदि किसी विभाग में विज्ञापित पदों की संख्या कम हुई, तो इसका खामियाजा आरक्षित वर्गों को भुगतना होगा, जिसकी संभावना सबसे अधिक है।

इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि यदि किसी विभाग में पदों की संख्या 5 होगी, तब 1 से लेकर 3 और पांचवा पद पद सामान्य वर्ग के लिए और चौथा पद ओबीसी के लिए आरक्षित होगा। जबकि, एससी और एसटी के लिए कोई पद आरक्षित नहीं होगा। इसका आधार यह है कि ओबीसी को 27 फीसदी, एससी को 15 और एसटी को 7.5 फीसदी आरक्षण का प्रावधान है। यानी एससी को एक पद तभी मिलेगा, जब कुल रिक्तियों की संख्या कम से कम 8 हाेगी। इसी प्रकार एसटी के लिए एक पद आरक्षित तभी होंगे, जब रिक्त पदों की संख्या कम से कम 14 होंगे।

(कॉपी संपादन : एफपी/प्रेम)


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