सवर्ण आरक्षण : जनाधार बचाने की कोशिश

आरक्षण शासन-प्रशासन मेंं सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करने का प्रावधान है। अब आर्थिक आधार का बहाना बनाकर सवर्णों को आरक्षण देने की बात करना संविधान की मूल भावना के विपरीत है। जाहिर तौर पर केंद्र सरकार ऐसा सवर्णों में घटते अपने आधार बचाने के लिए कर रही है

अपने खिसकते सवर्ण वोट बैंक को साधने के लिए लोकसभा चुनाव से ठीक छह महीने पूर्व सवर्णों को आर्थिक आधार पर 10 प्रतिशत आरक्षण देने का मोदी सरकार का फैसला गलत और असंवैधानिक ही नहीं, बल्कि संविधान की मूल भावना पर हमला भी है। संविधान मेंं आरक्षण का प्रावधान सामाजिक न्याय की अवधारणा पर की गई है। जनतांत्रिक देश का संविधान बनाने वालों ने आरक्षण के जरिए ये सुनिश्चित किया था कि सरकारी मशीनरी और तमाम सरकारी संस्थाओं मेंं सिर्फ समाज के वर्चस्ववादी तबके का आधिपत्य न हो। सुनिश्चित करने के लिए ही आरक्षण का प्रावधान किया गया था कि आर्थिक संसाधनों से हीन और समाज मेंं बेहद निम्न सीढ़ी पर खड़े दलित, वंचित वर्ग को लोगों भी समाज के लिए काम करने वाली सरकारी संस्थाओं मेंं अपने वर्ग का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिले। जिसे सवर्णवादी संस्थाएं और ब्राह्मणवादी सोच के वर्चस्ववादी नेता लगातार कमजोर करने का प्रयत्न करते रहे हैं।

आरक्षण दरअसल राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया है। आरक्षण के कारण ही समाज के सभी वर्गों को शासन-प्रशासन में प्रतिनिधित्व मिलता है। आर्थिक आधार पर गरीब सवर्णों को आरक्षण देने की बात करना संविधान की मूल भावना के विपरीत है। आरक्षण की भावना और उद्देश्य को रोजगार के अर्थ मेंं सीमित संकुचित करके देखना अपनी समाज विरोधी मानसिकता को प्रमाणित करना है। जबकि आरक्षण राष्ट्र निर्माण में सभी वर्गों के समुचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने हेतु सामाजिक न्याय की अवधारणा को दिया हुआ मूर्त रूप है।

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क्या विडंबना है कि आरक्षण को अब तक भीख कहकर निकृष्ट साबित करने वाले और आरक्षण के प्रति कई तरह की भ्रांतिया फैलाने वाले लोग अब अपने वर्ग के लिए आरक्षण का प्रावधान कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह

भारतीय समाज एक श्रेणीबद्ध समाज है, जो हजारों जातियों मेंं बंटा है और ये हजारों जातियां भी लगभग सैंकड़ों वर्षों से मौजूद हैं। इस श्रेणीबद्ध जातिवादी सामाजिक व्यवस्था के कारण अनेक समूहों जैसे दलित, आदिवासी एवं पिछड़े समाज को सत्ता एवं संसाधनों से दूर रखा गया और इसको धार्मिक व्यवस्था घोषित कर स्थायित्व प्रदान किया गया। इस हजारों वर्ष पुरानी श्रेणीबद्ध जाति आधारित ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था को तोड़ने के लिए एवं सभी समाजों को एक समान प्रतिनिधित्व प्रदान करने के निमित्त ही संविधान मेंं शोषित वंचित जातियों को आरक्षण दिया गया है। इस प्रतिनिधित्व से यह सुनिश्चित करने की कोशिश की गई है कि वे वंचिंत जातियां अपने अधिकारों की लड़ाई एवं अपने समाज की भलाई मेंं बनने वाली नीतियों को सुनिश्चित कर सकें।

अतः यह बात स्पष्ट हो जाती है कि जातियां एवं जातिवाद भारतीय समाज मेंं पहले से ही विद्यमान थी। आरक्षण का प्रावधान (प्रतिनिधित्व की सुनिश्चितता) इस व्यवस्था को तोड़ने के लिए लाया गया न कि इसने जाति और जातिवाद को जन्म दिया है। अगर आरक्षण जातिवाद को बढ़ावा देता है तो, सवर्णों द्वारा स्थापित समान-जातीय विवाह, समान-जातीय दोस्ती एवं रिश्तेदारी क्या करता है? आरक्षण जाति और जातिवाद को जन्म नहीं देता, बल्कि जाति और जातिवाद लोगों की मानसिकता और सवर्ण संस्कारों मेंं पहले से ही मौजूद है।

मोदी सरकार द्वारा 2019 लोकसभा चुनाव से ठीक पहले सवर्णों को आर्थिक आधार पर 10 प्रतिशत आरक्षण देना अपने खिसकते सवर्ण वोट बैंक को पकड़ने का राजनीतिक हथकंडा भर है। एक ओर जहां सत्तागत संस्थाओं का निजीकरण और शैक्षणिक संस्थाओं को स्वयत्तता देकर सरकारें आरक्षण और सामाजिक न्याय की मूल भावना को ही खत्म करने पर आमादा हैं। वहीं, दूसरी ओर वो सबके लिए रोजगार उत्पन्न करने की अपनी नाकामी को छुपाने के लिए सवर्णों को आरक्षण के बहाने सबल सवर्णों को वंचित जातियों के बरक्श खड़ा कर रहे हैं।

(कॉपी संपादन : प्रेम/एफपी डेस्क)


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