विभागवार आरक्षण : डीयू शिक्षक संघों ने खोला मोर्चा

विश्वविद्यालय के बजाय विभागवार आरक्षण का विरोध तेज हो गया है। दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक संघों के अलावा अन्य संगठनों ने इसका विरोध किया है। उनकी मांग है कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ फिर से पुनर्विचार याचिका दाखिल करे

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद विश्वविद्यालयों में 200 प्वाइंट के बदले 13 प्वाइंट रोस्टर के आधार पर नियुक्ति को लेकर देश भर के दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के छात्र व बुद्धिजीवी आंदोलन कर रहे हैं। दिल्ली में भी इसे लेकर मुहिम तेज हो गई है। इस कड़ी में दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के विभिन्न शिक्षक संघों ने भी माेर्चा खोल दिया है। इन संघों में दिल्ली यूनिवर्सिटी एससी, एसटी, ओबीसी टीचर्स फोरम, एकेडमिक फोरम फॉर सोशल जस्टिस, ऑल इंडिया टीचर्स फ्रंट और ओबीसी यूनाईटेड फ्रंट आदि शामिल हैं।

फैसले के विरोध के संबंध में दिल्ली यूनिवर्सिटी एससी, एसटी, ओबीसी टीचर्स फोरम की एक आपात बैठक बुधवार 30 जनवरी को साउथ कैम्पस, आर्ट्स फैकल्टी में हुई। इस बैठक में 31 जनवरी को होने वाली मंडी हाउस से संसद मार्ग तक रैली में शामिल होने का निर्णय लिया गया।  बैठक में अपील जारी की गई कि फोरम के सभी 31 जनवरी को 11 बजे मंडी हाउस पहुंचें, जहां से संसद मार्ग तक मार्च निकाली जाएगी। बैठक में यह भी फैसला लिया गया कि राष्ट्रपति ,प्रधानमंत्री, एचआरडी मंत्री ,सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री आदि को ज्ञापन सौंपा जाएगा जिसमें विश्वविद्यालय के आधार पर रोस्टर हेतु अध्यादेश लाने की मांग की जाएगी।

बताते चलें कि बीते 22 जनवरी 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने 7 मार्च 2017 को इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा दिए गए फैसले को सही साबित करते हुए केंद्र सरकार की पुनर्विचाार याचिका को खारिज कर दिया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में विश्वविद्यालयों में नियुक्ति हेतु विश्वविद्यालय के बजाय विभागवार रोस्टर बनाने का निर्देश दिया था। इसी के आधार पर 5 मार्च 2018 को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने अधिसूचना जारी की थी। इसके बाद व्यापक विरोध को देखते हुए केंद्र सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की गई थी।

जेएनयू में विभागवार आरक्षण का विरोध करते छात्र

बैठक की अध्यक्षता फोरम के महासचिव प्रो. के. पी. सिंह ने की। बैठक में लगभग सभी वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि फोरम मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एमएचआरडी), एससी, एसटी कल्याण संसदीय समिति, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, विधि मंत्रालय और आदिवासी मंत्रालय पर दबाव बनाया जाय ताकि संवैधानिक आरक्षण उच्च शिक्षा में भी नियमित रूप से लागू किया जा सके। साथ ही सरकार पर दबाव बनाया जाय कि वह सु्प्रीम कोर्ट में जल्द से जल्द पुनः विचार याचिका (रिव्यू पेटीशन) दाखिल कर पूर्ववर्ती आरक्षण नीति का क्रियान्वयन सुनिश्चित करे।

फोरम के चेयरमैन व डीयू के एकेडेमिक काउंसिल के मेंबर प्रो. हंसराज  ‘सुमन ‘ ने कहा कि सरकार एक कमेटी एससी, एसटी कल्याण संसदीय समिति के अंडर में कमेटी गठित करे] जिसमें एमएचआरडी, विधि मंत्रालय, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, डीओपीटी और यूजीसी के प्रतिनिधि हों और जो सुप्रीम कोर्ट में पुनः विचार याचिका (रिव्यू पेटीशन) बड़े बेंच में दाखिल कर सके।

अपने अध्यक्षीय भाषण में प्रो. के. पी. सिंह ने कहा कि सरकार इस मामले को गंभीरता से ले और फैसले को वापस लेने के लिए सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल करे। साथ ही सरकार आरक्ष्ण को नवीं अनुसूची में शामिल करे ताकि इसमें कोई छेड़छाड़ न किया जा सके। बैठक में डॉ. संदीप कुमार, अनिल कुमार, मनोज कुमार, रविन्द्र कुमार सिंह ,डॉ सुरेश कुमार, डॉ शांतनु कुमार दास आदि ने अपने विचार रखे।

वहीं एकेडमिक फोरम फॉर सोशल जस्टिस, ऑल इंडिया टीचर्स फ्रंट और ओबीसी यूनाईटेड फ्रंट आदि संगठनों के द्वारा 3 फरवरी को विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया गया है। इस संबंध में दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक प्रो. केदार मंडल ने बताया कि विभागवार रोस्टर का प्रावधान उच्च शिक्षा से दलितों, आदिवासियों और पिछड़े वर्ग के लोगों को वंचित रखने की साजिश है। उन्होंने बताया कि वे लोग नौ सूत्री मांग सरकार के सामने रखेंगे। इनमें जनसंख्या के अनुपात में सभी को आरक्षण, जातिगत जनगणना की रिपोर्ट सार्वजनिक करने, एससी, एसटी व ओबसी को निजी क्षेत्र में आरक्षण देने, न्यायपालिका में आरक्षण, पदोन्नति में आरक्षण, आरक्षित वर्गों के बैकलॉग पदों को भरने, 13 प्वाइंट रोस्टर को खत्म करने के लिए संसद में विधेयक लाने, पूरे देश में एक समान 200 प्वाइंट रोस्टर लागू करने और दिल्ली में ओबीसी के प्रमाण पत्र के लिए 1993 के पहले के वासी होने की बाध्यता को समाप्त करने की मांग शामिल है।

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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