डिहरी से विधान सभा का उपचुनाव लड़ेंगे हम

बिहार की राजधानी पटना के पत्रकार वीरेंद्र यादव ने डिहरी विधानसभा क्षेत्र में होने वाले उपचुनाव में बतौर ताल ठोंकने का निर्णय लिया है। उनका कहना है कि उनकी यह कोशिश पत्रकारिता को पटना के सियासी गलियारे से निकाल गांवों के खेत-खलिहानों तक ले जाने की है

(वीरेंद्र यादव बिहार के जमीनी पत्रकार हैं। पत्रकारिता को जनोन्मुखी बनाने के उनके अभिनव प्रयोगों को भले ही कारपोरेट मीडिया ने तवज्जो न दी हो, लेकिन वीरेंद्र यादव ने इसकी कभी परवाह नहीं की और हमेशा अपनी लेखनी पर सान चढ़ाते रहे हैं। अपने बूते उन्होंने पहले तो आह्वान नामक नियमित बुकलेट का प्रकाशन कर बिहार के सियासी गलियारे में अपनी उपस्थिति दर्ज करायी। बाद में बीरेंद्र यादव न्यूज के बैनर तले एक मासिक पत्रिका और वेब पोर्टल के जरिए अपने प्रयोगों को जारी रखा है। उनके प्रयोग इस मायने में भी खास रहे हैं कि उन्होंने बिहार की सवर्ण बहुल मीडिया के बरक्स पिछड़े वर्ग के मुद्दों और उनके सवालों को प्रमुखता दी। पत्रकारिता और राजनीति के बीच चोली-दामन के रिश्ते को आम अवाम के बीच ले जाने के लिए उन्होंने 2012 में औरंगाबाद जिले के ओबरा प्रखंड के बभनडीहा पंचायत में मुखिया पद के लिए उपचुनाव लड़ा। इससे पहले उन्होंने 2013 में ‘गांधी ग्राम संवाद यात्रा’ के नाम पर साइकिल यात्रा भी की। अर्थाभाव के कारण वे अपने अनुभवों को बुकलेटों के रूप में सामने न ला सके, परंतु फेसबुक के माध्यम लोगों के सामने रखा। इसी क्रम में अपने अभिनव प्रयोगों के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने इस बार डिहरी विधानसभा क्षेत्र के लिए होने वाले उपचुनाव में बतौर निर्दलीय प्रत्याशी ताल ठोंकने का फैसला किया है। यह सीट पिछले वर्ष 27 सितंबर से रिक्त है। इसके रिक्त होने की वजह यह रही कि 2015 में इस विधानसभा से जीते राजद के वरिष्ठ नेता इलियास हुसैन को कोर्ट ने एक मामले में सजायाफ्ता करार दिया था।)

पत्रकारिता : विधानसभा के गलियारे से खेत-खलिहान तक

  • वीरेंद्र यादव

चुनाव का कवरेज करना और चुनाव में उम्मीदवार होना, दो अलग-अलग विधा है। कवरेज करना पत्रकारिता है और उम्मीदवार होना राजनीति। कोई पत्रकार जब मुख्यमंत्री के चैंबर में बैठा हो तो राजनीति भी करता है और पत्रकारिता भी। हम पत्रकारिता को विस्तार देना चाहते हैं। विधानसभा के गलियारे से निकलकर वोटरों के दालान में पत्रकारिता को ले जाना चाहते हैं। खलिहान में पत्रकारिता को ले जाना चाहते हैं। मिठाई व पान की दुकान में पत्रकारिता को ले जाना चाहते हैं। इसलिए हम रोहतास जिले के डिहरी विधान सभा क्षेत्र के लिए होने वाला उपचुनाव लड़ना चाहते हैं। चुनाव लड़ेंगे, यह जानते हुए भी हार सुनिश्चित है।

चुनाव में हार-जीत लगी रहती है। मधेपुरा में लालू यादव चुनाव हार जाते हैं, बाढ़ में नीतीश कुमार चुनाव हार जाते हैं, हाजीपुर में रामविलास पासवान चुनाव हार जाते हैं। यूपी में भी योगी आदित्यनाथ के इस्तीफे से खाली हुई गोरखपुर सीट भाजपा हार जाती है। डिहरी में हम हार जाएंगे तो कौन सी आफत आ जाएगी।

हम निर्दलीय चुनाव लड़ेंगे। सभी पार्टी के नेताओं से समर्थन मांगने जाएंगे। लेकिन ‘चारपाई’ हमारी सबसे बड़ी ताकत होगी। हम सिर्फ यादव, राजपूत, भूमिहार और कुशवाहा जाति से वोट मांगने जाएंगे। यह चार जातियां हमारी चारपाई के स्तंभ होंगी। हालांकि यह चारों जातियां किसी न किसी पार्टी के ‘बंधुआ’ वोटर हैं। हमारी यह लड़ाई ‘बंधुआवाद’ के खिलाफ भी होगी। हम वोटरों के स्वाभिमान की लड़ाई लड़ेंगे। हम किसी भी जाति के समर्थन का स्वागत करेंगे।

हमारा चुनाव आयोग भी अद्भुत है। देश में पार्टियों के लिए सीट और उम्मीदवार का चयत तक जाति के आधार पर होता है और आयोग कहता है कि आप जाति के आधार पर वोट नहीं मांग सकते। इसलिए हमने अपने टारगेट जातियों के लिए ‘चारपाई’ शब्द गढ़ लिया है, ताकि जाति के ‘लांक्षण’ से बच सकें।

पत्रकार वीरेंद्र यादव

चुनाव हम लड़ेंगे ही हारने के लिए। इसलिए जीतने की उम्मीद पालना ही व्यर्थ है। लेकिन हम हार ही जाएंगे, इसकी भी कोई गारंटी नहीं है। यदि हमारी चारपाई मजबूती से खड़ी हो जाए तो कई महारथियों की ‘खटिया खड़ी’ हो जाएगी। यादवों की लड़ाई भूमिहार-राजपूत से जमीन की नहीं रही है। वह लड़ाई सत्ता और स्वाभिमान की रही है। इसमें कुशवाहा भी साथ खड़े हो जाएं तो सत्ता भी अपनी और स्वाभिमान भी अपना।

क्षेत्र में चुनाव प्रचार के लिए समय भी सिर्फ अधिसूचना के बाद से मतदान के दिन तक देना है। ओबरा विधान सभा के डिहरा (हमारा गांव) से डिहरी की दूरी सिर्फ 15 किमी है। घर से खाकर प्रचार के लिए निकलिये और फिर रात में वापस घर। चुनाव के पहले बक्सर में अश्विनी चौबे, आरा में आरके सिंह और काराकाट में उपेंद्र कुशवाहा झांकी मारने भी नहीं गये थे और जीत गये। हम तो डिहरी विधान सभा क्षेत्र का कई चक्कर लगा चुके हैं। बचपन में सिनेमा देखने से लेकर ट्रेन पकड़ने तक के लिए डिहरी से नाता रहा है। चुनाव में जीत गये तो सदन में बैठेंगे और हार गये तो सदन के ऊपर प्रेस दीर्घा में। हमने मुखिया का चुनाव लड़कर अनुभव की छोटी पुस्तक लिखी थी और विधायक का चुनाव लड़कर अनुभव की बड़ी पुस्तक लिख डालेंगे।

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें

आरएसएस और बहुजन चिंतन 

मिस कैथरीन मेयो की बहुचर्चित कृति : मदर इंडिया

बहुजन साहित्य की प्रस्तावना 

दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

महिषासुर एक जननायक’

महिषासुर : मिथक व परंपराए

जाति के प्रश्न पर कबी

चिंतन के जन सरोकार

 

About The Author

Reply