मदर इंडिया : ईमानदार गटर इंस्टपेक्टर की साहसिक रिपोर्ट

धर्म तथा तत्संबंधी तरह-तरह के कर्मकांड, जाति के नाम पर समाज का अमानवीय विभाजन जिसके दिल दहलाने वाले विवरण मेयो ने अपनी पुस्तक में किए हैं, के बारे में उपयोगितावादी दार्शनिक जेम्स मिल ने भी ‘हिस्ट्री ऑफ ब्रिटिश इंडिया’ में तीखी टिप्पणियां की थीं। बावजूद इसके किसी भी पुस्तक का इतना प्रचार नहीं हुआ था, जितना ‘मदर इंडिया’ को लेकर हुआ

बहुत कम पुस्तकें ऐसी होती हैं, जिन्हें आलोचना और सराहना भारी तादाद में, मगर समानरूप से प्राप्त होती हैं. कैथरीन मेयो की ‘मदर इंडिया’ ऐसी ही पुस्तक है। हाल ही में सुप्रतिष्ठित दलित लेखक-विचारक कंवल भारती ने उसका हिंदी अनुवाद किया है, जिसे ‘फारवर्ड प्रेस’ ने प्रकाशित किया है। पुस्तक का समग्र और संतुलित हिंदी अनुवाद आते-आते लगभग 90 वर्ष बीत चुके हैं। हालांकि इससे पहले भी पुस्तक में हिंदी अनूदित हो चुकी थी। लेकिन अनुवादकीय संतुलन, भाषायी धैर्य तथा निष्पक्षता के अभाव में पिछले अनुवाद को प्रामाणिक नहीं माना जा सकता। दरअसल, पुस्तक के कथ्य की गहराइयों में पैठने के लिए जो संवेदनशीलता चाहिए, उसका तत्कालीन लेखकों-बुद्धिजीवियों में अभाव था। उसे देखते हुए तब इसका संतुलित अनुवाद आ ही नहीं सकता था। इस तरह कंवल भारती ने बड़े अभाव की पूर्ति की है।

मूल पुस्तक ‘ब्लू रिबन बुक्स, न्यूयार्क’ से 1927 में प्रकाशित हुई थी। छपने के साथ ही उसे विवादों ने घेर लिया था। अधिकांश आलोचकों का कहना था कि पुस्तक की रचना भारत को बदनाम करने के लिए की गई है। अपनी भारत यात्रा के बारे में मेयो का दावा था कि यह एकदम स्वतंत्र, एक ऐसे व्यक्ति का यात्रा-विवरण है, जो इस देश को करीब से देखना-समझना चाहता है। आलोचकों का दावा है कि मेयो के औपनिवेशिक सरकार के केंद्रीय खुफिया विभाग से सीधे संबंध थे। दोनों के बीच पत्र-व्यवहार भी था। उसने ही मेयो से भारतीय परंपराओं और सामाजिक स्थिति पर पुस्तक तैयार करने का आग्रह किया था, ताकि गांधी, जो उन दिनों देश की स्वाधीनता के लिए भारतीयों को एकजुट करने में लगे थे—को जवाब दिया जा सके।

‘मदर इंडिया’ की लेखिका (27 जनवरी 1867 – 9 अक्टूबर 1940)

बहरहाल, समर्थन और विरोध, जिसमें विरोध की मात्रा कहीं अधिक थी—के बीच पुस्तक की ख्याति-कुख्याति इतनी बढ़ी कि इसकी प्रतिक्रिया में न केवल अंग्रेजी और हिंदी, अपितु तमिल, बांग्ला, उर्दू आदि में अनेक पुस्तकें लिखी गईं। मूल कृति के विरोध और समर्थन में लिखी गईं महत्त्वपूर्ण पुस्तकों और पर्चों की संख्या पचास से भी अधिक थी। आलोचना में लिखी गई प्रमुख पुस्तकों में दलीप सिंह सौंद की ‘माय मदर इंडिया’, धनगोपाल मुखर्जी की ‘ए सन ऑफ मदर इंडिया आन्सवर’, के. नटराजन की ‘ए रिजॉइंडर टू मिस मेयो मदर इंडिया’ तथा श्रीमती चंद्रवती लखनपाल की ‘मदर इंडिया का जवाब’ शामिल हैं। महाकाव्यीन शैली में बनाई गई महबूब खान की बहुचर्चित फिल्म ‘मदर इंडिया’ भी कैथरीन मेयो की पुस्तक का जवाब देने के लिए बनी थी। पुस्तक को लेकर भारत में हो रही जबरदस्त प्रतिक्रियाओं के जवाब में हेरी एच. फील्ड ने मेयो का बचाव करने हुए ‘आफ्टर मदर इंडिया’(1929) की रचना की थी। देश-विदेश में पुस्तक की प्रतियों के साथ मेयो के पुतले का दहन किया गया था। पुस्तक के प्रति भारतीयों की तीव्र नाराजगी को देखते हुए 1936 में, तत्कालीन सरकार ने उसे भारत में लाने पर पाबंदी लगा दी थी। मगर तब तक पुस्तक की लाखों प्रतियां यूरोप और अमेरिका में बिक चुकी थीं। मुफ्त में बंटवाई गई प्रतियों की संख्या इससे अलग थी। अकेले अमेरिका में ही ऐसी पचास हजार से अधिक प्रतियां बंटवाई जा चुकी थीं। अधिकांश आलोचकों का विचार था कि मेयो ने भारतीय समाज की छिछली और पक्षपातपूर्ण आलोचना कर अपनी औपनिवेशवादी दृष्टि का परिचय दिया है। कुछ लोगों ने मेयो पर साम्राज्यवादी तथा रंगभेदी होने का आरोप भी लगाया था।

पुस्तक में ऐसे कई वर्णन हैं, जहां यह आरोप सही प्रतीत होता है। पुस्तक को मिली अप्रत्याशित चर्चा के पीछे क्या यही कारण था? यदि नहीं तो इस पुस्तक में आखिर ऐसा क्या था, जिससे भारतीय नेता और बुद्धिजीवी एकसाथ तिलमिला उठे थे। इसे समझना कठिन नहीं है। मेयो पुस्तक की शुरुआत जिस अध्याय से करती हैं, उसका शीर्षक है—मांडले की बस। बस में उसका सहयात्री है—हलदार। एक ब्राह्मण पुजारी। पहले अध्याय से ही लेखिका पाठक को बांध लेती है। लेखन की बेबाक शैली, आंखों देखे को न्यूनतम शब्दों तथा आसान भाषा में पाठक के सामने उतार देने की खूबी—इस पुस्तक को पठनीयता प्रदान करती है। अनुवाद में इसे ज्यों का त्यों सहेजा गया है। इसके लिए अनुवादक की सराहना करनी होगी।

‘मदर इंडिया’ मुख्यतः चार हिस्सों में बंटी है। पहले हिस्से में मेयो सामाजिक रूढ़ियों और अंधविश्वासों का वर्णन करती हैं। उनका विवरण इतना जीवंत है कि कई स्थान पर वह जुगुप्सा उत्पन्न करता है। भारत के गरीब, अशिक्षित जनों की दुर्दशा तथा उनका रूढ़ि-प्रेम देख पाठक सिहर उठता है। पुस्तक के आलोचकों में उस समय के बड़े नेताओं के अलावा स्वयं गांधी भी सम्मिलित थे। हालांकि मेयो ने उनका उल्लेख करते समय अपेक्षित तटस्थता बरती है। मगर गांधी ने पुस्तक को बिना पूरा पढ़े ही उसे ‘नाली इंस्पेक्टर की रिपोर्ट’ कहकर नकार दिया था। पुस्तक के पहले अध्याय से ही पता चल जाता है कि लेखिका अपने यथार्थवादी वर्णन को कहां तक ले जा सकती है; और गांधी की नकारात्मक टिप्पणी का रहस्य क्या है! पुस्तक जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, लगने लगता है कि गांधी ने अनजाने में ही सही, पुस्तक को लेकर एकदम सही बात कह दी थी। ‘ड्रेन’ कहकर उन्होंने भारतीय समाज के जिन अंधकूपों की ओर संकेत किया था, वे काल्पनिक या मेयो के दिमाग की उपज न होकर(आज भी), इसी जीते-जागते भारतीय समाज का हिस्सा हैं। परंपरा और संस्कृति के नाम पर लोग उन्हें पीढ़ी-दर-पीढ़ी सहेजते आ रहे हैं। प्रकारांतर में गांधी की आलोचनात्मक टिप्पणी भी ‘मदर इंडिया’ का परोक्ष समर्थन करने लगती है।

शुरुआत कलकत्ता से होती है। मेयो आरंभ में ही भारतीय समाज के वर्गीय विभाजन की ओर इशारा कर देती हैं। वह जातीय ही नहीं आर्थिक भी है। या यूं कहें कि घोर जातीय है, इस कारण वह आर्थिक भी है। कलकत्ता के उजले, विकासमान और दिपदिपाते चेहरे का वर्णन वह इस प्रकार करती हैं—”कलकत्ता भव्य और बनावटी शहर है, जहां सभी धर्मों और रंगों के बनावटी लोग गवर्नमेंट हाउस की गार्डन पार्टियों में जाते हैं। अंग्रेज लाट साहबों को सलाम ठोकते हैं। बढ़िया अंग्रेजी बोलते हैं। चाय पीते हैं, आइसक्रीम खाते हैं और सेना का बैंड सुनते हैं।”

उनका कलकत्ता विश्व और भारत के व्यापार का विशाल मुक्त द्वार है। उसमें सबकुछ है—”आधुनिक इमारतें, राष्ट्रीय स्मारक, पार्क, बगीचे, अस्पताल, संग्रहालय, विश्वविद्यालय, न्यायालय, होटल, कार्यालय, दुकानें, और वह सब कुछ, जो एक समृद्ध अमेरिकी शहर में होता है।”

कलकत्ता का दूसरा चेहरा भारतीय समाज और बाकी शहरों की तरह ही उलझा और मटमैला है। दूसरे भारतीय नगरों की तरह उसमें भी मंदिर, मस्जिद, बाजार, करीने से काटे-छांटे गए मैदान और गलियां हैं। “चौराहों, गलियों तथा बाजारों में किताबों की छोटी-छोटी दुकानें हैं, जहां सुस्त चाल वाले, कमजोर नजर वाले और बीमार कद-काठी वाले नौजवान भारतीय छात्रों के झुंड अपनी देशी पौशाकों में रूसी साहित्य के ढेर पर ऐसे टूटे पड़ते हैं, जैसे मक्खियां भिनभिना रही हों(पृष्ठ 19)।”

मेयो ने ‘बनावटी’ लोगों की पोशाक का सीधे उल्लेख नहीं किया है। पाठक खुद-ब-खुद समझ जाता है कि वे गवर्नमेंट हाउस की पार्टियों में जाने वाले वही लोग रहे होंगे, जो सत्ता के इर्द-गिर्द रहकर सदैव स्वार्थ-सिद्धि करते आए हैं। कोलकाता भारत के प्रथम औद्योगिक शहर के रूप में पनपा था। उसमें अनियोजित विकास से जुड़ी वे सभी कमजोरियां थीं, जिनसे अनुप्रेत होकर मार्क्स ने ‘पूंजी’ जैसा महाग्रंथ रचा था।

पुस्तक में विधवा विवाह, बालविवाह, धर्म के नाम पर पाखंड, रूढ़िप्रेम, तंत्र-मंत्र, बलिप्रथा आदि के माध्यम से भारतीय महिलाओं और दलितों की दयनीय अवस्था के दिल-दहलाते वाले दृश्य हैं। इतने प्रामाणिक कि मेयो की आलोचना करते हुए चंद्रवती लखनपाल ने जहां उखड़ी हुई भाषा में कई जगह कुतर्क किए हैं, भारतीय स्त्रियों की दुर्दशा को पश्चिमी देशों में स्त्री की दुर्दशा के साथ तुलना कर, हालात का सामान्यीकरण करने की कोशिश की गई है—वहीं कई स्थानों पर मेयो को लगातार कोसने के बावजूद, वह उनसे सहमत दिखाई पड़ती हैं।

उदाहरण के लिए हिंदू समाज में विधवाओं की दुर्दशा का वर्णन करते हुए वे मेयो को कोई जवाब नहीं दे पातीं। केवल उनके तथ्य को ज्यों का त्यों पेश कर देती हैं— “भारत में विधवाओं की दुर्दशा अवश्य की जाती है; और उसके प्रायश्चित में उसे ‘मदर इंडिया’ जैसे थप्पड़ भी खाने पड़ते हैं।”

स्त्रियों के प्रति हिंदुओं की हृदयहीनता का मर्मभेदी वर्णन करते हुए मिस मेयो लिखती है—”जब सती प्रथा को हटाए जाने का ब्रिटिश-सरकार प्रयत्न कर रही थी, उस समय इस घृणित प्रथा को वैसे का वैसा बनाए रखने के लिए इन लोगों ने प्रिवी काउंसिल के दरवाजों तक को खटखटाया था। इस समय भी बाल विवाह तथा दहेज आदि कुप्रथाओं के दैत्यों पर कई लड़कियां जीती-जाग्रत साड़ी में आग लगाकर बलि चढ़ गई हैं। परंतु अब भी इस हत-भाग्य देश में, ऐसे लोग मौजूद हैं, जो इन दृष्टांतों से सबक सीखने के स्थान पर बालिका के मृदुल अंगों से उठती लपटों को देखकर उनमें सतीत्व की ज्योति झलकती देखते और हर्ष के आंसू बहाते हैं! 1925 में भारतवर्ष में 2,68,34,838—अढ़ाई करोड़ से ज्यादा विधवाएं मौजूद थीं।” (मदर इंडिया का जवाब, पृष्ठ 47, दूसरा संस्करण, संवत 1885)

एक अन्य स्थान पर वह मेयो से सहमत होते हुए लिखती हैं—”मेयो स्वयं एक स्त्री है। इसलिए स्वाभाविक तौर पर उसका ध्यान स्त्रियों की ओर अधिक खिंचा है। हमने स्त्रियों की दुर्गति भी कम नहीं कर रक्खी। ‘स्त्रीशूद्रैनाधीयाताम’ का जयघोष करने वालों को वह याद दिलाती है कि 1911 में 1000 में से 10 स्त्रियां अक्षर पढ़ना जानती थीं, 1921 में 1000 में से 18 को अक्षरबोध था और 1925 में 1000 में यह संख्या 20 हो गई….हम लोगों में स्त्रियों को शिक्षा देने की प्रवृत्ति ही नहीं है।” (पृष्ठ 54)

ऐसा नहीं है कि भारतीय स्त्री की दुर्दशा के जो बिंब मिस मेयो ने पुस्तक में उकेरे हैं, उनकी ओर से भारतीय नेता और बुद्धिजीवी एकदम अनजान हों। भारतीय समाज की उन भयावह विकृतियों पर विधायिकाओं में लंबी बहसें होती थीं। नेताओं की समय-समय पर टिप्पणियां, अखबारों में आलेख भी आते थे। लेकिन उस समय के अधिकांश बड़े नेता, बुद्धिजीवी भारतीय सभ्यता की कथित महानता के नाम पर, उन्हें किसी न किसी रूप में सहेजे रखना चाहते थे। उनपर सरसरी टिप्पणियां पुस्तक में जगह-जगह मौजूद हैं।

ध्यातव्य है कि भारत में व्याप्त जातिप्रथा, स्त्रियों की दुर्दशा, धर्म के नाम पर पोंगापंथी, बलिप्रथा के नाम पर निरीह पशुओं पर क्रूर अत्याचार, अशिक्षा और गरीबी के ऊपर उससे पहले भी कई पुस्तकें आ चुकी थीं। विधानसभाओं और परिषदों में होने वाली बहसों और उनकी सालाना रिपोर्ट भी दुनिया के सामने थीं। मेयो ने अपने तथ्य और आंकड़े उन्हीं जुटाए थे। कार्ल मार्क्स की पुस्तक ‘ब्रिटिश रूल इन इंडिया’(1853) कैथरीन मेयो की पुस्तक के लगभग 72 वर्ष पहले प्रकाशित हो चुकी थी। उसमें अंग्रेजों द्वारा भारत की लूट के साथ-साथ भारतीय समाज की दुरावस्था तथा दास मनोवृत्ति की आलोचना की गई थी। मेयो ने अपनी पुस्तक में दिया था कि किस प्रकार भारत में रह रहे कुल 67432(सैन्यबल 60000, सिविल सेवा 3432 तथा पुलिस 4000, पृष्ठ 33) अंग्रेज, लगभग 25 करोड़ भारतीयों पर हुकूमत जमाए हुए हैं। मार्क्स ने अपने भारत विषयक लेखों में इस तथ्य को भिन्न-भिन्न तथ्यों के साथ प्रस्तुत किया है। ‘आधुनिक भारत का इतिहास’ में डॉ. विपिन चंद्र ने लिखा है कि 1857 में भारतीय सेनाओं में कुल मिलाकर 3,11,400 सैनिक और अधिकारी थे। उनमें से भारतीयों की संख्या 2,65,900 थी। यूरोपीय सैनिकों की कुल संख्या 45,500 यानी उनके कुल सैन्यबल का मात्र 15 प्रतिशत थी। बाकी क्षेत्रों में उससे कहीं कम अंग्रेज थे। भारत की कुल जनसंख्या के सापेक्ष यहां आधा प्रतिशत से भी कम अंग्रेज थे, लेकिन वे 25 करोड़ से अधिक भारतीयों पर राज करते थे। यह केवल ऐसे समाज में संभव था, जहां लोगों के हितों में एका न हो। लोग अपने स्वार्थ के आधार पर बंटे हों। भारतीय समाज में तो जाति-प्रथा के नाम का कलंक हजारों वर्षों से छाया हुआ था। भारत में तथाकथित सवर्णों के संभ्रांत हिस्से ने बहुसंख्यक दलितों और पिछड़ों को अलग किया हुआ था। बंटे हुए समाज में मुट्ठी-भर चालाक आत्ममुग्धता के साथ जीवनयापन करते थे। सारे संसाधन, वैभव और भोग-विलास उनके कब्जे में थे। बाकी जनसमाज की उन्हें चिंता न थी। न उन्हें जीवन के सामान्य अधिकार और सुख प्राप्त थे। स्त्रियों की दुर्दशा पर मेयो को आंसू बहा-बहाकर कोसने वाली चंद्रवती लखनपाल मेयो द्वारा दलितों की दुर्दशा पर कोई टिप्पणी नहीं करतीं। गोया वे उसे ज्यों का त्यों स्वीकार कर लेती हैं। या फिर बाकी सवर्ण लेखकों की भांति दलितों की समस्या, उनका दैन्य और दुर्दशा उनके लिए कोई समस्या थी ही नहीं। लेकिन मेयो ने भारतीय समाज की इस कुरूपता का यथा-तथ्य वर्णन किया है। ‘मद्रास आदि द्रविड़ सभा’ जो मद्रास प्रेसीडेंसी में 60 लाख जनजातियों का प्रतिनिधित्व करती थी, को उद्धृत करते हुए उन्होंने लिखा है—“हिंदुओं की जाति-व्यवस्था हमें अछूतों के रूप में कलंकित करती है। फिर भी सवर्ण हिंदू हमारी सहायता के बिना नहीं रह सकते। हम जो श्रम करते हैं, वे उसी का फल खाते हैं। पर, वे बदले में हमें सिर्फ जूठन देते हैं।” (पृष्ठ-151)

आज भाजपा और संघ दलितों को हिंदू धर्म का हिस्सा बताते हैं। जातीय उत्पीड़न का शिकार होकर दूसरे धर्मों की ओर पलायन कर चुके दलितों की घर-वापसी की बात करते हैं, तो इसलिए कि उनके सामने मुस्लिमों के आगे अल्पसंख्यक हो जाने का खतरा उनके सिर पर खड़ा है। जबकि सौ वर्ष पहले तक दलितों के बड़े हिस्से को अछूत बताकर उन्हें हिंदू धर्म से बाहर रखा गया था। सवर्ण उन्हें हिंदू मानने को तैयार ही नहीं थे। मेयो के शब्दों में, “भारत की 24.70 करोड़ जनता में से लगभग 25 प्रतिशत अर्थात छह करोड़ लोग अनंतकाल से अशिक्षित बनाकर रखे गए हैं। और साथ ही उन्हें उनके ही भारतीय भाइयों ने मनुष्य से भी गिरा हुआ बनाकर रखा गया है। अवश्य ही यदि भारत में कोई रहस्य है, तो वह इस बात में है कि भारतीय कोई मनुष्य या कोई समाज या कोई राष्ट्र किसी भी परिस्थिति में, कहीं भी भारतीयों को यह याद दिलाए कि भारत में छह करोड़ देशवासी ऐसे हैं जिन्हें तुमने मनुष्य होने के सामान्य अधिकार देने से भी मना कर दिया है। तो वे पलटकर उस मनुष्य, समाज या राष्ट्र पर जातीय पक्षपात का दोष लगा देते हैं।” (पृष्ठ 135)

पुस्तक में स्त्रियों और दलितों की दुर्दशा के दिल दहलाने वाले विवरण जगह-जगह पर हैं—“उनके(दलितों) के बच्चे स्कूलों में पढ़ नहीं सकते। वे सार्वजनिक कुओं से पानी नहीं ले सकते। और यदि वे ऐसी जगह रहते हैं, जहां पानी उपलब्ध नहीं है तो उन्हें दूर से लाना पड़ता है….वे किसी अदालत में प्रवेश नहीं कर सकते। बीमार पड़ने पर अस्पताल नहीं जा सकते। और किसी सराय में नहीं ठहर सकते। कुछ प्रांतों में वे सार्वजनिक सड़कों पर भी नहीं जा सकते। और मजदूर या किसान के रूप में भी हमेशा उन्हीं को नुकसान उठाना पड़ता है। क्योंकि, वे न तो दुकानों पर जा सकते हैं और न ही उन सड़कों से गुजर सकते हैं, जहां दुकानें होती हैं। इसलिए उन्हें अपना सौदा बेचने या खरीदने के लिए दलालों पर निर्भर होना पड़ता है। इनमें कुछ इतने पतित हैं, उनसे कोई काम नहीं लिया जाता है। वे कुछ बेच नहीं सकते। यहां तक कि मजदूरी भी नहीं कर सकते। वे केवल भीख मांग सकते हैं। और भीख मांगने के लिए भी वे सड़क पर चलने का साहस नहीं कर सकते। उन्हें सड़क से दूर ऐसी जगह—जहां से कोई देख न सके—पर खड़े होकर गुजरने वाले लोगों से चिल्लाकर भीख मांगनी पड़ती है। यह भीख भी उन्हें सड़क से थोड़ा हटकर जमीन पर फेंक दी जाती है। यह भीख भी वे तब तक नहीं उठा सकते जब तब कि भीख फेंकने वाला दृष्टि से ओझल नहीं हो जाता।” (पृष्ठ-137)

मदर इंडिया पुस्तक की शुरूआत में दी गई दलित महिला की तस्वीर। इस तस्वीर को कैथरीन मेयो की सहयात्री मोयका निवेल ने खींचा था

पुस्तक की एक खास बात, जिसकी ओर बहुत कम ध्यान दिया गया है—वह है, पुस्तक के आरंभ में दिया गया अछूत स्त्री का चित्र। एक तो स्त्री ऊपर से दलित। चित्र को कैथरीन की मित्र, सहयोगी, मददगार और भारत यात्रा में उनकी सहयात्री मोयका निवेल ने खींचा था। उन दिनों भारत विषयक किसी पुस्तक का आरंभ दलित स्त्री के चित्र से करना बड़ी बात थी। वह भी स्त्री द्वारा। मानों एक पढ़ी-लिखी संभ्रांत महिला दलित स्त्री को अंधियारे से उजाले में ला रही थी। वह अपनी तरह का अलग स्त्री-विमर्श था। बिना किसी नारेबाजी के मेयो दलित स्त्री के बहाने पूरी स्त्री जाति की पीड़ा, उसके संत्रास, घुटन और छटपटाहट को दुनिया के सामने ले आती है। उस समय के बुद्धिजीवियों को तिलमिलाने के लिए यह भी पर्याप्त था। उससे पहले भारत में पुस्तकों पर या तो लेखक का चित्र होता था; अथवा आशीर्वाद कामना के साथ किसी देवता या साधु-संत के दर्शन. दलित महिला के चित्र को पुस्तक में जगह देकर कैथरीन ने उस परंपरा को उलट दिया था। आगे के अध्यायों में जब वह भारतीय स्त्री की दुर्दशा का बयान करती है, तो उसका वर्णन केवल चित्र में दिखाई गई अछूत स्त्री तक सीमित नहीं रह जाता, अपितु उसमें पूरी स्त्री-जाति की उपेक्षा, अवहेलना और तिरस्कार प्रतिबिंबित होने लगते हैं।

गौरतलब है कि धर्म तथा तत्संबंधी तरह-तरह के कर्मकांड, जाति के नाम पर समाज का अमानवीय विभाजन जिसके दिल दहलाने वाले विवरण मेयो ने अपनी पुस्तक में किए हैं, के बारे में उपयोगितावादी दार्शनिक जेम्स मिल ने भी ‘हिस्ट्री ऑफ ब्रिटिश इंडिया’ में तीखी टिप्पणियां की थीं। बावजूद इसके किसी भी पुस्तक का इतना प्रचार नहीं हुआ था, जितना ‘मदर इंडिया’ को लेकर हुआ। दरअसल पूर्ववर्ती विद्वान, ब्रिटिश सरकार की नीति के तहत आलोचना से बचते थे। अंग्रेजों की नीति थी कि केवल तथ्य रखे जाएं, उन्हें लेकर लेखकीय टिप्पणी अथवा आलोचना से बचा जाए। अंधिकांश पुस्तकें इसी अकादमिक निस्पृहता के साथ लिखी गई थीं। मेयो की पुस्तक में ऐसा नहीं था। पुस्तक एक तरह का यात्रा विवरण है। मेयो जो देख रही हैं, उसी को वर्णित कर रही हैं। लेखिका का साक्षी भाव ही ‘मदर इंडिया’ को महत्त्वपूर्ण बना देता है। पुस्तक में दिए गए तथ्यों की काट मेयो के आलोचकों के पास नहीं थी। वे केवल लेखकीय दृष्टि को पक्षपातपूर्ण बताकर उसके महत्त्व को हल्का करने की कोशिश कर सकते थे। यही उन्होंने किया भी। कुछ हद तक यह अवसर स्वयं मेयो ने भी दिया है। मेयो की औपनिवेशिक दृष्टि जॉन स्टुअर्ट मिल की औपनिवेशिक दृष्टि से मेल खाती है। हालांकि दोनों के बीच लगभग सौ वर्ष का अंतराल है। परंतु संकुचित औपनिवेशिक दृष्टि के बावजूद मेयो ने जो लिखा, वह सत्य से एकदम परे नहीं था। यदि मेयो इस देश पर ब्रिटिश राज को जरूरी मानती थीं तो सवर्णों के अत्याचारों के उत्पीड़न का शिकार रहा दलितों का बड़ा हिस्सा, भी वही चाहता था। अंग्रेजों के आने के बाद ही उन्हें शिक्षा और सामाजिक सम्मान के कुछ अवसर उपलब्ध हुए थे। शताब्दियों से जातीय उत्पीड़न का शिकार रहे दलित सोचते थे कि अंग्रेजों के जाने के बाद उनसे ये अवसर छिन भी सकते हैं। ‘मद्रास आदि द्रविड़ सभा’ ने तत्कालीन वायसराय को लिखे गए पत्र में लिखा था—“यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि हम लोग स्वराज के प्रबल विरोधी हैं। हम अपने रक्त की अंतिम बूंद तक अंग्रेजों द्वारा भारत की सत्ता हिंदुओं के हाथों में सौंपे जाने के प्रयास के खिलाफ लडेंगे। क्योंकि, जिन हिंदुओं ने अतीत में हम पर जुल्म किए हैं और आज भी कर रहे हैं, वे सत्ता प्राप्त करने के बाद भी हम पर जुल्म करेंगे। अंग्रेजों के कानून ही हमारे रक्षक हैं। आज भी हिंदू हमारे हितों की उपेक्षा करते हैं, बल्कि हमारे अस्तित्व तक से इन्कार करते हैं। यदि, इनके हाथों में प्रशासन का नियंत्रण आ जाएगा, तो वे हमारे हितों का संवर्धन कैसे कर सकते हैं।” (पृष्ठ 151)

मदर इंडिया किताब का कवर पृष्ठ

मेयो ने ‘ड्रेन थ्योरी’ पर भी सवाल उठाकर, आंकड़ों के आधार पर उसे गलत सिद्ध करने की कोशिश की थी। उन दिनों भारत में दादा भाई नौरोजी की पुस्तक ‘पावर्टी इन ब्रिटिश इंडिया’ की चर्चा थी। उसमें वर्णित ‘ड्रेन थ्योरी’ के अनुसार ब्रिटिश भारत के कच्चे माल को सस्ते दामों पर अपने देश ले जाकर और बदले में ऊंचे दामों पर अपने उत्पाद भारत लाकर यहां का आर्थिक दोहन कर रहे हैं। मेयो ने तथ्यों के साथ बताया था कि भारत का निर्यात ब्रिटिश से अधिक जापान को है। भारत के कपास उत्पादन के खरीदारों की सूची में अंग्रेजी बाजार छठे स्थान पर है। लंकाशायर के करघों के लिए सूत की आपूर्ति अमेरिका और सूडान से की जाती है। ब्रिटेन में भारतीय कपास का उपयोग मुख्य रूप से लैंप की बत्ती बनाने, पोंछा और निम्न श्रेणी के कपड़े बनाने में होता है। अच्छा होता कि मेयो के आलोचक इंग्लैंड और भारत के तत्कालीन आर्थिक संबंधों पर भी विचार करते। लेकिन अर्से तक दादा भाई नौरोजी की पुस्तक ‘पावर्टी इन ब्रिटिश इंडिया’ को ही अंतिम और प्रामाणिक मानते रहना बताता है कि उनके पास मेयो के इन तर्कों का कोई उत्तर नहीं था। मार्के की बात यह भी कि यदि आज निर्यात को आयात से बेहतर माना जाता है तो उन दिनों के निर्यात पर सवाल कैसे उठाए जा सकते हैं? आखिर उन दिनों के भारत के निर्यात बाजार पर अंग्रेजी व्यापारियों के साथ-साथ भारतीय उद्योगपतियों की भी बराबर की साझेदारी थी।

पुस्तक में मेयो ने स्त्रियों और दलितों के अलावा ‘ब्राह्मण’, ‘भारत के राजे-महाराजे’, ‘पवित्र गाय’, अशिक्षा की भयावह स्थिति सहित, स्वास्थ्य सेवा के नाम पर पनप रहे नीम-हकीमों पर विस्तृत और तथ्यपरक टिप्पणियां की हैं। जिससे यह पुस्तक उस समय के भारतीय समाज का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज बन जाती है। उचित तो यही होता कि पुस्तक की तीखी आलोचना करने, उससे तिलमिलाने के बजाए उसे आत्मावलोकन का जरिया बनाया जाता। भारतीय सभ्यता और परंपरा के नाम पर जो सहस्रों अंधकूप बने हैं, उन्हें पाटने की कोशिश की जाती, तब शायद हम मिस मेयो की पुस्तक का सही प्रत्युत्तर दे पाते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। नए अनुवाद के साथ भी यदि यह संभावना बनती है, तब लगेगा कि आधुनिक भारतीय समाज न केवल अपनी कमजोरियों पर खरी-खरी सुनने का साहस रखता है, अपितु उसमें आत्मावलोकन और आत्मपरिष्करण का साहस भी है।

अंत में केवल यह बात कि इस पुस्तक पर कोई टिप्पणी या समीक्षा उसके सत्व को बाहर नहीं ला सकती। उसके लिए अच्छा यही होगा कि पाठक पुस्तक को स्वयं पढ़ें, समझें और तब सही-गलत जो भी लगे, उसके अनुसार जवाब दें या आत्मसुधार की ओर अग्रसर हों। कंवल भारती ने कैथरीन मेयो की बहुचर्चित पुस्तक ‘मदर इंडिया’ को हिंदी में लाकर, वर्षों पहले छूट गई बहस की नए सिरे से शुरुआत करने का काम किया है। इसके लिए वे बधाई के पात्र हैं।

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(कॉपी संपादन : प्रेम/एफपी डेस्क)

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