प्रथम दलित साहित्य महोत्सव 3-4 फरवरी को

देश भर से दलित-आदिवासी, महिला, घुमंतू आदिवासी समुदाय, अल्पसंख्यक व कई अन्य वंचित समुदायों से करीब 15 भाषाओं के लेखक, संस्कृतिकर्मी, गायक, नाट्यकार, कलाकार हो रहे हैं शामिल

कल 3 फरवरी 2019 से दो दिवसीय प्रथम दलित साहित्य महोत्सव का आयोजन दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज परिसर में होगा। इस आशय की जानकारी दलित साहित्य महोत्सव के संयोजक डॉ. नामदेव ने दी। उन्होंने कहा कि दलित साहित्य महोत्सव का मुख्य उद्देश्य भारत में दलित-आदिवासी और वंचित अस्मिताओं के लेखन, साहित्य, और संस्कृति को समाज के सामने लाना है। उन्होंने कहा कि इन साहित्यों के माध्यम से ही भारत के वंचित समुदाय की समस्याओं को सामने लाया जा सकता है। इसीलिए इस बार के महोत्सव का मूल थीम हमने ‘दलित’ शब्द रखा है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के नार्थ कैंपस स्थित गेस्ट हाउस में आयोजित संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए दलित साहित्य महोत्सव के संस्थापक और आदिवासी-दलित कथाकार सूरज बडत्या ने कहा कि आज जानबूझकर ‘दलित’ शब्द, जो वंचित समुदायों पर किये दमन और उनकी पीड़ा, वेदना की परिचायक रही है, उस पर हमले हों रहे हैं। चाहें प्रगतिशील हो या प्रतिक्रियावादी सभी को इस शब्द से परेशानी हो रही है। शायद ही कोई लेखक या साहित्य संगठन दलित-आदिवासी व वंचित समुदायों के लेखन के प्रति सकारात्मक सोच रखते हैं इसीलिए अम्बेडकरवादी लेखक संघ और सहयोगी संगठनों के साथ मिलकर हमने इसकी योजना बनाई।

प्रेस वार्ता में कार्यक्रम की जानकारी देते हुए रिदम के निदेशक और डीयू की विद्वत परिषद के सदस्य प्रो. हंसराज ‘सुमन ‘ ने कहा कि दलित शब्द आज भारत में वंचित समुदाय के लिए सामाजिक न्याय का पर्याय बन चुका है। यह एक ऐसा अम्ब्रेला है जिसके नीचे दलित, आदिवासी, घुमन्तु, महिला और किन्नर, अल्पसंख्यक और पसमांदा समुदाय के लोग खड़े होने पर गर्व महसूस करते हैं। हम दलित की परिभाषा में कामगार, मजदूर, किसान एवं सभी वंचित समुदाय को शामिल कर रहे हैं।

बताते चलें कि इस साहित्य महोत्सव में महाराष्ट्र, राजस्थान, तमिलनाडु और गुजरात से आने वाले लोकगायक रहेंगे जो दलित आदिवासी परम्परा और संस्कृति से लोगों को रूबरू कराएंगे।

संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते वक्तागण

महोत्सव आयोजन समिति के सचिव संजीव डांडा ने कहा कि इस महोत्सव के लिए भारत की विभिन्न भाषाओं के दलित-आदिवासी, महिला, घुमंतू आदिवासी, अल्पसंख्यक और किन्नर समुदाय के साहित्यकारों से संपर्क किया गया है। जिनमें से करीब 15 भाषाओं के लेखक, संस्कृतिकर्मी, गायक, नाटककार, कलाकार शामिल होंगे। इनमें नेपाल की प्रमुख दलित लेखिका आहुति, नर्मदा बचाओ आन्दोलन और जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (एनएपीएम) की नेत्री मेधा पाटकर के अलावा महाराष्ट्र के साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत आदिवासी लेखक लक्ष्मण गायकवाड, दलित लेखक शरणकुमार लिम्बाले, गुजरात से हरीश मंगलम और आदिवासी कवि-गायक गोवर्धन बंजारा, विश्व प्रसिद्द कलाकार मनमोहन बावा, कन्नड़ भाषा के महत्वपूर्ण आदिवासी लेखक शान्था नाइक, हैदराबाद से वी.कृष्णा, त्रिवेंद्रम से जया श्री, शामल मुस्तफा खान, पंजाबी भाषा के साहित्य अकादमी पुरस्कृत लेखक बलबीर माधोपुरी, क्रान्तिपाल, मदन वीरा, मोहन त्यागी और कई अन्य इस महोत्सव में शामिल हो रहे हैं। हिंदी लेखकों में शामिल होने वालों में मोहनदास नैमिशराय, जयप्रकाश कर्दम, ममता कालिया, चौथीराम यादव, हरिराम मीणा, श्योराज सिंह बेचैन, निर्मला पुतुल, बल्ली सिंह चीमा व कई अन्य लेखक व बुद्धिजीवी शामिल होंगे।

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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