देश के विकास में सहयोगी बन रहे आदिवासी

आदिवासियों के लिए शिक्षा बहुत जरूरी है, जिससे वे अपने अधिकार जान सकें और वर्तमान समय में देश के विकास में भागीदार बनें। यह बात जनजातीय शोध एवं विकास संस्थान (वाराणसी) में आयोजित आदिवासी संगोष्ठी में राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (भारत सरकार) की उपाध्यक्ष एवं संगोष्ठी की मुख्य अतिथि अनुसूइया उइके ने कही

गोंडवाना के शासनकाल में सोने की चिड़िया था भारत : पांग्ती

जनजातीय शोध एवं विकास संस्थान (वाराणसी) में 08 फरवरी 2019 को “आदिवासी समाज का संवैधानिक अस्तित्व संकट! वर्तमान समय” विषय पर एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी का उद्घाटन राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (भारत सरकार) की उपाध्यक्ष एवं संगोष्ठी की मुख्य अतिथि अनुसूइया उइके ने आदिवासी वीरांगना महारानी दुर्गावती जी के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन कर किया। उद्घाटन सत्र में उनके साथ भेल हर्प तरना (वाराणसी) के उप महाप्रबंधक हिरा सिंह पांग्ती और संयुक्त सचिव राजेश्वर ने भी सहभागिता की। उद्घाटन से पूर्व अनुसूइया उइके ने जनजातीय शोध एवं विकास संस्थान का भ्रमण किया।

श्रोताओं को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि उइके ने कहा कि आदिवासियों के उत्थान के लिए जनजातीय शोध एवं विकास संस्थान वाराणसी के कार्यों का आदिवासी समाज को मजबूती प्रदान करने में अतुलनीय योगदान हैं। आदिवासी समाज को एक करने के साथ उनका संपूर्ण विकास करने का कार्य संस्थान के अध्यक्ष डॉ. बनवारी लाल गोंड के मार्गदर्शन में किया जा रहा है, जो बहुत सराहनीय है। इससे विगत चार वर्षों से सभ्यता, संस्कृति, शिक्षा, इतिहास, धर्म, परम्परा, आर्थिक प्रगति के क्षेत्र में आदिवासी समाज को संरक्षण के साथ-साथ मजबूती मिली है। इसके लिए संस्थान के सभी पदाधिकारी धन्यवाद के पात्र हैं। उन्होंने कहा कि आदिवासियों के लिए शिक्षा बहुत जरूरी है, जिससे वे अपने अधिकार जान सकें और वर्तमान समय में देश के विकास में भागीदार बनें।

जनजातीय शोध एवं विकास संस्थान (वाराणसी) के विद्यार्थियों से वार्तालाप करतीं अनुसूइया उइके

क्योंकि आदिवासी ही भारत के असली मूल-निवासी हैं, जो लाखों वर्षों से भारत भूमि पर रहकर यहां की प्रकृति और खनिज-संपदा को बचाए रखे हैं, जिनमें तात्याभील, बिरसा मुण्डा, मात्रशक्ति महारानी दुर्गावती, तिलका माझी, गुण्डाधुर, राजाशंकर शाह एवं रघुनाथ शाह आदि अनेक आदिवासी महापुरुषों को भारत की आजादी की लड़ाई में अपनी जान तक गंवानी पड़ी, लेकिन आज उन्हें लोग भूल रहें हैं। इसको जनजातीय शोध एवं विकास संस्थान बचाने का कार्य कर रहा है, साथ ही लोगों को जगाने व आदिवासी समाज के विकास के लिए सरकार के द्वारा चलाई जा रही योजनाओं को संचालित करने में विशेष योगदान दे रहा है। इसमें जनपद वाराणसी के साथ ही पूर्वांचल के सोनभद्र, मीरजापुर, चंदौली, गाजीपुर, लखीमपुर खीरी तथा अन्य अनेक जनपदों में निवासरत गोंड, पनीका, धसीया, खरवार, चेरों थारू, अगरीया बैगा आदि जनजातियां लाभान्वित हो रही हैं।

कलात्मक प्रस्तुति देते आदिवासी कलाकार

उन्होंने कहा कि अनुसूचित जनजाति आयोग जनजातीय समाज की समस्याओं के समाधान के लिए देश के हर कोने में कार्य कर रहा हैं। चाहें भारत के किसी भी कोने का आदिवासी नागरिक हो, यदि उसके साथ कोई भी उत्पीड़न हो रहा है, तो आयोग उनकी रक्षा हेतु सदैव कार्य करता रहेगा।

मंच पर उपस्थिति मुख्य अतिथि व अन्य सम्मानित जन

कार्यक्रम के विशिष्ठ अतिथि हिरा सिंह पांग्ती ने अपने उद्बोधन में कहा कि संस्थान का कार्य सराहनीय है, जो वर्तमान में समाज के हित में है। आदिवासी समाज के पास अनेक पारम्परिक, व्यावसायिक कलाएं एवं संस्कृति है। इसलिए आदिवासी हजारों साल से उन्हें बचाकर अपनी सभ्यता, संस्कृति के साथ ही राष्ट्र निर्माण में भागीदार बन रहे हैं। एक समय था जब आदिवासी समाज के राजा-महाराजा हुआ करते थे और इनके शासनकाल में सोने के सिक्के चलते थे, जो गोंडवाना का शासन काल था और भारत को सोने का चिड़िया कहा जाता था। लेकिन आदिवासी समाज में अशिक्षा के कारण आदिवासी समाज पीछे होता चला गया। इससे उबरने के लिए अब हम तकनीकी शिक्षा, व्यावसायिक शिक्षा व शोध के माध्यम से आगे बढ़ सकते हैं। कार्यक्रम में अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन संस्थान की संरक्षक प्रोफेसर पुष्पा अग्रवाल (हिन्दी विभाग बीएचयू) ने प्रेषित किया। संगोष्ठी का संचालन संस्थान सचिव बृजभान मरावी ने किया। कार्यक्रम में राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (भारत सरकार) के संयुक्त सचिव राजेश्वर, समाज कल्याण विभाग (वाराणसी) के अधीक्षक डॉ. रूपेश चौधरी, गौरव मिश्रा, विनोद शाह मरावी, राकेश शाह मरावी, विनोद कुमार, गब्बर गोंड, बेबी शाह गोंड, राजमनी देवी, प्रियंका गोंड, श्रेया गोंड, रानी देवी तथा अन्य सैकड़ों लोग उपस्थित थे।

(कॉपी संपादन – प्रेम)


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