जब एक आईएएस दूसरे आईएएस को नहीं चुन सकता फिर जज क्यों? परिचर्चा में उठे सवाल

बीते 3 मार्च को कंस्टीच्यूशन क्लब में आयोजित परिचर्चा में कोलेजियम सिस्टर पर सवाल उठाया गया। वक्ताओं ने कहा कि जब एक आईएएस दूसरे आईएएस को नहीं चुनते फिर जज आपस में मिलकर दूसरे जज को कैसे चुन सकते हैं?

“जहां खुद पारदर्शिता नहीं है, वहां हम न्याय की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं। लोकतंत्र के दो स्तंभ विधान पालिका और कार्यपालिका में आरक्षण है तो न्यायपालिका में क्यों नहीं। क्या हमारे आपके पैसों से उन जजों को वेतन, बंगला गाड़ी नहीं मिलती। जब एक आईएएस दूसरे आईएएस को नहीं चुन सकता, जब एक सांसद विधायक दूसरे सांसद विधायक को नहीं चुन सकता तो एक जज दूसरे जज को कैसे चुन लेता है। यह बेईमानी है।” ये बातें राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के पूर्व सदस्य विजय चौधरी ने कही। वे 3 मार्च 2019 को फोरम फॉर ऑल इंडिया जुडिशियल सर्विसेज और बार एसोसिएशन ऑफ ऑल कोर्ट्स ऑफ इंडिया के संयुक्त तत्वावधान में दिल्ली के कंस्टीच्यूशन क्लब में आयोजित परिचर्चा को संबोधित कर रहे थे।

उन्होंने कहा कि चार जज बैठकर किसी के रिश्तेदार को जज चुन लेते हैं। कोलेजियम सिस्टम में बैठे जजों का गिरोह है। उस गिरोह पर हमला करना ज़रूरी है। हमारा पूरा ध्यान कोलेजियम सिस्टम पर होना चाहिए। नहीं तो हम मुद्दे से भटक जाएंगे। कोलेजियम सिस्टम को खत्म किए बिना हमारे लोग न्यायपालिका में नहीं आ सकते।

‘उच्च न्यायतंत्र में आरक्षण’ और ‘न्यायिक भर्ती और पारदर्शिता’ विषय परिचर्चा में भाग लेते हुए सेवानिवृत्त जिला सत्र न्यायाधीश एम.सी. मेहरा ने कहा कि सामान्यतः यह बात कही जाती है कि दलित-बहुजन सक्षम नहीं होते। आजादी के बाद भी यह बात आई थी कि सिविल सेवा के आधार पर गर प्रावधान कर देंगे तो इसमें निपुण लोग नहीं आ पाएंगे। लेकिन इनके लिए एक अलग प्रावधान किया गया। आज हमारे यहां कई लोग बहुत निपुण हैं पर उनकी प्रैक्टिस ठीक नहीं चल पा रही है। उनको क्लाइंट नहीं मिल पाते क्योंकि वहां डायस पर उनका कोई जज नहीं बैठा है। डायस उस पर काम करने वाले को सक्षम बना देती है। कुर्सी काम करना सिखा देती है।

परिचर्चा को संबोधित करते वक्ता

सामाजिक कार्यकर्ता बुद्धशरण हंस ने इस मौके पर कहा कि आज अनुच्छेद 14, 15,16, 21 की गलत व्याख्या के लिए वकील लाखों, करोड़ों रुपए लेते हैं। इनमें हमारे समाज के वकील भी शामिल हैं। वे आंबेडकर और संविधान के प्रति वफादार नहीं हैं। आंबेडकर ने कहा था कि आरक्षण की मांग सिर्फ सामाजिक न्याय नहीं हैं। ये मानवीय गरिमा पर पुनः दावा करना है। केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य केस में 1966 तथा  नरेंद्र बनाम महाराष्ट्र स्टेट केस 1996 में आये जस्टिस मुखर्जी के फैसले से यह साबित होता है कि न्यायतंत्र भी स्टेट के अंतर्गत आता है।


उद्घाटन सत्र में बोलते हुए पूर्व पत्रकार व समाजवादी सोशल एक्टिविस्ट दिलीप मंडल ने कहा कि अब जज न्यायपालिका के भीतर के भ्रष्टाचार पर बात करने लगे हैं। सर्वोच्च न्यायालय के चार जजों ने प्रेस कान्फ्रेंस करके इस मुद्दे को उठाया। इससे पहले जस्टिस कर्णन ने इस मुद्दे को उठाया था। न्यायपालिका ने संविधान की सारी प्रक्रिया को फेल कर दिया है। जो उन्हें करना था वो उन्होंने किया नहीं। आज लोगों को भी पता है कि किस जज के पास कौन सा केस जाएगा तो क्या फैसला आएगा। वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने ट्वीट किया कि सवर्ण जजों ने मिलकर एससी-एसटी के खिलाफ़ एक फैसला लिया है। इस पर बहुत बवाल हुआ।  

हरियाणा अर्बन डेवलपमेंट ऑथोरिटी के चीफ एडमिनिस्ट्रेटर डी. सुरेश ने कहा कि आज मेरिट के नाम पर सब किया जा रहा है। मेरिट एक पक्षपाती और गलत अवधारणा है इसका दुरुपयोग किया जा रहा है। न्यायपालिका में आरक्षण की मांग हम 50 वर्षों से कर रहे हैं। लेकिन 4-5 लोग मिलकर ये डिसाइड कर लेते हैं कि कौन जज बनेगा। ये संविधान और लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ है। जस्टिस चेलमेश्वर ने भी कहा था कि न्यापालिका में सबकुछ अपारदर्शी है। कोलिजियम व्यवस्था पर्देदारी की व्यवस्था है।

परिचर्चा में रवि वर्मा और सुरेंद्र सिंह ने भी अपनी बातें रखीं। परिचर्चा का संचालन लेनिन विनोबर और नितिन मेश्राम ने किया।

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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