घोषणा पत्र : अबकी बार पिछड़े-दलितों का नाम लेने से भाजपा ने रखा परहेज

भाजपा का कहना है कि पार्टी देश में जातिवाद नहीं फैलाना चाहती है, इसलिए उसने घोषणापत्र में दलित-पिछडे-आदिवासियों का उल्लेख कम से कम किया है। क्या उसकी यह दलील सच्ची है?

वर्ष 2014 में भारतीय जनता पार्टी के घोषणा पत्र और इस बार के घोषणा पत्र में वैसे तो अनेकानेक समानताएं हैं। परंतु, इस बार खास बात यह है कि भाजपा के घोषणा पत्र में दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों को बहुत कम जगह मिली है।

ऐसा वर्ष 2014 में नहीं था। वर्ष 2014 में भाजपा द्वारा जारी घोषणा पत्र को यहां क्लिक कर पढ़ें

आखिर ऐसा क्यों हुआ है कि भाजपा ने इस बार दलितों, आदिवासियाें और ओबीसी की उपेक्षा की है।

उपेक्षा का अनुमान इसी मात्र से लगाया जा सकता है कि इस बार जारी संकल्प पत्र (भाजपा ने अपने घोषणा पत्र को संकल्प पत्र की संज्ञा दी है) में 75 संकल्पों का उल्लेख किया गया है और इनमें से केवल एक संकल्प आदिवासियों से जुड़ा है। दलितों और ओबीसी का नाम तक नहीं लिया गया है। इस बार भाजपा द्वारा जारी घोषणा पत्र को यहां क्लिक कर पढ़ें

2014 का हाल

आइए, सबसे पहले यह देखते हैं कि पिछली बार 2014 में भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में एससी, एसटी, ओबीसी और अन्य कमजोर वर्गों के मुद्दों को किस तरह प्रमुखता से शामिल किया था। हालत यह थी कि भाजपा ने तब इन वर्गों के मुद्दों लिए न केवल अलग से उपशीर्षक का प्रावधान किया था बल्कि कई वादे भी किए थे।

इन वादों में सामाजिक न्याय और सामाजिक समरसता बनाने का वादा शामिल था। तब कहा गया था कि यदि भाजपा की सरकार बनी तब इन वंचित तबकों को आर्थिक न्याय मिलेगा और राजनीतिक रूप से सशक्त बनाया जाएगा।

इसके अलावा यह भी कहा गया था कि सरकार में आने के बाद शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका को लेकर ऐसा माहौल बनाया जाएगा जिससे बराबर हिस्सेदारी मुकम्मिल हो सके। 2014 में भाजपा ने दलितों और आदिवासियों से वादा किया था कि वह एससी और एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम को और सुदृढ़ बनाएगी ताकि उनकी रक्षा हो सके। सभी स्तरों पर अछूत प्रथा खत्म करने का वादा भी तब भाजपा द्वारा किया गया था।

इतना ही नहीं, हाथ से मल उठाने की प्रथा के खिलाफ भाजपा ने पहल करने का वादा किया था। अन्य वादों में राष्ट्रीय स्तर पर दलितों के लिए कल्याण कार्यक्रम चलाने और आदिवासियों की कला,संस्कृति  और भाषाओं के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय स्तर पर संस्था शुरू करने की बात भी तब भाजपा द्वारा जारी घोषणा पत्र में कही गयी थी।

इस बार बहुजनों से किनारा

भाजपा ने इस बार अपने घोषणा पत्र में प्रायः इन सब मुद्दों से दूरी बनाई है। इस बार के घोषणा पत्र में भाजपा ने जो  ‘75 संकल्प’ व्यक्त किए गए हैं, उनको कृषि, युवा एवं शिक्षा, बुनियादी ढांचा, रेलवे, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था सुशासन, समावेशी विकास, महिलाएं और सांस्कृतिक धरोहर उपशीर्षकों से वर्गीकृत किया है। इनमें से केवल   एक जगह ‘समावेशी विकास’ उपशीर्षक ‘संकल्प’ में कहा गया है कि यदि भाजपा सत्ता में आयी तब छह आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालयों के निर्माण को पूरा किया जाएगा।

इस बार घोषणा पत्र में भाजपा ने आरक्षण शब्द से भी परहेज किया है। न तो न्यायपालिका में आरक्षण देने की बात कही गयी है और न ही निजी क्षेत्र में आरक्षण को लेकर कोई संकल्प व्यक्त किया गया है। अलबत्ता महिलाएं उपशीर्षक के तहत दो संकल्पों का उल्लेख है। इनमें महिला कार्यबल भागीदारी बढ़ाने की दिशा में  काम तथा दूसरा तीन तलाक के विरूद्ध कानून बनाकर मुस्लिम महिलाओं के लिए न्याय सुनिश्चित करने का संकल्प शामिल है। महिलाओं को संसद में 33 फीसदी आरक्षण देने को लेकर भी भाजपा ने कोई संकल्प नहीं व्यक्त किया है।

नई दिल्ली में घोषणा पत्र जारी करने के बाद उसका अवलोकन करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व बगल में अमित शाह

अपने 50 पन्नों के संकल्प पत्र में भाजपा ने अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा वर्ग आदि शब्दों का सिर्फ एक बार उपयोग किया है। पृष्ठ संख्या 40 पर कहा गया है कि ‘भाजपा अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा वर्ग के सभी लोगों को संवैधानिक प्रावधानों के तहत उपलब्ध हर लाभ प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है’।

पार्टी ने संकल्प पत्र में उच्च शिक्षा में विभागवार के बदले विश्वविद्यालयवार रोस्टर को लेकर कोई वादा नहीं किया है। साथ ही जातिगत जनगणना का भी कोई जिक्र नहीं है।

हम जातिवाद नहीं फैलाना चाहते : विजय सोनकर शास्त्री

इस संबंध में पूछे जाने पर भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता विजय सोनकर शास्त्री ने फारवर्ड प्रेस को दूरभाष पर कहा कि “भाजपा देश में जातिवाद नहीं फैलाना चाहती है। इसलिए संकल्प पत्र में जातिवार बातें नहीं कही गयी हैं। एक समरस समाज और समतामूलक समाज ही भाजपा की विचारधारा का मुख्य तत्व है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नए भारत की अवधारणा में सबका साथ-सबका विकास मूल बिंदू हैं।”

भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता विजय सोनकर शास्त्री

यह पूछने पर कि क्या भाजपा के लिए अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा वर्ग के मुद्दे क्या महत्वपूर्ण नहीं हैं, शास्त्री ने कहा कि “जब हम युवाओं को रोजगार देने की बात कर रहे हैं तो क्या इनमें दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के युवा शामिल नहीं हैं। पिछले पांच वर्षों में 8 करोड़ से अधिक घरों में शौचालय बने। इनमें आधे से अधिक तो दलितों के घरों में ही बने होंगे। इसी प्रकार मुद्रा योजना से जिन उद्यमियों को लाभ मिला, उनमें से आधे से अधिक दलित ही रहे।”

शास्त्री ने कहा कि “बड़ी मुश्किल से भारत की राजनीति जाति, पंथ और धर्म को पीछे छोड़ विकास के सवाल पर हो रही है। इसका श्रेय माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विकासपरक सोच को जाता है। विकास आज मुख्य डिस्कोर्स बन गया है।”

बहरहाल, सवाल यह है  अगर ‘विकास’ मुख्य डिस्कोर्स बन चुका है तो भाजपा के नेतागण  अतिपिछड़ी और अतिदलित जातियों के वोटों की गोलबंदी करने में क्यों जुटे हैं? अगर उनके वोटों की उन्हें जरूरत है, तो फिर घोषणा पत्र में उनके लिए अलग कोई संकल्प न होने के पीछे क्या कारण है? उत्तर शायद किसी से छिपा नहीं है।

(कॉपी संपादन : प्रमोद)


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