पूर्वोत्तर वृतांत : लोहित नदी के तीरे-तीरे

अरुणाचल प्रदेश के सबसे पूर्वी गाँव डोंग से लोहित नदी चीन से भारत में प्रवेश करती है। नदी के चीनी हिस्से पर कई बाँध बन चुके हैं और दोनों देश के बीच समझौता ज्ञापन के बावजूद पानी के रोकने या छोड़े जाने की कोई जानकारी चीन नहीं देता

बस्ती बस्ती परबत परबत 

(भारत के पूर्वोत्तर में स्थित राज्य मूल रूप से आदिवासी-प्रदेश हैं, जो भारतीय राजनीति और शासन-व्यवस्था के नक्शे पर उपेक्षित और वंचित हैं। फुले-आम्बेडकरवादी आंदोलनों को समावेशी बनाने के लिए यह आवश्यक है कि हम विभिन्न प्रकार की वंचनाओं की शिकार समुदायों/समाजों को गहराई से समझें और उनके साथ एका बनाने की कोशिश करें। फारवर्ड प्रेस की यह पहल इसी दिशा में है। इसके तहत हम हिंदी के चर्चित लेखक जितेंद्र भाटिया के पूर्वोत्तर यात्रा वृत्तांत की यह शृंखला प्रस्तुत कर रहे हैं। श्री भाटिया ने इन यात्राओं की शुरूआत  वर्ष 2014 में की थी, जो अभी तक जारी हैं। वे पूर्वोत्तर राज्यों की यात्राएं कर रहे हैं और वहां की विशेषताओं, विडंबनाओं व समस्याओं को हमारे सामने रख रहे हैं – प्रबंध संपादक, फारवर्ड प्रेस)


अरूणाचल प्रदेश : जहां बिखेरता है सूरज अपनी पहली किरण

सुदूर अरुणाचल में लोहित नदी पर स्थित अरुणाचल प्रदेश का सबसे पूर्वी गाँव डोंग है। यहाँ से लोहित नदी चीन से भारत में प्रवेश करती है। नदी के चीनी हिस्से पर कई बाँध बन चुके हैं और दोनों देश के बीच समझौता ज्ञापन के बावजूद पानी के रोकने या छोड़े जाने की कोई जानकारी चीन नहीं देता, जिसके चलते लोहित का पानी कब सूख जाएगा और कब चीन अचानक बहुत सा पानी छोड़कर हमारे यहाँ बाढ़ की स्थिति पैदा कर देगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। इस स्थिति से निबटने के लिए सरकार ने पानी अधिकारी बूढ़े दास बाबू को वहां चौबीसों घंटे पानी का तल मापने वाले यंत्रों के साथ ड्यूटी पर बैठा रक्खा है, जहाँ वे घंटे दर घंटे पानी का तल मापकर ये आंकड़े तिनसुकिया के बड़े दफ्तर भेजते हैं।

हम वोलोंग गाँव से जीप में सूरज के ढलने के आसपास वहां पहुंचे थे और अँधेरा घिर चुकने के बाद अब रात वहीँ गुज़ारने के सिवा कोई चारा हमारे पास नहीं रह गया था। दास बाबू शर्मिंदा थे कि उनके पास हमें देने के लिए बिस्तर तक नहीं था। इलाके के सहृदय फ़ौज वालों की मदद से हमें नज़दीक के मिलिट्री डिपो से ‘स्लीपिंग बैग’ उधार पर मिले तो  दास बाबू ने एक बंद कोठरी खोलकर हमारे लिए खुद ताज़ा दाल-चावल बनाए। फिर वे पानी के माप की सरकारी बहियों के बीच हमें देर रात तक अपने एकाकी जीवन की कहानियां सुनाते रहे थे।

अलस्सुबह चलने से पहले हमने नदी के खूबसूरत तट को देखा था तो दास बाबू ने मुस्कराकर कहा था कि इन्हें कैद कर लीजिये, ये देश पर गिरने वाली सूरज की पहली किरणें हैं। यहीं से कुछ आगे मशाई के पास सीमा सड़क संस्थान का बोर्ड लगा था—भारत की सबसे पूर्वी सड़क!

भारत की सबसे पूर्वी सड़क

जिस तरह ब्रह्मपुत्र असम को उत्तरी और दक्षिणी हिस्सों में काटती है, कुछ उसी तरह लोहित पूर्वी अरुणांचल प्रदेश को दो भागों में विभक्त करती है। लोहित नदी के सुदूर तटों के अलावा भी उत्तराँचल प्रदेश काफी बड़ा है और इसके पश्चिमी इलाकों को छानने का हमारा सफ़र अभी बाकी है। चीन एक अरसे से इस सारे प्रदेश को अपना बताता रहा है और इस संघर्ष के चलते पूरे प्रदेश में सेना की भारी मौजूदगी है। यह मौजूदगी चीन की सीमा से सटे इलाकों में तो  पागलपन की हदों तक पहुँच जाती है।

डोंग तक की हमारी यात्रा पूर्व नियोजित नहीं थी और हम पहले वोलोंग से ही वापस लौट जाने वाले थे। कुछ दुर्लभ पक्षियों की तलाश हमें यहाँ तक खींच लायी थी और अब वहां से लौटते समय हमारे पास खाने के लिए कुछ भी शेष नहीं बचा था। उत्तर पूर्वी इलाकों में कम से कम ‘मैगी’ या ‘वाई वाई’ के नूडल छोटे से छोटे ढाबे या खोखे पर भी मिल जाते हैं और इसीलिये हम भोजन को लेकर ज्यादा चिंतित नहीं थे। लेकिन जब सामने वाले हिस्से में दुकान चलाने वाले तीन चार घरों में चीनी चेहरे वाले बाशिंदों और औरतों ने शिद्दत से सिर हिलाकर हमें चले जाने को कहा तो आश्चर्य होना स्वाभाविक था। बाद में पता चला कि वहां अजनबी चेहरों को (जो चीन के जासूस भी हो सकते थे) भोजन खिलाना फ़ौज वालों से दुश्मनी मोल लेने के बराबर था और यह खतरा कोई भी नहीं उठाना चाहता था।

 

अरूणाचल प्रदेश की मुख्य नदी लोहित नदी के पास पहाड़ पर लगा एक साइन बोर्ड

 हमने सुबह से कुछ नहीं खाया था। जब भूख बर्दाश्त के बाहर हो गयी तो एक फौजी डिपो के बाहर खड़े बंदूकधारी सिपाही से हमने खाने के लिए कोई जगह पूछने का इरादा बनाया। वह सिपाही कुछ भी कहने की जगह हमें वहीं छोड़ भीतर चला गया।  मिनटों के बाद वापस लौटने पर उसने जीप को वहीं छोड़ हमें भीतर कमांडेंट से मिलने को कहा। कमांडेंट जौनपुर का एक बाशिंदा था जिसका हाल ही में वहाँ तबादला हुआ था। उसने हमें बताया कि कहीं बाहर भोजन ढूंढना बेकार है क्योंकि यहाँ लोग फ़ौज वालों से बहत डरते हैं। किस्सा कोतहा यह कि कमांडेंट ने डिपो के तीन चार अन्य साथियों के साथ हमें न सिर्फ लंच रूम में रविवार के दिन पकने वाला विशेष भोजन खिलाया, बल्कि एक-डेढ़ घंटे तक भोजन के साथ जौनपुर, इलाहाबाद और जयपुर के कई व्यक्तिगत अनुभव भी उसने हमारे साथ बांटे। लेकिन भोजन कक्ष में ले चलने से पहले कमांडेंट ने हमें सख्त ताकीद दी थी कि हममें से कोई भी यह नहीं पूछेगा कि वे वहां क्या काम करते हैं क्योंकि इसके बारे में कुछ भी बोलने की उन्हें इजाज़त नहीं है। फ़ौज की इस जवाबदेही के साथ साथ उसके अत्यंत मानवीय पक्ष को जानना सचमुच सुखद था। भोजन के बाद वे सब हमें बाहर जीप तक छोड़ने के लिए आए और जीप के चल चुकने के बाद भी देर तक उनके हाथ हवा में हिलते रहे।

 

बाहर से उत्तर पूर्व आने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए वहां के जीवन में ब्रह्मपुत्र के महत्वपूर्ण स्थान को समझना बहुत मुश्किल नहीं है। इसका प्रवाह एक तरह से सड़कों के जाल को निर्धारित करता है। यह नदी एक तरह से पूरे प्रदेश की प्राण शक्ति है।

हमारे यहाँ नदियों के नाम पारम्परिक रूप से स्त्रीलिंग होते हैं लेकिन एशिया की सबसे बड़ी नदियों में से एक ब्रह्मपुत्र इसका एकमात्र अपवाद है। असमिया भाषा में इसे पुरुषवाचक ‘ब्रह्मपुत्र नद’ कहा जाता है और असम के बोडो आदिवासी इसे अपने पारंपरिक नाम बुर्लुंग बुथुर से जानते हैं। कई नामों वाली ब्रह्मपुत्र एक तरह से उत्तर पूर्व भारत और बांग्लादेश की तमाम नदियों को अपने भीतर समेटे हुए है।

तिब्बत के आंग्सी ग्लेशियर से निकलने वाली चीनी नदी यारलुंग त्सांगपो जब भारत के अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है तो इसका नाम बदलकर सियांग हो जाता है और इससे कुछ आगे मैदानों में उतरने पर यह दिहांग हो जाती है। यहाँ से कुछ फासले पर जब दिबांग और लोहित नदियाँ इसमें मिलती हैं तो इसे अपना नया शक्तिशाली नाम ब्रह्मपुत्र मिलता है। असम में अपने प्रवाह के दौरान पहाड़ों की अनेकानेक तूफानी नदियाँ कामेंग, भरेली, मानस, चम्पावती, बूढ़ी दिहिंग, दिसांग, दिखू आदि इसमें आ मिलती हैं। असम में कहीं कहीं तो इसका पाट बरसातों में 8 किलोमीटर तक चौड़ा हो जाता है। हर साल तटों की दिशा बदलता ब्रह्मपुत्र का उद्दंड चौड़ा पाट बाढ़ का एक बड़ा कारण बनता है। इसी ब्रह्मपुत्र पर देश का सबसे लम्बा 9 किलोमीटर का पुल हाल ही में  बनकर तैयार हुआ है। और इसी के भीतर दुनिया का सबसे बड़ा नदी द्वीप मजुली फैला है जो अब एक पूरा जिला है। किसी समय इसका क्षेत्रफल 1250 वर्ग किलोमीटर था जो अब नदी के भूस्खलन से घटकर 350 वर्ग किलोमीटर रह गया है।

बांग्लादेश में ब्रह्मपुत्र में तीस्ता आ मिलती है और इससे आगे नदी दो शाखाओं में बाँट जाती है—पूर्वी शाखा यमुना (बांग्लादेश) जिसमें ढाका के नज़दीक मेघना का संगम होता है; और पश्चिमी शाखा जिसमें दक्षिणी गंगा आ मिलती है और तब नदी का नाम पद्मा हो जाता है। कुछ और दक्षिण पहुँचने पर ये दोनों शाखाएं फिर मिल जाती हैं और अपने अंतिम रूप में मेघना नाम से यह नदी बंगाल की खाड़ी में समा जाती है। पश्चिम में कोलकाता की हुगली नदी से पूर्व में मेघना नदी तक फैला गंगा-ब्रह्मपुत्र का नदीमुख (डेल्टा) सुंदरबन दुनिया में सबसे बड़ा और कदाचित दुनिया का सबसे उपजाऊ प्रदेश है।

लोहित नदी का मनोरम दृश्य

ब्रह्मपुत्र और इसकी सहायक नदियों ने इस समूचे प्रदेश को सांस लेने वाले यादगार घने जंगल दिए हैं जिनके भीतर धूप शायद ही कभी ज़मीन तक पहुँच पाती होगी। जल, आर्द्रता और धूप की ऊष्मा पता नहीं कितनी सदियों से इन  जीवित जंगलों में विलक्षण पेड़ों, जीवों, पक्षियों, साँपों, तितलियों और कीड़े-मकोड़ों को एक प्राकृतिक कवच देती रही है। इस शामियाने तले मनुष्य का प्रवेश इन जंगलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। प्रकृति जिस विरासत को सदियों से बरकरार रक्खे हुए है, उसी को कुछ ही वर्षों में पूरी तरह नष्ट करने की काबिलियत इंसान के पास है। उसके बांधों ने प्रकृति की दिशा को बदल दिया है और खेती के निरंतर दबाव में  बहुत से जंगल कई मीलों तक छंटनी और जलाए जाने के बाद मृत ठूंठों के कब्रिस्तानों में बदल गए हैं। विडम्बना यह है कि इस विनाश को हम विकास की संज्ञा देकर लगातार जायज़ ठहराने की कवायद में जुटे रहते हैं।

गाजोलडोबा के किनारे पर सुनी उस पुरअसरार बाउल की धुन में  शरीर और इसके इर्दगिर्द सब जगह व्याप्त प्रकृति से सामंजस्य स्थापित करने का ‘सहजिया’ पंथ निहित था। हम सोचते रहे कि क्या कोई सूरत ऐसी भी हो सकती है कि किसी चमत्कारी अलौकिक क्षण में इंसान की समूची भूमिका प्रकृति की इस हरी चादर, इसकी प्राणदायी नदियों को नष्ट करने वाले खलनायक से बदलकर इसकी रक्षा करने वाले ‘टोहोल’ पर निकले किसी चिरंतन बाउल गायक सी सहज और पूरक बन जाए?  लेकिन सवाल है कि तब हमारे तथाकथित विकास और उससे जुड़ी हमारी महत्वाकांक्षा, हमारी राजनीति, हमारी अधिग्रहण की अनंत भूख का क्या होगा?

भूटान और भारत की सीमा रेखा पर बहने वाली मानस नदी के दोनों ओर फैला, दुनिया के सबसे खूबसूरत जंगलों में से एक– मानस अभयारण्य, हमें इस सवाल का जवाब देता है। भयानक क्षरण के बाद इस जंगल की रक्षा की जिम्मेदारी उन्हीं स्थानीय आदिवासियों और बोडो प्रतिनिधियों को सौंप दी गयी थी जिन्होंने कुछ वर्ष पहले इसे तहस-नहस किया था, और सत्ता स्थानान्तरण का यह प्रयोग काफी हद तक सफल रहा था। इन्हीं प्रयासों के कारण आज भी इसके गगनचुम्बी पेड़ों की ऊंची डालों पर एक पेड़ से दूसरे पर आश्चर्यजनक छलांगें लगाते हूलोक बंदरों और बेहद बड़े आकार की मलेशियन गिलहरी के रोमांचकारी करतब देखे जा सकते हैं।  हाथियों के झुण्ड यहाँ निर्भीक घूमते हैं और मानस नदी का नीला पानी उसी तरह इसके तट की सुनहरी रेत को दुलारता बहता चला जाता है।

यह कायापलट कैसे हो पाया? मानस के रहस्यमय जंगलों से जो किम्वदंतियां और लोककथाएं जुड़ी हैं उनमें स्थानीय लोगों का गहरा विश्वास है। यह विश्वास उन्हें एक धरातल पर जंगल को बचाने की प्रेरणा और प्राणशक्ति भी देता है। इनमें सबसे व्यापक और प्रचलित कथा ‘मानस की बेटी’ की है जो जंगल की रक्षक है। लोगों के अनुसार यह श्वेत परिधान वाली एक स्त्री है जिसे सचमुच देखने का दावा कई लोग कर चुके हैं। उनका कहना है कि यह देवी हमेशा जंगली हाथियों के झुण्ड के साथ रहती है और वे हाथी किसी बच्चे के तरह उसे अपनी माता समझकर उसके पीछे चलते और उसका हर कहा मानते हैं। कुछ का कहना है कि ये जंगल उसी मानस देवी ने बनाए हैं और वही उनकी संरक्षक है। ये लोग यहाँ जंगल के जानवरों या इसके वृक्षों को मारने या नष्ट करने वालों पर आयी भयानक विपदाओं और दुष्परिणामों का ज़िक्र भी करते हैं। कुछ अन्य धार्मिक लोग उसे शिव की पुत्री साँपों की देवी मनसा से जोड़ते हैं। साठ के दशक में हाथियों को पालतू बनाने वाले ट्रेनर कुमुद कुमार चौधुरी कहते हैं कि सफ़ेद परिधान वाली वह स्त्री सचमुच थी और एक बार उन्होंने उसे बहुत नज़दीक से देखा था, वह मनुष्यों की भाषा नहीं समझती थी और उन्होंने जब उसे भोजन देने की कोशिश की थी तो उसने इनकार कर दिया था। मानस की वह देवी सचमुच थी या नहीं, यह सवाल दीगर है। बल्कि यह सवाल लातिन अमेरिका साहित्य के जादुई यथार्थ की याद दिलाता है जहाँ एक किंवदंती वास्तविक यथार्थ को एक ऐसे जादुई यथार्थ से जोड़ती है जो है नहीं, पर जिसे अवश्यम्भावी तौर पर ‘होना चाहिए’!  इन अर्थों में श्वेत परिधान वाली उस वन देवी का अस्तित्व उस शाश्वत कामना से जुड़ा है कि जंगल हर हाल में बचाए ही जाने चाहिए। मार्क्वेज़ कहते हैं कि उनकी दादी अपनी हर जादुई कहानी इस विश्वास के साथ सुनाती थी कि उन्हें स्वयं उन कथाओं पर यकीन होने लगता था। कुछ इसी तरह यदि सब लोग मानस की उस देवी के अस्तित्व में यकीन करने लगें तो निस्संदेह ये नदियाँ, ये जंगल और ये पेड़ हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए सचमुच बचे रह जाएंगे!

(यह यात्रा संस्मरण सबसे पहले हिंदी साहित्यिक अनियतकालीन ‘पहल’ में प्रकाशित हुआ था)

(कॉपी संपादन : नवल)

(आलेख परिवर्द्धित : 27 अप्रैल 2019, 1:55 PM)


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