नुपी लेन : मणिपुर के महिला-संघर्ष की अनूठी दास्तान

इस लेख में ओमप्रकाश कश्यप बता रहे हैं कि पूर्वोत्तर के राज्य मणिपुर में महिलाओं के दो आंदोलन हुए। इनमें से एक तो अपने ही राजा के खिलाफ और दूसरा आंदोलन अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ। ये दोनों आंदोलन कोई जागीर या रियासत बचाने के लिए नहीं, बल्कि राज्य सत्ता द्वारा उत्पीड़न के खिलाफ सामूहिक संघर्ष थे

आज की राज बीत चुकी है

एक दिन और गुजर गया

स्त्रियो! अपने बाल बांध लो

वे अराजक होकर उड़ रहे हैं

क्या तुम भूल गईं….

एक 12 दिसंबर गुजर चुका है

दूसरा 12 दिसंबर आने को है

भूल जाओ कि बालों को बांधना जरूरी है

भूल जाओ कि यह दिन दुबारा लौटकर आएगा

स्त्रियों! अपने बाल बांध लो….

—हाजिम इराबोट, मणिपुरी जननेता और लोककवि

भारत विविध संस्कृतियों और मान्यताओं वाला विशाल देश है। अपने आप में लंबा इतिहास समेटे हुए। मगर जब भी देश के इतिहास और संस्कृति की बात होती है, आमतौर पर सारा विमर्श उत्तर, उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत तक सिमटकर रह जाता है। ज्यादा से ज्यादा सुदूर दक्षिण को शामिल कर लिया जाता है। पूर्वाेत्तर के प्रदेशों जो भारतीय भू-भाग के वैसे ही हिस्से हैं, जैसे बाकी प्रदेश—के योगदान को आमतौर पर बिसरा दिया जाता है। इसका एक कारण तो उनकी विशिष्ट जनजातीय संस्कृति है। हम प्रायः मान लेते हैं कि जनजातीय प्रभाव के कारण पूर्वाेत्तर के समाज आधुनिकताबोध से कटे हुए हैं। जबकि सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक हलचलों से यह क्षेत्र वैसा ही प्रभावित रहा है, जैसा बाकी देश। कुछ मामलों में तो यह दूसरों से विशिष्ट है। जैसे 1904 और 1939 में मणिपुर में हुए दो ‘नुपी-लेन’(महिला-युद्ध) की मिसाल पूरे देश में अन्यत्र नहीं मिलती। वे महिलाओं द्वारा अपने बल पर चलाए गए एकदम कामयाब जनांदोलन थे, जिन्होंने औपनिवेशिक भारतीय सरकार के संरक्षण में पल रही भ्रष्ट राजसत्ता को झुकने के लिए विवश कर दिया था। उनके फलस्वरूप सामाजिक सुधारों का सिलसिला आरंभ हुआ। संवैधानिक सुधारों की राह प्रशस्त हुई।

मणिपुर विरल जनसंख्या वाला प्रांत है। लगभग 22300 वर्ग किलोमीटर में फैले इस प्रांत की जनसंख्या करीब तीस लाख है। प्रदेश का 91 प्रतिशत हिस्सा पहाड़ी क्षेत्र है। पर जो बात उसे खास बनाती है, वह है—समाजार्थिक-सांस्कृतिक जीवन में महिलाओं की पुरुषों के मुकाबले ज्यादा भागीदारी। इस दृष्टि से वह देश का इकलौता प्रांत है। मणिपुर का इतिहास 2000 वर्ष पहले, 33वें ईस्वी सन से आरंभ होता है, जब वहां मैतेई प्रजाति के नोंग्दा लैरन पाखनग्बा ने शासन संभाला। मैतेई प्रजाति के कारण ही उस क्षेत्र का नाम मणिपुर हुआ। इस बीच वहां अनेक सामंती समूह पनपे। परंतु शासन-प्रशासन में मैतेई लोगों की प्रधान भूमिका बनी रही। 15वीं-16वीं शताब्दी के बीच मणिपुर में ब्राह्मणों ने प्रवेश किया। देखते ही देखते वे राजसत्ता के करीबी और उसके सबसे बड़े लाभार्थी बन गए। पूजा-पाठ और कर्मकांडों के माध्यम से उन्होंने वहां के जनजीवन पर कब्जा कर लिया। सामाजिक सरंचना में सबसे ऊपर मैतेई थे, दूसरे स्थान पर ब्राह्मण, तीसरा वर्ग आम प्रजा, मेहनतकश लोगों का था, जिनकी अहमियत वहां दासों के समान थी। उन्हें बाकी दोनों वर्गों की गुलामी करनी पड़ती थी।

इंफाल में बना एक तोरणद्वार

मणिपुर की स्वतंत्रता को झटका 1819 में उस समय लगा, जब वहां बर्मा का आक्रमण हुआ। स्वतंत्रता प्रेमी मणिपुर वासी अगले 7 वर्षों तक हमलावरों से लगातार जूझते रहे। उन्होंने अपनी स्वतंत्रता की रक्षा तो कर ली, परंतु प्रदेश का लैंगिक अनुपात गड़बड़ा गया। युद्ध में भारी संख्या में पुरुष हताहत हुए थे। इसलिए गृहस्थी चलाने की जिम्मेदारी महिलाओं के कंधों पर आ गई। स्त्रियां कढ़ाई, बुनाई जैसे हस्तशिल्पों में जुट गईं। हाट-बाजार में सामान ले जाकर बेचने लगीं। महिलाओं की सक्रियता के फलस्वरूप ‘इमा’ जैसे बाजार बने। अपने आप में अद्वितीय। ऐसे बाजार जिन्हें केवल महिलाएं चलाती हैं। मणिपुर के हस्तशिल्प ने अंग्रेज व्यापारियों को आकर्षित किया था। मारवाड़ी भी वहां पहुंचे। अंग्रेज व्यापारियों के साथ मिलकर वे स्थानीय बाजार पर छा गए।

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1891 में मणिपुर अंग्रेजों के अधिकार में आ गया। राजा से सेना और हथियार रखने के अधिकार छीन लिए गए। अंग्रेजों की ओर से राजनीतिक प्रतिनिधि, जिसे राज्याध्यक्ष का दर्जा प्राप्त था, शासनकार्य संभालने लगा। अंग्रेज राजा को शक्तिविहीन-श्रीविहीन कर चुके थे, परंतु मणिपुर के नागरिकों की स्वातंत्र्य-चेतना मरी नहीं थी। इस कारण वहां अंग्रेज प्रशासकों को अनेक प्रतिरोध का सामना करना पड़ता था। स्थानीय नागरिकों का प्रतिरोध भिन्न-भिन्न रूपों में सामने आता था। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में महिलाओं का वर्चस्व हो तो प्रतिरोध के मामले में वे भला कैसे पीछे रह सकती थीं। पहले नुपी लेन को वहां ‘महिला-युद्ध’ के रूप में देखा जाता है। लेकिन उसके मूल में दास प्रथा और नाकारा शासन-व्यवस्था थी। धर्मसत्ता और राजसत्ता ने मिलकर तरह-तरह के टैक्स जनता पर थोपे रखे थे। कर-वसूली के लिए अमानवीय बल-प्रयोग आम बात थी। उनसे वहां का सामान्य जनजीवन त्रस्त था।

पहले महिला-विद्रोह (नुपी लेन) की कहानी 15 मार्च 1904 से आरंभ हुई। कुछ विद्रोहियों ने औपनिवेशिक सरकार के राजनीतिक प्रतिनिधि तथा सुपरिटेंडेंट जे. जे. डनलप के बंगले को आग लगा दी। उस घटना के बारे में जांच-पड़ताल चल ही रही थी कि छह महीनों के भीतर 4 अगस्त को डनलप और सहायक राजनीतिक प्रतिनिधि एवं राज्याध्यक्ष आई. आर. नटाल के बंगले दुबारा आग के हवाले कर दिए गए। उससे पहले 6 जुलाई 1904 को विद्रोहियों ने राजधानी इंफाल के सबसे बड़े व्यापारिक स्थल, ख्वारमबंद बाजार में भी आग लगा दी थी। विद्रोहियों के सुराग के लिए अंग्रेज शासकों ने काफी जतन किए। आगजनी को षड्यंत्र मानते हुए डनलप ने सुराग देने के वाले को 500 रुपये का ईनाम भी घोषित किया। लेकिन कोई भी आगे नहीं आया। तिलमिलाए डनलप ने वर्षों पहले समाप्त कर दी गई बेगार प्रथा लालअप को इंफाल में दुबारा शुरू करने का ऐलान कर दिया। पाखनग्बा राजाओं के शासनकाल में आरंभ हुई ‘लालअप’ पृथा असल में कराधान प्रणाली थी। जिसमें जनता को प्रत्येक 40 दिनों में से 10 दिन बेगार ली जाती थी। इस तरह स्थानीय जनता से उसके 25 प्रतिशत श्रम-दिवस कराधान के बहाने झटक लिए जाते थे। डनलप ने घोषणा की थी कि क्षतिग्रस्त भवनों का पुनर्निर्माण के लिए स्थानीय जनता को बेगार करनी होगी।  

मनुष्य प्रकृति से आजाद होता है। जब भी उसे अपनी स्वाधीनता पर खतरा दिखाई देता है, विद्रोह की स्वाभाविक चेतना उसके भीतर उमगने लगती है। चूंकि मनुष्य का व्यवहार उसके विवेक के साथ-साथ परिस्थितियों भी प्रभावित होता है। इससे संभव है, उसकी कोई तात्कालिक प्रतिक्रिया न हो। कई बार तात्कालिक प्रतिक्रिया न होना भी अच्छा होता है। विशेषकर सामाजिक परिवर्तन की दृष्टि से। स्थायी परिवर्तन के लिए वही बदलाव कामयाब होते हैं, जो लंबे समय तक सुलगती सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना का परिणाम हों। क्योंकि इस बीच उत्पीड़ित जन, उत्पीड़क सत्ता के मनोविज्ञान को पहचानकर उसका सामना करने की रणनीति तैयार कर लेते हैं। भारतीय स्वाधीनता संग्राम ऐसे ही सत्ता विरोध का परिणाम था। जबकि 1857 का प्रथम स्वाधीनता संग्राम सैनिकों के तात्कालिक आक्रोश की परिणति होने के कारण अपेक्षित सफलता प्राप्त न कर सका था। दक्षिण में पेरियार द्वारा शुरू किए गए ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ की सफलता के मूल में भी लोगों के मन में वर्ण-व्यवस्था के प्रति शताब्दियों पुराने आक्रोश की भूमिका थी। लंबे समय की परतंत्रता के कारण मनुष्य की स्वातंत्र्य-चेतना कमजोर पड़ सकती है। कई बार वह परिस्थितियों से समझौता कर लेता है। परिणामस्वरूप पराधीनता उसे समाज और संस्कृति का सहज-स्वाभाविक हिस्सा लगने लगती है। ऐसे में यदि कोई उसे स्वतंत्रता का बोध करा दे, अथवा उसे पराधीनता के कारणों का पता चल जाए तो वह दुबारा दासता के लिए आसानी से तैयार नहीं होता।

डनलप के ऐलान के साथ के साथ ही लोगों को ‘लालअप’ पृथा की वापसी का डर सताने लगा था। जनमानस में बढ़ता आक्रोश देख पंचायत और स्थानीय मुखियाओं के एक दल ने डनलप से भेंट कर फैसला वापस लेने की अपील की। डनलप का कहना था कि स्थानीय पुलिस और चौकीदार अपनी जिम्मेदारी निभाने में नाकाम रहे हैं। उसने धमकी दी कि आदेश के विरोध को ‘राजद्रोह’ माना जाएगा। भविष्य में ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए पुलिस चौकियां बनाई जाएंगी। उनका खर्च भी स्थानीय जनता से वसूला जाएगा। इन सूचनाओं ने आग में घी डालने का काम किया।

मणिपुर की राजधानी इंफाल में नुपी लेन आंदोलन की स्मृति स्थापित प्रतिमाएं

5 अक्टूबर की सुबह को महिलाएं निकल पड़ीं। लगभग 3000 निहत्थी महिलाओं ने डनलप के आवास को घेर लिया। वे लालअप के आदेश को वापस लेने की मांग पर अड़ी थीं। आंदोलनकारियों के बढ़ते दबाव को देखते हुए डलनप को आदेश पर पुनर्विचार करने का निर्णय लेना पड़ा। स्थानीय अधिकारियों के आश्वासन पर महिलाएं वापस लौट आईं। मगर उसी दिन शाम को ख्वारमबंद बाजार में 5000 से अधिक महिलाओं की भीड़ जुट गई। वे अंग्रेज प्रशासक द्वारा दिए गए आदेश पर अमल चाहती थीं। आखिर आंदोलनकारियों की जीत हुई। लालअप आदेश को वापस ले लिया गया। यह अशिक्षित, गंवई, गरीब और साधनविहीन महिलाओं की बड़ी कामयाबी थी। इतिहास में अपने किस्म की अनूठी घटना।

दूसरा नुपी लेन

दूसरे ‘नुपी लेन’ की परिस्थितियां भिन्न थीं। मगर पहले नुपी लेन की भांति वह भी महिलाओं का स्वयं-स्फूर्त आंदोलन था। उसका दायरा पहले नुपी-लेन की अपेक्षा काफी विस्तृत था। आरंभ में आंदोलनकारी महिलाएं चावलों के बढ़ते मूल्य तथा उनके निर्यात पर पाबंदी के लिए एकजुट हुई थीं। बाद में उनका लक्ष्य बढ़ता गया। उसमें वाखई सेल, मेगा सेखई तथा मांग्बा-सेंग्बा जैसी कुरीतियों से मुक्ति की मांगें भी शामिल होती गईं। अंग्रेजों के आने के बाद ‘लालअप’ नामक बेगारी की प्रथा समाप्त हो चुकी थी। उसके स्थान पर सरकार ने नई कराधान प्रणाली लागू की थी, जिसके अनुसार खाड़ी क्षेत्र में 2 रुपये प्रति आवास तथा पहाड़ी क्षेत्र में तीन रुपये प्रति आवास का नया कर लगाया गया था। कृषि-योग्य भूमि भी कराधान के दायरे में आती थी। कर-वसूली के लिए जबरदस्ती करना आम बात थी। उसके कारण जनता में आक्रोश था। शासन प्रणाली में शिखर पर महाराजा और ब्रिटिश सरकार का प्रतिनिधि था, जो ‘दरबार’ की मदद से शासन करते थे। दरबार में अधिकांश प्रतिनिधि राजा की ओर से नियुक्त किए जाते थे। आमतौर पर वे उसके सगे-संबंधी होते थे। बड़े व्यापार पर मारवाड़ियों का कब्जा था। सबने मिलकर आम जनता पर तरह-तरह के कर लादे हुए थे।

1939 में चारुचंद मणिपुर का महाराजा था, लेकिन नाममात्र का। अधिकांश अधिकार औपनिवेशिक सरकार के प्रतिनिधि के अधीन थे। बड़े फैसलों में उसी की मनमानी चलती थी। राजसत्ता और धर्मसत्ता की ओर से थोपे गए करों का बोझ आमजन को उठाना पड़ता था। वाखई सेल, मांग्बा-सेंग्बा, पंडित लोइशंग, चंदन सेंखाई तथा कुंजा सेन असल में जनता से वसूले जाने वाले तरह-तरह के टैक्स थे। इनमें से कुछ तो बड़े ही विचित्र थे। उनके पीछे राजसत्ता और धर्मसत्ता का स्वार्थमय गठजोड़ था। कई कर मनुष्य के जनजीवन से जुड़ी सामान्य गतिविधियों के नाम पर लगाए गए थे। वे मनुष्य की मौलिक स्वतंत्रता का हनन करते थे। ‘वाखई सेल’ भूमि के बंदोबस्त, चकबंदी से जुड़ा था, जबकि ‘पंडित लोइशंग’ ब्राह्मण मंडल के नाम पर थोपा हुआ कर था। ‘चंदन सेंखाई’ माथे पर तिलक लगाने के नाम पर वसूला जाता था। उसके अनुसार प्रत्येक हिंदू परिवार को ‘चार आना’ केवल माथे पर तिलक लगाने के लिए चुकाना पड़ता था। ‘कुंजा सेन’ वेशभूषा कर था। इनके अतिरिक्त गायकों के नाम पर भी टैक्स का प्रावधान था।

‘मांग्बा-सेंग्बा’ सबसे निकृष्ट और अमानवीय कराधान व्यवस्था थी। यदि कोई व्यक्ति सामाजिक मर्यादाओं का उल्लंघन करता हुआ पाया जाता अथवा ब्रह्म-सभा की सत्ता को चुनौती देता या किसी कारणवश ब्रह्म-सभा उससे रुष्ट हो जाती थी, तो ऐसे व्यक्ति को अशुद्ध (मांग्बा) घोषित कर दिया था। ‘मांग्बा’ घोषित व्यक्ति अपने समाज और जाति के लिए अछूत हो जाता था। शुद्धीकरण (सेंग्बा) यानी समाज में पुनर्वापसी के लिए उसे भारी जुर्माना भरना पड़ता था। जुर्माने की दर अलग-अलग थी। यदि निचली सभा व्यक्ति को अशुद्ध घोषित करती, तो मात्र 50 रुपये की क्षतिपूर्ति देकर शुद्धीकरण किया जा सकता था। लेकिन यदि ब्रह्म सभा के अशुद्ध घोषित करने पर 85 रुपये 23 पैसे। ‘ब्रह्म सभा’ के अध्यक्ष के रूप में राजा भी किसी व्यक्ति को अशुद्ध घोषित कर सकता था। महाराजा द्वारा ‘मांग्बा’ घोषित व्यक्ति को अपने शुद्धीकरण के लिए, 500 रुपये की मोटी धनराशि भेंट करनी पड़ती थी।

महाराजा चारुचंद्र सिंह के शासनकाल में ‘मांग्बा-सेंग्बा’ की समस्या प्लेग की तरह भयावह हो चुकी थी। उसका सामना गरीब, विपन्न और कमजोर तबके को करना पड़ता था। ‘लालअप’ से मिलती-जुलती ‘पोथांग’ जैसी बेगार प्रथा भी थी। उसके अनुसार राजा, शाही परिवार का और कोई सदस्य अथवा अंग्रेज अधिकारी जब भी यात्रा या शिकार पर निकलते तो मैदानी और पहाड़ी दोनों इलाकों में उन्हें तथा उनके सामान को ढोने की जिम्मेदारी स्थानीय प्रजा की होती थी। भोजन और मनोरंजन आदि का प्रबंध भी गरीब जनता को करना पड़ता था। लोगों का विश्वास था कि महाराजा ने ‘ब्रह्म सभा’ के प्रभाव में आकर इन करों को थोपा हुआ है। संवैधानिक सुधारों के बिना उनसे मुक्ति असंभव है। यह आधुनिक चेतना थी जो लगभग सभी पूर्वोत्तर के सभी प्रदेशों में एक साथ पनप रही थी। लोग राजा की शक्तियों पर नियंत्रण चाहते थे। यही वे कारण थे जिन्होंने दूसरे ‘महिला युद्ध’ की जमीन तैयार की थी। दूसरे ‘महिला युद्ध’ को निखिल मणिपुरी महासभा का समर्थन प्राप्त था।

1938-39 में मणिपुर को भारी बाढ़ का सामना करना पड़ा था। बाढ़ से तबाह हुई संपत्ति की मरम्मत हेतु दरबार की ओर से 16000 रुपये की धनराशि स्वीकृत की गई। लेकिन इतने मात्र से फसल से हुए नुकसान की भरपाई होना मुश्किल था। फसल मारे जाने से खाद्य-सामग्री के दाम तेजी से बढ़ने लगे। राज्य में अकाल जैसे हालात पैदा हो गए। हालात को काबू करने के लिए दरबार ने चावल, चिवड़ा के निर्यात को अपने नियंत्रण में ले लिया। आदेश दिया गया कि यदि निर्यात आवश्यक हुआ तो वह केवल राज्य के अन्न-भंडारों के माध्यम से किया जा सकेगा। चावल तथा उसके उत्पादों के निर्यात को हालांकि राजा की मंजूरी प्राप्त नहीं थी। लेकिन ब्रिटिश सरकार के राजनीतिक प्रतिनिधि ने उसके पीछे राजा का हाथ मानते हुए, तत्काल प्रतिबंध उठा लेने का निर्देश दिया। दबाव में आकर राजा वैसा ही आदेश देना पड़ा। अंततः चावल तथा चावल उत्पादों के निर्यात से प्रतिबंध हटा लिया गया। जनता पर इसका उल्टा असर पड़ा। उन्हें अकाल का डर सताने लगा। अफवाहों ने काम किया। लोग गुस्से से उबलने लगे।

नुपी लेन आंदोलन की स्मृति में भारत सरकार द्वारा जारी डाक टिकट

चावल और धान के निर्यात की अनुमति का असर स्थानीय बाजारों में आपूर्ति पर पड़ा। परिणामस्वरूप उनके दाम तेजी से बढ़ने लगे। अफवाहों का बाजार पुनः गर्म हो गया। स्त्रियों के अहिंसक आंदोलन का पहला निशाना बनीं खुमुककेम चावल मिल, जो चावल के निर्यात में अग्रणी थी। आंदोलनकारी महिलाओं ने मिल बंद करने को विवश कर दिया। उसके बाद वे साहसी महिलाएं सीधे राजनीतिक प्रतिनिधि क्रिस्टोफर जिमसन के सहायक टी. ए. शार्पे के पास पहुंचीं तथा उससे चावल निर्यात पर प्रतिबंध लगाने की मांग की। उनका आक्रोश देख शार्पे ने अगले दिन तक संबंधित आदेश जारी करने का आश्वासन दिया। उसके बाद आंदोलनकारी महिलाएं वापस लौट आईं। मगर आंदोलन का यही समापन नहीं था। अगले दिन बाजार में काम करने वाली महिलाओं ने बिक्री के लिए आए धान की गाड़ियों को अपने कब्जे में ले लिया। कब्जे में लिए गए धान को इकट्ठा कर वे दरबार की इमारत के आगे पहुंचीं तथा किसी भी सूरत में धान और चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने की मांग करने लगीं।

महिलाओं का आक्रोश देख दरबार के सदस्य एक-एक कर बाहर निकल गए। केवल राजनीतिक प्रतिनिधि वहां रह गया। महिलाएं घेरा डाले पड़ी थीं। वे उससे निर्यात पर तत्काल प्रतिबंध की मांग कर रही थीं। फंसे हुए राजनीतिक प्रतिनिधि ने महाराज की अनुपस्थिति में प्रतिबंध के आदेश देने में असमर्थता प्रकट की। इसपर औरतों ने कहा कि वे महाराज को टेलीग्राम कर, तत्काल आने को कहें। उग्र महिलाओं ने राजनीतिक प्रतिनिधि को अपने साथ तार-घर तक चलने को विवश कर दिया। आंदोलनकारियों का व्यवहार देखकर राजनीतिक प्रतिनिधि ने असम रायफल्स के कमांडर बुलफिल्ड को संदेश भेजकर स्थिति से वाकिफ कराया। हालात की गंभीरता समझते हुए बुलफिल्ड फौज की टुकड़ी के साथ वहां पहुंच गया। पुलिस बल को वहां देख आंदोलनरत महिलाओं का गुस्सा और भी बढ़ गया। उसकी परिणति महिलाओं और सिपाहियों के बीच झड़प के रूप में हुई। घायल महिलाओं को इंफाल के अस्पताल में भर्ती कराया गया। अगले दिन महाराज की ओर से चावल के निर्यात पर प्रतिबंध के आदेश आ गए। उसके अनुसार असम रायफल्स की कोहिमा और इंफाल छावनियों को छोड़कर बाकी निर्यात को प्रतिबंधित कर दिया गया था।

उसी दिन आदेश पर अमल के लिए महिलाएं दुबारा राजनीतिक प्रतिनिधि और इंजीनियर के आफिस पहुंचीं। उन्होंने दोनों को अपने साथ चलने के लिए विवश कर दिया। दोनों अधिकारियों को साथ लेकर आंदोलनकारी महिलाएं चावल मिलों तक पहुंची। वहां उन्होंने मिलों के विद्युत कनेक्शन काटने के लिए विवश कर दिया। ख्वारेमबंद बाजार में पूरे सात दिनों तक हड़ताल रही। आंदोलनकारी महिलाओं ने बाजार पहुंचकर माल बेचने बैठे दुकानदारों का सारा सामान उलट-पुलट दिया। इतने प्रयासों के बावजूद बाजार में चावल का भाव गिर नहीं रहा था। महिलाओं ने पाया कि प्रतिबंध के बाद भी दुकानदार माल को मुनाफे के लिए यहां से वहां ले जा रहे हैं। उसे रोकने के लिए 28 दिसंबर को महिलाओं का एक जत्था इंफाल के निकट केसमपेट नाम स्थान पर पहुंचा। वहां उन्होंने चावल से लदी नौ गाड़ियों को गुजरते हुए देखा। महिलाओं ने उन गाड़ियों को अपने अधिकार में ले लिया। उन्होंने गाड़ीवान पर दबाव डाला कि वह चावलों को एक रुपया बारह आना प्रति मन (चालीस सेर) के हिसाब से बेचे। चावलों का व्यापारी उस माल को सीधे दुकानदारों को, ऊंचे दाम पर बेचना चाहता था। उसके कहने पर गाड़ीवान ने चावल को सस्ता बेचने से इन्कार कर दिया। इसपर आंदोलनकारी महिलाएं भड़क गईं। कुपित महिलाओं ने सारा चावल बिखेर दिया और गाड़ीवान को मारने के लिए चढ़ गईं। अभी तक महिलाओं का आंदोलन अहिंसक चल रहा था। लेकिन ख्वारेमबंद बाजार और केसमपेट की घटनाओं में महिलाओं का उग्र रूप सामने आया था। इसके बाद शासन को आंदोलनकारियों पर बल प्रयोग का बहाना मिल गया। पुलिस बल ने हस्तक्षेप करते हुए आंदोलनकारी महिलाओं को गिरफ्तार कर लिया।

दूसरा ‘नुपी-लेन’ लगभग 14 महीनों तक चला था। इतने दिनों तक महिला बाजार भी अस्त-व्यस्त रहा। महिलाएं वहां माल बेचने पहुंचतीं तो पुलिस बल निगरानी के लिए पहुंच जाता। इससे आंदोलनकारियों में फूट पड़ने लगी। बावजूद इसके उस ‘नुपी-लेन’ की सफलताएं कम नहीं थीं। असम रायफल्स की दो छावनियों को छोड़कर चावल बाहर भेजने पर प्रतिबंध लग चुका था। आंदोलन का असर वाखई सेल, मांग्बा-सेंग्बा, चंदन शेखई जैसे कानूनों पर भी पड़ा था। उसने पूरे मणिपुरी समाज को जाग्रत करने का काम किया था। फलस्वरूप मणिपुर में कानून के राज्य और संवैधानिक सुधारों का मार्ग प्रशस्त हुआ। आंदोलन के दौरान महिलाएं बजाय किसी नेता के ‘मणिपुर माता की जय’ के साथ आगे बढ़ती थीं। मणिपुर में ‘वंदेमातरम’ गीत सबसे पहले दूसरे नुपी-लेन के दौरान गूंजा था।

दूसरे नुपी-लेन की एक विशेषता यह भी थी कि अपनी एकता, संगठन सामर्थ्य और सूझबूझ के कारण महिलाओं ने शासन-प्रशासन को अपने पीछे चलने के लिए विवश कर दिया था। बावजूद इसके उस आंदोलन के लिए किसी भी महिला को सजा नहीं हुई। पिछले 12 दिसंबर 2018 को राज्य सरकार द्वारा राजधानी इंफाल में ‘नुपी लेन दिवस’ के रूप में, राजकीय स्तर पर बड़ी धूमधाम से मनाया गया। उसमें राज्य सरकार ने निर्णय लिया कि आंदोलन के साक्षी रहे, कासिमपेठ से संजेनथोंग(इंफाल) मार्ग का नामकरण दूसरे नुपी लेन की आंदोलनकारी ‘इमास’ (माओं) और इच्स (बहनों) की याद में ‘नुपी लेन रोड़’ के रूप में किया जाएगा।

(कॉपी संपादन : नवल)


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