वेद और उसकी दुनिया

लेखक प्रेमकुमार मणि बता रहे हैं कि ऋग्वेद व अन्य वेदों के ऐतिहासिक निहितार्थ क्या हैं? सिंधु घाटी सभ्यता के पतन के बाद ईरान से आये आर्य और मूलनिवासी हिंदू लंबे समय तक लड़ते-झगड़ते रहे। मानव सभ्यता के दृष्टिकोण से इसके परिणाम क्या हुए?

जन-विकल्प

अहं पुरो मंदसानो व्यैरं नव साकं नवतीः शम्बरस्य

शततम वेश्यं सर्वताता दिवोदास मतिथिग्वं यदावम .

  • ऋग्वेद की एक बानगी, चतुर्थ मंडल, सूक्त 26 (3 )

(सोमरस पी मतवाला हो कर मैंने शम्बर असुर के निन्यानबे नगरों को एक ही साथ नष्ट कर दिया है। यज्ञ में अतिथियों का स्वागत करने वाले दिवोदास को मैंने सौ सागर दिए हैं।)

वेद दुनिया की संभवतः पहली किताब है। हिन्दुओं ने इसे धर्म-ग्रन्थ के रूप में अपनाया है और कुछ लोगों ने इसे जादुई तरीके से सहेज कर तीन हजार से भी अधिक वर्षों से रखा हुआ है। यह संस्कृत भाषा में है, और कोई खास इंसान इसका रचनाकार नहीं है। इसे अपौरुषेय (किसी पुरुष द्वारा रचित नहीं) कहा गया है। अनुमान है कि इंडो-ईरानी आर्यों के द्वारा इसकी रचना ईस्वीपूर्व 1500-1000 के बीच, एक दीर्घ कालखंड में क्रमशः की गयी है। लम्बे समय तक यह श्रुति रूप में रहा, अर्थात इसे लिपिबद्ध नहीं किया गया। यह नहीं माना जाना चाहिए कि इस बीच लिपि नहीं थी। लेकिन जिन खास लोगों की यह थाती थी, उन्होंने कदाचित इसे गोपनीय बना कर रखना अधिक आवश्यक समझा। लिपिबद्ध कर देने और ग्रन्थ रूप दे देने से इसके सार्वजनिक हो जाने का ‘खतरा ‘ था और इसके रचयिता लोग, तथा उनका परिमंडल, जिनका धीरे-धीरे एक वर्ग बन गया, इसके सार्वजनिक करने के पक्ष में बिलकुल नहीं था। उनके अनुसार हर कोई इसका पाठ करता, तो पाठ के भ्रष्ट होने का भय भी था, इसलिए कोई ‘कुपात्र ‘ इसका पाठ न कर सके, इसकी भरपूर कोशिश उनके द्वारा की गयी। यह और कुछ नहीं ज्ञान-सम्पदा पर एकाधिकार की कोशिश थी, और इस प्रवृत्ति की जड़ें संभवतः कबायली संस्कृति में थी। अंततः यह कोशिश ही हास्यास्पद हो कर रह गयी। छुपाव की इन कोशिशों ने वेद को एक रहस्य बना कर रख दिया, हालांकि रहस्य जैसा इसमें कुछ था नहीं। कुल मिला कर एक भयग्रस्त समाज का मनोविज्ञान ही इससे प्रतिबिम्बित होता है। इसके रचनाकारों ने अपने जानते, योग्य लोगों के बीच इसे रखा, और उन योग्य लोगों ने भी इसे चुने हुए लोगों के बीच ही बनाये रखा। पहले ये आर्यजन थे, फिर ब्राह्मण हो गए। इसे लोग एक दूसरे से सुन कर कंठाग्र कर लेते थे और फिर पीढ़ी दर पीढ़ी सम्प्रेषित करते रहते थे। यह एक जटिल, लेकिन अचरज भरा काम था। सब से अधिक हैरानी इस बात पर होती है कि तीन हजार से अधिक वर्षों तक इस रूप में यह बना रहा। कुछ इतिहासकारों के अनुसार इसको ग्यारहवीं सदी के बाद ही लिपि दी गयी अर्थात ग्रंथन हुआ। दामोदर धर्मानंद कोसंबी तो इसे चौदहवीं सदी में लिपिबद्ध हुआ स्वीकारते हैं। पश्चिमी जगत से इसके परिचय का श्रेय जर्मन विद्वान मैक्स मूलर.को है, जिन्होंने उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में ऋग्वेद का सम्पादन कर प्रकाशित करवाया।

वेद संस्कृत भाषा का शब्द है और बताया जाता है इसका संबंध ‘विद ‘ धातु से है, जिसका अर्थ है जानना, या ज्ञान। वेद कुल चार अलग-अलग ग्रंथों या संकलनों में हैं। ये हैं – ऋग, यजुर, साम और अथर्व। ऋग सबसे प्राचीन वेद है। कुछ विद्वानों के अनुसार वेद असल में तीन ही हैं, इसीलिए इन्हें त्रयी भी कहा गया है। चौथा वेद ‘अथर्व’ इस श्रृंखला में बाद में जोड़ा गया है। वेदों को श्रुति कहा गया है। श्रुति का अर्थ है इसे सुना गया है। किससे सुना गया? तो किसी लौकिक पुरुष से नहीं। यदि वेदों का ग्रंथन और परिमार्जन ग्यारहवीं सदी के बाद हुआ, तब इस बात पर भी विचार करना होगा कि यह श्रुति वाला रूप कहीं तुर्कों के आने के बाद इस्लाम की देखा-देखी तो नहीं हुई। क्योंकि इस्लामिक धर्मग्रंथ कुरान ऐसी ही अपौरुषेयता का दावा करता है, जिसमें ईश्वर के सन्देश वह्य रूप में उतरे हैं। वेदों का पाठ रूप ऐसा है कि बाहर से सुनी गयी किसी बात का बोध होता नहीं दीखता। बल्कि बार-बार ऋषि ही देवताओं को सम्बोधित करता है। इसलिए इसकी अपौरुषेयता थोपी गयी प्रतीत होती है। प्राचीन बाइबिल या कुरान के मुकाबले वेद अधिक इहलौकिक और मानवीय है और अपनी संरचना में धार्मिक से अधिक काव्यात्मक है। वैदिक ऋषि अपौरुषेयता का कोई दावा नहीं करते, क्योंकि यहां कोई शक्तिमान ईश्वर नहीं, बल्कि अनेक की संख्या में वे देवता हैं, जिनकी कृपा के ये ऋषि आकांक्षी हैं। संभवतः इन्हीं ऋषियों के अंतर्मन से ऋचाओं के ये काव्यात्मक भावोद्वेग उठे होंगे। इन ऋषियों ने स्वयं को कोई श्रेय नहीं दिया, यह उनकी उदारता और संवेदनशीलता थी। स्वयं के अहम का पूरी तरह विलोप कर वे निःसर्ग अथवा प्रकृति का हिस्सा बन चुके थे और इस रूप में वे सचमुच अलौकिक या अपुरुष भी बन चुके थे। इस रूप में ही यह वेद संभवतः अपौरुषेय है। इन रचनाकारों ने स्वयं को ‘स्रष्टार’ या ‘कर्तार’ न कह कर ‘द्रष्टार’ कहा। वे, बस, देखने वाले थे, रचने और करने वाले नहीं। अपनी इन पंक्तियों को जिन्हें ऋचा कहा गया है, उन्होंने सहेज कर रखा। योग्य पात्रों को सोमरस की घूँटों के साथ इसे सुनाया और कंठाग्र करा दिया। आरंभ में तो लिपि थी या नहीं, यकीनी तौर पर कहना मुश्किल है, लेकिन जब लिपि आई भी तब इसे उससे बद्ध करने से रोका। श्रुति रूप में ही यह उसके संरक्षक मंडल को अधिक सुरक्षित प्रतीत हुआ।

वेद के दो भाग हैं – मंत्र अथवा संहिता भाग और ब्राह्मण भाग। ब्राह्मण भाग को वेदंगम यानि वेद का अंग भी कहते हैं। इसमें इसके ठीक-ठीक पाठ पर जोर दिया गया है और उसकी विधि बतलायी गयी है। इसके छह सोपान हैं। पहला है शिक्षा अर्थात उच्चारण विज्ञान, दूसरा छन्दस यानि छंद-शास्त्र, तीसरा व्याकरण, चौथा निरुक्त यानि कठिन शब्दों की व्याख्या, पांचवां ज्योतिष या गणित-ज्योतिष और छठा कल्प अर्थात कर्मकांड।

ऋग्वेद की एक ऋचा

बता चुका हूं कि ऋग्वेद सब से पुराना वेद है। अपनी संरचना में यह दस मंडलों में विभक्त है। प्रत्येक मंडल में नियत सूक्त हैं और ये सूक्त ऋचाओं या मंत्रों से मिल कर बने हैं। प्रथम मंडल में 191, द्वितीय में 43, तृतीय में 62, चतुर्थ में 58, पंचम में 87, षष्टम में 75, सप्तम में 104, अष्टम में 92, नवम में 114 और दशम में 191 सूक्त हैं। इस तरह कुल सूक्तों की संख्या 1017 है। (आधार-ऋग्वेद, संपादक, डॉ. गंगासहाय शर्मा, संस्कृत साहित्य प्रकाशन, नई दिल्ली) कतिपय विद्वानों के अनुसार दूसरा से लेकर सातवां मंडल तक सबसे प्राचीन अंश हैं। इन्हे ‘कुल-मंडल’ कहा जाता है। पहला, आठवां, नवां और दसवें मंडल को बाद में जोड़ा गया है। प्रथम और दशम मंडल में सूक्तों की संख्या एक समान है। सभी मंडलों का हर सूक्त किसी न किसी देवता को समर्पित है। अग्नि, इंद्र से लेकर मंडूक (मेढ़क) तक देवताओं की कोटि में हैं। अग्नि और इंद्र ऋग्वेद के सबसे प्रभावी देवता हैं। 295 सूक्तों में इंद्र और 223 में अग्नि की वंदना की गयी है। केवल नवम मंडल ऐसा है, जिसमें इंद्र या अग्नि की वंदना नहीं है। यहां केवल सोम देव् का वर्चस्व है। कुल-मंडल यानि द्वितीय से लेकर सप्तम मंडल की विशेषता है कि एक देवता को समर्पित ऋचा-समूह को घटते हुए छंद-संख्या के अनुसार सजाया गया है। ऐसा अन्य मंडलों में नहीं हुआ है। यही इस बात का द्योतक है कि सभी मंडलों की रचना एक ही काल-खंड में नहीं हुई है। इसमें सुविन्यास को ही आधार बनाया जाय, तो कहा जाना चाहिए कि कुल-मंडल ही बाद की रचना है। क्योंकि प्रायः बेहतर चीजें कुछ अभ्यास के उपरांत ही आती हैं। इस आधार पर प्रथम, अष्टम, नवम और दशम मंडल भी पुरातन हो सकता है। ऋग्वेद में कई कथात्मक उल्लेख हैं। उदाहरण के लिए दशम मंडल में यम-यमी संवाद (सूक्त 10), इंद्र व उनके पुत्र वासुकि ऋषि का संवाद (सूक्त 27, 28), पुरुरवा-उर्वशी संवाद (सूक्त 95 ) नचिकेता-यम संवाद (सूक्त 135) आदि। इस तरह का संवाद सरल समाज में संभव नहीं है। इनसे ऋग्वैदिक-दुनिया का पता चलता है।

अपने क्रम में यजुर दूसरा वेद है, जिसमें यज्ञों के विधि-विधान हैं, तीसरा सामवेद-ऋग्वैदिक छंदों का संकलन है और चौथा अथर्व-वेद जादू-टोने से भरे मंत्रों की पिटारी है। अतएव कहा जाना चाहिए ऋग्वेद ही मूल और वास्तविक वेद है .

हम यहां वेद की चर्चा धार्मिक अर्थों में नहीं, बल्कि इतिहास के अर्थों में कर रहे हैं, क्योंकि एक निश्चित काल-खंड की यह विश्वसनीय इतिहास-सामग्री है( जैसे सिंधु-सभ्यता की कहानी उत्खनन से प्राप्त पुरातात्विक साक्ष्य देते हैं, वैसे ही अपनी भाषा में छुपाये अपने समय की कहानी वेद हमें बता जाता है। वैदिक ऋषियों का पूरा परिवेश, उनके मन-मिजाज, प्रेम-विरह सब इससे उझकते हैं। ‘ऋग्वेद’ और ईरानी धर्मग्रन्थ ‘जेंद-अवेस्ता’ की भाषा, कुछेक शब्द और देवता इतने मिलते-जुलते हैं कि यह साफ़ तौर से पता चलता है कि ईरान, जो अपने मूल में सम्भवतः आर्यान है, के लोग और ये वैदिक-जन कभी एक साथ रहे होंगे। दोनों ग्रंथों में अग्नि, इंद्र, वरुण आदि देवता हैं। ईसा पूर्व छह सौ के आस-पास जब जरथ्रुष्ट ने अपने विचारों से ईरानी देवताओं को विनष्ट कर डाला, तब भी अग्नि वहां रह गया, जो आज भी वहां पारसियों का मुख्य देवता और उनकी संस्कृति का मूल बना हुआ है। वैदिक संस्कृति के लिए भी अग्नि प्रधान देवता है। कोई भी वैदिक यज्ञ आज भी अग्नि के बिना पूरा नहीं हो सकता। जबकि इंद्र अपना महत्व कब का खो चुका है। ऋग्वेद में पर्जन्य वर्षा के देवता हैं। लेकिन इंद्र भी अनेक दफा वर्षा-देवता के रूप में चिन्हित किये जाते हैं। आज भी ग्रामीण चेतना में कई जगह वह वर्षा का देवता बना हुआ है। कुछ-कुछ आज के सिंचाई मंत्री जैसा। वर्षा के न होने पर ग्रामीण स्त्रियां इंद्र को रिझाने के लिए समूह गीत चौहट गाती हैं।

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वैदिक ऋषि कुल मिला कर विलक्षण थे। उनकी आध्यात्मिकता ज्ञान-केंद्रित थी। अग्नि और इंद्र के भरोसे उनकी दुनिया थी। अग्नि और इंद्र – जो अंततः वर्षा का देवता बन गया था, ही उनकी वैदिक संस्कृति के आधार थे। भाषा पर भी उनका जोर था। इसकी मीमांसा करें, तो वैदिक ऋषियों की मेधा का पता चलता है। आग और पानी ऊर्जा के आदि स्रोत हैं और फिर व्यक्ति या पुरुष-चेतना का केंद्र भाषा है। ऊर्जा अथवा शक्ति के इन तीनों आधार तत्वों पर उनका जोर यह बताता है कि इंसान को इसके बाद सोमरस के अलावा और क्या चाहिए। बीसवीं सदी के रूसी बोल्शेविक नेता लेनिन समाजवाद का अर्थ बतलाते थे – बिजली जोड़ पानी बराबर समाजवाद। बिजली यानी मूल में अग्नि। हजारों साल की दूरी के बावजूद अपनी चेतना में ये दोनों कितने करीब लगते हैं!

वैदिक ऋषि आज के तथाकथित वैदिक जनों की तरह तंगदिल नहीं थे। हां ,लड़ाई-झगड़ों में उनकी दिलचस्पी दिखती है, क्योंकि सिंधु अथवा हिन्दू पणि-जनों से वे बहुत भय खाते थे। यह पणि समुदाय हड़प्पाकालीन सभ्यता से विकसित व्यापारी समुदाय था, जो इन झगड़ालू और उत्पाती-प्रवृत्ति के आर्यजनों से अपनी ‘मातृ-भूमि’ को बचाना चाहते थे। इनके अलावा असुर अथवा दस्युजन और दास-जन थे जिन्होंने इस भूमि को, चाहे इसका जो भी नाम हो ,अपनी मिहनत से संवारा था। वे यहां के वासी थे। यह उनकी मातृभूमि थी। इन दास और दस्यु जनों को अलग-अलग और एक भी माना गया है। यह तय करना मुश्किल है कि असलियत क्या है। अलग मानने वालों का कहना है कि दासों का संबंध ईरानी मूल से है, लेकिन दस्यु मूल भारतीय हैं। लेकिन आर्यों के आने तक दोनों मिल कर एक हो गए होंगे, ऐसी ही उम्मीद है। जैसा कि पहले ही बतला चुका हूं कि इसका कारण इनके जीवन में आर्यों का हस्तक्षेप होगा।

स्वाभाविक है कि इन आर्यजनों से भारतीय समाज में सामाजिक अव्यवस्था होती होगी। वैदिक ऋषि अपने देवता इंद्र को अपने शत्रुओं से लड़ने के लिए लगातार उत्साहित करते हैं। ऐसे मंत्रों की ऋग्वेद में भरमार है जो इंद्र को सम्बोधित हैं और उनसे पणि जनों और दस्यु जनों से लड़ने की प्रार्थना करते हैं। ऋषियों को अपने कुल या गिरोह के इस योद्धा पर कुछ अधिक ही गुमान था। इंद्र की ताकत का बखान करने में वे अपनी भाषा की पूरी ताकत लगा देते थे। उनका पेय सोमरस जिस पर वे और उनके देवता फ़िदा रहते थे, उनका दूसरा आकर्षण था। पूरा नवम मंडल सोमदेव की स्तुति से भरा पड़ा है। दशम मंडल का 175वां सूक्त तो सोमरस निचोड़ने वाले पत्थर (यानि लोढ़े ) को समर्पित है। उसकी देवता के समान स्तुति की गयी है। इस से इस बात का तो पता चलता है कि सोम कोई वनस्पति है , जिसे पत्थर से चूर कर उसका अर्क या रस लोग निकालते रहे होंगे और उसका पान करते होंगे। लेकिन इस नाम की कोई वनस्पति आज नहीं मिलती। संभवतः यह भांग (केन्नाईबस सटाइबा) हो, या न भी हो। किन्तु इतना तय है कि यह ताड या खजूर से निकलने वाला पेय मैरेय (ताड़ी ) तो नहीं ही है; क्योंकि फिर इसे पत्थर से निचोड़ने का प्रसंग नहीं होता। कुछ विद्वानों ने इसे इफिड्रा नामक एक वनस्पति बतलाया है, जिसकी पत्तियां नहीं होतीं। और यह एशिया तथा यूरोप के कई देशों में पाया जाता है। ईरान में पारसी लोग इसी का उपयोग होम पेय बनाने के लिए करते थे। यह होम संभवतः सोम ही है। इसलिए इफिड्रा से सोम का एक सेतु बनता है। इफिड्रा में पाया जाने वाला इफिड्रिम मनुष्य के तंत्रिका-तंत्र को प्रभावित करता है, नशा देता है। इसलिए संभव है कि यही सोम हो। लेकिन भारत में इफिड्रा की प्रजाति नहीं मिलती। इसलिए भांग पर ही सोम की संभावना टिकती है। यह भांग आज भी पौराणिक देवता शिव को अर्पित किया जाता है और मंदिरों में भी इसका उपयोग वर्जित नहीं है।

वैदिक आर्य सिन्धुओं या हिन्दुओं की तरह व्यवस्थित जीवन जीने के आदि नहीं थे। उनकी यायावरी वृत्ति अभी ख़त्म नहीं हुई थी, हालांकि अब वे धीरे-धीरे व्यवस्थित कृषि से जुड़ने लगे थे, लेकिन नगरीय जीवन के कोई संस्कार या रूचि उनमें अब तक विकसित नहीं हुए थे। वैदिक जीवन कम से कम उतना ही लम्बा चला है जितना सिंधु सभ्यता, यानि 600 से 800 वर्ष तक। लगभग 1400 ईसापूर्व से 600 ईसापूर्व तक इनका समय अवश्य था। निश्चय ही इस बीच हमेशा एक समान समय नहीं रहा होगा। ऋग्वेद का समय तो 1000 ईसापूर्व से पहले का ही है। हालांकि ऋग्वेद रामायण और महाभारत की तरह कोई महाकाव्य नहीं है। अपने धार्मिक ढांचे में एक काव्यात्मकता उसमें है, लेकिन वहां कोई महाकाव्यात्मक आख्यान नहीं है कि हम सिन्धुवासियों अथवा हिन्दुओं के समाज की बातें भी जान सकें। ऋग्वेद आर्य समाज की एकतरफा कहानी सुनाने के लिए अभिशप्त है। इसलिए शेष समाज की कहानी हमें अन्य स्रोतों से ढूंढनी होगी। इसके लिए कुछ पौराणिक कथाओं का भी हम सहारा लेते हैं। लेकिन अथर्व वेद में हम केवल आर्य जनों को ही नहीं देखते हैं। यहां गैर आर्यों की उपस्थिति भी हम महसूस सकते हैं। ऐसा प्रतीत होता है अब तक हिन्दू और आर्य जनों की एकता कुछ अंशों में विकसित हो गयी थी। धीरे-धीरे आर्यजन हिन्दू समाज में समाहित हो गए। उन्होंने हिन्दू संस्कृति को आत्मसात कर लिया। अपनी कई चीजें छोड़ दीं। कुछ चीजें यहां के लोगों ने उनसे सीख ली। अब वे पूरी तरह हिन्दू हो गए। यहां की नदियां, यहां के पहाड़, वनस्पतियां, पेड़-बाग, चिड़ई-चुरमुन, बहुत सारे शब्द और देवता भी उन्होंने अपना लिए। उनकी कुछ चीजें यहां के लोगों ने अपना ली। यह दो बड़ी संस्कृतियों का मिलन था। किसी का एक दूसरे के प्रति समर्पण नहीं था। आर्यों ने अपने घोड़ों पर हिन्दुओं को घुमाया और हिन्दुओं ने आर्यजनों को अपनी गैया का मीठा दूध पिलाया। हालांकि यह सब ऊपरी स्तर पर ही हुआ।

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आर्यों के आने के पूर्व सिंधु या हिन्दू जनों की जो दुनिया थी, वह जटिल थी। यह जटिलता उनकी सभ्यता में उत्पादन और व्यापार से विकसित हुआ था। हड़प्पा जीवन की नगरीय व्यवस्था में अतिरिक्त उत्पादन पर कब्जे की लड़ाई शुरू हो गयी थी और वहां व्यापारियों और पुरोहितों का एक वर्ग भी विकसित हो गया था, ऐसा लगता है। इस तरह कहा जाना चाहिए कि आर्य पूर्व हिन्दुओं में तीन तबके तो बन ही चुके थे। एक सामान्य जन जिनमें किसान, मजदूर और कारीगर थे। दूसरे पणि – यानि वणिक – व्यापारी और तीसरे पुरोहित। ऐसा प्रतीत होता है सिंधु समाज में ही इन पुरोहितों को ब्राह्मण कहा जाने लगा था। रावण और शुक्राचार्य असुर है, लेकिन ब्राह्मण भी हैं। आर्यों के यहां जम जाने के बाद हिन्दुओं और आर्यों के पुरोहितों में संभवतः एका हुआ और दोनों ने एक दूसरे से ज्ञान संबंधी लेन-देन की। देवताओं अथवा आर्यों के गुरु वृहस्पति के बेटे कच के असुर-गुरु शुक्राचार्य के यहां ज्ञान हासिल करने हेतु जाने की कथा ऐसी ही संभावनाओं को रेखांकित करता है।

हिन्दुओं की देखा-देखी जब आर्यों ने अपने समाज को श्रेणी विभाजित किया तो वह वर्ण-व्यवस्था बन गया। यह इसलिए हुआ कि रंग और नस्ल के आधार पर वर्चस्व दिखाने की एक प्रवृति विकसित हुई, जो नयी चीज थी। इसलिए वर्ण-व्यवस्था में धन और ज्ञान की जगह नस्ल और रंग को प्रधानता दी गयी। ऋग्वेद के दशम मंडल में अचानक 90वां पुरुष सूक्त आ जाता है। इसी सूक्त के पुरुष को समर्पित 12वीं ऋचा में चार वर्णों की बिना किसी भूमिका के चर्चा की गयी है। इसे अनेक विद्वानों ने प्रक्षिप्त यानी बाद में जोड़ा हुआ बताया है, जिसके लक्षण स्पष्टतया दीखते हैं। इसका रहस्य कुछ तो है। यह साफ़ दीखता है कि आर्य जनों के यहां वृहद-स्तरीय उत्पादन की कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं थी। आर्थिक तौर पर वह एक पिछड़ा हुआ फटेहाल समाज था, जो तब भी अपने मूल रूप में पशुचारक था। ऐसे समाज में श्रेणी विभाजन केवल रंग, नस्ल, भाषा और आचार-व्यवहार के आधार पर ही संभव था। यह विभाजन स्वाभाविक रूप से नहीं, हिन्दुओं की देखा-देखी की गयी थी, जैसे मध्य-काल में हिन्दुओं की देखा-देखी मुस्लिम-समाज में अशरफ, अरजाल और अजलाफ की श्रेणियां बन गयीं। यह श्रेणी विभाजन इस्लाम के धार्मिक-सामाजिक तहजीब से मेल नहीं खाता। ठीक वैसे ही पुरुष सूक्त का वर्ण-विभाजन ऋग्वेद के पाठ से मेल नहीं खाता।

ऋग्वैदिक आर्यों के सामाजिक जीवन और उनके भौगोलिक क्षितिज के बारे में बहुत से विद्वानों ने लिखा है और कुल मिला कर वे इसी नतीजे पर पर आये कि ऋग्वैदिक जीवन भी सिन्धुवासियों की तरह पंजाब के इलाके में बसे और उन नदियों से ही जुड़े जिनसे सिन्धुवासी जुड़े थे। आर्यों के आने तक यह इलाका संभवतः मुर्दों का टीला बन चुका था। बहुत हद तक वीरान और भुतहा-सा रहा होगा। यहां पैर जमाने में इन्हे कोई खास परेशानी नहीं हुई होगी। हां, यहां से पूर्व की तरफ बढ़ते ही सिन्धुवासियों से उनकी तकलीफदेह मुठभेड़ होने लगी। आर्य और अनार्य अथवा देव् और असुर का संघर्ष आरम्भ हो गया, जो लम्बे समय तक चला। देवताओं यानि आर्यों को अपने एकमात्र नायक इंद्र का भरोसा था, जिसने सेना तो नहीं, एक छोटा-मोटा गिरोह जरूर बना लिया था। ऋग्वैदिक स्रोतों के आधार पर यह तय करना संभव नहीं है कि युद्ध में हमेशा इंद्र ही जीतता रहा होगा। हालांकि ऋषियों ने अपने कुनबे की पराजय का कोई बखान नहीं किया है, लेकिन उनके भय कई रूपों में प्रकट हुए हैं। ऋग्वैदिक आर्य यहां के मूल निवासियों यानि हिन्दुओं से अभी दूरी बना कर रखते प्रतीत होते हैं। उनके ग्राम आस-पास होते होंगे, लेकिन एक ही ग्राम में दोनों रहते हों, ऐसा प्रतीत नहीं होता। हालांकि रहने-सहने के विधि-विधान, भाषा और तकनीक दोनों एक-दूसरे से सीख रहे थे। सांस्कृतिक स्तर पर दोनों एक-दूसरे के करीब आ रहे थे। लेकिन दोनों में अंतर भी था, जो किसी को भी दिख सकता है। इन दिनों दोनों ग्राम में रहते थे और परिवार व विवाह संस्था दोनों समाजों में थे। आर्यों और हिन्दुओं के गांव आपस में टकराते थे तो इसे संग्राम (दो गांवों का मिलन अर्थात युद्ध) कहा जाता था। ऐसे संग्राम तब तक होते रहे जब तक दोनों लड़ते-लड़ते थक नहीं गए और एक ही साथ रहने नहीं लगे। इस तरह साथ रहने के लिए इन दोनों ने राम और कृष्ण का इंतज़ार नहीं किया, जैसा कि सावरकर ने राम की कथा के द्वारा अनार्यों के समर्पण की बात बताई है। दो संस्कृतियों के महामिलन यानि फ्यूज़न को किसी एक का समर्पण नहीं कहा जा सकता।

ईरान में आर्य : चौथी शताब्दी का बना 5 X 24 सेमी आकार का एक प्लेट। इसमें आर्यों के युद्ध कौशल को चित्रित किया गया है।

दो संस्कृतियों के परस्पर लय-विलय के कुछ चिह्न ऋग्वेद में यूं ही मिल जाते हैं। इंडो-ईरानी लोग जिस स्थान से भी भारत की दिशा में चले होंगे, वहां की उनकी जीवन शैली और भाषा के बहुत से तत्व उनके साथ आये होंगे। लेकिन वे सभी वनस्पतियां और पशु तो साथ लाना संभव नहीं हुआ होगा। घोड़े उनके साथ थे, इसकी सूचना मिलती है। रथ और उसकी तकनीक भी उनके साथ होगी, इसका अनुमान है। लेकिन क्या गाय उनके साथ उसी तरह आयी, जैसे घोड़े? क्या गाय इंडो-ईरानी लोगों के जीवन में थी? शायद नहीं। गाय और घोड़े का साथ आना किसी जमात के साथ संभव तो नहीं ही दीखता, यूं भी अनुमान किया जा सकता है किसी लड़ाकू दल के साथ गाय नहीं हो सकती। गाय सिन्धुवासियों के जीवन में महत्वपूर्ण रूप से थी। खास कर इसके बैल से सिंधु-हिन्दू लोग वही काम लेते थे, जो काम घोड़े से आर्य लेते थे। इसलिए ऋग्वेद में गाय का महत्वपूर्ण होते जाना उस संस्कृति पर हिन्दू-दास संस्कृति के बढ़ते प्रभाव की सूचना देता है। निश्चित ही चालाकी दोनों ओर से होती होगी, लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि हिन्दुओं की सभ्यता अब भी आर्यों से कहीं अधिक विकसित थी। यही कारण था कि दस्यु और दास-समाज से नफरत होने के बावजूद आर्य संस्कृति पर उनके (दासों के) प्रभाव को वे रोक नहीं सके। गौ, गोष्ठी, गवेषणा, गोत्र जैसे शब्द आर्यों के ही थे यह कहना मुश्किल है। निश्चित ही गाय से सिन्धुवासी भी परिचित थे और ऐसा लगता है उससे जुडी बहुत सी बातें दोनों संस्कृतियों में थी। कृषि मामले में भी सिंधु वासी आर्यों से कहीं आगे थे। आर्यों ने इस क्षेत्र में कोई उल्लेखनीय कार्य किया हो, इसके कोई प्रमाण नहीं हैं। इंद्र या पुरंदर सामरिक कारणों से नदियों के बांध को ध्वस्त करते थे, इसकी सूचना तो मिलती है, उन्होंने सिंचाई के लिए कोई बांध भी निर्मित किया इसकी कोई सूचना नहीं है। कालांतर में आर्यों ने सिन्धुवासियों की कृषि संबंधी कई तकनीक को आत्मसात कर लिया। रामशरण शर्मा अर धातु को आर्य का मूल मानते हुए इसे कृषि से जुड़ा मानते हैं। लेकिन अर का कृषि से क्या संबंध है, उन्होंने नहीं स्पष्ट किया है। मैंने पहले ही बतलाया है किसी जाति-समूह की संज्ञा दूसरे लोग तय करते हैं। अर का संबंध संभवतः उनके रथ के चक्के में लगे अर, जिससे चक्का तकनीकी स्तर पर एक कदम आगे बढ़ कर चक्र हो गया और अपेक्षाकृत अधिक हल्का होने के कारण अधिक गति देने लगा, से है। संभव है, ऐसे रथों के आविष्कार के कारण इंडो-ईरानी लोगों की ताकत बढ़ गयी और दूसरे जन समूहों में उनका कुछ दबदबा भी बढ़ गया। इस रूप में अन्य लोग इंडो-ईरानी समूह आर्य कहने लगे हों, ऐसा संभव है।

आर्यों का भाषा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान अवश्य दिखता है। मैंने पहले ही बतलाया है कि आर्यों की ऊर्जा के प्राथमिक स्रोतों को समझने में दिलचस्पी थी। भाषा को इन लोगों ने इसी रूप में लिया। आर्यों के पुरोहित तबके का सिन्धुवासियों के पुरोहित तबके से जब साझा हुआ, तब एक बात पर दोनों सहमत थे कि शारीरिक श्रम से कैसे बचा जाय। श्रेणी विभाजन और वर्ण विभाजन की भी मुख्य बात शारीरिक श्रम से पुरोहित और ब्राह्मण लोगों की दूरी थी। पुरोहित तबका कोई शारीरिक श्रम नहीं करता। इसे हेय कहा गया है, शूद्रों का काम है यह। शारीरिक श्रम नहीं करने वाला तबका मानसिक श्रम करता है। मानसिक श्रम से भाषा, गणित, दर्शन आदि का विकास तो होता है, कृषि और उद्योग का विकास नहीं होता। इसलिए कि कृषि और उद्योग में शारीरिक श्रम की आवश्यकता प्राथमिक स्तर पर होती है। भारत में पुरोहितवाद जैसे-जैसे मजबूत होता गया भाषा और गणित में तो उन्नति हुई, तकनीक के क्षेत्र में यह पिछड़ने लगा। सिन्धुवासियों और आर्यों के पुरोहित तबके के एक समूह ने भाषा की कारीगरी पर स्वयं को समर्पित कर दिया। नतीजतन संस्कृत जैसी भाषा बनी, जिसमें दोनों संस्कृतियों का योगदान है। संस्कृत का लोक से उन दिनों भी जुड़ाव नहीं था जब यह रची-बनी गयी थी। यह पुरोहितों की, पुरोहितों द्वारा पुरोहितों के लिए संस्कार की गयी एक जुबान थी, जो चाहे जितने भी काम की हो, कुछ लोगों की ही थी। हड़प्पा के पुरोहितों ने जैसे अपने सिटाडेल को ऊँचे दुर्ग से घेर कर विशिष्ट और पृथक कर लिया था, संस्कृत भाषा को भी कर लिया। सब लोग न संस्कृत पढ़ सकते थे, न ही वेद। सामान्य जनता से इसकी दूरी बढ़ती चली गयी। भले ही उसके निर्मित शब्दों से ही इस भाषा के मीनार खड़ी हुई हो। इतिहासकार उपिंदर सिंह के अनुसार, “ऋग्वेद में प्रायः 300 शब्द ऐसे हैं जो स्पष्ट रूप से इंडो-यूरोपियन भाषा समूह के बाहर से लिए गए हैं। उधार के लिए इन शब्दों के आधार पर सोचा जा सकता है कि ऋग्वैदिक लोगों का द्रविड़ तथा मुंडा भाषी लोगों के साथ सांस्कृतिक आदान-प्रदान हो रहा था। ऋग्वेद में चुमुरि, धुनि, पिप्रु और शम्बर जैसे जनों की चर्चा है, जो निश्चित रूप से इंडो-आर्य नाम नहीं है। कुछ ऐसे आर्यों के भी नाम हैं जो स्पष्ट रूप से आर्येत्तर प्रतीत होते हैं – जैसे बलबूथ तथा वृवू। यह सब सांस्कृतिक आदान-प्रदान के परिचायक हैं।”

ऋग्वेद सहित सभी वेद अपने अध्ययन के विस्तृत आयाम और भारतीय दृष्टिकोण का इन्तजार कर रहे हैं। यह उतना आर्य-केंद्रित नहीं है, जितना बतलाया जाता रहा है। आधुनिक भारत के हिन्दू द्विज समूह ने इसे अपना सांस्कृतिक अभयारण्य बनाने की भरसक कोशिश की है। इसे तिलिस्म अथवा रहस्य-लोक की तरह विकसित किया है। फिर हिन्दुओं के वंचित जनसमूह के बीच से उभर कर एक ऐसा सांस्कृतिक दस्ता आया, जिसने इसे पढ़े-समझे बिना ही इसका विरोध आरम्भ कर दिया। मैंने पहले ही कहा है कि हम इसे धार्मिक ग्रन्थ नहीं मान कर एक ऐतिहासिक स्रोत के के रूप में देख रहे हैं। ऋग्वेद और इसके अन्य अनुसंगी ग्रन्थ चुपके से हमारे कानों में कहते हैं – मुझ से डरो मत। हमारा जमाना बीत गया, लेकिन यह अनुभव हमारे पास जरूर है कि लड़ने-झगड़ने में कुछ भी नहीं रखा है, मिल-जुल कर चलना, एक दूसरे से सीखना और निरंतर गतिमान रहना ही असल चीज है।

(कॉपी संपादन : नवल)


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