सामाजिक न्याय सिद्धांत की राजनीति परखेेंगे डीयू के विद्वान, अरुणाचल में लोक संस्कृति पर चर्चा 

दिल्ली और उत्तर भारत के राज्यों से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक आने वाले दिनों में अकादमिक और बौद्धिक के कई बड़े सम्मेलन, संगोष्ठियां और विचार-विमर्श के कार्यक्रम हो रहे हैं। इस हफ्तावार कॉलम में पढें आगामी आयोजनों का सिलसिलेवार ब्यौरा

अकादमिक दुनिया में समाज व इतिहास

राजनीति में महिलाएं

भारतीय समाज और सत्ता में इस समय ऐसी शक्तियां और प्रवृतियां बलवती हैं जब मनुवादियों की गहरी पैठ है। एक अहम अध्ययन में कहा गया है कि महिलाएं भारतीय समाज में एक ऐसे वर्ग का निर्माण करती हैं जो परम्परागत रूप से प्रताड़ना, उपेक्षा व पिछड़ेपन का शिकार रही है। अतः जब संविधान की प्राथमिकताओं के अनुरूप समाज के कमजोर वर्गों के ऊपर उठाने की बात आती है तो महिला वर्ग उसमें प्रमुख रूप से आता है। यह निर्विवाद तथ्य है कि भारत में महिलाओं की राजनीतिक सहभागिता वर्तमान में अपेक्षित स्तर पर विद्यमान नहीं है। यह सामान्यतः स्वीकार किया जाता है कि सांविधानिक और कानूनी रूप से समानता की घोषणा के पश्चात् भी यदि महिलाएं राजनीतिक प्रक्रिया में समान रूप से भागीदार नहीं है तो इसके लिए भारतीय सामाजिक व्यवस्था ही उत्तरदायी रही है। यदि प्राचीन भारतीय परम्परा पर दृष्टिपात किया जाए तो सामाजिक और सामुदायिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी के विषय में दृष्टिकोण की एकरूपता का अभाव रहा है। एक ओर भारतीय सांस्कृतिक इतिहास में अनेक ऐसे उदाहरण खोजे जा सकते है जहां महिलाओं को सामाजिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों और शासकीय निर्णय प्रक्रिया तक में भागीदारी के अवसर उपलब्ध थे, वहीं दूसरी ओर भारतीय चिन्तन परम्परा में मनु इत्यादि ऐसे कथित विचारकों का स्वर भी मुखर रहा है जिन्होंने महिलाओं की भूमिका को परिवार तक सीमित रखा। तथा उनके स्वतन्त्र सामाजिक अस्तित्व को ही मान्यता प्रदान नहीं की।

इसी अध्ययन के मुताबिक, मनु जैसे कथित विचारकों ने महिलाओं को शिक्षा के अधिकार से वंचित रखने को उचित माना तथा परिवार के बाहर उनकी किसी भूमिका को वांछनीय नहीं माना। निर्णय निर्माण में भागीदारी तो दूर, मनु ने तो न्यायिक प्रक्रिया जैसे प्रसंगों में भी महिलाओं के साथ भेदभाव को उचित ठहराया। न्यायिक प्रक्रिया के सन्दर्भ में मनु का यह मत उल्लेखनीय है कि सामान्यतः किसी मुकदमे में महिलाओं की गवाही स्वीकार ही नहीं की जानी चाहिए। यदि कोई अन्य साक्ष्य उपलब्ध ही न हो तो महिला की गवाही को पुरुष की प्रतिद्वंद्वी गवाही के संबंध में आधी मान्यता प्रदान की जानी चाहिए। अर्थात् मुकद्मों में विरोधी पक्ष के एक पुरूष ने गवाही दी है तो दूसरे पक्ष द्वारा दो महिलाओं की गवाही उस गवाही की बराबरी कर सकेगी। उपर्युक्त उदाहरण न्यायिक प्रक्रिया जैसे विषयों में भी महिलाओं के साथ भेदभाव का स्पष्ट प्रमाण है। मनु के उपर्युक्त भेदभावपूर्ण दृष्टिकोण के बावजूद भारतीय परम्परा में ऐसे उदाहरण हैं जहां सम्पत्ति और उत्तराधिकार के संबंध में महिलाओं के अधिकारों का मान्यता प्रदान की गई। समग्रतः, प्राचीन भारतीय परम्परा महिलाओं की राजनीतिक सहभागिता के संबंध में कोई उज्जवल चित्र उपस्थित नहीं करती। मध्य युग में मुगलकाल के सामाजिक वातावरण व राजनीतिक सत्ता का मिलाजुला प्रभाव यह रहा है कि महिलाओं की राजनीतिक सहभागिता अत्यन्त सीमित हो गयी और उनकी क्षमताएं प्रायः कुंठित हो गई।

इस संदर्भ में गांधी शांति प्रतिष्ठान की ओर से 12 अक्टूबर को आयोजित मेरा रंग संगोष्ठी और पैनल विमर्श महत्वपूर्ण हो जाता है। इस कार्यक्रम का नाम है- महिलाएं और राजनीति। कार्यक्रम में भारतीय राजनीति में महिलाओं की भूमिका और भागीदारी पर चर्चा और पैनल डिस्कसन में कई महत्वपूर्ण लोगों के आख्यान सुनने को मिल सकते हैं।

कार्यक्रम स्थल 221-223, दीनदयाल उपाध्याय मार्ग, नई दिल्ली स्थित है जो शाम के पांच बजे से शुरू होगा।

सामाजिक न्याय के पहलू कितने न्यायसंगत

सत्यवती कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, डॉ. बी.आर. आंबेडकर पीठ (सोशल जस्टिस), भारतीय लोक प्रशासन संस्थान, नई दिल्ली और सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च एंड गवर्नेंस, नई दिल्ली ने इम्प्रेस-आईसीएसएसआर के सहयोग से दो दिन का अंतरर्राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया है। 16-17 नवंबर 2019 को दिल्ली के आईआईपीए में होने वाले इस सेमिनार का विषय है- ’मोदी सरकार की सामाजिक न्याय नीतियां’।

कार्यक्रम की अवधारणा में कहा गया  है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) 2014 में ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे के साथ सत्ता में आई, जिसके माध्यम से समाज के हर वर्ग, विशेष रूप से गरीब और कमजोर वर्गों के सभी समावेशी विकास का वादा किया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा सरकार ने अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, ओबीसी, दिव्यांगों, वरिष्ठ नागरिकों, घुमंतू जनजातियों और अन्य के उत्थान के लिए कई नीतियों को क्रियान्वित किया। मोदी सरकार ने एक कदम आगे बढ़कर और सकारात्मक कार्य नीतियों के नए तरीकों के साथ आने की कोशिश की, इस क्रम में न केवल नौकरियों और रोज़गार में आरक्षण को ठीक से लागू किया गया, बल्कि समाज के कई नए वर्गों और सशक्तिकरण के तरीकों को भी- जिसे अब तक दरकिनार कर दिया गया था- की भी पहचान की गई। 

आयोजकों के मुताबिक, भारत में सामाजिक न्याय की राजनीति पूरी तरह से पहचान की राजनीति पर आधारित है, लेकिन सामाजिक न्याय का बड़ा विचार प्रगतिशील और आधुनिक मूल्य प्रणाली के आधार पर एक समतावादी समाज का निर्माण करना है। नरेंद्र मोदी सरकार ने कई नीतियां बनाई हैं जो पहचान की राजनीति से परे हैं और सामाजिक न्याय के विचार को फिर से परिभाषित करती हैं।

सरकार ने सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण को बाजार की अर्थव्यवस्था से जोड़ने की कोशिश की है और दलित पूंजी निधि, स्टैंड अप योजना, मुद्रा योजना, जन धन और अन्य जैसी नई नीतियों को पेश किया है। इसके चलते समाज, राज्य और बाजार के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया।साथ ही हमने ये भी देखा कि इस दौरान अनुसूचित जातियों और अन्य वर्गों से आरक्षण, प्रतिनिधित्व और इस वर्ग पर अत्याचार जैसे मुद्दों पर कई असंतोष के सुर निकले। आदिवासी क्षेत्रों से उनके विकास और पुनर्वास के बारे में कई आवाजें उठाई गई हैं। वरिष्ठ नागरिकों की संख्या भी दिन पर दिन बढ़ती जा रही है और इसलिए उनकी चिंता भी काफी बढ़ गई है। अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) भी नई मांगों के साथ सामने आया है और कई समुदाय इस सेगमेंट में शामिल होना चाहते हैं। दूसरी ओर, सरकार ने आर्थिक पिछड़े वर्गों की एक नई श्रेणी बनाई है और उन्हें 10% आरक्षण दिया है। मोदी सरकार ने कई नीतियों और अभिनव तरीकों के साथ आने की कोशिश की है लेकिन अभी भी ऐसे मुद्दे हैं जो बहस के केंद्र में हैं, जिन्हें समझने और संबोधित करने की आवश्यकता है।

सत्यवती कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय

प्रस्तावित संगोष्ठी में, मोदी सरकार के सामाजिक न्याय के विचार और भारतीय जनता पार्टी के मूल दर्शन के साथ इसके संबंधों को समझने का प्रयास किया जाएगा। यह संगोष्ठी सामाजिक न्याय की नीतियों और मोदी सरकार के तहत इन नीतियों को कैसे लागू किया गया है, इस पर चर्चा करने का भी प्रयास करेगी। प्रस्तावित विषय-वस्तु हैं – 1. सामाजिक न्याय विमर्श: सिद्धांत और व्यवहार, 2. अंत्योदय और सबका साथ, सबका विकास, 3. हाशिये के वर्गों के मुद्दे और चुनौतियाँ, 4. बदलते समय में दलित मुद्दे, 5. ओबीसी, ईबीसी, घुमंतू जनजातियों और आदिवासियों के लिए मुद्दे और नीतियां, 6. वरिष्ठ नागरिकों और दिव्यांगों के लिए मुद्दे और नीतियां, 7. आरक्षण, प्रतिनिधित्व और मान्यताएं, 8. आरक्षण से परे सकारात्मक कार्रवाई, 9. सीमांत क्षेत्र और निजी क्षेत्र, 10. न्यू इंडिया और सामाजिक न्याय का विचार।

इस बारे में शोधसार या आलेख का संक्षेप 400 शब्दों में भेजना चाहिए। सार प्रस्तुत करने की अंतिम तिथि 15 अक्टूबर, 2019 है। ज्यादा जानकारी के लिए ईमेल एड्रेस seminar.socialjustice@gmail.com या फोन नंबरों 7303712710; 9930912114 से लें।

पूर्वोत्तर की लोक कलाएं और शिक्षा

राजीव गांधी विश्वविद्यालय दोईमुख, ईटानगर अरुणाचल प्रदेश के हिंदी विभाग ने 17 और 18 अक्टूबर 2019 को राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की है जिसका विषय है- लोक कलाएं और शिक्षा (पूर्वोत्तर का विशेष संदर्भ) इस संगोष्ठी को भारतीय शिक्षण मंडल नई दिल्ली, राष्ट्रीय सिंधी भाषा परिषद नई दिल्ली और मौलाना अबुल कलाम आजाद एशियन अध्ययन केंद्र के सहयोग से किया जा रहा है। जानकारी के मुताबिक संगोष्ठी में भाग लेने के लिए कोई पंजीकरण शुल्क नहीं लगेगा।


शैक्षणिक अध्ययनों के मुताबिक, पूर्वोत्तर भारत की लोक और सांस्कृतिक धरोहर बहुत संपन्न है। यहाँ की संस्कृति अनोखी है और वर्षों से इसके कई अवयव अब तक अक्षुण्य हैं। पूर्वोत्तर के प्रान्त अपनी प्राकृतिक बनावट के कारण, भारत का न केवल अभिन्न भाग है बल्कि भारत की समृद्धि में उसकी भूमिका बहुआयामी है। पूर्वोत्तर का समाज बहुधार्मिक, बहुभाषी तथा बहु सांस्कृतिक है। विभिन्न धर्मों के इस भूभाग पर कई मनभावन पर्व और त्योहार मनाये जाते हैं। यहाँ का खानपान बहुत ही समृद्ध है। यहाँ इनकी अपनी संगीत और नृत्य की शैलियाँ विकसित हैं जो बहुत ही लोकप्रिय हैं। प्रकृति का खजाना अछूता, अनुपम सौन्दर्य, जनजातियों की सांस्कृतिक छटा में विविधता और उनका स्वाभाविक सौन्दर्य सब कुछ अपने में अनोखा होने का आभास देता है।

रहन-सहन, रस्म रिवाज, खान-पान, पर्व-त्यौहार सभी में अरुणाचल प्रदेश देश के अन्य भागों से अलग है। विभिन्न जातियों और विभिन्न नस्लों के लोग इस क्षेत्र में समय-समय पर आकर बसे हैं और अब यहीं के होकर रह गए है। यहाँ की मूल

जातियां मंगोल नस्ल की हैं। कुछ तिब्बत के दक्षिणी भाग से सिक्किम आए और कुछ अरुणाचल प्रदेश की पश्चिमी भाग भूटान से दक्षिणी चीन और थाईलैंड से। पहाड़ का जीवन संघर्षों से भरा हुआ है। इन मंगोलियन लोगों के साथ यहाँ द्रविड़ और आर्य जाति के लोग भी मिलते हैं, जो नौकरी पेशा और व्यापार करते हुए यहीं के बाशिंदे हो गए हैं।

संगोष्ठी के कुछ उप-विषय हैं- लोक कलाओं के विविध आयाम, लोक कलाएं और उनका प्रशिक्षण, लोक शिक्षा में लोक कलाओं की भूमिका, प्राचीन शिक्षा पद्धति और लोक कलाएं, नई शिक्षा नीति और लोक कलाएं, लोक कलाएं एवं प्रतीकात्मकता, लोक कलाएं एवं अध्यात्म, लोक कलाओं में प्रतिबिंबित लोकजीवन, लोक कलाओं में अभिव्यक्त दर्शन, लोक कलाओं की वर्तमान दशा और दिशा, पूर्वोत्तर का लोक कलागत वैशिष्ट्य, पूर्वोत्तर एवं लोक कलाओं के तुलनात्मक अध्ययन के आयाम, लोक कलाएं एवं लोक संस्कार, सामाजिकता और लोक कलाएं, लोक कलाएं एवं सांस्कृतिक सरोकार, लोक जीवन में लोक कलाओं की भूमिका, लोक कलाओं में लोक जीवन की अभिव्यक्ति, लोक कलाओं में भारतीय मूल्य दृष्टि, लोक कलाएं और लोकमंगल, लोक कलाएं एवं लोक सौंदर्य बोध।

कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए प्रोफेसर ओकेन लेगो (संगोष्ठी संयोजक) उनके मोबाइल नंबर 9402275615 और डॉ. सत्यप्रकाश पॉल को 8707547595 पर संपर्क किया जा सकता है।

शिवाजी कॉलेज का तर्कोत्सव

दिल्ली के शिवाजी कॉलेज में तीन दिन की संसदीय वावद-विवाद प्रतियोगिता का आयोजन किया है। आयोजकों का कहना है कि इस कार्यक्रम के जरिए छात्र अपने तर्कों में धार देना सीखेंगे। 19, 21, 22 अक्टूबर को होने वाले इस कार्यक्रम का नाम तर्कोत्सव’ 19 दिया गया है। शिवाजी महाविद्यालय लगातार शिवाजी भोंसले संसदीय वाद-विवाद प्रतियोगिता का आयोजन करता है। इस बार ये पाँचवाँ आयोजन है।

आयोजकों ने बताया कि कार्यक्रम में आकर्षित पुरस्कार राशि- विजेता, उपविजेता, सेमी-फाइनलिस्ट के साथ ही क्वार्टर फाइनलिस्ट को दी जाएगी। प्रतियोगिता के सर्वश्रेष्ठ वक्ता को भी पुरस्कार प्रदान किया जाएगा। पंजीकरण लिंक है- https://cutt.ly/shivaji-hinpd। साथ ही नियमावली के लिए लिंक देखें- https://cutt.ly/pd-rulebook तीनों दिन ये कार्यक्रम प्रातः 8:30 बजे कालेज सभागार में शुरू होगा। इस बारे में ज्यादा जानकारी के लिए आस्था अग्रवाल- 9685455964 और संजीव सुमन को 8709429342 फोन नंबरों पर संपर्क करें।

उपनिवेश के दौर की भावनाएं

“औपनिवेशक दौर में भारत में भावनाएं और आधुनिकता” विषय पर सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज (सीएसडीएस) दिल्ली ने 11 अक्टूबर को पुस्तक चर्चा आयोजित की है। इस कार्यक्रम में हर वर्ग के छात्र, शिक्षक और आम लोग शिरकत कर सकते हैं। मार्ग्रिट पर्नाव की पुस्तक- औपनिवेशिक भारत में भावनाएँ और आधुनिकता के परिप्रेक्ष्य में होने वाली इस चर्चा में सुधीर चंद्र और सोफिया सिद्दीकी मुख्य वक्ता होंगे। कार्यक्रम की अध्यक्षता राजीव भार्गव करेंगे।

आयोजकों ने पुस्तक के हवाले से कहा है कि 1857 की क्रांति के उभार और प्रथम विश्व युद्ध के दौरान औपनिवेशिक भारत में भावनाएं और आधुनिकता एक साथ दिख रही थी। कहा जा रहा है कि इस पुस्तक में औपनिवेशिक भारत के उस दौर की प्रमुख राजनीतिक घटनाओं के संदर्भ में उस समय की भावनाओं के प्रचलित अनुभवों, व्याख्याओं और प्रथाओं के केंद्र में रखकर व्याख्या की गई है। जाहिर है पुस्तक औपनिवेशिक भारत की उस समय की आधुनिकता जो कई अनुशासनों और बंधनों से जकड़ी थी, उससे बाहर निकलते हुए बदलावों को देखती है और बड़ा विमर्श तैयार करती है।

पुस्तक के लेखक मार्गेट पर्नाव मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन डेवलपमेंट से संबद्ध हैं और बर्लिन की एक यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं। सुधीर चंद्र मिज़ोरम विश्वविद्यालय, आइज़ोल में एसोसिएट फेलो हैं। सोफिया सिद्दीकी सेंट स्टीफन कॉलेज, दिल्ली में एक सहायक प्रोफेसर हैं। राजीव भार्गव दिल्ली के विकासशील अध्ययन केंद्र के प्रोफेसर हैं।

कार्यक्रम शुक्रवार,11 अक्टूबर 2019 शाम 5 बजे 29 राजपुर रोड, दिल्ली स्थित सीएसडीएस के संगोष्ठी कक्ष में होगा।

आंबेडकर के विचारों का पुनरावलोकन

मोतीलाल नेहरू कॉलेज (सांध्य) दिल्ली विश्वविद्यालय ने “आंबेडकर के विचारों का पुनरावलोकन-बहुआयामी परिशीलन” विषय पर 15 अक्टूबर को राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया है। कार्यक्रम आंबेडकर स्टडी सर्किल के सौजन्य किया गया है जिसमें देश के शोधार्थी, छात्रों और शिक्षकों के अच्छी संख्या में जुटने की उम्मीद है।

उद्घाटन सत्र में मुख्य वक्ता दलित लेखक जयप्रकाश कर्दम होंगे जबकि पहले सत्र में जेएनयू के प्रोफेसर विवेक कुमार और इग्नू के प्रोफेसर प्रमोद कुमार विचार रखेंगे। ये वक्ता सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में अपने विचार रखेंगे। इसके अलावा जेएनयू के प्रोफेसर अजमेर सिंह काजल, डीयू के डॉ. रजत रानी मीनू, जेएनयू के डॉ. तपन कुमार बिहारी बोलेंगे। कार्यक्रम सुबह 10 बजे से शुरू होगा। चुने हुए शोधपत्रों का वाचन शाम के 5 बजे से होगा।

इसमें पूर्ण शोध या आलेख जमा करने की तिथि 11 अक्टूबर है। कार्यक्रम की अधिक जानकारी के लिए इसके संयोजक डॉ. अश्विनी कुमार से संपर्क कर सकते हैं जिनका मोबाइल नंबर है 99680 77465 है।

साहित्य क्षेत्रे 

कथाकर 2019: कथा जो पढ़ी नहीं, सुनाई जाएं

11 से 13 अक्टूबर दिल्ली में “कथाकार 2019” नाम से एक विश्वस्तरीय आयोजन किया जा रहा है। यह अपने आप में इस रूप में अनोखा है क्योंकि इसमें श्रोता ना सिर्फ दुनिया की कहानियों से रूबरू होंगे हैं बल्कि (कहानी के) मौखिक कथा-वाचन की कला को भी जान पाएंगे। ऐसी कथाओं के लुभावने वर्णन के साथ ही इस कार्यक्रम में तीन दिन तक हर शाम कहानियों पर चर्चा भी होगी। कुल 17 सत्रों में पूरा कार्यक्रम चलेगा। आयोजकों का दावा है कि दुनिया भर के पेशेवर रैटनर कहानी कहने का जादू बुनेंगे। संस्था का यह वार्षिक उत्सव कार्यक्रम है जिसके नौवें संस्करण का आयोजन सुंदर नर्सरी में होना है। कार्यक्रम की मुख्य आयोजक सांस्कृतिक संस्था “निवेश” है।


हिमालयन हब फॉर आर्ट, कल्चर एंड हेरिटेज (एचएएचएएचसी) और बाबाजी म्यूजिक की भागीदारी से यह कार्यक्रम किया जा रहा है। कहानी सत्र में भारत के दुर्लभ कला रूप देखने को मिलेंगे तो पोलैंड, ऑस्ट्रेलिया, स्वीडन, रोमानिया, मंगोलिया, लिथुआनिया और ब्रिटेन की कहानियां भी अहम होंगी।

कथा को अदाकारी साथ कहने को लेकर भी एक सत्र है जिसमें “किस्से कहानी और अदाकारी” पर अभिनेता मनोज बाजपेयी से संगीतकार मोहित चौहान बातचीत करेंगे। यह सत्र शुक्रवार शाम 11 अक्टूबर है जिससे कार्यक्रम का आगाज भी होगा।

रंगमंच कलाकार दानिश हुसैन “क़िस्सेबाज़ी : कहानी कहन का आर्बिट” की प्रस्तुति देंगे जिसका निर्देशन उन्होंने खुद किया है। केरल के पारंपरिक थोलपावकुथु कठपुतली प्रदर्शन होगा जिसकी प्रस्तुति तमिल महाकाव्य कम्बा रामायण की शैली में बुनी गई है। कथाकार 2019 में ग्रैमी अवार्डी मोंक्स ऑफ़ शेरिंग मोनेस्ट्री का बौद्ध जप देखा जा सकेगा जो दिल्ली में पहली बार प्रस्तुति देंगे। कार्यक्रम में आदिवासी कथाकार अंकल लैरी वाल्श अपनी स्वदेशी कहानियों के भारतीय दर्शकों के साथ अपने शुरुआती अनुभव को याद करेंगे। फिल्म निर्माता इम्तियाज अली भी फिल्म-निर्माण के बारे में अपनी कहानियों को साझा करेंगे।

ज्ञातव्य है कि पहली बार इस उत्सव का आरंभ 2010 में सहोदर बहनों प्रार्थना, रचना और शगुना गहिलोट की तिकड़ी की प्रस्तुति के साथ हुआ था जिसमें उन्होंने नाट्य शैली में कहानी कहन की कला को पुनर्जीवित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।  शगुना एक पारंगत कहानी वाचक हैं जबकि प्रार्थना और शगुना ने हिमालय क्षेत्र पर आधारित क्यूरियस टेल्स नाम की पुस्तक लिखी हैं, जिसमें लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश के बीच मध्य हिमालयी बेल्ट की कोई ग्यारह लोक कहानियां हैं।

इस उत्सव का आरंभ 2010 में सहोदर बहनों प्रथना, रचना और शगुना गहिलोट की तिकड़ी की पहल के रूप में हुआ, जिन्होंने नाटकीय प्रदर्शन और यात्रा उत्सवों के लिए एक स्वसंपूर्ण कला के रूप में कहानी कहने को पुनर्जीवित करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जबकि शगुना एक मास्टर कहानीकार है, प्रथना और शगुना ने हिमालय से क्यूरियस टेल्स नामक एक पुस्तक लिखी है, जिसमें लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश के बीच हिमालयी बेल्ट से ग्यारह लोक कहानियां हैं।

कथाकार 2019 में यह पहली बार बौद्ध जप (हिमाचल प्रदेश में शेरिंगिंग मठ से ग्रैमी अवार्डी भिक्षुओं द्वारा) भी प्रदर्शित होगा। इसके अलावा पोलिश कथाकार एमिलिया रायतर भी प्रस्तुति देंगी। वह एक प्रसिद्ध वीणा वादक हैं जो अपने देश के गाथा-गीत गाती हैं। ब्रिटेन की एमिली हेनेसी भारत की लोककथाओं काली और महाभारत पर प्रस्तुति देंगी। इसमें दुनिया भर से विशेष रूप से यूरोपीय देशों जैसे ऑस्ट्रेलिया के अलावा रोमानिया और स्वीडन की कहानियां भी सुनाई जाएंगी। इसके अलावा उत्सव में किस्साबाजी को लेकर दो सत्र हैं जो दर्शकों को बहुभाषी रंग की खूबियों के साथ दिखेगा। पहली बार हरियाणवी लोकगीतों को महिला कलाकार रश्मि मान और रुचिता ताहिदी प्रदर्शित करेंगी। दानिश हुसैन दास्तांगो होंगे जिसे वह दास्तां-ए-अमीर हमज़ा सुनाएंगे।

यह आयोजन पहली बार यूनेस्को के तत्वावधान में घुमक्कड़ नारायण नाम से शुरू किया गया था जो ठाकुर विश्व नारायण सिंह की याद में एक यात्रा साहित्य उत्सव था। नारायण भारत के पहले ब्रेल संपादक थे जो देश-दुनिया के साहित्य के उत्साही पाठकों में एक थे।

कार्यक्रम में आगा खान ट्रस्ट ने भी सहयोग किया है। सुंदर नर्सरी दिल्ली हैरिटेज पार्क निजामुद्दीन में है जहां शाम साढ़े पांच बजे से तीनों दिन कार्यक्रम होंगे। कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए पंजीकरण जरूरी होगा। अधिक जानकारी के लिए ‘निवेश’ संस्था को nivesh.india@gmail.com, kathakarfest@gmail.com या फोन नंबर- 9873833362 और 9999088105 पर संपर्क किया जा सकता है।

साहित्यिक अनुवाद की जटिलताएं कम होंगी

दिल्ली विश्वविद्यालय के पीजीडीएवी कॉलेज, शोधसंवाद-रिसर्च फोरम और साहित्य अकादमी की ओर से 11-12 अक्टूबर 2019 को दिल्ली में ‘साहित्यिक अनुवाद और तुलनात्मक अध्ययन में उभरती हुई चुनौतियों का अध्ययन’ विषय के लेकर विशेष सेमिनार रखा गया है। यह सेमिनार दिल्ली के रिंग रोड से लगे नेहरू नगर स्थित कॉलेज परिसर में होगा।

उद्घाटन सत्र सुबह 10:30 बजे शुरू होगा जिसमें पीजीडीएवी कॉलेज के प्राचार्य डॉक्टर मुकेश अग्रवाल, जाने माने चिंतक डॉ. अवनिजेश अवस्थी, जामिया मिल्लिया इस्लामिया की हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. इंदु वीरेंद्रा, साहित्य अकादमी के डॉ. श्रीनिवास राव संबोधित करेंगे। मुख्य भाषण जामिया मिल्लिया इस्लामिया के डॉ मोहम्मद असद्दुदीन रखेंगे। इस सत्र में मुख्य अतिथि राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन और राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के पूर्व अध्यक्ष ब्रजकिशोर शर्मा होंगे तो डॉ जाहिदुल दीवान भी शिरकत करेंगे।

कार्यक्रम के पहले सत्र में अरबी एवं अफ्रीकी अध्ययन केंद्र, जेएनयू के अध्यक्ष अध्यक्ष प्रो. रिजवानुर रहमान, इग्नू के प्रोफेसर डॉ. राजेंद्र प्रसाद पांडेय, जामिया मिल्लिया इस्लामिया के डॉ. विवेक दुबे शिरकत करेंगे। वह हिंदी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।

साहित्यिक अनुवाद एवं तुलनात्मक अध्ययन का पारस्परिक अंत:संबंध विषय पर कन्नड़ भाषा पीठ, भारतीय भाषा केंद्र, जेएनयू के प्रो. पुरुषोत्तम बिलेमाले, फ्रेंच भाषा अध्ययन केंद्र, जेएनयू प्रो. सुशांत कुमार मिश्र विचार रखेंगे। कार्यक्रम में चयनित शोध पत्रों का वाचन भी होगा। भारतीय भाषा और साहित्य में अनुवाद एवं तुलनात्मक अध्ययन की आवश्यकता विषय पर भारतीय भाषा केंद्र, जेएनयू के अध्यक्ष प्रो. देव शंकर नवीन, ब्रजेंद्र कुमार त्रिपाठी अतिथि संपादक, ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ पत्रिका और डॉ. कृष्णा शर्मा एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी विभाग, पीजीडीएवी कॉलेज, डीयू, डॉ. रेखा सेठी एसोसिएट प्रोफेसर, इंद्रप्रस्थ कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय शिरकत करेंगे। इस सत्र में भी चयनित शोधपत्रों का वाचन कार्यक्रम है।

विशेषज्ञों से संवादः साहित्यिक अनुवाद और तुलनात्मक अध्ययन की व्यावहारिक चुनौतियाँ विषय पर हिंदी विभाग दिल्ली विश्वविद्यालय के अध्यक्ष प्रो. पूरनचंद टंडन, भारतीय भाषा केंद्र जेएनयू के उडिया पीठ के प्रो. उदयनाथ साहू, अनुवाद अध्ययन पीठ, जेएनयू के डॉ. जगदीश शर्मा, प्रो. अख़लाक अहमद अंसारी,फारसी एवं मध्य एशिया अध्ययन केंद्र, जेएनयू शिरकत करेंगे।

कार्यक्रम को लेकर अधिक जानकारी के लिए 7678118393, 9871726471, 9718704903, 7503443641, 9756018177 पर संपर्क किया जा सकता है। ईमेल पता है apnetwork18@gmail.com । इस संगोष्ठी को ‘प्रकाशन संस्थान’ दिल्ली के सहयोग से किया जा रहा है।

गांधी और हिंदी साहित्य

छत्तीसगढ़ के रायपुर में रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय ने 22, 23, 24 अक्टूबर को हिंदी साहित्य और गांधीवाद विषय पर तीन दिन की राष्ट्रीय गोष्ठी का आयोजन किया है। यह कार्यक्रम साहित्य और भाषा अध्ययनशाला के सहयोग से किया जा रहा है। रायपुर में ही विश्वविद्यालय के सभागार में होगा।

इसमें देशभर से वक्ताओं को आमंत्रित किया गया है। इनमें प्रोफेसर मोहन (दिल्ली), प्रोफेसर करुणा शंकर उपाध्याय (मुंबई), प्रोफेसर अरुणा होता (कोलकाता), प्रोफेसर सूरज पालीवाल (नागपुर), प्रोफेसर कुमार पंकज (लखनऊ), प्रोफेसर आनंद कुमार त्रिपाठी (सागर), प्रोफेसर शैलेंद्र शर्मा (उज्जैन), प्रोफेसर दिनेश कुशवाह (रीवा), प्रोफेसर ईश्वर चंद्र दोस्त (भोपाल), प्रोफेसर राजेंद्र मिश्र (रायपुर), प्रोफेसर चितरंजन कर (रायपुर), प्रोफेसर मृदुला शुक्ल (खैरागढ़), प्रोफेसर सियाराम शर्मा (दुर्ग) शामिल हैं।

ज्यादा जानकारी के लिए संगोष्ठी संयोजक डॉक्टर मधुबाला बारा को 94255-42755 पर या ईमेल एड्रेस literaturelanguage64@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है। इसके अलावा आयोजक समिति के डॉ गिरिजा शंकर गौतम, राजेश दुबे, सुधीर शर्मा को संपर्क किया जा सकता है जिनके क्रम से मोबाइल नंबर हैं- 94242 29233, 94062 37888, 90390 58748

कामायनी और गीतांजलि की विशिष्टता

शिवाजी कॉलेज, हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय और महाकवि जयशंकर प्रसाद फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया है। जिसका विषय है- कामायनी तथा गीतांजलि का वैशिष्ट्य। यह संगोष्ठी 11 नवम्बर 2019, सोमवार को सुबह 9 बजे से शाम 6 बजे तक तक शिवाजी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय के सभागार में होगी।

आयोजकों ने संगोष्ठी को लेकर केंद्रित विषय पर शोध परक आलेख आमंत्रित किए हैं जो न्यूनतम 2000 शब्दों में होने चाहिए। इस संबंध में अधिक जानकारी के लिए ईमेल एड्रेस darshan.du@gmail.com पर या मोबाइल नंबर 9891320580 पर संपर्क किया जा सकता है। संगोष्ठी आयोजन से जुड़े प्रमुख नाम हैं- डॉ दर्शन पाण्डेय संयोजक एवं प्रभारी, हिंदी विभाग, शिवाजी कॉलेज, विजय शंकर प्रसाद, न्यासी, महाकवि जयशंकर प्रसाद फाउंडेशन और डॉ. शशि निझावन, प्राचार्या, शिवाजी कॉलेज।

मसरूर जहां की याद

मसरूर जहां को कम लोग ही जानते हैं, लेकिन उनकी याद में जामिया नगर दिल्ली में 12 अक्टूबर को विशेष आयोजन रखा गया है। इसमें देश के कई चिंतक मसरूर के जीवन और उनकी रचनाओं की सार्थकता पर चर्चा करेंगे। कार्यक्रम में प्रोफेसर शमां अफरोज जैदी, नईमा जाफरी पाशा, प्रोफेसर सद्दीक और आर. रोही व्याख्यान देंगे।

मसरूर जहां का जन्म 8 जुलाई, 1938 को फतेहपुर में लखनऊ के पास बाराबांकी जिले में एक विद्वान परिवार में हुआ था। उनका जन्म और पालन-पोषण लखनऊ में हुआ। उनके दादा, प्रो. शेख मेहदी हुसैन नासरी लखनावी ’एक प्रसिद्ध कवि और लेखक थे और सात भाषाओं में पारंगत थे। उन्होंने कई किताबें लिखने के साथ इसाबेला थोबर्न कॉलेज, इलाहाबाद विश्वविद्यालय और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में उर्दू, अरबी और फ़ारसी भी पढ़ाई की। उनका काव्य संग्रह-नज़्र-ए-अहबाब’ और ‘ग़ुबार-ए-सहरा’ के नाम से प्रकाशित हुआ था, जबकि उनकी लिखी सनादे-ए-आजम’ पुस्तक आज कई विश्वविद्यालयों में पाठ्यक्रम का हिस्सा है।

एक दौर में उनकी लघु कथाएँ और उपन्यास भारत, पाकिस्तान और कनाडा से प्रकाशित हुए हैं। उनकी लघु कथाएँ और आलोचनात्मक निबंध ‘पाकीज़ा आंचल’, ‘बेइसेन सादी’, ‘नया दर’, ‘सब-ए उर्दू’ जैसी प्रमुख लोकप्रिय पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं। वह रेडियो की नियमित आवाज थीं। हाल ही में उनके गृहनगर लखनऊ में उनका निधन हो गया था।

कार्यक्रम में उनके लिखी रचनाओं का भी पाठ होगा। कार्यक्रम के लिए रजिस्ट्रेशन के लिए www.kaarvaanindia.com पर जाएं। कार्यक्रम कारवां ओपन स्टूडियो अब्दुर रब अपार्टमेंट गफ्फार मंजिल जामिया नगर में शाम 5 बजे से होगा।

कहानी कहने के हुनर पर कार्यशाला

आप अगर शिक्षक या प्रशिक्षक या एक महत्वाकांक्षी स्टोरी टेलर (कथा वाचक) तो आप अपनी विधा को और शक्तिशाली बना सकते हैं। “कहानी शेयर करें” नाम से दो दिन की एक कार्यशाला ब्रिटिश कौंसिल ने चंडीगढ़ में आयोजित की है। इस कार्यशाला में दुनिया में कई जगह अपनी कहानी कहने की कला को लेकर मशहूर रही कथाकर वेर्जिन गुलबेर्किन शिरकत करेंगी।

प्रसिद्ध कहानीकार वेर्जिन से इस कार्यशाला में आप पारंपरिक कहानियों पर काम करना और उन्हें अभ्यास करते रहने से कहने का हुनर सीख सकते हैं। कार्यशाला 14 अक्टूबर सुबह 10 बजे और 15 अक्टूबर शाम 6 बजे होगी। चंडीगढ़ में ब्रिटिश कौंसिल का ऑफिस सेक्टर 9 के अलावा इंडस्ट्रियल एरिया फेज-1 में भी है।

विज्ञान की दुनिया में

कोलकाता में साइंस कॉन्फ्रेंस

इंडिया इंटरनेशनल साइंस फोरम का चार दिवसीय सम्मेलन इस बार कोलकाता में 5 से 8 नवंबर को होगा। इस बार इसके केंद्र में युवा वैज्ञानिकों को मंच देना है। इस चार दिनों की इस यंग साइंटिस्ट कॉन्फ्रेंस (वाईएससी) में शिरकत के लिए युवाओं, युवा वैज्ञानिकों/ शोधकर्ताओं/ संकाय/ साइंस इनोवेटर/ राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं के पेशेवरों से लेकर शैक्षणिक संस्थानों और उद्योग प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया है। पोस्ट-डॉक्टोरल और डॉक्टरेट में सभी क्षेत्रों के फेलो, एमएससी और बी-टेक छात्र भी आयोजन में भाग ले सकते हैं। भारत में वाईएससी वैज्ञानिक अनुसंधान और तकनीकी के विकास से जुड़े सभी क्षेत्र के वैज्ञानिकों के अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान महोत्सव का आमंत्रण भेज रहा है। यह युवा और उत्साही लोगों के लिए एक बड़ा मंच प्रदान करेगा जहां शोधकर्ता अत्याधुनिक अनुसंधान और प्रौद्योगिकी का पता लगाने के लिए अंतःविषय दृष्टिकोण विकसित कर सकेंगे।

आयोजकों का कहना है वाईएससी उन्हें भी बढ़ाने का अवसर देगा जो अनुसंधान के साथ ही शैक्षणिक नेटवर्क से जुड़े विशेषज्ञ हैं। संस्था को उम्मीद है कि वे नवीनतम अनुसंधान और तकनीकी चुनौतियों को देश की तत्काल जरूरतों से जुड़े विषयों को समेट सकेंगे। इसमें समानांतर रूप से एक विशेष सत्र होगा जहां युवा वैज्ञानिक अपनी उपलब्धियों को लेकर पोस्टर भी लगा सकेंगे। सेशन में पीएचडी के बाद देश और विदेशों में उद्योगों में कैरियर के मौकों को लेकर चर्चा की जाएगी। युवा शोधकर्ताओं के बीच वैज्ञानिक राष्ट्रीय नीतियां  को साझा करने और शिक्षित करने का प्रयास के लिए “अनुसंधान पद्धति और अनुदान प्रस्ताव ” पर चर्चा की जाएगी। सामान्य के अलावा निर्दिष्ट विषयों पर पोस्टर सत्र होंगे जिनमें “जल संकट और संरक्षण” विषय भी शामिल किया गया है।

कार्यक्रम में उन शोधकर्ताओं को विशेष प्रोत्साहन दिया जाएगा जो उद्योग बिरादरी और वैज्ञानिक मीडिया हाउस (जर्नल और विज्ञान संचारक) से जुड़े हैं ताकि वे अपनी उपलब्धियों बता सकें भविष्य की संभावनाओं पर चर्चा करें।प्रतिनिधियों को उनके संबंधित विश्वविद्यालयों/ संस्थानों, विभाग/ अनुसंधान एवं विकास लैब्स  द्वारा नामित किया जाएगा जिसके बाद वे शिरकत करेंगे। इसके अलावा इच्छुक उम्मीदवार सीधे ऑनलाइन पंजीकरण के माध्यम से आवेदन कर सकते हैं जिन्हें शोध सार-संक्षेप के आधार पर आयोजक शॉर्टलिस्ट करेंगे।

प्रस्तुति के लिए थीम्स- अनुसंधान के सीमांत क्षेत्र (सभी विषय), जीवविज्ञान (कृषि, चिकित्सा विज्ञान और प्रौद्योगिकी सहित), रसायन विज्ञान (मूल और एप्लाइड), इंजीनियरिंग (नवीनतम इंजीनियरिंग अनुसंधान से संबंधित), भौतिकी और गणित (मूल और एप्लाइड, साइबर सुरक्षा, क्रिप्टोलॉजी और क्रिप्टोग्राफी), मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, जैव विविधता, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन, स्वच्छ भारत। स्वच्छ भारत के तहत- जल संकट और संरक्षण (विशेष पोस्टर सत्र का विषय)। चर्चा के लिए विषय-वस्तु होंगे- राष्ट्रीय वैज्ञानिक नीतियां, कैरियर के अवसर, रिसर्च मेथोडोलॉजी एंड फंडिंग प्रपोजल। पोस्टर सत्र के लिए थीम्स- उपरोक्त सभी विषय, जल संकट और संरक्षण पर विशेष पोस्टर सत्र।

कौन आवेदन कर सकता है? युवा वैज्ञानिक, संकाय सदस्य, पोस्ट-डॉक्टरल फैलो, पीएचडी धारक और एमएससी और बी-टेक अंतिम वर्ष प्रतिभाशाली छात्र व वैज्ञानिक इसमें भी भाग ले सकते हैं। प्रतिभागी की उम्र 5 नवंबर, 2019 तक 45 साल से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। भागीदारी के लिए प्रतिनिधि को संस्थानों के प्रमुख द्वारा नामित किया जाना चाहिए जिनमें निदेशक, कुलपति और विश्वविद्यालयों के प्रभागों के प्रमुख, डीन फैकल्टी आदि के प्रमुख हैं। इसके अलावा प्रतिनिधि ऑनलाइन पंजीकरण भी कर सकेंगे। आयोजन समिति के अयान दत्ता, फोन नंबर- 98742 95938, जाजती के. नायक, फोन नंबर 94331 18008, अमित सिंह, फोन नंबर 78272 63051 और प्रवीन फोन नंबर 94456 24768 पर संपर्क कर सकते हैं। इसके अलावा ysc@scienceindiafest.org पर ईमेल के जरिए भी संपर्क साधा जा सकता है।

ज्ञातव्य है कि 2015 में इंडिया इंटरनेशनल साइंस फेस्टिवल (आईआईएसएफ) विज्ञान और प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने के मकसद से बनाया गया था। इसका उद्देश्य विज्ञान के क्षेत्र में कम समय में भारत को विकसित राष्ट्र की ओर ले जाना है। साथ ही संस्था का उद्देश्य जनता को विज्ञान के साथ जोड़ना है। इसे विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय और पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सक्रिय सहयोग से मिलकर बनाया गया है।

तकनीकी विकास व प्रौद्योगिकी पर सम्मेलन

महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक हरियाणा ने यूजीसी और एसएपी की मदद से 14-15 अक्टूबर को “विज्ञान और तकनीकी विकास के लिए प्रौद्योगिकी” पर दो दिन का राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया है। इस कार्यक्रम के लिए देशभर से वैज्ञानिक शिक्षक और छात्र अपने शोध पत्र और आलेख पढेंगे। कार्यक्रम ग्रामीण विकास के लिए होने वाले विज्ञान और प्रौद्योगिकी के सम्मेलनों के तहत किया जा रहा है। सम्मेलन के विषय पर पोस्टर सत्र भी रखा गया है।

आयोजकों का कहना है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी हमारे रोजमर्रा के जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इसकी विविध शाखाएँ समाज में एक साथ काम करत हैं। समाज के विकास और लाभ में विज्ञान की भूमिका महत्वपूर्ण है। सम्मेलन में रासायनिक विज्ञान, भौतिक विज्ञान, जीवन विज्ञान, चिकित्सा विज्ञान, पशु चिकित्सा विज्ञान, कृषि विज्ञान, औषधि विज्ञान, टेक्नोलॉजी  इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी, कंप्यूटर विज्ञान समाहित हैं। प्रतिभागी अधिक जानकारी के लिए ncstrd.orgsec@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं। फोन नंबर हैं 01262-393131, 9813805666, 9466722544, 9896001262, 9416175000 

मिट्टी की सेहत के लिए फ्रिकमंद

जमीन की उर्वरता लगातार लगातार खत्म होने को लेकर वैज्ञानिक चिंता में हैं। सोयल कंटीनिनेशन रिसर्च इंडियन नेटवर्क (आईएनसीएसआर) और सूक्ष्म जीव विज्ञान विभाग ने 11-12 अक्टूबर को रोहतक विश्वविद्लाय में दो दिन का अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन रखा है। कार्यक्रम में माइक्रोबायोलोजी और इस क्षेत्र के मौजूदा रुझानों के वैश्विक परिप्रेक्ष्य पर चर्चा की जाएगी। कार्यक्रम राधा कृष्ण सभागार में होगा।

सम्मेलन के बारे में आयोजको ने कहा है कि इसमें एनआईआई के निदेशक डॉ. अमूल्य पांडा मुख्य व्याख्यान रखेंगे। इसके बाद चर्चा और आमंत्रित अंतर्राष्ट्रीय वक्ता अपनी राय रखेंगे। सम्मेलन पूर्व कार्यशाला “हैंड्स आन टू कम्प्यूटेशनल बायोलॉजी” पर चर्चा की जानी है।

सेमिनार के उद्देश्य को लेकर आयोजकों ने कहा है कि आज पारिस्थितिकी ने मानव निर्मित रसायनों या इस जैसे अन्य कारणों से प्राकृतिक मिट्टी के वातावरण में परिवर्तन आया है। ऐसा आमतौर पर औद्योगिक गतिविधि, कृषि रसायनों के कारण होता है। कचरे का अनुचित तरीकों से निपटान इसका एक प्रमुख कारण है। माइक्रोबायोम में वर्तमान रुझान में एक वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखने की कोशिश की जाएगी।

समिनार के उपविषय हैं-  माइक्रोबायोम और उसके भविष्य की संभावनाएँ, मिट्टी और कृषि माइक्रोबायोलॉजी, सूक्ष्मजीवियों की कार्यात्मक विविधता. जैव सूचना विज्ञान और मेटागेनोमिक्स: भविष्य की संभावनाएं, संयंत्र-मृदा माइक्रोब बातचीत माइक्रोबियल संक्रमण और रोग। अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें: कृष्ण कांत शर्मा (मो. नंबर- 9996303126) kekulsharma@gmail.com और डॉ राजीव कपूर (मो. नंबर 8901529477) patent.agent.biotech@gmail.com को।

गणित का ग्राफ और डिजिटल दौर

इनोवेशन इन ग्राफ्स एंड इट्स एलायंस इन डिजिटल ईरा- 2020 (आईसीआजीए-2020) विषय पर केरल विश्वविद्यालय तिरुअनंतपुरम ने 22 से 24 जनवरी 2020 को तीन दिन का अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया है। आयोजकों का कहना है कि आधुनिकीकरण के दौर में तेजी से प्रगति के युग में ग्राफ सिद्धांत नए निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वैज्ञानिक तकनीकों में कई की जड़ें मूल और शुद्ध रूप से गणित में जुड़ी हैं।

आयोजक केरल विश्वविद्यालय का कहना है कि आज का दौर नए विचारों और अनुसंधानों का है। हम चाहते हैं कि दुनिया में व्यापकता के इस स्वरूप को वैज्ञानिक और युवा गणितिज्ञ एक मंच पर जमा होकर समझें। सम्मेलन का उद्देश्य दुनिया शिक्षाविदों और शोधकर्ताओं के लिए गणित और उसके अनुप्रयोग के भविष्य के पहलुओं पर अपने अनुभवों और विचारों का आदान-प्रदान कराना और साझा करना है। साथ ही सम्मेलन में गणित में विभिन्न क्षेत्रों के बीच संबंधों पर चर्चा करने का अवसर दिया जा रहा है। ग्राफ थ्योरी और उससे संबंधित क्षेत्रों में अनुसंधान का व्यापक ज्ञान प्राप्त करने के लिए यह पहल जरूरी हो जाती है। युवा शोधकर्ताओं के बीच जागरूकता बढ़ाने के लिए और इसका पता लगाने के लिए उनके पसंदीदा क्षेत्रों की संभावनाएं जाननी भी जरूरी हो जाती है।

सम्मेलन में सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुति पर पुरस्कार (नकद और प्रमाण पत्र) दिए जाएंगे। कार्यशाला के बारे में अधिक जानकारी के लिए प्रोफेसर मंजू वीएन गणित विभाग, केरल विश्वविद्यालय, फोन नंबर 8129391763/ 8075907792 पर संपर्क किया जा सकता है। इसके अलावा आयोजन सचिव डॉ जी सुरेश सिंह मोबाइल नबंर 9447471455 या उनके ईमेल पते iciga2020@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

अन्य

सीखेंगे शोध करने के सरल तौर-तरीके

संस्कृति, मीडिया और शासन केंद्र जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली ने यूजीसी के यूनिवर्सिटी अनुदान संभावना केंद्र के साथ मिलकर सात दिवसीय अनुसंधान पद्धति कार्यशाला का आय़ोजन किया गया है। कार्यशाला 11 से 17 दिसंबर को होगी जिसमें तमाम विषयों की अनुशासनों की जांच, उनकी शैलियों को देखने परखने की कोशिश होगी। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य मीडिया और संचार अध्ययन के विषयों को लेकर छात्रों को इस तरह पारंगत करना है ताकि वो शोध के लिए अध्ययन सामग्री जुटाकर आगे का मार्ग प्रशस्त कर सकें। कार्यशाला में अनुसंधान तकनीक पर जोर होगा।

मीडिया, जनसंचार अध्ययन, सामाजिक विज्ञान अध्ययन और मानविकी से जुड़े युवा जो एमफिल/ पीएचडी कर रहे हैं, इस कार्यशाला में भाग लेने के पात्र हैं। इसमें भाग लेने के लिए पंजीकरण के समय सुविधा होगी कि आप बता सकें इस दौरान दिल्ली में रहने के लिए आपको आवास चाहिए तो इसकी व्यवस्था शुल्क लेकर आयोजक कराएंगे।

इच्छुक विद्वान नीचे दिए गए लिंक पर ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं जिसकी एक हार्ड कॉपी भी जमा करानी होगी। इसे 15 नवंबर, 2019 तक पंजीकृत/ स्पीड पोस्ट के माध्यम से आवश्यक दस्तावेजों के साथ भेजा जाना चाहिए। अधिक जानकारी के लिए लिखें: cpepaccmg@gmail.com पर। महत्वपूर्ण तिथियाँ- ऑनलाइन आवेदन करने की अंतिम तिथि 2 नवंबर, 2019। चयनित प्रतिभागियों की सूची: 5 नवंबर, 2019। पंजीकरण शुल्क जमा करने की अंतिम तिथि: 15 नवंबर, 2019। कार्यशाला की अवधि: 11-17 दिसंबर, 2019। आयोजन समिति में बिस्वजीत दास, साइमा सईद, डॉ ए काइसी, डॉ अज़ाज़ अहमद गिलानी हैं। साथ ही डॉ रतन कुमार रॉय, शारिक जलाल, रिद्धि कक्कड़, शंभु दास साहू संगोष्ठी सहायक हैं। कार्यशाला का स्थान है- संस्कृति, मीडिया और शासन केंद्र, जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली -110025। ऑनलाइन पंजीकरण लिंक है-

https://docs.google.com/forms/d/1njabDBVxNkdaDKxO6gAnauKfHcCrSzPCclKgp जामिया केंद्र के आयोजकों का आधिकारिक नंबर 011 2693 3810 है। 

लखनऊ से सनतकदा की दस्तक

इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के सहयोग से नई दिल्ली में लखनऊ के महिंद्रा सनतकदा ने 11 अक्टूबर से 15 अक्टूबर तक 5 दिन का महोत्सव आयोजित किया है। अवध और लखनऊ की शान से भारतीय संस्कृति में जितना कुछ भरा है, वो इस महोत्सव में देखने को मिल सकेगा। यहां की संस्कृति, कला और उसका शिल्प रोज नए आकार इसलिए लेता है कि क्योंकि उसकी रवायत बहुत संपन्न है। कार्यक्रम में अवधी शिल्प प्रदर्शनी ‘हुस्न-ए-कारीगरी अवध’, संस्कृति को दिखाती ‘सोजखवानी’ के अलावा फिल्म समारोह ‘फिल्मी दुनिया में अवध’, “अवध के चाँद वर्क़” का प्रदर्शन होगा।

आयोजकों के मुताबिक, 11 अक्टूबर 2019 शाम 4 बजे अवध से चांद वर्क़ में तस्वीरें, कलाकृतियां, अभिलेखीय वस्त्र, पुस्तक और पत्रों की प्रदर्शनी लेगेगी। लखनऊ की भौतिक और संस्कृति की विविधता की झलक दिखाई जाएगी। वुडवर्क का खास शिल्प काबिलेगौर होगा। 5 बजे हुस्न-ए कारीगरी-ए-अवध में दिग्गज कलाकारों का लाइव प्रदर्शनी लगेगी।

इस मौके पर ‘फ़िल्मी दुनिया में अवध’ कार्यक्रम के तहत शतरंज के खिलाड़ी फिल्म का शो रखा गया है। सत्यजीत रे निर्देशित इस फिल्म में संजीव कुमार, सईद जाफरी, शबाना आज़मी है। फिल्म अवध के शान और विरासत को जीवंत करती है। 12 अक्टूबर को- अवध से चांद वर्क़, तस्वीर, कलाकृतियों, अभिलेखीय वस्त्रों, पुस्तकों और पत्रों की प्रदर्शनी देखी जा सकती है। फिल्म चौदहवीं का चाँद (निर्देशक: मोहम्मद सादिक, कलाकार गुरुदत्त, वहीदा रहमान, मीनू मुमताज़) और पाकीज़ा (निर्देशक: कमाल अमरोही, कलाकार मीना कुमारी, राज कुमार, अशोक कुमार) के शो भी कार्यक्रम में होंगे।

सोज़ ख़्वानी या विलाप के गीतों का कार्यक्रम काफी खास है। इसे उत्तर प्रदेश के मुस्तफाबाद के अस्करी नकवी दुर्लभ काव्यात्मक, संगीतमय, कहानी कहने की कला के साथ पेश करेंगे। यह कर्बला में 1400 साल पहले की बुराई और सच्चाई के बीच की लड़ाई की कहानी है।

13, 14 और 15 अक्टूबर को भी इसी तरह के भिन्न-भिन्न शैक्षणिक, सांस्कृतिक और अन्य कार्यक्रम है। प्रदर्शनी स्थल फव्वारा लॉन और फिल्म की स्क्रीनिंग स्थल सीडी देशमुख सभागार है। इस संबंध अधिक जानकारी के लिए 94151 04361, 99369 14134, 98898 98741 मोबाइल नंबरों पर संपर्क किया जा सकता है।

(कॉपी संपादन : नवल)


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