आदिवासी चाय श्रमिकों की सुध कौन लेगा?

सवाल यही है कि पश्चिम बंगाल के चाय बागानों में काम करने वाले श्रमिक केवल आदिवासी होने के कारण उपेक्षा के शिकार हैं? उनकी दयनीय हालत व सरकार के दावों की पड़ताल कर रहे हैं राजन कुमार

हम चाय की चुस्की से ही ताजगी भरे दिन की शुरूआत करते हैं, लेकिन चाय की चुस्कियां लेते वक्त क्या हमारे मन में कभी यह ख्याल आता है कि उस चाय का उत्पादन करने वाले श्रमिक किस हाल में जीवन-बसर कर रहे हैं? आपको जानकर हैरानी होगी कि आपके चाय की चुस्की के बीच चाय श्रमिकों की जिंदगी सिसक रही है। इनमें से अधिकांश आदिवासी समुदायों के हैं।

अंग्रेजों के द्वारा लाए गए थे आदिवासी

पश्चिम बंगाल के चाय बागान, जो दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी और अलीपुरदुआर जिले में फैले हैं, जिन्हें पहाड़, तराई और डुवार्स क्षेत्र के नाम से जाना जाता है। ब्रिटिश काल के दौरान झारखंड-छत्तीसगढ़ से लाखों की संख्या में आदिवासी मजदूरों को जंगल साफ कर चाय की खेती करने के लिए लाया गया। लेकिन गरीबी, अशिक्षा, प्रतिकूल परिस्थितियां एवं अनेक कारणों से ये आदिवासी मजदूर वापस अपने घर नहीं जा सके और बंगाल के इन्हीं चाय बागानों में रच-बस गए। 

पश्चिम बंगाल के दर्जीलिंग में एक चाय श्रमिक का घर और एक वृद्ध आदिवासी महिला

संयुक्त श्रम आयुक्त, उत्तर बंगाल क्षेत्रीय श्रम कार्यालय द्वारा  2009-10 में किए गए सर्वे के अनुसार पहाड़, तराई और डुवार्स क्षेत्र कुल 276 चाय के बागान होना बताया गया है, जिनमें पहाड़ क्षेत्र में 81, तराई में 45 और डुवार्स क्षेत्र में 150 चाय बागान है। पहाड़ क्षेत्र के अधिकतर श्रमिक गोरखा हैं, जबकि तराई और डुवार्स में अधिकतर श्रमिक आदिवासी हैं। इन चाय बागानों में 1.87 लाख परिवार निवासरत हैं जिनकी संख्या 11.3 लाख है, जबकि 96 हजार श्रमिक दिहाड़ी मजदूर के रूप में कार्यरत हैं और चाय बागान के बाहर आसपास के क्षेत्रों या गांवों मेें रहते हैं। 

बागानों में इन श्रमिकों को रहने के लिए एक टीन-शेड का झोपड़ीनुमा कमरा मिल जाता है, जिसमें ये पूरी जिंदगी गुजार देते हैं। उक्त सर्वे के अनुसार सिर्फ 3156 परिवारों को सरकारी योजना के अनुसार आवास की सुविधा मिल सकी है। वहीं 44 चाय बागानों में शौचालय की भी व्यवस्था नहीं है।

पहले भी आती रही हैं श्रमिकों की दयनीय हालत की खबरें

इन श्रमिकों के बारे में समय-समय पर खबरें आती रही हैं। मसलन, वर्ष 2015 में ब्रिटेन की पीजी टिप्स, टेटलीज और ट्विनिंग्स जैसी चाय कंपनियों की पहल पर बीबीसी न्यूज़ द्वारा असम एवं पश्चिम बंगाल के चाय बागानों की पड़ताल की गई, जिसमें पाया गया कि बागान के मज़दूर और उनके परिवारों के हालात इतने बुरे हैं और मज़दूरी इतनी कम है कि उनमें कुपोषण आम बात है और इसलिए वो बीमारियों के जल्द शिकार हो जाते हैं। 

दिसंबर, 2017 में मुझे स्वयं अलीपुरदुआर जिले के कुमारग्राम और फालाकाटा क्षेत्र के कुछ चाय बागानों में जाने का मौका मिला। चाय श्रमिकों ने बताया कि बागान में सप्ताह में छह दिन के हिसाब से काम मिलता है, जिसमें प्रत्येक श्रमिक को 25 किलो चाय की पत्ती प्रतिदिन तोड़ना अनिवार्य रहता है, जिसे तोड़ने में कम से कम 8 से 9 घंटे लगते हैं। कम तोड़ने पर प्रति किलो 3 रुपये की दर से मजदूरी में कटौती होती है जबकि अधिक तोड़ने पर मात्र डेढ़ रुपये प्रति किलो का भुगतान किया जाता है। हालांकि चाय बागान की तरफ से पत्ती तोड़ने के लिए प्रतिदिन न्यूनतम 6 घंटा और सप्ताह में 48 घंटा निर्धारित किया गया है। 

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वर्तमान में मजदूरी के रूप में 167 रूपए प्रतिदिन मिलता है, कहीं-कहीं 176 रुपए, जो पश्चिम बंगाल में अकुशल श्रमिक के लिए न्यूनतम मजदूरी दर 290 रूपए से 114 रुपए कम है। उन्हें बस 176 रूपए में अपना परिवार पालना पड़ता है। दूर-दूर तक सिर्फ चाय के बागान ही होते हैं, जहां चाय की पत्ती तोड़ने के सिवाय कोई दूसरा काम नहीं मिलता है। लेकिन असल मुसीबत तब आती है जब चाय बागान मालिक चाय श्रमिकों को दो-तीन महीने तक मजदूरी नहीं देते या बिना मजदूरी दिए चाय बागान बंद कर भाग जाते हैं।

चाय बागान बंद होने के बाद चाय श्रमिकों के पास जीविका का कोई साधन नहीं बचता है। पास के चाय बागानों में कुछ श्रमिकों को ही पत्ती तोड़ने का काम मिल पाता है, क्योंकि उनके पास पहले से ही पर्याप्त श्रमिक होते हैं। आसपास कोई दूसरा काम नहीं होने से कुछ महानगरों की तरफ रूख कर लेते हैं। जो बच जाते है उन्हें अपना और परिवार का भरण-पोषण करना दूभर हो जाता है। स्थिति इतनी दयनीय हो जाती है कि भूखों मरने की नौबत आ जाती है।

मालिक और सरकार : सब एक समान उदासीन 

आलम यह है कि हर दिन किसी न किसी चाय बागान के बंद होने तथा श्रमिकों को समय पर वेतन तथा अन्य सुविधाएं नहीं देने की बात सामने आती रहती हैं। बागान मालिकों के मनमाने रवैये एवं राज्य सरकार और केन्द्र सरकार द्वारा अनदेखी के कारण इन चाय श्रमिकों की स्थिति दिन-प्रतिदिन बदहाल होती जा रही है। कई श्रमिकों की भूख से मौत भी हो चुकी है। लेकिन इस सच्चाई को ना तो कभी राज्य सरकार ने स्वीकार किया और ना ही बागान प्रबंधकों ने। 

एक उदाहरण यह भी देखिए। अलीपुरदुआर जिले के कालचीनी प्रखंड में ही राईमाटांग चाय बागान और कालचीनी चाय बागान विगत 3 माह से बंद पड़ा है। जहां दियारी मुंडा, संजय उरांव समेत कई श्रमिकों ने पिछले दिसंबर माह में भोजन एवं चिकित्सा के अभाव में दम तोड़ दिया था। अलीपुरदुआर के ही मदारीहाट ब्लाक में 4000 श्रमिकों वाला मुजनाई चाय बागान एक वर्ष से बंद पड़ा है।

चाय बागान में काम करती एक महिला श्रमिक

चाय श्रमिकों को सरकारी योजनाओं का भी कोई खास लाभ नहीं मिलता है। वीर बिरसा, नवा पढ़ा, झारखंड धारा और निरंग पझरा जैसे पत्रिकाओं का संपादन कर चुके और पश्चिम बंगाल के चाय बागानों पर गहरी नजर रखने वाले एवं चाय बागानों में जन्में जलपाईगुड़ी जिले के नेह अर्जुन इंदवार ने अपने फेसबुक पर बांग्लाभाषी उत्तरबंगा समाचार पत्र के हवाले से लिखा था कि “डुवार्स-तराई और दार्जीलिंग के करीब 300 चाय बागानों में चाय श्रमिक 1855-60 से बसे हुए हैं। एक ही स्थान पर बसने और काम करने की उनकी अवधि 2019 तक कमोबेश 160 से 165 वर्ष हो गया है। 165 वर्ष से जिस जमीन पर चाय श्रमिक पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक ही घर में रह कर चाय बागानों में अपनी कई पीढ़ियों को खपा दिए हैं। खून-पसीना बहा कर हर वर्ष कई अरब रूपए टैक्स और आयात आय प्राप्त करने में महत्वपूर्ण योगदान कर रहे हैं। वे पिछले 10 वर्षों से लगातार अपने 165 वर्ष के आवासीय भूमि पर मालिकाना हक मांग रहे हैं। लेकिन दर्जनों बार उनकी मांग पर विचार करने के वादा करने के बावजूद उन्हें सरकार द्वारा सिर्फ नजरंदाज किया गया है।” 

चूंकि उक्त अधिकतर चाय श्रमिक आदिवासी हैं और जिस जमीन पर रह रहे हैं, वह वन भूमि के रूप में दर्ज है, इस तरह से वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत भी वे श्रमिक जमीन का मालिकाना हक पाने के हकदार हैं। लेकिन यह तो छोड़ ही दें, सच यही है कि चाय श्रमिकों को गरीबी रेखा के तहत आनेवाले अन्तोदय योजना या अन्य कई योजनाओं का भी लाभ नहीं मिलता है। 

चाय बागान मालिकों द्वारा चाय श्रमिकों की दिहाड़ी से कुछ राशि भविष्य-निधि के नाम पर काट ली जाती है। लेकिन कई बार ऐसे मामले सामने आते हैं जिसमें बागान मालिकों द्वारा भविष्य निधि का पैसा जमा नहीं कराया जाता है, श्रमिकों द्वारा विरोध करने पर उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी जाती है, डरा-धमका कर चुप करा दिया जाता है।

फिर उठ रहे सवाल

बीते 13 जनवरी, 2020 को इम्प्लॉईज प्रोविडेंड फंड आर्गेनाईजेशन द्वारा दार्जिलिंग जिले के सिलीगुड़ी में चाय श्रमिकों के पीएफ, ग्रेच्युटी, इएसआई व अन्य सुविधाओं पर विचार-विमर्श के लिए एक सभा का आयोजन किया गया, जिसमें अलीपुरदुआर से भाजपा के सांसद तथा प्रोविडेंट फंड सेंट्रल बोर्ड ऑफ ट्रस्ट के सदस्य जॉन बारला ने कहा कि चाय श्रमिकों के प्रति चाय बागान मालिकों का रवैया नहीं बदला है। आज भी चाय श्रमिकों के हक को मारा जा रहा है। यदि चाय श्रमिक अपने हक की मांग करते हैं तो उसे काम से बैठा दिया जाता है। यहां तक कि कई श्रमिकों को बागान मालिक जेल तक भिजवा चुके हैं। अभी भी बड़ी संख्या में ऐसे चाय बागान हैं जो चाय श्रमिकों को पीएफ नहीं दे रहे। ऐसे बागान मालिकों को जेल भेजा जाना चाहिए। 

जॉन बारला ने आगे कहा कि चाय श्रमिकों के वेतन से बागान मालिक पैसे काट लेते हैं, लेकिन श्रमिकों के खाते में नहीं जमा कराते हैं। ऐसी स्थिति ज्यादा दिन जारी नहीं रह सकती। ऐसे चाय बागान प्रबंधन की पहचान कर उनको जेल भेजना चाहिए। इसके लिए पीएफ अधिकारियों को और सजग होने की जरूरत है। 

उसी सभा में तृणमूल कांग्रेस से राज्यसभा सांसद सह इपीएफ कमेटी की सदस्या दोला सेन ने कहा कि पीएफ खाता के साथ आधार कार्ड के लिंक में विसंगति तथा नामों में गड़बड़ी के कारण अनेक चाय श्रमिकों को इन दिनों अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। 90 प्रतिशत चाय श्रमिक रिटायरमेंट के बाद पेंशन नहीं पा रहे हैं। श्रमिकों को रिटायरमेंट के बाद पेंशन पाने के लिए पीएफ कार्यालय का चक्कर बार-बार काटना पड़ रहा है। चाय श्रमिक इतने पढ़े लिखे नहीं हैं। इनके आधार कार्ड में कोई ना कोई गलती है। किसी के नाम में कुछ गलत है तो किसी की जन्म तिथि में गड़बड़ी है। श्रमिकों के पास इतना समय भी नहीं होता कि वह अपने आधार कार्ड ठीक करा सकें। यदि आधार कार्ड ठीक कराने जाएंगे तो उनका एक दिन लग जाएगा। एक दिन वह काम नहीं कर पाएंगे तो उन्हें वेतन भी नहीं मिलेगा, जो उनके लिए काफी महत्वपूर्ण है। 

बहरहाल, सरकारें इसे स्वीकार करें या नहीं करें, लेकिन सच यही है कि चाय श्रमिक आज भी आवास, न्याय पूर्ण वेतन शिक्षा, रोजगार एवं सरकारी योजनाओं से वंचित हैं और भूखों मरने की हालत में पहुंच चुके हैं। 

(संपादन : नवल)

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  1. बिरसा भक्त जीतू डावर Reply

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