क्या अमरीकी टेक कंपनियां जाति-आधारित आरक्षण कर भारत को राह दिखाएंगी?

सिस्को के खिलाफ मुकदमे ने उस देश की बहुराष्ट्रीय आईटी कंपनियों, जिनमें बड़ी संख्या में भारतीय काम करते हैं, में व्याप्त जातिगत भेदभाव की ओर अमरीका की सरकार का ध्यान खींचा है। हार्वर्ड के दलित अध्येता सूरज येंग्ड़े ने अमरीकी रेडियो एनपीआर से बातचीत में कहा कि इन कंपनियों को जाति-आधारित आरक्षण की नीति अपनानी चाहिए और इसे भारत सहित अन्य स्थानों में स्थित अपने कार्यालयों में भी लागू करना चाहिए

अमरीकी रेडियो एनपीआर के ‘रफ़ ट्रांसलेशन’ नामक कार्यक्रम के हालिया एपिसोड में अमरीका में जातिवाद पर चर्चा हुई। एनपीआर ने 30 दिसंबर को इस कार्यक्रम का पोडकास्ट प्रकाशित किया। अमरीका की आईटी नेटवर्किंग क्षेत्र की विशाल कंपनी सिस्को के खिलाफ उसके एक भारतीय कर्मचारी की शिकायत को संज्ञान में लेते हुए, कैलिफोर्निया की प्रांतीय सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ़ फेयर एम्प्लॉयमेंट एंड हाउसिंग द्वारा कंपनी के खिलाफ मामला दर्ज करने के बाद से, अमरीका में जातिवाद चर्चा का विषय बन गया है। शिकायतकर्ता, जो कि दलित हैं, का आरोप है कि उनके दोनों ब्राह्मण सुपरवाइजरों ने उनके साथ भेदभाव किया और कंपनी ने उनकी शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं की।

अमरीका में रहने वाले भारतीयों में ऊंची जातियों की बहुसंख्या है। यह बात आईटी सेक्टर में काम करने वालों के बारे में और भी सही है। ऐसा इसलिए है क्योंकि केवल ऊंची जातियों के सदस्यों को ही अमरीका में नौकरी करने के लिए आवश्यक शिक्षा, कौशल और अंग्रेजी भाषा पर अधिकार हासिल करने का अवसर मिल पाता है। अब तक आईटी कंपनियों में टीमों के नेता अमरीकी हुआ करते थे और टीम के सदस्यों में से थोड़े-बहुत दलित व अन्य दमित वर्गों के लोग होते थे। उन्हें किसी भी प्रकार के भेदभाव का सामना नहीं करता पड़ता था। बल्कि उन्हें तो अपने देश में उनके साथ होने वाले भेदभाव से मुक्ति मिल जाती थी। हैदराबाद के एक दलित, जो अपना परिचय सैम कोर्नेलिअस के रूप में देते हैं, सन 1990 के दशक के मध्य से लघु अवधि के वर्क वीजा पर अमरीका जाते रहे हैं। उन्होंने रफ़ ट्रांसलेशन को बताया, “वहां हमें प्रोत्साहित किया जाता है. जैसे, (वे हमसे कहते हैं), हम लोग स्विमिंग क्लास जा रहे हैं। क्या तुम चलना चाहोगे?” उन्होंने कहा कि वहां उनके लिए जाति के लेबल से मुक्ति एक बड़ी राहत थी। “बहुत अच्छा लगता है यह सोचकर कि वहाँ हमें वह मिलेगा जिसके हम लायक हैं…वहां मैं बहुत कुछ करता हूं, अनेक गतिविधियों में भाग लेता हूं। मेरा आत्मविश्वास इतना बढ़ गया है कि मुझे लगता है कि अब मेरी पूरी क्षमता और योग्यता बाहर आ रही है।” 

धीरे-धीरे उन्होंने पाया कि टीमों में भारतीयों की संख्या बढ़ने लगी। समय के साथ भारतीय, टीमों का नेतृत्व भी करने लगे। और फिर उनके कंधे पर हाथ मारा जाने लगा – यह जानने के लिए कि वे जनेऊ पहने हैं या नहीं। या उनसे कहा जाता, “चलो तैरने चलें” क्योंकि वहां सबको अपनी कमीजें उतरनी होंगीं और यह जाहिर हो जाएगा कि कौन जनेऊ पहने है और कौन नहीं।

कोर्नेलिअस आगे बताते हैं, “मेरे उपनाम से आसानी से मेरी जाति का पता नहीं चलता। इसलिए, जब मैं उन्हें अपना नाम बताता हूं तो मुझसे तुरंत पूछा जाता है, “तुम कहां के रहने वाले हो? तुम किस राज्य के किस हिस्से से आते हो?” मैं भी कम नहीं हूं। मैं हैदराबाद में रहता हूँ और मैं उन्हें यही बताता हूं। परन्तु केवल शहर का नाम उन्हें संतुष्ट नहीं करता। वे कहते हैं, ‘नहीं, नहीं, मैं यह नहीं पूछ रहा हूँ कि तुम (भारत में) किस शहर में रहते हो। मैं पूछ रहा हूं कि तुम्हारे माता-पिता कहां से हैं? किस गांव से, किस जिले से?’ मेरे माता-पिता बम्बई में रहते थे। मैं उनसे कहता हूं, ‘मेरे पिता रेलवे में काम करते थे और इसलिए बम्बई और उसके पहले हम दिल्ली में रहते थे’। मैं एक के बाद एक अन्य शहरों के नाम गिनाता जाता हूं। और मैं सच बोल रहा होता हूं। अंततः वे समझ जाते हैं कि मैं उन्हें गोल-गोल घुमा रहा हूं और हार मान लेते हैं…दूसरा जो प्रश्न अक्सर पूछा जाता है वह है, “क्या तुम शाकाहारी हो?” यह इसलिए क्योंकि ब्राह्मण शाकाहारी होते हैं। अगर आप कहते हैं कि आप शाकाहारी हैं तब फिर, अगर प्रश्नकर्ता और उत्तरदाता दोनों भारतीय हैं, तो दूसरा प्रश्न होगा, ‘क्या तुम जन्म से शाकाहारी हो या बाद में बने हो?’ वे किसी भी तरह से आपकी जाति जानना चाहते हैं।”    

कैलिफ़ोर्निया की प्रांतीय सरकार ने सिस्को को अपने कर्मचारी के साथ भेदभाव करने के लिए सिस्को को अदालत में घसीटा है; हार्वर्ड अध्येता सूरज येंग्ड़े

‘सैम कोर्नेलिअस’ अपना असली नाम नहीं बताते क्योंकि वे अपने नियोक्ता की नज़रों में नहीं आना चाहते। अगर ऐसा हुआ तो यह भी हो सकता है कि वे अपनी नौकरी खो बैठें। उस स्थिति में उन्हें भारत वापस जाना पड़ेगा क्योंकि उनका वीजा (एच1 बी) तभी तक वैध है जब तक वे अपनी कंपनी की सेवा में हैं।  

थेंमोज्ही सौन्द्रराजन अमरीका में रहते हैं। वे दलित हैं। वे फिल्म निर्माता और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं और इक्वलिटी लैब्स नामक एक मानवाधिकार संगठन चलाते हैं। वे कहते हैं, “सिस्को प्रकरण के बाद से इक्वलिटी लैब्स को इसी तरह की 300 से ज्यादा शिकायतें मिलीं। इनमें फेसबुक, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, आईबीएम, सिस्को, अमेज़न, डैल, ट्विटर, उबर, नेटफ्लिक्स, सेल्सफ़ोर्स, ज़ूम, ड्रापबॉक्स और कोरा इत्यादि में काम करने वाले लोगों की शिकायतें शामिल हैं। इनमें से कोई भी एच-1 बी वीजा के कारण अपनी कंपनी के एचआर के पास नहीं जाना चाहता। यह सिर्फ नौकरी का सवाल का सवाल नहीं है बल्कि अपने स्टेटस खो देने का सवाल भी है। हमारे सर्वे में आधे दलित उत्तरदाताओं ने कहा कि उन्हें हमेशा यह डर बना रहता है कि उनकी जाति के बारे में लोगों को पता चल जाएगा।” और यह डर इसलिए है क्योंकि वहां ऊंची जातियों का बोलबाला है।   

सिस्को के विरुद्ध जो प्रकरण दायर किया गया है, उसमें भी कहा गया है कि दलित कर्मचारी के साथ भेदभाव उसकी जाति के बारे में पता चलने के बाद शुरू हुआ। उनका दावा है कि उनके ब्राह्मण सुपरवाइजरों में से एक, जो आईआईटी, बम्बई में उनके सहपाठी थे, ने 2016 में उनकी जाति के बारे में उनके सहकर्मियों को बताया। जब उन्होंने कंपनी के मानव संसाधन विभाग से इसकी शिकायत कि तो दोनों सुपरवाइजर उनके साथ वैर रखने लगे और उन्हें परेशान करने लगे। मानव संसाधन विभाग ने मामले की जांच की और प्रकरण को इस आधार पर बंद कर दिया कि भेदभाव का आरोप सिद्ध नहीं हो सका। इसका कारण यह था कि गवाहों ने सुपरवाइजरों के डर के मारे कुछ भी कहने से इंकार कर दिया।  

हार्वर्ड अध्येता सूरज येंग्ड़े, जो दलित हैं और ‘कास्ट मैटर्स’ नामक पुस्तक के लेखक हैं, ने रफ़ ट्रांसलेशन को बताया कि अमरीका में रहने वाले वर्चस्वशाली जातियों के कुछ भारतीयों ने उन्हें पत्र लिखकर दलितों के साथ उनके समुदायों द्वारा किये गए अन्याय के लिए क्षमायाचना की। येंग्ड़े उन सब को एक ही जवाब देते हैं: “मैं आपको इस बात के लिए बधाई देता हूं कि वर्चस्वशाली जाति का होते हुए भी आप इस चीज़ को सुधारने का प्रयास कर रहे हैं। और मैं यह मानता हूँ कि यह पहला कदम है। (दूसरा कदम यह है कि) आपको सांस्कृतिक सुसाइड बॉम्बर बनना होगा। आपको अपने सांस्कृतिक विशेषाधिकारों को उपयोग करते हुए इस व्यवस्था को उड़ा देना होगा। आपको उन लोगों को चुनौती देनी होगी जो चुपचाप आराम से बैठे हुए हैं।”

येंग्ड़े का कहना है कि सिलिकॉन वैली में इतनी बड़ी संख्या में भारतीय कर्मचारी काम कर रहे हैं कि वहां की कंपनियों को कार्यस्थल पर जातिगत विविधता पर अपनी नीति बनानी चाहिए। वे मानते हैं कि इससे इन कम्पनियों के भारत में स्थित कार्यालयों को भी इस नीति का पालन करने पर मजबूर होना पड़ेगा। आख़िरकार, इन कंपनियों के भारत में काम करने वाले कर्मचारी भी कैलिफ़ोर्निया के अपने मुख्यालय के आदेशों का पालन करने से इंकार नहीं कर सकते।” 

अगर ऐसा होता है तो इससे पूरे भारत के निजी क्षेत्र पर असर पड़ेगा। सार्वजनिक क्षेत्र में आरक्षण को अनमने भाव से लागू किया जा रहा है। वैसे भी, सरकार सार्वजनिक क्षेत्र का निजीकरण करने पर आमादा है। अतः निजी क्षेत्र में आरक्षण ही वह एकमात्र तरीका है जिससे दलित, आदिवासी और ओबीसी, भारतीय अर्थव्यवस्था में शीर्ष स्तर पर प्रतिनिधित्व प्राप्त कर सकेंगे। 

(अनुवाद: अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल)


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