किसानों की मुकम्मिल जीत जरूरी है

कंवल भारती के मुताबिक, भारत के किसानों ने मोदी सरकार के कारपोरेट कृषि कानूनों में निहित खतरों को अच्छी तरह पहचान लिया है। जिस तरह दूध का जला, छाछ भी फूंककर पीता है, उसी प्रकार हरित क्रांति से उभरी बाजार-व्यवस्था के दुष्प्रभावों से प्रभावित किसानों को ये कानून भी रास नहीं आ रहे हैं

इस लेख के लिखते वक्त तक दिल्ली में क्या, पूरे देश में किसानों का आन्दोलन जारी है। सरकार से वार्ता भी चल रही है, हालाँकि उसका कोई नतीजा न तो अभी निकला है, और न निकलने की सम्भावना नजर आ रही है।

क्यों खामोश हैं दलित-बहुजन नेता?

यहां मेरी चिंता का विषय यह है कि दलित-पिछड़ी जातियों के नामीगिरामी नेता, जिनमें कई प्रधानमंत्री बनने का भी सपना देख रहे हैं, किसानों के समर्थन में क्यों नहीं हैं? मुलायम सिंह यादव, जो अपने आप को धरतीपुत्र कहते हैं, उनके भाई शिवपाल यादव, उनके पुत्र अखिलेश यादव, जो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं; मायावती, जो चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं; उदित राज, ये सब किसान-विरोधी काले कानूनों का विरोध क्यों नहीं कर रहे हैं? कायदे से तो उन्हें अपने-अपने क्षेत्र में किसानों का नेतृत्व करना चाहिए था, पर नेतृत्व करना तो दूर, वे किसानों की समस्याओं से भी आखें मींचे हुए हैं।

आखिर क्या कारण है कि बहुजन समाज का दम भरने वाले ये नेता किसान-आन्दोलन के पक्ष में नहीं हैं? क्या ये तटस्थ हैं? राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा है, ‘जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी इतिहास।’ तटस्थ का वही अर्थ है, जो संसद में सत्ता-पक्ष को जिताने के लिए ‘वाक्आउट’ का अर्थ होता है। उदित राज यह कहकर कि उनके लोग भूमिहीन हैं, किसान नहीं हैं, अपने भाजपा-प्रेम को छिपा रहे हैं। इसके दो ही कारण हो सकते हैं, या तो उन्हें अभी भी भाजपा-नेतृत्व से उम्मीद है कि वह उन्हें गले लगा लेगा, या फिर वह किसी ऐसे कारण से, जिसे वह ही जानते हैं, भाजपा से डरे हुए हैं। सच्चाई यह है कि छोटे और मंझोले किसानों में सर्वाधिक संख्या में दलित-पिछड़े वर्ग के लोग ही हैं।

दिल्ली-हरियाणा के सिंधु सीमा पर आंदोलनरत किसान

किसानों की समस्याएं समझने को सरकार क्यों नहीं है तैयार?

फिलवक्त स्थिति किसानों के अनुकूल नहीं लग रही है, न मीडिया में, जो पूरी तरह भाजपा के शिकंजे में है, और ना ही मुस्लिम नफरत की भगवा राजनीति से सराबोर जनता में, जो मोदी को गलत मानने की स्थिति में बिलकुल नहीं है। भाजपा इसी मुस्लिम-विरोध को और भी तेज करने की तैयारी में है।

एक अनुमान के मुताबिक भारत में अब तक छत्तीस हजार किसान आत्महत्याएं कर चुके हैं। अफ़सोस कि किसी भी सरकार ने उनकी आत्महत्याओं के कारणों को गंभीरता से नहीं लिया, इसलिए किसानों की आत्महत्याओं को रोकने के लिए सरकार की तरफ से कोई प्रबंध नहीं किया जाता। प्रबंध तब होता, जब किसानों की समस्याओं को समझा जाता। सच यह है कि किसानों की समस्याओं को समझने की कभी कोशिश ही नहीं की गई।

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कारपोरेट हित में बनाए गए हैं कानून

मौजूदा कृषि कानून निश्चित रूप से कारपोरेट के हित में बनाए गए हैं, और भाजपा सरकार शायद ही कारपोरेट के हितों को कमजोर करेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी महीनों से इन कानूनों को किसान-हितैषी बताकर प्रचार कर रहे हैं कि किसान अपनी उपज कहीं भी बेचने के लिए स्वतंत्र हैं, कि किसान कितना ही भंडारण कर सकते हैं, कि इन कानूनों से किसानों की आय दुगुनी हो जाएगी, इत्यादि। किन्तु प्रश्न यह है कि यदि ये कानून इतने ही किसान-हितैषी हैं, तो किसानों द्वारा उनका विरोध क्यों हो रहा है? क्यों वे ठंड के मौसम में दिल्ली की सीमाओं पर खुले आसमान के नीचे धरने पर बैठे हुए हैं? और सबसे बड़ी बात यह कि जब कानून ठीक हैं, तो किसानों के दबाव में सरकार उनमे संशोधन करने के लिए क्यों हामी भर रही है?  इसका मतलब साफ़ है कि कानून में खामियां हैं, और वे किसानों से ज्यादा कारपोरेट के हितों की रक्षा करते हैं।

सवाल केवल एमएसपी का नहीं है

यह केवल न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) ही एकमात्र मुद्दा नहीं है, जिसकी किसान मांग कर रहे हैं। और भी कई प्रावधान हैं जो कारपोरेट के हित में और किसानों को तबाह करने वाले हैं। मसलन, किसी कम्पनी को उपज बेचने के मामले में अन्याय होने पर किसान अदालत नहीं जा सकता, बल्कि उस विवाद का निपटारा उपजिलाधिकारी अर्थात एसडीएम करेगा। एसडीएम जिला प्रशासन का अंग है, जो सीधे जिलाधिकारी के अधीन होता है। वह सरकार की मंशा के विरुद्ध निर्णय ले ही नहीं सकता। प्रावधान के अनुसार एसडीएम का निर्णय ही अंतिम होगा। अगर निर्णय किसान के विरोध में हुआ, जो होना ही है, तो ऐसी स्थिति में किसान न्याय के लिए न्यायिक अदालत में नहीं जा सकता। इसका मतलब साफ़ है कि यह कानून किसान को नैसर्गिक न्याय से भी वंचित करता है। एक प्रावधान यह भी कारपोरेट के हित में किया गया है कि मंडी में फसल बेचने पर किसान को मंडी-शुल्क देना होगा, जबकि मंडी के बाहर व्यापारी को बेचने पर कोई शुल्क नहीं देना होगा। यह दोहरी व्यवस्था किसान की कमर तोड़ने और कारपोरेट को फायदा पहुँचाने के लिए बनाई गई है?

बड़े खतरे की आहट

विकास राय ने जनज्वार नामक एक वेब पोर्टल पर प्रकाशित अपने एक लेख में एक बड़ी ही महत्वपूर्ण बात कही है कि धोखाधड़ी से लाए गए इन तीन कृषि कानूनों के संदर्भ में बहस से तीन पहलू छूट रहे हैं, (एक) कारपोरेट कृषि में वांछित पूंजी निवेश के लिए कारपोरेट को निजी बैंक खोलने की सुविधा, (दो) कारपोरेट कृषि से संभावित सामाजिक परिवर्तन, और (तीन) बेरोजगार युवाओं का अपराध की ओर जाने की संभावना। वे कहते हैं कि इंदिरा गांधी की हरित क्रान्ति ने किसानों के एक वर्ग को संपन्न बनाया था, और जो बाज़ार-व्यवस्था बनाई थी, उसने बड़ी संख्या में शहरी विस्थापन और संयुक्त परिवारों के विखंडन की जमीन तैयार की थी। उसे यह कारपोरेट कृषि और भी भयानक चरण में ले जायेगा, ‘शायद मानव-तस्करी को कानूनी मान्यता दिलाने और परिवार-विहीनता को स्थापित करने की हद तक.’ ऐसी स्थिति में युवाओं के अपराधीकरण की प्रबल सम्भावना को रोकना मुश्किल होगा।

अर्थशास्त्री गुरचरण के हवाले से विकास राय ने रेखांकित किया है कि इन कृषि कानूनों में, जिन्हें कारपोरेट कानून कहना ज्यादा सही होगा, किसानों को अपनी फसल को कहीं भी बेचने, कितनी भी मात्रा में भंडारण करने और खतरे से बचने के लिए फसल को अनुबंध के द्वारा कारपोरेट को देने की जो तीन स्वतंत्रताएं दी गयी हैं, वे असल में फसल की कीमत को कम करने की ही स्वतंत्रताएं हैं।

इसलिए मुकम्मिल जीत चाहते हैं किसान

भारत के किसानों ने मोदी सरकार के कारपोरेट कृषि कानूनों में उपर्युक्त खतरों को अच्छी तरह पहचान लिया है। जिस तरह दूध का जला, छाछ भी फूंककर पीता है, उसी प्रकार हरित क्रांति से उभरी बाजार-व्यवस्था के दुष्प्रभावों से प्रभावित किसानों को ये कानून भी रास नहीं आ रहे हैं। इसलिए वे अब संशोधन नहीं, बल्कि तीनों कानूनों की वापसी चाहते हैं।

निश्चित रूप से किसानों की यह लड़ाई कारपोरेट कृषि के खिलाफ है, और एक ऐसे पूंजीवाद के खिलाफ भी, जो भारत के छोटे और मंझोले किसानों को ही तबाह नहीं करेगा, बल्कि उन्हें भूमिहीन भी बना देगा।

(संपादन : नवल)


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