‘हम अपने लिए नहीं, आने वाली पीढ़ियों को बचाने के लिए लड़ रहे हैं’

किसानों के आंदोलन के दसवें दिन सिंघु बार्डर पर आंदोलनरत किसानों ने बातचीत में विस्तार से उन कारणों के बारे में बताया जिसके कारण वे दिसंबर की ठंड में भी सड़क पर डटे हैं

हम पंजाब के रोपड़ जिले के किसान हैं। जमीन बहुत नहीं है। कुल मिलाकर चार किला (एकड़) जमीन है। जितनी खेती हम करते हैं, उससे परिवार का गुजारा नहीं होता है। हम किराए पर जमीन लेकर भी खेती करते हैं। हमारे लिए केंद्र सरकार के तीनों कानून बेहद खतरनाक है। हम उनके खात्मे के लिए यहां अपना घर-परिवार छोड़कर डटे हैं। यह कहना था जब सरशेम सिंह का जब हमने उनसे सिंघु बार्डर पर आंदोलनरत होने का कारण पूछा। 

सरशेम सिंह ने कहा कि ये तीनों कानून केवल बड़े किसानों के हितों को प्रभावित नहीं करते हैं। यदि इन्हें वापस न लिया गया तो इसकी जद में हम सभी किसान आएंगे चाहे हम छोटे किसान हों या फिर बड़े। सबसे अधिक नुकसान तो हम छोटे किसानों को उठाना होगा यदि हमें हमारी फसल की वाजिब कीमत नहीं मिली। इसलिए हम सरकार से कहना चाहते हैं कि वह तीनाें कानूनों को पहले तो वापस ले।

अपने साथियों के साथ किसान सरशेम सिंह (सबसे बाएं) (तस्वीर : एफपी)

सरशेम सिंह के साथ उनके अन्य साथी भी हैं। इनमें दो का नाम करनैल सिंह था। उनमें से एक करनैल सिंह ने कहा कि इस आंदोलन में हम सब एक हैं। फिर चाहे हम किसी भी पंथ को मानने वाले हों। हम अमीर हों या गरीब। सरकार के कानून की मार हमसब पर पड़ेगी। यह आंदोलन हम अपने लिए नहीं कर रहे हैं। यह हम अपनी आने वाली पीढ़ियों का अधिकार बचाने के लिए लड़ रहे हैं। 

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किसानों के आंदोलन के दसवें दिन दिल्ली-हरियाणा बार्डर पहुंची फारवर्ड प्रेस की टीम ने आंदोलन में शामिल अनेक लोगों से बातचीत की। आंदोलन स्थल पर कई संगठनों के लोग मिले। आंदोलन स्थल पर कई मंच थे। सभी मंचों से वक्ता अपनी बात रखते नजर आए। वहीं आंदोलन स्थल पर सांस्कृतिक सामाजिक कार्यकर्ता भी मिले जो अपने गीत-संगीत से लोगों के अंदर उत्साह भरते नजर आए। 

सिंघु बार्डर पर आंदोलनरत एक किसान (तस्वीर : एफपी)

इस क्रम में यह साफ दिखा कि किसान चाहे किसी भी तबके के हों, सब एकजुट दिखे। इनमें से एक मोगा जिले के किसान ने बताया कि यह आंदोलन किसी राजनीतिक संगठन का नहीं है। हम सभी किसान हैं और सरकार से मांग करने आए हैं कि वह तीनों काले कानून वापस ले और पराली जलाने के आरोप में जो हमलोगों पर मुकदमे दर्ज कराए जाते हैं, जुर्माने किए जाते हैं, उन्हें बदले। हम तो चाहते हैं कि सरकार हमारी पराली ले जाय। हम इसके लिए उनसे कोई पैसा नहीं लेंगे। यहां तक कि हम उन्हें अपनी परालियों को इकट्ठा कर देने को तैयार हैं। उनका कहना था कि जैसे सरकार शहरों में लोगों का कचरा इकट्ठा करती है और उन्हें डंप करती है, वैसे ही वह हमारे परालियों का भी हल निकाले।

आंदोलन में शामिल महिलाएं (तस्वीर : एफपी)

हरियाणा के करनाल से आए चार नौजवनों में से एक सर्वजीत सिंह ने बताया कि सरकार यह भूल रही है कि किसान हैं तो इस देश की अर्थव्यवस्था है। जबतक किसानों का भला नहीं होगा तबतक देश तरक्की के रास्ते पर कैसे आगे बढ़ सकता है। अर्थशास्त्र के हिसाब से भी सरकार का यह पहला कर्तव्य है कि वह देश के किसानों के हक को सुनिश्चित करे। आप सर्विस सेक्टर को प्राइवेट कंपनियों के हाथों में दे चुके हैं। रेलवे के निजीकरण की शुरूआत हो चुकी है। रक्षा के क्षेत्र में भी विदेशी पूंजी निवेश को मंजूरी दी जा चुकी है। लेकिन कृषि का यदि निजीकरण हुआ तो किसान कहां जाएंगे। इससे तो हमारे किसान अपने ही खेत में मजदूर हो जाएंगे। 

सिंघु बार्डर पर कंटीले तार और तैनात सुरक्षाकर्मी (तस्वीर : एफपी)

किसानों के आंदोलन को लेकर जितने सवाल और विरोध के कारण बुजुर्ग और अधेड़ उम्र के किसानों में है, उतने ही सवाल युवा किसानों में भी है। वे आंदोलनस्थल पर कारसेवा कर रहे हैं। इस क्रम में वे कचरा साफ करने से लेकर लंगर में भोजन परोसते तक नजर आ रहे हैं। अमृतसर से आए किसानों के संग बातचीत के क्रम में दिल्ली के एक युवा दंपत्ति ने बताया कि केंद्र सरकार किसानों की पीड़ा को समझ ही नहीं रही है। यदि समझा होता तो वे समझते कि यदि इनके पास अपनी जमीनें नहीं होंगी, निजी मंडियों का चलन शुरू हो जाएगा तो यह देश एक बार फिर से ईस्ट इंडिया कंपनी राज के युग में चला जाएगा। हम इन सबका विरोध करते हैं।

(संपादन : अनिल)


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