सिलेगर गोलीकांड : शक के दायरे में बघेल सरकार और सुरक्षा बल

बीते 17 मई, 2021 को छत्तीसगढ़ के सिलेगर में सुरक्षाबलों की गोली से तीन आदिवासियों की मौत हो गई। पुलिस ने मृतकों को नक्सली करार दिया है। दूसरी ओर बघेल सरकार ने मृतकों के आश्रितों को सहायता राशि दी है। इस बारे में बता रहे हैं मनीष भट्ट मनु

छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के सिलेगर में गत 17 मई, 2021 को सुरक्षा बलों की गोलीबारी शक के दायरे में है। इस घटना में तीन आदिवासियों के मारे जाने को पुलिस नक्सलियों की मौत बता रही है। वहीं ग्रामीणों का आरोप है कि उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाने के लिए बनाए जा रहे सुरक्षा बलों के कैपों का विरोध रोकने के लिए ये हत्याएं की गई हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि मारे गए ग्रामीण नक्सली नहीं थे। वे यह भी आरोप लगाते हैं कि उस दिन के बाद से कुछ आदिवासी गायब भी थे, जिन्हें स्थानीय लोगों के दबाव के बाद अंततः सामने लाया गया। उन्हे संदेह था कि आने वाले दिनों में नक्सली करार देकर इनकी भी हत्या की जा सकती थी। इस बीच पुलिस द्वारा नक्सली बताए जा रहे मृतकों के परिजनों को भूपेश बघेल सरकार द्वारा दी गई आर्थिक मदद भी संदेहों को बढ़ा ही रही है। 

इस घटना को लेकर राज्य सरकार द्वारा अपनाया गया रवैया और ख्यात सामाजिक कार्यकर्ताओं को वहां तक पहुंचने से रोकने के लिए अपनाए गए हथकंडे स्थानीय आदिवासियों के शक की पुष्टि करते प्रतीत हो रहे हैं।

आदिवासियों के विरोध के बाद भी कैंप क्यों?

पिछले एक वर्ष में स्थानीय आदिवासियों के विरोध के बाद भी बस्तर संभाग में सुरक्षाबलों द्वारा 30 से अधिक कैंपों का निर्माण किया जा चुका है। जबकि यह क्षेत्र पांचवीं अनुसूची में आता है। पेसा एक्ट के मुताबिक, यहां ग्रामसभा की अनुमति के बिना कोई भी निर्माण नहीं किया जा सकता। स्थानीय नागरिकों की मानें तो यहां किसी कैंप के लिए ग्रामसभा का आयोजन नहीं किया गया है। सिलेगर में भी कैंप बनाए जाने की सूचना मिलने पर मई माह की शुरुआत में ही आदिवासियों ने इसका विरोध किया था, जिसे नजरअंदाज कर इसका निर्माण किया गया। 

सिलेगर में प्रदर्शन के दौरान सुरक्षाबल आदिवासियों को रोकते हुए। प्रदर्शनकारियों में बड़ी संख्या में महिलाएं थीं शामिल

फिर 12 मई, 2021 को निर्माण पूरा होने की खबर मिलते ही आसपास के कुछ गांव वालों के साथ ही स्थानीय आदिवासियों ने यह कहते हुए वहां धरना प्रारंभ कर दिया कि कैंप उनकी जमीन पर बनाया गया है। स्थानीय आदिवासियों के मुताबिक, विरोध के स्वर तेज होने के बाद 17 मई, 2021 को सुरक्षा बलों द्वारा सबसे पहले धरना दे रहे आदिवासियों पर लाठीचार्ज किया गया और उसके बाद बिना किसी पूर्व सूचना के गोली चला दी। इसमें चुटवाही निवासी कवासी भगत, गुडेम के सुग्गा मुरली और तिम्मापुर के भीमा उईका की घटनास्थल पर ही मौत हो गई। 

सिलेगर में मृतकों के शवों के साथ प्रदर्शन करते आदिवासी

स्थानीय आदिवासियों के अनुसार, उसी दौरान सुरक्षा बलों ने आठ अन्य आदिवासियों को अवैध रूप से अपनी हिरासत में ले लिया था। हालांकि अब इन्हें सुरक्षा घेरा तोड़ कैंप पर हमला करने के आरोप में जेल भेजा जा चुका है।

पुलिस ने कहा– ग्रामीणों की आड़ में नक्सलियों का हमला 

हालांकि पुलिस द्वारा अपने स्पष्टीकरण में कहा गया है कि 17 मई को आदिवासियों की आड़ में नक्सलियों द्वारा सुरक्षाबलों पर हमला करने का प्रयास किया गया। उनके द्वारा की गई फायरिंग के जवाब में ही सुरक्षाबलों द्वारा आत्मरक्षा के लिए चलाई गई गोली में तीन नक्सलियों की मौके पर ही मौत हो गई। आदिवासियों को अवैध हिरासत में रखे जाने के आरोपों को खारिज करते हुए आईजीपी बस्तर सुंदरराज पी. ने मीडिया से कहा था कि ग्रामीणों को पूछताछ के लिए रखा गया है।

मृतक नक्सली थे तो आर्थिक मदद क्यों? 

इस घटना के विरोध में सिलगेर समेत लगभग 50 गांवों के आदिवासी लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। इसमें प्रतिदिन लोगों के शामिल होते जाने से हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं। ऐसे में 23 मई को स्थानीय आदिवासियों के प्रतिनिधियों और पुलिस व प्रशासन के मध्य लंबी बातचीत के समाचार हैं। स्थानीय नागरिकों की मानें तो इसी बैठक में मृतकों के परिजनों को आर्थिक मदद के नाम पर प्रशासन की ओर से दस-दस हजार रुपए भी दिए गए, जिन्हें गांववालों ने यह कहते हुए वापिस कर दिया कि यदि मरने वाले सुरक्षा बलों के अनुसार नक्सली थे, तो फिर आर्थिक मदद क्यों दी जा रही है?

पुलिस के लाठीचार्ज से गंभीर रूप से घायल एक आदिवासी महिला

दहशत में हैं गांववाले, सरकार दे जवाब : मनीष कुंजाम

घटना के बाद अपने साथियों के साथ पूर्व विधायक मनीष कुंजाम ने सिलेगर का दौरा किया। फारवर्ड प्रेस से दूरभाष पर बातचीत में उन्होंने कहा कि पुलिस ने अकारण ही गोली चलायी। जैसा कि गांववालों ने बताया कि कैंप के विरोध में प्रदर्शन चल रहा था और बड़ी संख्या में लोग जुटे थे। इस दौरान नोंक-झोंक भी हुई। लेकिन जब पुलिस ने लाठीचार्ज किया तब लोगों ने भी पत्थरबाजी की। इसमें कोई बड़ी बात नहीं है। पुलिस को संयम रखना चाहिए था ना कि गोली चला देनी चाहिए थी।

छत्तीसगढ़ के पूर्व विधायक मनीष कुंजाम, सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी और पीयूसीएल, छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष डिग्री प्रसाद चौहान

मनीष कुंजाम के मुताबिक, पुलिस की गोलियों से जो तीन लोग मारे गए, पुलिस उन्हें नक्सली साबित करने में जुटी है। मृतकों को हाल ही में सुकमा-बीजापुर सीमा पर हुए नक्सलियों हमले शामिल बताया जा रहा है। जबकि मारे गए तीनों आदिवासियों का इससे कोई लेना-देना नहीं था। मनीष कुंजाम ने बताया कि तिम्मापुर के मृतक भीमा उईका की भतीजी ने जानकारी दी कि उसके चाचा के पास मोबाइल फोन, आधार कार्ड और जेब में करीब 800 रुपए थे, जो सुरक्षाबलों द्वारा वापस नहीं किए गए हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कोई नक्सली अपना आधार कार्ड और मोबाइल जेब में रखता है? 

राज्य सरकार की भूमिका के बारे में मनीष कुंजाम ने बताया कि एक तरफ तो राज्य पुलिस मृतकों को नक्सली बता रही है तो दूसरी ओर वह उनके परिजनों को मुआवजा दे रही है। इससे सवाल तो उठते ही हैं। ऐसे में सरकार को अपना रूख स्पष्ट करना चाहिए।

मनीष कुंजाम ने कहा कि इस पूरे मामले में सुरक्षाबलों पर सवाल उठते हैं। इस मामले की न्यायिक जांच होनी चाहिए। जांच करने वाला हाईकोर्ट का पूर्व न्यायाधीश हो।

ज्यां द्रेज को रोका, सोनी सोरी मजबूरी में जाना पड़ा पहाड़ के रास्ते 

वहीं इस मामले में सामाजिक कार्यकर्ताओं को रोका जा रहा है। अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज और बेला भाटिया को सिलेगर जाने की अनुमति नहीं दी गई। उनके अलावा छत्तीसगढ़ की सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी को रोकने की कोशिशें की गयीं। फारवर्ड प्रेस से बातचीत में सोनी सोरी ने बताया कि “मुझे चार-चार नोटिस थमा दिए गए। मुझे सड़क मार्ग से जाने नहीं दिया गया। लेकिन मैं पहाड़ों के रास्ते गयी। लेकिन रास्ते में मेरी तबीयत खराब हो गई। मैं आंदोलन स्थल पर गई और वहां के लोगों से बातचीत की। वहां गांववालों ने मृतकों के बारे में बताया कि वे नक्सली नहीं थे। वे ग्रामीण थे।”

पुलिस द्वारा रोके जाने के संबंध में मनीष कुंजाम ने बताया कि उन्हें भी धरमपुर के पास सुरक्षाबलों ने रोका था। करीब दो घंटे के बाद उन्हें जाने दिया गया।

बताते चलें कि रमन सिंह के कार्यकाल के दौरान जब बेला भाटिया को धमकी मिली थी, तो राहुल गांधी सहित पूरी कांगेस पार्टी जिसमें भूपेश बघेल भी शामिल थे, ने विरोध में स्वर बुलंद किए थेे। मगर अब ज्यां द्रेज, बेला भाटिया और सोनी सोरी के साथ अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं को घटनास्थल पर जाने से रोकने के प्रयास से बघेल पर ही सवाल उठा रहे हैं। वे बताते हैं कि मुख्यमंत्री बनने के बाद बघेल ने नक्सल समस्या के हल के लिए प्रभावित लोगों, खासकर आदिवासियों से, बात करने पर जोर दिया था। उन्होंने कहा था कि इस समस्या से पाने के लिए बंदूक कोई समाधान नहीं। मगर अब यह सरकार भी पूर्ववर्ती भाजपा सरकार की ही तरह व्यवहार कर रही है।

13 सितंबर, 2016 को भूपेश बघेल द्वारा ट्वीटर पर जारी किया गया एक संदेश

सुरक्षाबलों के खिलाफ दर्ज हो मामला : डिग्री प्रसाद चौहान

छत्तीसगढ़, पीयूसीएल के अध्यक्ष डिग्री प्रसाद चौहान ने बताया कि सुकमा जिले में शांतिपूर्ण विरोध कर रहे आदिवासी ग्रामीणों पर पुलिस द्वारा की गई अंधाधुंध फायरिंग की घटना का पीयूसीएल निंदा करती है और मांग करती है कि सुरक्षाबलों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया जाय। उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने पीयूसीएल बनाम महाराष्ट्र राज्य के मामले में वर्ष 2014 में यह निर्णय दिया है कि मुठभेड़ों के मामलों में पीड़ितों की ओर से भी एक काउन्टर एफआईआर पुलिस, अर्धसैनिक बलों और दोषी अधिकारियों के खिलाफ अनिवार्य रूप से दर्ज होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि सिलेगर में कई गांवों के आदिवासी पुलिस कैंप की स्थापना का विरोध करने हजारों की संख्या में जुटे थे, जहां पुलिस द्वारा दिन के उजाले में फायरिंग की गई है। अब पुलिस और प्रशासन इस घटना को सुरक्षाबलों और माओवादियों के बीच मुठभेड़ बता रहा है। जबकि मृतकों और घायल होने वालों में सब निहत्थे ग्रामीण हैं। 

उन्होंने कहा कि राज्य सरकार को इस बर्बर घटना का तुरंत संज्ञान लेते हुए एक स्वतंत्र और उच्च स्तरीय जांच की घोषणा करनी चाहिए और इस घटना के लिए जिम्मेदार पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों पर तत्काल कार्यवाही सुनिश्चित की जानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यह गोलीकांड बस्तर में  ग्रामीणों के विरुद्ध हिंसा और मानवाधिकारों पर सुरक्षा बलों की हमले की वारदातों की कड़ी का एक हिस्सा है, जिसका तुरंत राजनैतिक समाधान ढूंढने की जरूरत है।

विकास के सरकारी दावों पर सवाल उठा रहे आदिवासी 

प्रदर्शनकारी आदिवासियों का कहना है कि यदि सरकार वाकई हमारा विकास चाहती है तो उसे आंगनबाड़ी, स्कूल, अस्पताल, हैंडपंप आदि की सुविधाएं उपलब्ध करवाना चाहिए। मगर इसके उलट सरकार उद्योगपतियों को लाभ पहुचाने के लिए जो सड़क बनवा रही है, उसकी सुरक्षा के लिए ही पुलिस कैंप स्थापित किए जा रहे हैं। उनका यह भी आरोप है कि आदिवासियों को अपने घर और जमीन से भगाने के लिए ही नक्सली करार देकर उनकी हत्या की जा रही है।

नया नहीं है बस्तर में आदिवासियों पर अत्याचार का आरोप 

बस्तर संभाग में आदिवासियों पर अत्याचारों के आरोप नए नहीं है। फर्क सिर्फ इतना है कि वर्ष 2000 में छत्तीसगढ़ की स्थापना होने से पहले यह आरोप नक्सलियों और कुछ नौकरशाहों पर लगते रहे थे। मगर पृथक छत्तीसगढ़ बनने के बाद आरोपों की जद में राज्य सरकार आ गई। छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री रहे अजीत जोगी के मुख्यमंत्रित्व काल में फिर भी स्थिति ज्यादा नहीं बिगड़ पाई, मगर रमन सिंह के मुख्यमंत्री बनने के बाद आदिवासियों की जमीनें उद्योगपतियों को दिलाए जाने के प्रयास प्रारंभ किए गए, जो पांचवी अनुसूची के प्रावधानों के विपरीत होने के चलते न्यायपालिका द्वारा अमान्य कर दिए गए। इसके बाद वर्ष 2005 में शुरु हुआ सलवा जुड़ूम।

निजी उद्योग समूहों के साथ एमओयू और सलवा जुड़ूम

दरअसल देश की कुल खनिज संपदा का एक बड़ा भाग छत्तीसगढ़ में होने का अनुमान है। इसमें भी वर्तमान बस्तर संभाग को सबसे समृद्ध कहा जाता है। बैलाडीला की विश्व प्रसिद्ध लौह अयस्क की खदानें भी इसी संभाग में हैं। वर्ष 2005 में रमन सिंह के नेतृत्व वाली राज्य सरकार द्वारा टाटा स्टील और एस्सार के साथ मैमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए। बस्तर के लोग मानते हैं कि इन एमओयू हस्ताक्षरित किए जाने के दिन ही सलवा जूड़ूम की शुरुआत की गई। वहीं कई जानकार यह आरोप लगाते हैं कि आलोचना होने पर सलवा जुड़ूम और एमओयू की तारीखें बदल दी गईं ताकि वे आपस में न मिलें। हालांकि दोनों ही समूहों द्वारा तत्समय बयान जारी कर यह कहा गया था कि उनके और राज्य सरकार के मध्य पहले से ही बात चल रही थी और सलवा जुडूम का उनसे कोई लेना-देना नहीं है। मगर यह भी एक सच्चाई है कि भाजपा सकार द्वारा प्रारंभ इस बदनाम आंदोलन – जिसे उस दौरान आदिवासियों का नक्सलियों के विरुद्ध स्वतःफूर्त आंदोलन के तौर पर प्रचारित किया जा रहा था – को शुरुआती दिनों में कोतरापाल, इरिल, बेचापाल आदि गांवों के आसपास ही केन्द्रित रखा गया, जो बैलाडीला की खदानों से महज कुछ किलोमीटर दूर थे। इनमें से खदान एक व तीन को नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कारपोरेशन द्वारा निजी समूहों को लीज पर दिया जा चुका था।

ध्यातव्य है कि बस्तर में सुरक्षाबलों पर आदिवासियों के घर जलाने, बलात्कार और हत्या के आरोप तक लग चुके हैं। स्थानीय नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि बस्तर के हालातों और सुरक्षाबलों की भारी-भरकम मौजूदगी के चलते इनको साबित कर पाना मुश्किल हो जाता है। प्रशासन का रवैया भी खासी अड़चनें उत्पन्न करता है। ऐसे कुछ प्रमुख आरोप इस प्रकार हैं–

  1. वर्ष 2012 में 28-29 जून की दरम्यानी रात को सारकेगुडा में हुई मुठभेड़ में सुरक्षा बलों ने 17 नक्सलियों के मारे जाने का दावा किया था। मारे जाने वालों में सात नाबालिग भी शामिल थे। स्थानीय आदिवासियों का आरोप था कि बीज पंडूम त्‍योहार मनाने के लिए आयोजित बैठक में सुरक्षाबलों द्वारा अकारण निर्दोष ग्रामीणों की हत्या की गई है। मामले में गठित न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट में भी मुठभेड़ की बात नकारी गई। इसे सुरक्षा बलों द्वारा दहशत में की गई फायरिंग करार दिया गया। हालांकि स्थानीय नागरिकों का आज भी कहना है कि यह एक सोची समझी हत्या थी।
  2.  वर्ष 2013 में 17-18 मई की दरम्यानी रात को एड़समेटा में हुई मुठभेड़ में आठ नक्सलियों, जिसमें तीन नाबालिग भी थे, के मारे जाने का दावा सुरक्षाबलों द्वारा किया गया था। हालांकि स्थानीय आदिवासियों द्वारा विरोध किए जाने पर बयान बदलते हुए सुरक्षाबलों द्वारा क्रॉस फायरिंग में इनकी मौत की बात कही गई। मौके पर जवानों और नक्सलियों के मध्य मुठभेड़ से लोगों ने इंकार किया। इस घटना की जांच तीन मई 2019 को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सीबीआई को सौंपी गई थी। प्रकरण न्यायालय में अभी विचाराधीन है।
  3. 12 दिसंबर, 2017 की रात तिम्मापुर में बने सीआरपीएफ कैंप पर नक्सली हमले का दावा सुरक्षाबलों ने किया था। इस मुठभेड़ में नंदू पुनेम नामक युवक की मौत का दावा किया गया था। स्थानीय आदिवासियों का आरोप है कि पुनेम इसी कैंप के जवानों के साथ न केवल क्रिकेट खेलता था वरन जवानों को सामान आदि भी लाकर देता था। उस रात कोई नक्सली हमला नहीं हुआ था।
  4. सितंबर, 2016 में बुरगुम के जंगलों के पास हुई दो छात्रों की मौत भी सुरक्षाबलों पर सवाल खड़ा करती है। उनका दावा है कि नक्सलियों से हुई मुठभेड़ में ये दोनों मारे गए। जबकि गांववालों का आरोप है कि परिवार में हुई मौत की सूचना देने बारसूर इलाके से आए सोनाकु और बिज्नो नाम के इन दोनों लड़कों को पुलिस उस वक्त उठा कर ले गई जब वे अपने रिश्तेदार की झोपड़ी में सो रहे थे।
  5. जनवरी 2019 गमपुर में हुई एक मुठभेड़ में सुरक्षा बलों द्वारा भीमा और सुखमती नाम आदिवसियों को नक्सली बताकर  मार डाला गया था। हालांकि स्थानीय लोगों ने इसे फर्जी करार देकर आरोप लगाया था कि नाबालिग सुखमती की हत्या के पहले उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया था। अपने इस आरोप को छिपाने के लिए ही बाद में उसकी व भीमा की हत्या के बाद उन्हें नक्सली करार दे दिया गया। 

नोटिस जारी कर चुका है राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग

वर्ष 2019 में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग भी छत्तीसगढ़ सरकार को एक नोटिस जारी कर चुका है। आयोग ने बस्तर में पुलिसकर्मियों द्वारा 16 आदिवासी महिलाओं के साथ बलात्कार और छेड़छाड़ की रिपोर्ट का संज्ञान लेकर जांच की और इसे प्रथम 

दृष्टया सही मानते हुए यह नोटिस जारी किया था। आयोग ने अपने अन्वेषण और विधि विभाग के एक जांच दल को मौके पर जाकर जांच के निर्देश भी दिए थे। जांच दल ने 16 महिलाओं के बयान दर्ज किए, जबकि 20 अन्य के बयान दर्ज नहीं हो सके। हालांकि जांच दल के निष्कर्षों और आयोग द्वारा की गई अनुशंसा अभी अप्राप्त है।

सीबीआई दल पर भी हमला 

सुरक्षाबलों की कार्यप्रणाली का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सुकमा जिले के ताड़मेटला, तिम्मापुर और मोरपल्ली गांवों में 11 से 16 मार्च 2011 के दौरान आदिवासियों के घर सुरक्षाबलों द्वारा जला दिए जाने के आरोपों की जांच सर्वोच्च न्यायालय के आदेशानुसार करने पहुंचे सीबीआई दल पर भी हमला किया गया। वर्ष 2012 में हुए इस हमले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि केंद्र सरकार को सीआरपीएफ जवानों को सीबीआई के दल को बचाने के निर्देश जारी करने पड़े। हालांकि सीबीआई ने बाद में विशेष सुरक्षा अधिकारियों, जिन्हें एसपीओ कहा जाता है, पर इस हमले का आरोप लगाते हुए उनके तथा सलवा जुड़ूम के नेताओं सहित तीस से अधिक लोगों पर भारतीय दंड संहिता की धारा 34, 147, 149, 323, 341, 427 व 440 के तहत मामला दर्ज किया था। 

स्थानीय नागरिकों की मानें तो इस हमले के पीछे छत्तीसगढ़ के एक विवादास्पद आईपीएस की महत्वपूर्ण भूमिका थी। वे आरोप लगाते हैं कि इसी अधिकारी के कहने पर ताड़मेटला, तिम्मापुर और मोरपल्ली गांवों में आदिवासियों के घर जलाए गए थे। उनका यह भी आरोप है कि राजनीतिक दबाव पड़ने से सीबीआई ने महज एसपीओ और सलवा जुड़ूम के नेताओं पर प्रकरण दर्ज करने की खानापूर्ति कर ली। 

घर जलाने और बलात्कार के आरोप सही पाया था सीबीआई ने

अक्टूबर 2016 में सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत चार्जशीट में सीबीआई ने माना कि आगजनी कांड को सुरक्षा बलों द्वारा ही किया गया। इसमें ताड़मेटला में 160, तिम्मापुर में 59, और मोरपल्ली में 33 घरों को आग लगाकर नष्ट कर दिया गया। सीबीआई ने यह भी माना कि मोरपल्ली गांव के माड़वी सुला तथा पुलनपाड़ गांव के बड़से भीमा और मनु यादव की हत्या की गई। मोरपल्ली गांव दो ताड़मेटला की एक महिला के साथ बलात्कार की पुष्टि भी सीबीआई द्वारा की गई थी। मगर साथ ही यह भी कहा गया था कि अभी जांच जारी है। 

बहरहाल, सिलेगर की घटना की जांच के आदेश दिए जा चुके हैं। लेकिन स्थानीय आदिवासियों को उससे कोई उम्मीद नहीं है। सुकमा में मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के पद पर कार्य कर चुके प्रभाकर ग्वाल का आरोप है कि सुरक्षा बल अक्सर ही बेकसूर और गरीब आदिवासियों को प्रताड़ित करते हैं। इसके लिए वे उनके विरुद्ध झूठे प्रकरण तक कायम करने से नहीं चूकते। वे बतलाते हैं कि छत्तीसगढ़ की जेलें ऐसे बेकसूर आदिवासियों से भरी पड़ी हैं। इनमें से कई पर अत्यंत संगीन अधिनियमों / धाराओं में प्रकरण दर्ज होने के बाद भी सालों से उनके प्रकरणों में कोई प्रगति नहीं हुई है। 

दरअसल, बस्तर में सुरक्षाबलों की मौजूदगी वहां के स्थानीय निवासियों की रक्षा नहीं कर रही, बल्कि उन्हें झूठे मुकदमों में फंसा उन्हें डराने और उन्हें उनकी जमीन से भगाने का कार्य कर रही है। वे कहते हैं कि न जाने कितने जांच आयोग बनाए जा चुके हैं, मगर नतीजा धरातल पर नहीं दिखता।

(संपादन : नवल/अनिल/अमरीश)


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