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हार से खत्म नहीं हुई है स्टालिन की पेरियारवादी राजनीति

स्टालिन इसलिए भी महत्वपूर्ण बने रहेंगे कि उन्होंने राज्य को नीट से छूट और नेशनल एजुकेशन पॉलिसी में तीन भाषा वाली पॉलिसी का कड़ा विरोध किया। उन्होंने पुरजोर मांग की कि शिक्षा राज्य का विषय होना चाहिए और इसे समवर्ती सूची से बाहर किया जाना चाहिए। बता रहे हैं श्रावण देवरे

द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके) दोनों ही रामासामी पेरियार और उनकी ब्राह्मणवाद विरोधी विचारधारा को अपना मुख्य आधार मानते हैं। हालांकि एआईएडीएमके के संस्थापक एम.जी. रामचंद्रन केरलम के नायर (शूद्र जाति, जिसे क्षत्रिय का दर्जा मिला है) जाति के थे और उनकी राजनीतिक उत्तराधिकारी जयललिता ब्राह्मण थीं। लेकिन उनकी पार्टी में भी ओबीसी का दबदबा है। पिछले साठ वर्षों में तमिलनाडु में दोनों पार्टियां बारी-बारी से सत्ता में आती रहीं। इन दोनों पार्टियों ने अपने-अपने राज में ब्राह्मण वर्चस्व के खिलाफ कई क्रांतिकारी और आक्रामक कानून बनाए। उदाहरण के लिए इन दोनों पार्टियों की वजह से तमिलनाडु में आरक्षण की 50 प्रतिशत की सीमा की बाध्यता हमेशा के लिए खत्म हो गई और कुल आरक्षण 69 प्रतिशत तक हो गया।

जब 26 जनवरी, 1950 को संविधान लागू हुआ तब केवल अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए सरकारी नौकरियों व विधायिका में आरक्षण का प्रावधान था। उच्च शिक्षण संस्थानों में दाखिले में आरक्षण को चुनौती दी गई, जिसके विरोध के परिणामस्वरूप संविधान में पहला संशोधन किया गया। तमिलनाडु (उस समय मद्रास प्रांत) में 1921 और बाद में कई बार संशोधित कानूनों के तहत पहले से आरक्षण की व्यवस्था थी, जिसके तहत ब्राह्मण, मुस्लिम, ईसाई, गैर-ब्राह्मण और दलित सहित सभी समुदायों के लिए आबादी के अनुपात में आरक्षण देय था और एक रोस्टर प्रणाली थी, जिसके जरिए सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व का निर्धारण होता था। मद्रास प्रांत में पहले से चली आ रही इसी आरक्षण व्यवस्था को बनाए रखने के लिए पेरियार व डीएमके के नेतृत्व में हुए आंदोलनों के कारण पहला संविधान संशोधन हुआ, जिससे संविधान के प्रावधानों के तहत आरक्षण और व्यापक व अनिवार्य रूप से लागू हुआ। इस तरह उच्च शिक्षण संस्थानों में भी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जाति के लिए आरक्षण संविधान के तहत सुनिश्चित किया गया।

सनद रहे कि देश के स्तर पर ओबीसी को सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण 1990 में तब दिया गया जब मंडल कमीशन को लागू किया गया। वहीं 2006 में उच्च शिक्षण संस्थानों में दाखिले हेतु आरक्षण का अधिकार मिला। हालांकि राज्य के स्तर पर बिहार, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में ओबीसी के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण 1970 के दशक में लागू किया गया। जबकि यह व्यवस्था तमिलनाडु में पहले से लागू थी।

इतना ही नहीं, संविधान में आरक्षण के लिए सिर्फ़ तीन कैटेगरी हैं– एससी, एसटी और ओबीसी। अब मोदी सरकार के कारण गरीब सवर्ण भी आरक्षण के पात्र हो गए हैं। लेकिन, तमिलनाडु की क्रांतिकारी डीएमके पार्टी की सरकार ने इसका विरोध किया और अपने यहां इसे लागू नहीं होने दिया। वहीं एससी, एसटी और ओबीसी में उपवर्गीकरण करके आरक्षण को समान रूप से सभी को इसका समुचित लाभ दिया। क्योंकि तमिलनाडु में सभी ब्राह्मणवादविरोधी जाति-धर्म के लोगों को आरक्षण का लाभ एक जैसा मिलता है, इसलिए वहां जाति और धर्म के आधार पर फूट डालने की कांग्रेस और भाजपा की साज़िश कामयाब नहीं हो पाती।

एम.के. स्टालिन, पूर्व मुख्यमंत्री, तमिलनाडु

यह पेरियार के आंदोलन का ही प्रभाव रहा कि पूर्व मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के बेटे व पूर्व उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में ‘सनातन’ (ब्राह्मण) धर्म को खत्म करने का आह्वान किया। कहना गैर-वाजिब नहीं कि ऐसी कई क्रांतिकारी घटनाएं सिर्फ तमिलनाडु में ही हो सकती हैं। क्योंकि तमिलनाडु ने एक लंबे सांस्कृतिक संघर्ष के जरिए खुद को ‘ब्राह्मणवाद-विरोधी राष्ट्र’ साबित किया है।

हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में एम.के. स्टालिन और उनकी पार्टी हार गई। कहा जा सकता है कि बंगाल और असम के चुनाव परिणाम कुछ हद तक उम्मीद के मुताबिक थे। स्टालिन की हार के साथ ही देश की राजनीति का एक दमदार राष्ट्रीय नेता (कम-से-कम कुछ समय के लिए) मैदान से बाहर हो गया है।

यह बात और भी ज़्यादा चौंकाने वाली है कि टी. विजय जोसेफ की लीडरशिप वाली नई पार्टी ने डीएमके को हरा दिया। जबकि स्टालिन के नेतृत्व में तमिलनाडु का कुल सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) 2024-25 में 16 प्रतिशत बढ़ा। पिछले 14 सालों में ऐसा पहली बार हुआ कि तमिलनाडु ने डबल-डिजिट ग्रोथ हासिल की। 2021 से 2023 तक सिर्फ़ दो सालों में, स्टालिन सरकार के प्रयासों के कारण राज्य में 9.74 लाख करोड़ रुपए का निवेश हुआ और 31 लाख नौकरियां पैदा हुईं। फरवरी, 2026 में तमिलनाडु सरकार के इकोनॉमिक सर्वे में अनुमान लगाया गया था कि तमिलनाडु 2031 तक 1 ट्रिलियन डॉलर की इकॉनमी बन सकता है।

मुख्यमंत्री के तौर पर स्टालिन ने छात्रों के लिए मुफ्त नाश्ता, उच्च शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति और महिलाओं के लिए मुफ्त बस पास जैसी कई योजनाएं लागू कीं। शिक्षा केवल अमीरों का एकाधिकार नहीं होना चाहिए, यह डीएमके के संस्थापक और राज्य में डीएमके की पहली सरकार का नेतृत्व करने वाले मुख्यमंत्री अन्नादुरई का सपना था, जिसे स्टालिन जमीन पर उतार रहे थे।

स्टालिन की हार इसलिए भी चौंकाती है कि उनकी असली ताकत किसी भी मुद्दे पर, खासकर भाषाई मुद्दे पर केंद्र सरकार को घेरने की उनकी क्षमता में देखी जाती है। अलग-अलग समय पर जब भी हिंदी भाषा थोपे जाने का संकट तमिल भाषा (और दक्षिण भारत के अन्य राज्यों की क्षेत्रीय भाषाओं) पर आया, स्टालिन (और निश्चित रूप से उनके पूर्ववर्तियों) ने कड़ा संघर्ष किया और उस संकट को रोका। लेकिन जब राष्ट्रीय नई शिक्षा नीति के कारण तीन भाषा नीति के नाम पर हिंदी थोपने का खतरा अभी भी सबके सिर पर तलवार की तरह मंडरा रहा है, तो स्टालिन की हार का मतलब है कि अन्य भाषाओं पर संकट और भी गहरा होता जाएगा।

स्टालिन इसलिए भी महत्वपूर्ण बने रहेंगे कि उन्होंने राज्य को नीट से छूट और नेशनल एजुकेशन पॉलिसी में तीन भाषा वाली पॉलिसी का कड़ा विरोध किया। उन्होंने पुरजोर मांग की कि शिक्षा राज्य का विषय होना चाहिए और इसे समवर्ती सूची से बाहर किया जाना चाहिए। उन्होंने राज्य की ऑटोनॉमी को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस कुरियन जोसेफ के नेतृत्व में एक हाई-लेवल कमेटी भी बनाई थी।

अगर इतना कुछ करने के बाद भी कोई हार जाए तो उसे क्या करना चाहिए? लेकिन यह सवाल आम लोगों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है, स्टालिन के लिए नहीं। हार के बावजूद, वे तुरंत अपने विधानसभा क्षेत्र कोरथुल में जनता को मिलने चले गए ओर उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया, जिसका सारांश इस प्रकार है–

“मैं उन सभी 1.54 करोड़ लोगों का दिल से शुक्रिया अदा करता हूं जिन्होंने विधानसभा चुनाव में डीएमके फ्रंट पर भरोसा करके वोट दिया। जीतने वाली पार्टी को हमसे सिर्फ 3.52 प्रतिशत ज़्यादा वोट मिले। यह लोगों का हम पर मज़बूत भरोसा है। मैं डीएमके के सभी जीतने वाले उम्मीदवारों से अनुरोध करता हूं कि वे सीधे लोगों के पास जाएं और उन्हें शुक्रिया कहें। डीएमके ने अब तक कई जीत और हार देखी हैं। लेकिन इसकी पॉलिसी और सोच कभी डगमगाई नहीं। पार्टी के कार्यकर्ता ही हमारी असली ताकत हैं। मुझे आपके सपोर्ट से ही ताकत मिलती है।

“सत्ता में रहते हुए, हमने लोगों के लिए कई वेलफेयर स्कीम लागू कीं। अब एक मज़बूत विपक्षी पार्टी के तौर पर, हम लोगों के अधिकारों और मांगों के लिए ज़रूर लड़ेंगे।

“हम अपनी संस्कृति (द्रविड़ियन), भाषा और देश को बचाने के लिए यह आंदोलन जारी रखेंगे। पेरियार, अन्ना (दुरई) और कलैगनार (एम. करुणानिधि) के विचारों की विरासत को बचाकर रखेंगे। हम निराश नहीं होंगे, हम फिर से ज़रूर जीतेंगे!”

कहना अतिश्योक्ति नहीं कि हार के बावजूद, राज्य के विकास और अधिकारों के लिए स्टालिन की लड़ाई खत्म नहीं हुई है।

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

श्रावण देवरे

अपने कॉलेज के दिनों में 1978 से प्रगतिशील आंदोलन से जुड़े श्रावण देवरे 1982 में मंडल कमीशन के आंदोलन में सक्रिय हुए। वे महाराष्ट्र ओबीसी संगठन उपाध्यक्ष निर्वाचित हुए। उन्होंने 1999 में ओबीसी कर्मचारियों और अधिकारियों का ओबीसी सेवा संघ का गठन किया तथा इस संगठन के संस्थापक सदस्य और महासचिव रहे। ओबीसी के विविध मुद्दों पर अब तक 15 किताबें प्राकशित है।

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