h n

‘हड़प्पा : गॉड्स सिटी ऑफ़ सिविलाईजेशन’ : क्यों और कैसे?

न तो ‘रामायण’ की अयोध्या और न ही ‘महाभारत’ की द्वारका के प्राचीन नगर होने के कोई पुरातात्विक प्रमाण हैं। मेरा उपन्यास दुनिया के सबसे पुराने शहर हड़प्पा पर केंद्रित है। पुरातात्विक खुदाईयों और डीएनए अध्ययनों से यह साबित हो चुका है ईसा से 3,000 साल पहले सिंधु नदी की घाटी में यह शहर था, बता रहे हैं कांचा आइलैय्या शेपर्ड

मेरे उपन्यास ‘हड़प्पा : गॉड्स सिटी ऑफ़ सिविलाईजेशन’, जिसका लाजवाब चित्रांकन प्रीति गुलाटी कॉक्स ने किया है, अनबाउंड स्क्रिप्ट, नई दिल्ली द्वारा हाल में प्रकाशित किया गया है। यह उपन्यास भारत के साहित्यिक इतिहास में एक अनोखा प्रयोग है। आलोचक सत्यसागर का कहना है कि यह कृति मिथकों का पर्दाफाश करती है और ‘साहसिक कल्पना’ से उपजी है। अब तक प्राचीन इतिहास के नाम पर हम केवल ब्राह्मणवादी संस्कृत साहित्य पढ़ते-पढ़ाते आ रहे हैं, जो विशुद्ध रूप से मनगढ़ंत है। ब्राह्मणवादी संस्कृत साहित्य की शुरुआत ‘ऋग्वेद’ से होती है और ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ तक जाती है। इन ग्रंथों में न तो उत्पादन के साधनों की चर्चा है, न पशु अर्थव्यवस्था की, न सामूहिक संस्कृति की और न ही किसी सभ्यता की। ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ की कथाएं चंद ब्राह्मण और क्षत्रिय किरदारों और कुछ सन्यासियों और महिलाओं के आसपास बुनी गई हैं।

दूसरी ओर मेरा उपन्यास दुनिया के सबसे पुराने शहर हड़प्पा के बारे में है, जो ईसा से करीब 3,000 साल पहले सिंधु नदी की घाटी में बस चुका था। भारतीय व विदेशी अध्येताओं की निगरानी में किए गए पुरातात्विक उत्खननों, डीएनए अध्ययनों और प्राचीन कलाकृतियों के अध्ययन से यह साबित हुआ है कि इस नाम का शहर वास्तव में था और सांस्कृतिक व आर्थिक दृष्टि से और एक सभ्यता बतौर उस कालखंड में पूरी दुनिया में उसकी कोई सानी नहीं थी।

एक राष्ट्र के रूप में भारत आज इस बात पर गर्व कर सकता है कि उसकी सभ्यता की जड़ें हड़प्पा में है। मेरे उपन्यास का मुख्य किरदार हड़प्पा नाम का नौजवान है जो अपने समय की दुनिया के सबसे बड़े और महानतम शहर का निर्माण करता है। इस काम में उसकी पत्नी मेसम्मा उसकी मदद करती है। हड़प्पा भैंस को पालतू बनाकर सभ्यता के निर्माण की प्रक्रिया की शुरुआत करता है। मेसम्मा दुनिया का पहला कृत्रिम जलाशय बनाती है। धीरे-धीरे वे लोग जम्बूद्वीप नाम के एक गांव, जिसका नामकरण हड़प्पा के पिता के नाम पर किया गया है, को एक बहुत बड़े शहर हड़प्पा में बदल देते हैं। हड़प्पा इस शहर का पहला राजा बनता है। यह कहानी उस धरती पर कुछ विदेशियों के आगमन के साथ खत्म होती है।

अयोध्या नहीं हड़प्पा था प्राचीन ऐतिहासिक शहर

हड़प्पा दुनिया का पहला बड़ा शहर था। कई मामलों में वह मिस्र, इजराइल, यूनान और रोम के प्राचीन शहरों से अलग था। वहां के घर ईंटों और लकड़ी से बनाए जाते थे और वहां नहरें थीं। इन सबसे यह तो साफ है कि आज के वे भारतीय गांव और कस्बे, जिनके निवासियों का मुख्य काम खेती है, इस सभ्यता से कहीं न कहीं जुड़े हुए हैं।

हड़प्पा ने मनुष्यों के ज्ञान के विस्तार की प्रक्रिया की नींव रखी। इस शहर के निवासी अपनी रोजाना की जिंदगी के साथ-साथ उनकी पशु अर्थव्यवस्था, उत्पादकता, विज्ञान और इंजीनियरिंग के बारे में काफी जानकारियां हमारे लिए छोड़ गए हैं। यह उन्नत सभ्यता आर्यों (ब्राह्मण, क्षत्रिय और बनिया) के भारत में आने (या उस पर हमला करने) के 1,500 साल पहले फल-फूल रही थी। शेष दुनिया इतनी उन्नत सभ्यता का निर्माण बहुत बाद में कर सकी।

इसके विपरीत राम के पिता दशरथ के राज्य की राजधानी अयोध्या – जहां हिंदुत्ववादियों के अनुसार रामराज्य था – हड़प्पा के काफी बाद अस्तित्व में आई। ऐसा लगता है कि ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ में जिन प्राचीन शहरों और बसाहटों के नाम मिलते हैं, वे दरअसल इन महाकाव्यों के किरदारों के नाम पर रखे गए हैं। यानी ये नगर इन ग्रंथों के लेखन के बाद अस्तित्व में आए। दूसरी ओर हड़प्पा एक विशिष्ट स्थान का सबसे पुराना ऐतिहासिक नाम है। मेरी राय में इस शहर का नाम उसके निर्माता हड़प्पा के नाम पर रखा गया होगा। भारत में लंबे समय से मनुष्यों के नाम पर शहरों और गांवों के नाम रखने की परंपरा रही है। मेरी इस मान्यता को इस तथ्य से भी बल मिलता है कि दक्षिण भारत में सैंकड़ों नामों के अंत में ‘अप्पा’ (दक्षिण भारतीय भाषाओं में पिता) लगा होता है। हड़प्पा के जो निवासी दक्षिण भारत में जाकर बसे होंगे वे नामकरण की इस प्रणाली को भी अपने साथ ले गए होंगे।

अयोध्या व द्वारका

इस बात का कोई पुरातात्विक प्रमाण नहीं है कि ‘रामायण’ में वर्णित अयोध्या और ‘महाभारत’ में वर्णित द्वारका वास्तविक प्राचीन नगर थे। बाबरी मस्जिद विवाद के सिलसिले में एक अदालत के आदेश के बाद अयोध्या में खुदाई की गई थी। इस खुदाई पर आधारित भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण (एएसआई) की रिपोर्ट में कहा गया है कि अयोध्या में ईसा पूर्व 700-300 सदियों के कुछ अवशेष मिले हैं। मगर खुदाई में उस काल की कोई कलाकृतियां नहीं मिलीं और न ही अयोध्या की अर्थव्यवस्था, वहां के लोगों द्वारा पाले जाने वाले जानवरों और उपयोग की जाने वाली तकनीकी आदि के बारे में कोई जानकारी मिली है। अगर हम इस रपट को सही मानें तब भी यह स्पष्ट है कि अयोध्या, हड़प्पा के काफी बाद अस्तित्व में आई। इसका निर्माण आर्य ब्राह्मणों के भारतीय उपमहाद्वीप के आने के करीब 800 से 1000 साल बाद हुआ। हड़प्पा के विपरीत अयोध्या में हुई पुरातात्विक खुदाई पर एक भी वैज्ञानिक अध्ययन नहीं हुआ है। अयोध्या के निवासियों का जो वर्णन ‘रामायण’ में किया गया है, उसमें यह बताया गया है कि वे बहुत शानदार कपड़े पहनते थे, बड़े-बड़े महलों में रहते थे, उनके पास तरह-तरह के गहने थे और आवागमन के लिए वे रथों का इस्तेमाल करते थे। इससे ऐसा लगता है कि ‘रामायण’ के किरदार काफी आधुनिक थे। वहां के राजाओं और उनकी पत्नियों व परिवार की अन्य महिलाओं को इस तरह के कपड़े और गहने कहां से हासिल हुए? अगर यह सचमुच एक प्राचीन सभ्यता थी तो उस युग के लोगों के पास न तो इस तरह के परिधान हो सकते थे, न गहने, न घर और न ही आवागमन के साधन। कृतियुग (या सतयुग) की कल्पना काफी बाद की है और इसका कोई प्रमाण नहीं है कि इस तरह का कोई युग वास्तव में था। ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ दोनों काव्यात्मक रचनाएं हैं, जिनके किरदार विशुद्ध काल्पनिक हैं। भारतीय शूद्रों, दलितों और आदिवासियों को किसी भी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य लेखक द्वारा लिखी गई किसी भी पुस्तक पर विश्वास नहीं करना चाहिए क्योंकि ये लोग केवल अपने लिए और अपने बारे में लिखते थे। उन्होंने तो कभी यह स्वीकार ही नहीं किया कि शूद्र, दलित और आदिवासी उत्पादक समुदाय उनके समय में थे। इस बात का तो सवाल ही नहीं उठता कि वे यह मानते कि ये उत्पादक समुदाय उनसे बहुत पहले भारत में रहते थे। इसी कारण मेरा उपन्यास ‘हड़प्पा’ भारत की भावी पीढ़ियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण बन जाता है। ब्राह्मण, बनिया और क्षत्रिय युवाओं को भी यह समझना चाहिए कि संस्कृत साहित्य – जिसमें उत्पादक आमजनों के जीवन और उनके योगदान की कोई चर्चा ही नहीं है – की देश के लिए कोई महत्व नहीं है। भारतीय युवाओं को भारत के अतीत की शुरुआत हड़प्पा की शहरी सभ्यता से माननी चाहिए। तभी वे वैश्विक ज्ञान प्रणालियों में भारत को एक सम्मानजनक स्थान दिलवा पाएंगे। केवल ब्राह्मणों और क्षत्रियों के जीवन को भारत की प्राचीन परंपरा बताने से भारत की विभिन्न जातियों के बीच सांस्कृतिक संघर्ष शुरू हो जाएगा। सभी जातियों की एकता के लिए यह आवश्यक है कि हम यह मानें कि भारत में सभ्यता की शुरुआत हड़प्पा से हुई, जिसका समाज जातिविहीन था।

भारत की प्राचीन सभ्यता और उसके लोगों की कहानी हड़प्पा से शुरू होती है, अयोध्या और द्वारका से नहीं।

‘हड़प्पा’ में प्रकाशित प्रीति गुलाटी कॉक्स द्वारा बनाया गया चित्र; रामचंद्र माधव महिषी की पुस्तक ‘चित्र रामायण’ (1916) में बालासाहब पंत प्रतिनिधि द्वारा राम की अयोध्या में वापसी का चित्र

मेरा उपन्यास

‘हड़प्पा : गॉड्स सिटी ऑफ़ सिविलाईजेशन’ मानव समाज के विकास की प्रक्रिया समझाता है। यह बताता है कि प्राचीन भारत की अर्थव्यवस्था कैसी थी। उस समय मनुष्यों और पशुओं के परस्पर रिश्ते क्या थे। उनका विज्ञान और उनकी तकनीक कितनी विकसित थी। दूसरी ओर ‘रामायण’ हमें यह नहीं बताती कि उस काल की पशु अर्थव्यवस्था कैसी थी। ‘रामायण’ की कहानी दशरथ के शासनकाल से शुरू होती है। कथा-साहित्य भी अक्सर कृषि, पशुओं, शिल्पकारों और तकनीकी पर कुछ रोशनी डालता है, लेकिन ‘रामायण’ केवल क्षत्रिय राजाओं और ब्राह्मण सन्यासियों पर केंद्रित है। क्या उस समय के लोग बिना कुछ खाए जीते थे? अगर नहीं, तो वे लोग कौन थे जो क्षत्रिय शासकों और ब्राह्मण साधु-सन्यासियों को अनाज, मांस व दुग्ध उत्पाद आदि उपलब्ध करवाते थे? यह स्वाभाविक है उस युग में यदि क्षत्रिय राजा और ब्राह्मण सन्यासी थे तो शूद्र खाद्यान्न उत्पादक भी रहे होंगे और वर्ण-व्यवस्था भी रही होगी। उस काल की सामाजिक व्यवस्था में ब्राह्मण और क्षत्रिय खाद्यान्न उत्पादन की प्रक्रिया में कोई भूमिका नहीं निभाते रहे होंगे। प्राचीन भारत की किसी भी यथार्थपरक कहानी में उस युग के मूल्यों, जीवनशैली, कलाकृतियों और तकनीकी का वर्णन होना ही चाहिए। अगर किसी ग्रंथ में वर्णित घटनाक्रम को प्राचीन काल में घटित बताया जाता है, लेकिन उसके किरदारों की जीवनशैली और उनकी तकनीकी उस काल की न होकर, आधुनिक समय की प्रतीत होती है, तो इससे उस ग्रंथ के लेखक की समझ पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। किसी उपन्यास या कहानी को भी उसके काल से मेल खाना चाहिए। अगर ‘रामायण’ का लेखन वाल्मीकि नामक व्यक्ति ने किया था, तो कृति में उसके काल के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिवेश की झलक भी मिलनी चाहिए। ‘रामायण’ हमें उन लोगों के बारे में कुछ नहीं बताती जो तत्कालीन समाज को जिंदा रखते थे। मेरा उपन्यास उन आम लोगों के बारे में है जिन्होंने इस देश की सबसे पुरानी सभ्यता का निर्माण किया और उसी सभ्यता से आज का भारत उपजा।

मेरा उपन्यास ‘हड़प्पा’ बताता है कि प्राचीन समाज की प्रकृति विकासपरक थी। वह समाज धीरे-धीरे, संयुक्त प्रयासों से नई-नई चीजें सीख रहा था। वहां की उत्पादन प्रक्रिया भी सामूहिक श्रम पर आधारित थी और युद्ध भी सब मिल कर लड़ते थे। ‘रामायण’ हमें बताती है कि किस प्रकार रावण के खिलाफ लड़ाई में वानरों ने राम का साथ दिया था। इस तरह राम का रावण के खिलाफ युद्ध भी एक संयुक्त उपक्रम था। सच तो यह है कि प्राचीन काल में खाद्य उत्पादन, मकानों के निर्माण, उपयोगी उपकरण गढ़ने और युद्ध के लिए हथियार तैयार करने – इन सभी के लिए दीर्घकालीन संगठित संयुक्त प्रयासों की आवश्यकता होती थी। लेकिन ‘रामायण’ हमें यह नहीं बताती कि अयोध्या या उसके आसपास के गांवों में ये काम किस तरह से होते थे।

कोई भी आध्यात्मिक या सामाजिक ग्रंथ अपने समय के आमजनों को अंधेरे में नहीं रख सकता – फिर चाहे वे गुलाम हों या मालिक। मगर ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ केवल क्षत्रियों और ब्राह्मणों की बात करते हैं जो क्रमशः शासक वर्ग एवं धर्मगुरु थे। इस तरह की पुस्तकें हमें असली भारत और असली भारतीयों के बारे में नहीं बतातीं। क्षत्रिय शासकों को देवी-देवताओं का दर्जा देना धर्म का विरूपण है। ज्योंही ईश्वर को किसी विशिष्ट जाति का निरूपित किया जाता है, वह उन सब उत्पादक लोगों से दूर हो जाता है जिन पर समाज जिंदा रहने के लिए निर्भर होता है। मेरा उपन्यास ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ के नॅरेटिव का ठीक उलट है और उसमें वर्णित घटनाक्रम कथित कृतियुग और द्वापर युग के सैंकड़ों साल पहले घटित होता है।

पशु-पक्षियों को पालतू बनाना

अब तक न तो समाजविज्ञान की किसी पुस्तक में और न ही कथा-साहित्य में उस प्रक्रिया पर रोशनी डाली गई है जिसके जरिए मनुष्यों ने भेड़ों और बकरियों को पालतू बनाया। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण था एक अत्यंत खूंखार जंगली जानवर भैंस को पालतू बनाना। किसी ने हमें यह नहीं बताया कि मुर्गे जैसे पक्षियों को कब और किस तरह पालतू बनाया गया। पशुओं और पक्षियों को पालतू बनाने की प्रक्रिया वैज्ञानिक थी और उसके लिए पशुओं और पक्षियों के मनोविज्ञान की समझ आवश्यक थी। मेरे उपन्यास में यह बताया गया है कि हड़प्पा, उसके पिता जांभव और मां सिंध को भैंस, भेड़, बकरी और मुर्गे को पालतू बनाने के लिए किस तरह कड़ी मेहनत और संघर्ष करना पड़ता है। जांभव भेड़ और बकरी को पालतू बनाता है और हड़प्पा भैंस को। हड़प्पा की मां किस तरह मुर्गे को पालतू बनाती है और किस प्रकार दूध एवं दही पर आधारित अर्थव्यवस्था की नींव रखती है, इसका सजीव वर्णन उपन्यास में किया गया है। आमतौर पर लेखक यह मानकर चलते हैं कि ये सभी जानवर मनुष्यों के आसपास घूमते थे और मनुष्यों को उनका उपयोग करना भर सीखना पड़ा। मगर सच यह है कि इन जानवरों को पालतू बनाने के पहले मनुष्यों को शिकार कर अपने लिए भोजन जुटाना पड़ता था। जानवरों को पालतू बनाने के बाद मनुष्यों की जीवनशैली में बहुत बड़ा परिवर्तन आया। इससे मांस और दूध पर आधारित अर्थव्यवस्था को घरों और गांवों में जगह मिल गई। पक्षियों और पशुओं को पालतू बनाए बिना मनुष्य कभी गांवों में स्थायी तौर पर नहीं रह पाता और न ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था विकसित हो पाती। ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विकास के बिना कोई शहर अस्तित्व में नहीं आ पाता। ‘हड़प्पा: गॉड्स सिटी ऑफ़ सिविलाईजेशन’ इस प्रक्रिया का सृजनात्मक वर्णन करता है।

हड़प्पा गॉड्स सिटी ऑफ़ सिविलाइज़ेशन; लेखक कांचा आइलैय्या शेपर्ड; प्रकाशक अनबाउण्ड स्क्रिप्ट; सजिल्द; पृष्ठ 80, मूल्य रु. 399

मुझे कैसे एहसास हुआ कि हड़प्पा किसी मनुष्य का नाम था?

आज के भारत में भी अधिकांश गांवों और शहरों के नाम उन महिलाओं या पुरुषों के नामों पर हैं जिन्होंने संबंधित गांवों या शहरों की स्थापना में महती भूमिका निभाई थी। हम सब जानते हैं कि गांव ही धीरे-धीरे बड़े होकर शहर और कस्बे बनते हैं। प्राचीन और मध्य काल में शहरों को योजना बनाकर नहीं बसाया जाता था। उस समय आधुनिक भारत के चंडीगढ़ जैसा कोई शहर नहीं था, जिसे पहले कागज पर उकेरा गया और फिर धरती पर। दुनिया में कहीं भी शहरों का निर्माण एक बार में नहीं हुआ। गांव धीरे-धीरे बड़े होते गए और अंततः शहर बन गए।

अनेक दक्षिण भारतीयों के नाम के अंत में ‘अप्पा’ होता है। कई देवों के नाम में भी ‘अप्पा’ प्रत्यय के रूप में इस्तेमाल किया गया है। जैसे अयप्पा, वीरप्पा, रामप्पा इत्यादि। केरल का अयप्पा मंदिर काफी मशहूर है। वीरप्पा पूरे दक्षिण भारत में चरवाहों के देव हैं, विशेषकर महाराष्ट्र के धनगर और तेलंगाना, आंध्र प्रदेश व कर्नाटक के कुरूमा/कुरूबा समुदायों के। इन समुदायों के लोग जिन गांवों में रहते हैं, वहां वीरप्पा का कम-से-कम एक मंदिर जरूर होता है। रामप्पा मंदिर पूर्वी तेलंगाना में मुलुगू नामक शहर के नजदीक है। 

‘अप्पा’ प्रत्यय वाले शब्द व्यक्तियों और परिवारों दोनों के नाम होते हैं जैसे बंगारप्पा, वीरप्पा, मलप्पा आदि। इसके अलावा अयप्पा, वीरप्पा और मारप्पा जैसे देवों के नाम पर भी कई लोग अपने नाम रखते हैं। कई गांवों के नाम के अंत में भी ‘अप्पा’ आता है। दक्षिण भारत के इस सामाजिक, मनोवैज्ञानिक व सांस्कृतिक वातावरण ने मुझे यह सोचने के लिए प्रेरित किया कि कदाचित हड़प्पा भी प्राचीन भारत के किसी निवासी का नाम रहा होगा, जिसके नाम पर देश के सबसे प्राचीन और ऐतिहासिक नगर का नाम हड़प्पा रखा गया।

इस उपन्यास के लेखन की प्रक्रिया इन नामों के समाजशास्त्रीय निहितार्थों की समझ से शुरू हुई। इसके साथ ही पुरातत्वशास्त्रियों और इतिहासविदों के अध्ययनों के निष्कर्षों के आधार पर मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि प्राचीन हड़प्पा और आज के दक्षिण भारत में कई समानताएं हैं। इनमें शामिल हैं लोगों की त्वचा का रंग, उनके कृषि उपकरण, आवास निर्माण के तरीके इत्यादि।

हड़प्पा शब्द किसी आर्य संस्कृत ग्रंथ में नहीं मिलता और न ही ऐसे लोग जिनके पुरखे आर्य रहे होंगे, इस नाम का इस्तेमाल करते हैं। 

कोई भी गांव तभी बस सकता है और उन्नति की राह पर आगे बढ़ सकता है जब उसकी सुविकसित पशु व कृषि अर्थव्यवस्था हो और वहां विभिन्न शिल्पों के कारीगर उपलब्ध हों। लोग नए तरह के उपकरण तभी बना सकते हैं जब उन्हें भोजन के लिए दिनभर शिकार और मछली पकड़ने का काम नहीं करना पड़े और उन्हें यह भरोसा हो कि बिना यह सब करे भी उन्हें भोजन उपलब्ध हो जाएगा। 

मेरे उपन्यास में जंबूद्वीप नाम का गांव हड़प्पा के पिता जांभव और मां सिंध द्वारा भेड़, बकरी, मुर्गे और कुत्ते को पालतू बनाने के साथ अस्तित्व में आता है। जांभव के पिता का नाम महिश और मां का नाम पोचा था। महिश और पोचा अपने जीवनयापन के लिए पूरी तरह से प्रकृति पर निर्भर थे और पेड़ों के नीचे और गुफाओं में रहते थे। मगर जांभव और सिंध के पशुओं और मुर्गे को पालतू बनाने में सफलता से शिल्पकला के विकास और गांवों के बसने की प्रक्रिया शुरू हुई। यह मानवता के इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण मील का पत्थर था। 

ईश्वर का विचार

उपन्यास में यह बताया गया है कि ईश्वर का विचार लोगों की सोच और कल्पना से उभरा। जंबूद्वीप के निवासी जीवन के बारे में नए-नए तरीके से सोचने लगे। 

शुरुआत में ईश्वर की अवधारणा एक अमूर्त या निराकार शक्ति के रूप में थी। मगर कुछ लोग मूर्तियों की पूजा करना चाहते थे। हड़प्पा ने मनुष्यों को देवी-देवताओं के रूप में प्रस्तुत करने का कड़ा विरोध किया। लेकिन वह खुद उस नगर-राज्य का राजा बन गया। फिर कहानी में आदिदेवड़ू नामक किरदार का प्रवेश होता है जिसका यह दावा है कि वह यह देख सकता है कि आने वाले समय में क्या होने वाला है। वह यह भविष्यवाणी करता है कि भविष्य में कुछ विदेशी आएंगे और हड़प्पा को तहस-नहस कर देंगे। हड़प्पा उसकी बातों को गंभीरता से लेने लगता है। इस तरह आदिदेवडू वह पहला मनुष्य बन जाता है जिसे ईश्वर के समकक्ष दर्जा दिया जाता है। 

मेरी मान्यता है कि जिस समय भारत के मूल निवासियों ने हड़प्पा शहर और उससे जुड़ी महान सभ्यता का निर्माण किया, उसके काफी पहले वे ईश्वर का विचार विकसित कर चुके थे। उनमें से कुछ ईश्वर को अमूर्त मानते थे तो कुछ उसे मनुष्य रूप में देखते थे। समय के साथ देवों को मनुष्य रूप में देखने की परंपरा ने मूर्तियों को जन्म दिया। आदिदेवड़ू उसी आध्यात्मिक-सांस्कृतिक धारा का प्रतिनिधित्व करता है। 

यह उपन्यास यह साबित करेगा कि ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ जैसी पौराणिक पुस्तकें केवल इसलिए लिखी गईं ताकि क्षत्रिय शासकों की सहायता से समाज को ब्राह्मण लेखकों और पुजारियों के अधीन लाया जा सके। ये दोनों जातियां उत्पादन-विरोधी बन गईं और उत्पादन विज्ञानों व तकनीकों की विरोधी भी। बल्कि वे मानवता की प्रगति की विरोधी बन गईं। जो बच्चे और बड़े ‘हड़प्पा: गॉड्स सिटी ऑफ़ सिविलाइज़ेशन’ पढ़ेंगे उन्हें यह एहसास होगा कि भारत की मूल जड़ें हड़प्पा में है।

(मूल अंग्रेजी से अनुवाद : अमरीश हरदेनिया,संपादन : नवल/अनिल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, संस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

लेखक के बारे में

कांचा आइलैय्या शेपर्ड

राजनैतिक सिद्धांतकार, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता कांचा आइलैया शेपर्ड, हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक और मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय, हैदराबाद के सामाजिक बहिष्कार एवं स्वीकार्य नीतियां अध्ययन केंद्र के निदेशक रहे हैं। वे ‘व्हाई आई एम नॉट ए हिन्दू’, ‘बफैलो नेशनलिज्म’ और ‘पोस्ट-हिन्दू इंडिया’ शीर्षक पुस्तकों के लेखक हैं।

संबंधित आलेख

आजाद मुल्क में हाशिए की मुक्ति संग्राम का उद्घोष करतीं कविताएं
कवि राजेश पाल उम्मीद के रचनाकार हैं। उनका आक्रोश विध्वंसक नहीं है, सृंजनशील है। वे हर तरह की असमानता, अन्याय और भेदभाव का ख़ात्मा...
टुकड़े-टुकड़े आईना : दलितों की व्यथा-कथा और प्रतिरोध-प्रतिवाद का जीवंत इतिहास
यदि कोई हिंदी पट्टी का इतिहास सबसे बड़े मेहनतकश हिस्से दलित को केंद्र में रखकर देखना-पढ़ना-लिखना चाहे तो दलित आत्मकथाएं इसका सबसे बड़ा स्रोत...
‘लोकविद्याधर’ : लोककला, श्रम और असमान विकास की विडंबना की कहानी
रामजी यादव की कहानी ‘लोकविद्याधर’ लोककला के क्षरण, पारंपरिक कारीगर जातियों के रोजगार-संकट, बाजार के अमानवीय दबाव और जाति-वर्ग से निर्मित सामाजिक दूरी को...
डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह की साहित्यिक, भाषायिक व वैचारिक यात्रा
डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह की प्रकाशित कृतियां भाषा-विज्ञान, साहित्यालोचना, इतिहास-बोध, लोकसंस्कृति तथा बहुजन विमर्श के विविध आयामों को अपने आप में समेटी हुईं हैं।...
‘पीली छतरी वाली लड़की’ की जाति
अगर विश्वविद्यालय में दिखाई देने वाला जातिवाद आसमान से नहीं टपका है, बल्कि यह समाज में मौजूद जातिवाद का ही विस्तार है, तो फिर...