न्यूज चैनल तोड़-मरोड़ रहे हैं दलितों की खबरें

गोहाना में मीडिया की भूमिका दो हिस्सों में साफ-साफ बंटी नजर आई। एनडीटीवी इंडिया ने गोहाना की घटना का जिस तरह से पहले दिन प्रसारण किया उसे भारतीय पत्रकारिता की वास्तविक विरासत की बानगी कहा जा सकता है

समाचार पत्रों के स्थानीय संस्करणों के बढ़ते प्रसार के चलते यह देखा जाता है कि स्थानीय स्तर की छोटी-मोटी घटनाएं भी प्रकाश में आ जाती हैं। लेकिन वंचित वर्गों के उत्पीडऩ के संदर्भ में देखा जाए तो स्थानीय स्तर पर उनकी खबरों का सिमटना उन वर्गों के लिए घातक होता है। 31 अगस्त, 2005 को हरियाणा के गोहाना में दलितों के मुहल्ले पर हमले के पहले से स्थानीय समाचारपत्रों के संस्करणों में जाति या खाप पंचायत द्वारा हमले की चेतावनी प्रकाशित हो रही थी। स्पष्ट है कि दलित विरोधी हमले की घटनाओं में मीडिया की भूमिका का अध्ययन करने की आवश्यकता है।

गोहाना में मीडिया की भूमिका दो हिस्सों में साफ-साफ बंटी नजर आई। एनडीटीवी इंडिया ने गोहाना की घटना का जिस तरह से पहले दिन प्रसारण किया उसे भारतीय पत्रकारिता की वास्तविक विरासत की बानगी कहा जा सकता है। इससे उस चैनल का देशभर में फैला दर्शक समूह वस्तुस्थिति से अवगत हो सका। चैनल ने राज्य प्रशासन के आला अधिकारी संजय कोठारी के साथ बातचीत की। उस बातचीत से कोठारी की दलित विरोधी मानसिकता का पता चला।

संजय कोठारी, वाल्मीकि मुहल्ले में जलायी गई कोठियों को झोंपड़ी बता रहे थे। यह मानसिक जड़ता है कि दलित झोंपड़ी में ही रहता है। यही नहीं वे हमले के शिकार मकानों की संख्या बार-बार पांच-सात बता रहे थे। दरअसल चैनल जब अपनी वास्तविक भूमिका में हों तो हमें उन पक्षों को भी जानने का मौका मिलता है जो हमलावरों की सहायता करते हैं। बहरहाल, एनडीटीवी इंडिया ने गोहाना में दलित दहन की खबर को स्थानीय संस्करणों से बाहर निकालने में भूमिका अदा की। बलजीत की हत्या के बाद जिस तरह से समाचारपत्र पंचायत की चेतावनियां प्रकाशित कर रहे थे यदि वे क्षेत्र विशेष की सीमा से बाहर निकल पाते तो शायद देश और राज्य का बड़ा हिस्सा गोहाना में वाल्मीकि जाति के घरों पर हमले की तैयारी के खिलाफ कुछ करता। कई बार स्थानीय पंचायतों के फैसले देश के संवैधानिक ढांचे से टकराते दिखाई देते हैं।

दूसरी तरफ जी टीवी के चैनल जी न्यूज और स्टार न्यूज ने दूसरे दिन संपन्न जाटों के नेतृत्व में बुलाई गई पंचायत का सीधा प्रसारण किया। उसने दिल्ली से दो-दो संवाददाता वहां भेजे। जी न्यूज पर तो घंटों पंचायत और दलितों के खिलाफ आक्रामक भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा था। गोहाना के वाल्मीकि मुहल्ले को चंबल की घाटी बताया जा रहा था। दलितों के नामों का मखौल उड़ाया जा रहा था। यह बाजार पर कब्जा करने की योजना का हिस्सा भर नहीं था। यह मीडिया में सामाजिक वर्चस्व का खुलासा था। मीडिया में दलित और पिछड़ों की तादाद न के बराबर है। जी न्यूज के मालिक हरियाणा के ही हैं। ‘जी न्यूज और हरियाणा की खबरें’ एक स्वतंत्र शोध का विषय हो सकता है। जी न्यूज और स्टार न्यूज ने उस पंचायत का सीधा प्रसारण किया, जिसमें दलितों के खिलाफ जहर उगला जा रहा था और जहां हमलावर मौजूद थे।

गोहाना जैसी घटना के समय मीडियाकर्मी महज निष्पक्ष खबर देने वाले पेशेवर नहीं रह जाते। उनकी सामाजिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि भी सतह पर आ जाती है। पुलिस द्वारा आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में एक महिला संवाददाता ने बताया कि घटना के बाद उसे दलितों की धमकियां मिलीं। ऐसे मामले में कोई व्यक्ति, जाति में कैसे बदल जाता है, यह इसका ज्वलंत नमूना है। कोई सवर्ण जाति का सदस्य धमकी देता तो क्या उसे सवर्णों की धमकी के रूप में पेश किया जाता है ? कोई पत्रकार जब किसी संवाददाता सम्मेलन में जाता है तो वह अपने साथ घटी किसी व्यक्तिगत घटना को आपराधिक हमले की घटना से जोडऩे के लिए क्यों बेचैन हो जाता है ? यह  जातिवाद से जुड़े मामले में ही क्यों किया जाता है? गोहाना के लिए हमारी टीम ने जब 31 अगस्त के हमले की घटना का अध्धयन करने के बाद पानीपत में संवाददाता सम्मेलन किया तो उससे उसी तरह के सवाल किए गए जो हमलावरों के समर्थक और जातिवादी कर रहे थे। टीम से पूछा गया कि क्या गोहाना में हमले की घटना जिन घटनाओं की प्रतिक्रिया है उसकी पड़ताल की गई?

इस तरह की प्रतिक्रिया की भाषा का इस्तेमाल हिन्दुत्ववादी संघ के नरेन्द्र मोदी और कांग्रेस के राजीव गांधी ने गुजरात में मुसलमानों और दिल्ली और दूसरे शहरों में सिखों पर हमले के समय की थी। गोहाना में मीडिया के एक हिस्से, प्रशासन और हमलावरों की भाषा एक जैसी क्यों हो जाती है ? हत्या की वारदातों के बाद मृतकों की जातियों को हमलावरों की जाति पर हमले की छूट तो नहीं दी जा सकती है। तब फिर कानून-व्यवस्था और संविधान की क्या जरूरत है ? टीम से कहा गया कि निष्पक्षता के लिए दूसरे पक्ष से भी बातचीत करनी चाहिए। टीम ने पूछा कि दूसरा पक्ष कौन है ? हमने गोहाना की 31 अगस्त की घटना का अध्ययन किया है। समाचार-पत्रों में आमतौर पर आपराधिक घटनाओं की खबरें पुलिस के हवाले से छपती हैं। वहां इसका पालन क्यों नहीं किया जाता है ?  फिर गोहाना की घटना में क्या कोई पक्ष हमले की जिम्मेदारी लेने को तैयार है ? वैसे आमतौर पर समाचार पत्रों में गोहाना की घटना को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दिखाई दी।

बलजीत की हत्या के बाद पंचायतों की खबरें प्रमुख समाचार-पत्रों के स्थानीय संस्करणों में प्रकाशित हो रही थी। लेकिन प्रशासन ने इस चेतावनी से निपटने की कोई तैयारी नहीं की। एहतियातन किसी की भी गिरफ्तारी नहीं की गई। राज्य सरकार की भूमिका ऐसी थी कि मानो वह 31 अगस्त को हमले का इंतजार कर रही थी। वह 31 अगस्त के बाद के घटनाक्रमों में ही अपनी भूमिका देख रही थी। ऐसी घटनाओं के समय राजनीतिक पार्टियों की स्थानीय शाखाओं की भूमिका कैसे खत्म हो गई है, यह साफ तौर पर नजर आता है। गोहाना में हमले के लिए 28 अगस्त के बाद पंचायतों की बैठकों में शामिल लोगों की साफ-साफ भूमिका दिखाई दी। लेकिन प्रशासन ने केवल तेईस लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया। घटना के बाद राज्य सरकार के आला अधिकारी संजय कोठारी की एनडीटीवी इंडिया से बातचीत में प्रशासन द्वारा त्वरित कार्रवाई करने में किस तरह की बाधा उपस्थित की गई, इसको भी देखने का मौका मिला।

जिस तरह हम कहते हैं कि साम्प्रदायिक दंगे कराने में किसी की भूमिका देखी जाती है, उसी तरह दलितों के खिलाफ हमलों में भी मीडिया की भूमिका रही है। उसकी भूमिका किस-किस तरह से रही है और रहती है, इसका बाकायदा अध्ययन किया जाना चाहिए। हरियाणा में दलित उत्पीडऩ की जिस तरह की घटनाएं होती हैं उसके मुकाबले खबरें नहीं आ पाती हैं। स्थानीय स्तर पर खबरें कुछ आ भी जाती हैं तो उसको वहां का राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचा चबा जाता है। दरअसल दलित उत्पीडऩ और साम्प्रदायिक असर वाली खबरों को स्थानीयता के दायरे से बाहर निकालने की जरूरत होती है। उनमें बाहरी हस्तक्षेप की जरूरत उस वक्त ज्यादा होती है। गोहाना में हमले की खबर यदि स्थानीय स्तर के मीडिया से बाहर निकल पाती तो शायद वह हमला रोका जा सकता था।

(फारवर्ड प्रेस के फरवरी, 2014 अंक में प्रकाशित)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +919968527911, ईमेल : info@forwardmagazine.in

About The Author

Reply