सहारनपुर दंगा : राजपूतों को भडकाने के लिए उत्तराखंड में सोशल मीडिया सेंटर!

सहारनपुर में भडकायी गई सामाजिक विद्वेष की आग सोशल मीडिया के सहारे अन्य राज्यों में भी फैलायी जा रही है। उत्तर प्रदेश पुलिस और इंटेलिजेंस की नजर इन घटनाओं पर है। अगर जांच एजेंसियों को दबाव-मुक्त होकर काम करने दिया गया तो जमानत पर छूट कर उन्माद फैला रहा शेर सिंह राणा जल्दी ही सलाखों के पीछे होगा

सामाजिक विद्वेष की आग भले ही पुलिस की सख्ती के कारण सहारनपुर में ठंडी पडती दिख रही हो, लेकिन इसकी लपटें अन्य राज्यों में फैल रही हैं। उत्तर प्रदेश के बाद अब  हरियाणा से दलितों और राजपूतों के बीच इस मामले को लेकर झडप की खबरें आईं हैं। विद्वेष को भडकाने के लिए सेल्फी-वीडियो बनाकर व्हाट्सएप  और फेसबुक पर प्रसारित किए जा रहे हैं तथा फेसबुक व ट्वीटर पर लगाए जाने वाले बैनर (फोटो-पोस्ट, जिसमें तस्वीरों के साथ भडकाऊ बातें लिखी जाती हैं) बडे पैमाने पर उत्पादित किए जा रहे हैं। सोशल मीडिया पर इस प्रकार की जाे सामग्री आ रही है, उन्हें ध्यान से देखने पर स्पष्ट होता है कि दलित-पक्ष से आने वाली सामग्री अनगढ है। जबकि राजपूत पक्ष से प्रसारित चीजों को योजनाबद्ध तरीके से

तैयार करवाया गया है। इस पक्ष से सोशल मीडिया पर आई सामग्री दलित-पक्ष की तुलना में सैकडों गुणा अधिक भी है।  व्हाट्स एप पर प्रसारित वीडियो में दिखने वाले अधिकांश युवा उत्तराखंड के रूडकी व आसपास के इलाकों के हैं तथा जिन फेसबुक पेजों पर इन्हें सबसे पहले प्रसारित किया गया है, उनकी जांच करने पर यह ज्ञात होता है कि वे पेज रूडकी तथा उत्तराखंड के अन्य स्थानों से चलाए जा रहे हैं। इन्हें आरंभ में शेयर करने वाले युवा, जो मेरठ, दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर आदि में पढाई कर रहे हैं, उनमें से कई के प्रोफाइल से उनके उत्तराखंड के निवासी होने अथवा वहां के किसी शिक्षण संस्थान में पढाई कर चुकने का पता लगता है। सूत्र बताते हैं कि  झूठी अफवाहों और नफरत से भरे इन संदेशों को उत्पादित करने के लिए उत्तराखंड में बकायदा कुछ सोशल मीडिया सेंटर चलाए जा रहे हैं।

इन सेंटरों में राजपूतों को दलितों के प्रति भडकाने के वाली सामग्री के साथ-साथ ऐसी सामग्री भी तैयार की जा रही है, जिसमें  भीम आर्मी के सदस्य राजपूत जाति को अपमानित करते हुए दिखते हैं। इन सेंटरों से कई ऐसे वीडियो भी जारी किए गए हैं, जिनमें भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद रावण के मूल वीडियो और आवाज को बदलकर उसे राजपूतों को भडकाने वाली बातें कहते हुए प्रदर्शित किया गया है।

चंद्रशेखर का फर्जी वीडियो

इंटेलीजेंस, प्रशासन और सहारनपुर का मीडिया और बाहरी तत्व

सहारनपुर से निकल कर अन्य राज्यों में फैल रहे हालिया वैमनस्य  के तार दरअसल सीधे तौर पर शब्बीरपुर की घटना से जुडे हैं।

शब्बीरपुर की घटना के बारे में उत्तर प्रदेश सरकार की इंटलिजेंस की रिपोर्ट बताती हैं कि 5 मई को आग “बाहरी” तत्वों ने लगाई थी। 25 मई को उत्तरप्रदेश के गृह सचिव मणि प्रसाद मिश्रा ने भी  सहारनपुर में एक प्रेस कांफेंस में बताया कि सहारनपुर में हुए दंगों को बाहरी लोगों ने अंजाम दिया है। उन्होंने कहा कि इन लोगों की सरगर्मी से तलाश की जा रही है, जो भी दोषी होंगे उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। उनके यह कहने पर सहारनपुर के पत्रकारों ने विषयांतर करते हुए सवाल दागा कि  “क्या चंद्रशेखर को गिरफ्तार किया जाएगा?” इसके उत्तर में गृह सचिव ने कहा कि “जो भी दोषी होगा, उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई अमल में लाई जाएगी और निर्दोष को बिना वजह परेशान नहीं किया जाएगा।” इसके बाद स्थानीय संस्करण के पत्रकारों ने खबरें चलाईं कि भीम आर्मी के एकाउँट में 50 लाख से अधिक की रकम, चंद्रशेखर होगा गिरफ्तार, आदि।  कुछ वेब पोर्टलों ने सही खबर भी चलायी, लेकिन स्थानीय पत्रकारों द्वारा मूल बात को तोड मरोड कर पेश किए जाने पर गृह सचिव भी  “नरो वा कुंजरो” की तर्ज पर मौन रह गए। सरकार उनकी, मीडिया उनका, कोई कैसे विवाद मोल ले?

चंद्रशेखर का एक असली वीडियो, जिसे उनकी आवाज से पहचाना जा सकता है


बाहरी कौन हैं?

5 मई 2017 को सहारनपुर जिला मुख्यालय से 33 किलोमीटर दूर राजपूत बहुल गांव शिमलाना में महाराणा प्रताप की जयंती मनाई जा रही थी। शब्बीरपुर शिमलाना से 4 किलोमीटर दूर है। स्थानीय अखबारों के अनुसार, जयंती के लिए कुछ राजपूत सुबह 9 बजे डीजे लेकर शब्बीरपुर से गुजर रहे थे। शब्बीरपुर के जाटव जाति के प्रधान ने इसका विरोध किया और दलितों ने पथराव किया, जिसमें एक 35 वर्षीय राजपूत सुमित राणा घायल हो गया, जिसकी बाद में अस्पताल में मौत हो गई। इसके बाद शिमलाना से लगभग 1000 राजपूत बदला लेने के लिए शब्बीरपुर पर टूट पडे और जाटवों के 50 से अधिक घर जला डाले।

शेरसिंह राणा के सम्मान में तैयार किया गया एक वीडियो

घटना की जो रिपोर्टिंग अब तक हुई हैं, उससे स्वभाविक तौर पर सामान्य समझ यह बनती है कि शब्बीरपुर के पडोसी गांव शिमलाना के राजपूतों ने गुस्से में आकर सामंती धाक दिखाने के लिए शब्बीरपुर को फूंक दिया।  लेकिन यह अधूरा सच है। शिमलाना में जो आयोजन हो रहा था, उसके लिए राजस्थान, हरियाणा, बिहार, उत्तरांचल, पंजाब समेत कई राज्यों से राजपूतों को बुलाया गया था, जिसमें करणी सेना, राजपूत रेजिमेंट जैसे उग्र संगठनों के युवक भी शामिल थे। शिमलाना के आयोजन में लगभग 2500 लोग भाग ले रहे थे, जिसमें शिमलाना समेत आसपास के लोगों की संख्या स्वभाविक रूप से ज्यादा थी, लेकिन इसमें बाहर के राज्यों से आए करीब 800 लोग भी थे, जिनमें लगभग 200 लोग हरियाणा और राजस्थान के थे।

बहरहाल, सभी स्रोतों से यह स्पष्ट है कि शब्बीरपुर में  राजपूतों द्वारा “आम्बेडकर मुर्दाबाद” का नारा लगाए जाने और गांव के प्रधान के साथ धक्कामुक्की किए जाने के बाद गांव के ही दलित युवकों और महिलाओं ने पथराव किया, उसमें कोई “बाहरी” आदमी शामिल नहीं था।  “बाहरी” लोग शिमलाना में मौजूद थे। उनके पास ज्वलनशील केमिकलों से भरे बैलून भी थे और वे  महाराणा प्रताप जयंती के मंच से इस पूर्वनियोजित विवाद का ऐलान  होने का इंतजार कर रहे थे। (देखें)

शिमलाना के राजपूतों ने “बाहरी” तत्वों पर  जताया था ऐतराज

यह  जानना भी महत्वपूर्ण है कि शिमलाना गांव के प्रमुख राजपूतों ने  महाराणा प्रताप जयंती पर इस प्रकार के आयोजन का विरोध किया था। शिमलाना गांव के प्रधान-पति ( “निर्वाचित” प्रधान उनकी पत्नी सुषमा रानी हैं) वीरपाल सिंह भी, जो स्वयं राजपूत हैं, इस आयोजन से अपनी नाराज़गी जाहिर करते हैं। वे बताते हैं कि आयोजन बाहरी लोगों के इशारे पर किया गया था। मुखिया होने के बावजूद  न ही उनके अनुमति ली गई थी, न ही उन्हें सूचना दी गई थी। वे बताते हैं कि बाहरी आयोजकों ने गांव के 6-7 युवाओं को विश्वास में लेकर यह खेल रचा था। वीरपाल सिंह बाहरी आयोजकों और गांव के उनके विश्वासपात्र युवाओं का नाम उजागर करने से इंकार करते हैं। शिमलाना के कुछ अन्य ग्रामीण बताते हैं कि आयोजकों ने पंचायत के सदस्यों को उपेक्षित कर सीधे एसडीएम से आयोजन की अनुमति ले ली। एक ग्रामीण विनोद कुमार कहते हैं कि जैसे किसी शादी-ब्याह में कुछ उपद्रवी तत्व घुस जाएं और गांव को जला कर चुपचाप निकल जाएं, ऐसा ही कुछ यहां भी हुआ। (देखें वीडियो)

शिमलाना के प्रधान-पति व ग्रामीणों से बातचीत

चार महीने पहले रची गई थी साजिश

शिमलाना गांव के लोग बताते हैं कि  दरअसल, 5 मई को मनायी गई महाराणा प्रताप जयंती का आयोजन एक महीने पहले किया जाना था, जिसके लिए पिछले 4 महीने से तैयार चल रही थी।  लेकिन पहले वाले कार्यक्रम को उसे टाल दिया गया और 5 मई को फाइनल कार्यक्रम तय किया गया। इस पूरे घटनाक्रम में शेरसिंह राणा का नाम हर जगह दिखता है।

सहारनपुर में विभिन्न जगहों पर लगे पोस्टर। दाहिने पोस्टर में राज्यमंत्री सुरेश राणा का नाम मुख्य अतिथि के रूप में है

शिमलाना, शब्बीरपुर व आसपास के गांवों में जयंती से संबंधित कई प्रकार के पोस्टर आज भी चिपके दिखते हैं। एक पोस्टर में  शेर सिंह राणा का नाम आयोजक/निवेदक के रूप में हैं, जबकि एक अन्य पोस्टर में उत्तर प्रदेश के राज्यमंत्री सुरेश राणा का नाम मुख्य अतिथि के रूप में प्रकाशित है। ये पोस्टर इतने अलग-अलग प्रकार के क्यों हैं? आयोजकों, अतिथियों के नाम क्यों बदले जाते रहे? आयोजन में आसपास के इलाक़ों के कई राजपूत राजनेताओं,  विधायकों आदि को भी बुलाया गया था, इनमें से कोई नहीं आया। पोस्टर में बार-बार नाम प्रचारित हो जाने के बावजूद “मुख्य अतिथि” सुरेश राणा ने भी कार्यक्रम में जाने से इंकार कर दिया। गांव के लोग बताते हैं कि बाद में झक मार कर शेर सिंह राणा ने स्वयं को ही “मुख्य  अतिथि” बनवा लिया।  मंच पर शेर सिंह राणा के अतिरिक्त अन्य लोगों में प्रमुख थे – निर्दलीय विधान पार्षद हेम सिंह पुंडीर और प्रखंड-प्रमुख  विकी पाल राणा। 

शब्बीरपुर में महाराणा प्रताप जयंती का पोस्टर। इसमें आयोजक/निवेदक के रूप में शेरसिंह राणा का भी नाम है

सवाल यह है कि क्या कार्यक्रम को एक महीने के इसलिए टाला गया ताकि इस समय का उपयोग हिंसा के लिए तैयारी के लिए किया जा सके? सवाल यह भी है कि क्या इस योजना की भनक राज्य मंत्री सुरेश राणा व अन्य आमंत्रित भाजपा नेताओं को लग गई थी, इसलिए उन सभी ने अंतिम समय में आने से इंकार कर दिया?

शिमलाना में हुए कार्यक्रम से शेर सिंह राणा किस प्रकार जुडा हुआ था, यह सोशल मीडिया पर मौजूद अनेक तस्वीरों से मालूम चलता है। बायीं तस्वीर में जो युवक महाराणा प्रताप जयंती का प्रचार करता हुए दिखते हैं, उनसे राणा के घनिष्ठ संबंध को दाहिनी तस्वीर में देखा जा सकता है। poup.org नामक साेशल मीडिया प्लेटफार्म पर ये तस्वीरें सन्नी, शिमलाना नामक प्रोफाइल पर हैं


कार्यक्रम के लिए घोषित मुख्य अतिथि राज्यमंत्री  सुरेश राणा दावा करते हैं कि उन्होंने इस कार्यक्रम के लिए अपना प्रोग्राम कभी दिया ही नहीं था। न उन्हें वहां जाना था, न ही उन्हें ऐसे किसी कार्यक्रम की कोई जानकारी थी। लेकिन बिना उनकी जानकारी के सहारनपुर में जगह-जगह बडे-बडे पोस्टरों पर उनके नाम की मौजूदगी बनी रही, यह भी संभव नहीं दिखता। फारवर्ड प्रेस द्वारा इस संबंध में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि “कुछ लोगों  में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा तेज गति के साथ  किए जा रहे कार्यों को पचाने की क्षमता नहीं है। ऐसी जानकारियाँ प्राप्त हुई हैं कि कुछ लोगों के द्वारा अवैध करोबार से कमाए गए पैसों का इस्तेमाल सामाज को विखंडित करने में किया जा रहा है। ऐसे लोगों को बारे में जांच करवाई जा रही है।”

अब तक क्यों नहीं करवाई गई केमिकल की फ़ॉरेंसिक जांच?

साजिश का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि शब्बीरपुर गांव में दलितों का घर जलाने के लिए एक प्रकार के  केमिकल वाले बैलून इस्तेमाल किये गये। जब फ़ारवर्ड प्रेस की टीम वहां पहुंची तब पीड़ित लोगों ने केमिकल के निशान दिखाये (देखें वीडियो)। यानी यह स्पष्ट है कि शब्बीरपुर में लगी आग सामान्य आग नहीं थी। इसकी तैयारी लंबे समय से चल रही थी। दिलचस्प यह है कि मामले की जांच की कमान संभाल रहे उत्तर प्रदेश के एडीजी (ला एंड आर्डर) आदित्य मिश्रा को केमिकल वाले बैलूनों की जानकारी नहीं है, जबकि शब्बीरपुर के प्राय: सभी  प्रत्यक्षदर्शी इसका जिक्र करते हैं। क्या पुलिस पीडित पक्ष से कोई बातचीत नहीं कर रही है?


एडीजी ने फ़ारवर्ड प्रेस पर बताया कि वे अभी दो-तीन दिन पहले ही आए हैं, इस बीच उनका सारा जोर शांति व्यवस्था कायम करने पर रहा है। अब वे पूरे मामले की जडों की  तहकीकात कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि फारवर्ड प्रेस के जानकारी मिलने के बाद अब केमिकलों की फ़ोरेंसिक जांच करायी जायेगी तथा साजिश रचने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। उन्होंने बताया कि अब 50 लोगों को गिरफ़्तार किया जा चुका है। जल्दी ही और गिरफ्तारियां होंगी।

हरियाणा और राजस्थान  में तनाव

इस बीच हरियाणा और राजस्थान से राजपूतों और दलितों के बीच तनाव की खबरें आ रही हैं।  5 मई 2017 को शिमलाना, सहारनपुर में आयोजित महाराणा प्रताप जयंती कार्यक्रम में हरियाणा के कुछ राजपूत भी गये थे। वहां से लौटने के बाद ये लोग लगातार सोशल मीडिया पर भडकाऊ पोस्ट डाल रहे थे। इससे कई जगहों पर दलितों में  रोष फैल गया और इसकी शिकायत पुलिस के आला अधिकारियों से की गई। 25 मई 2017 को दो राजपूत युवकों को सोशल मीडिया पर भड़काऊ संदेश भेजने के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया। लेकिन उनकी गिरफ्तारी के बाद राजपूतों के संगठन करणी सेना ने एक बडा बबाल  खडा कर दिया। लगभग 250 राजपूत जमा हो गए और थाना तथा जिला के अन्य बडे अधिकारियों से समक्ष उन्होंने हंगामा खडा कर दिया। प्रदर्शन के दबाव में आकर पुलिस को दोनों युवकों को छोडना पडा। इसके दो दिन बाद हरियाणा के यमुनानगर जिले के तिगारा गांव में राजपूतों द्वारा फैलाए जा रहे एक विडियो को लेकर विवाद हो गया। राजपूतों का कहना था कि उन्होंने जाटवों द्वारा जारी एक वीडियो के उत्तर में कहीं बाहर से आया वीडियो एक ग्रुप में फारवर्ड किया था। इसे भडके दलित पक्ष के एक युवक ने राजपूत के घर में आकर गोली चला दी। पुलिस ने राजपूत पक्ष को शांति भंग होने की आशंका से कस्टडी में रखा है तथा गोली चलाने वाले दलित की गिरफ्तारी के लिए दबिश दी जा रही है।

दलितों की भावनाओं को आहत करने वाली ऐसी अनेक तस्वीरें सोशल मीडिया सेंटर से जारी की जा रही है

गौरतलब है कि राजस्थान और हरियाणा में सक्रिय  करणी सेना उत्तर प्रदेश में बने नए संगठन राजपूत रेजिमेंट का सहयोग संगठन है। शेर सिंह राणा ने पिछले दिनों फिल्म पद्मावती संबंधी विवाद में करणी सेना के ही मंच से घोषणा की थी कि फिल्म बनाने वाले संजय लीला भंसाली को इसकी सजा के तौर पर थप्पड लगाए जाएंगे। उसकी घोषणा के कुछ दिन बाद ही भंसाली को राजपूतों ने थप्पड जड  दिया था। 28 मई को राजस्थान के कोटा से खबरें आईं कि वहां महाराणा प्रताप जयंती मानाने के नाम पर “राजपूत प्रताप सेना” के मोटरसाइिकलों पर सवार कार्यकर्ताओं ने हथियारों के साथ प्रदर्शन किया। शेर सिंह राणा ने फारवर्ड प्रेस से बातचीत में बताया था कि वह एक आयोजन में भाग लेने कोटा जाएगा। हालांकि वह इस आयोजन में शरीक हुआ या नहीं, इसकी पुष्टि नहीं हो पाई है।

क्या शेर सिंह राणा पर कसेगा शिंकजा?

फारवर्ड प्रेस ने अपनी पिछली दो रिपोर्टों में शब्बीरपुर में हुई हिंसा से उत्तराखंड के रूडकी के रहने वाले शेर सिंह राणा के रिश्ते को उजागार किया था। (यहां और यहां देखें) ।

राजस्थान के कोटा में महाराणा प्रताप जयंती पर आयोजित रैली में हथियारों का प्रदर्शन करते करणी सेना और राजपूत रेजीमेंट के सदस्य


सहारनपुर का असली गुनाहगार कौन है, इसका संकेत 27 मई, 2017 को फारवर्ड प्रेस से फोन पर बातचीत में  उत्तरप्रदेश के गृह सचिव मणि प्रसाद मिश्रा ने भी दिया। उन्होंने कहा कि शेर सिंह राणा के संबंध में कई संगठनों के लोगों के द्वारा शिकायतें मिली हैं, उसकी संलिप्तता के सवाल पर भी जांच की जा रही है। सहारनपुर का दौरा कर लखनऊ लौटे उत्तर प्रदेश के एडीजी (ला एंड आर्डर) आदित्य मिश्रा ने भी कहा कि शब्बीरपुर में हिंसा के लिए उकसाए जाने संबंधी सभी पहलुओं पर जांच की जा रही है। जल्दी ही गिरफ्तारियां होंगी।

उत्तरप्रदेश पुलिस के आला अधिकारियों ने बताया कि यह बात एजेंसियों की जानकारी में है कि सहारनपुर में जातीय बवाल के बाद अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दूसरे जिलों में इसे फैलाने की साजिश रची जा रही है। पुलिस की गोपनीय जांच में इसकी पुष्टि हो गई है। इसके बाद मेरठ जोन के एडीजी आनंद कुमार और आईजी रेंज रामकुमार ने सोशल साइट पर अफवाहों पर शिकंजा कसने के लिए मेरठ की सोशल मीडिया लैब को पूरी तरह से एक्टिवेट कर दिया है। एडीजी आनंद कुमार ने लोगों से सोशल साइट पर धर्म और जाति से जुड़ी आपत्तिजनक पोस्ट फाॅरवर्ड नहीं करने की अपील की है। हालांकि उत्तराखंड के डीजीपी एमए गणपति कहते हैं कि उन्हें प्रदेश से ऐसे किसी सोशल मीडिया सेंटर के चलाए जाने की जानकारी है, जिसके तार सहारनपुर के दंगों से जुडे हों।

फूलन देवी की हत्या 25 जुलाई 2001 को गोली मारकर कर दी गर्इ, उस समय वह समाजवादी पार्टी की सांसद थी (फाइल फोटो : बीबीसी)

गौरतलब है कि शेर सिंह राणा दस्यु सुंदरी नाम से चर्चित पिछडी जाति की डकैत फुलन देवी, जो आत्मसमर्पण के बाद समाजवादी पार्टी से दो बार सांसद बनीं, की हत्या में सजयाफ्ता है। राणा ने अपने आत्मसमर्पण के समय बताया कि उसने फूलन देवी की हत्या फूलन देवी द्वारा बेहमई में 21 राजपूतों की हत्या का बदला लेने के लिए की थी।  

राणा लगभग 13 साल जेल में गुजारने के बाद कुछ महीने पहले ही जेल से बाहर आया है। 22 अक्टूबर, 2016 को दिल्ली हाईकोर्ट ने उसकी उम्र कैद की सजा को निलंबित कर जमानत दे दी थी। हालांकि हाईकोर्ट ने बेल देते हुए कहा था कि रिहाई के बाद वह जहां भी रहेगा, पता और मोबाइल नंबर ट्रायल कोर्ट और पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने के एसएचओ को देगा। अगर वह पता या मोबाइल नंबर बदलता है, तो उसे इसके लिए भी सूचित करना होगा। साल में दो बार दिसंबर और जून के दूसरे शनिवार को उसको रुड़की के एसपी को हाजिरी देने का भी आदेश दिया गया है। इसके अलावा उसे फूलन देवी के परिवार से नहीं मिलने की भी हिदायत दी गई है। कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन करते हुए राणा उत्तर भारत के विभिन्न शहरों में राजपूत संगठनों की बैठकें कर रहा है तथा धार्मिक कट्टरता को बढावा देने वाले संगठनों से राजपूत युवाओं को जोडने की मुहिम चला रहा है। बहुजन समाज पार्टी के प्रवक्ता उम्मेद सिंह के मुताबिक शेर सिंह राणा उन्माद का पर्याय रहा है। उनके मुताबिक वह योगी आदित्यनाथ द्वारा स्थापित हिन्दू वाहिनी सेना का सक्रिय सदस्य रहा है। उस पर अपने समर्थकों के साथ मिलकर मस्जिद तोड़ने का भी आरोप है। हालांकि उम्मेद सिंह कहते हैं कि शेर सिंह राणा महज प्यादा है और दलितों पर हिंसा का ताना-बाना भारतीय जनता पार्टी के एक बडे नेता ने बुना है।

बहरहाल, उत्तर प्रदेश की गृह सचिव व अन्य आला अधिकारियों के संज्ञान में अब अनेक भौतिक व परिस्थितिजन्य  साक्ष्य हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि जांच जाति आधारित राजनीति के दबाव से मुक्त होगी और इन हिंसक घटनाओं के षडयंत्रकारी सलाखों के पीछे होंगे।


(इनपुट : प्रमोद रंजन, संजीव चंदन, अनिल कुमार व अरविंद कुमार)


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