जेएनयू की नई प्रवेश नीति : गंभीर सामाजिक अन्याय

नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा नियुक्त नए कुलपति के साथ आई नई प्रवेश नीति का एकमात्र उद्धेश्य जेएनयू के विद्यार्थियों में हाशिए पर पड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व में कमी लाना है। अभय कुमार का विश्लेषण :

जब से भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार ने एम. जगदीश कुमार को दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) का कुलपति नियुक्त कर, इस प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान का संचालन अपने हाथों में लिया है, तभी से इसे ‘राष्ट्र विरोधियों का अड्डा‘ बताकर बदनाम किया जा रहा है। जेएनयू पर हिन्दुत्ववादी हमले जारी हैं। उसके धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील चरित्र को समाप्त करने की कोशिश हो रही है। पहले से ही जारी निजीकरण की प्रक्रिया को और तेज किया जा रहा है और विश्वविद्यालय में प्रजातांत्रिक ढंग से अपनी असहमति को स्वर देने की गुंजाइश कम होती जा रही है। जीएससीएएसएच (एक समिति जो यौन उत्पीड़न के मामलों की जांच करती थी और लैंगिक संवेदनशीलता को बढ़ावा दे रही थी) का स्थान दंतविहीन और कठपुतली आईसीसी (इंटरनल कम्पलेंट्स कमेटी) ने ले लिया है। परंतु भारत के नए निजाम ने जेएनयू के संदर्भ में जो सबसे गंभीर और चिंताजनक कदम उठाया है वह है वहां विद्यमान आरक्षण प्रणाली को कमजोर करने का प्रयास, जो सामाजिक न्याय की जड़ों पर प्रहार है। इससे वंचित वर्गों के विद्यार्थियों – चाहे वे वर्तमान मे विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे हों या यहां दाखिला लेना चाहते हों – का भविष्य अंधकारमय हो गया है।

जेएनयू के शिक्षकों और छात्रों ने संयुक्त रूप से संवाददाता सम्मेलन कर नये प्रवेश नीति का विरोध किया जिससे संविधान प्रदत्त आरक्षण की अवहेलना की जा रही है

आरक्षण की व्यवस्था को कमजोर करने और उसके जरिए सामाजिक न्याय की प्रक्रिया को बाधित करने के प्रयास का सबसे प्रमुख उपकरण है नई प्रवेश नीति, जिसे कुलपति ने विश्वविद्यालय पर थोप दिया है। विश्वविद्यालय के विद्यार्थी और शिक्षक शुरू से ही इस नीति का लगातार विरोध करते आए हैं। उनका मानना है कि नई नीति के प्रावधानों से हाशिए पर पड़े वर्गों के विद्यार्थियों के लिए विश्वविद्यालय में प्रवेश पाना बहुत मुश्किल हो जाएगा। नई नीति के अंतर्गत, प्रवेश प्रक्रिया को साक्षात्कार-केन्द्रित बना दिया गया है। लिखित परीक्षा में अच्छे अंक, केवल उम्मीदवार को साक्षात्कार में भाग लेने की अहर्ता प्रदान करते हैं और अंतिम चयन से उनका कोई लेना-देना नहीं होता। नई नीति में प्रत्येक विद्यार्थी, चाहे उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि और रहवास का स्थान कोई भी हो, को साक्षात्कार में बुलाए जाने के लिए लिखित परीक्षा में कम से कम 50 प्रतिशत प्राप्त करना आवश्यक होगा। इसके अलावा, नई नीति में एमफिल और पीएचडी कार्यक्रमों में सीटों की संख्या बहुत कम कर दी गई है। वर्तमान शैक्षणिक सत्र में इन कार्यक्रमों में केवल 159 विद्यार्थियों को प्रवेश दिया गया है। पिछले साल 970 विद्यार्थियों को प्रवेश दिया गया था। विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि सीटों की संख्या में कमी इसलिए की गई है ताकि अध्यापक-शोध अध्येता अनुपात को बेहतर बनाया जा सके। यह इस तथ्य के बावजूद कि अध्यापकों का कहना है कि पिछले वर्ष जितने विद्यार्थियों को शोध कार्यक्रमों में प्रवेश दिया गया था, उतने विद्यार्थी आसानी से विश्वविद्यालय में अध्ययन कर सकते हैं।

कुलपति कुमार का कहना है कि नई प्रवेश नीति, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की 5 मई 2016 की गजट अधिसूचना के अनुरूप है। वे यह नहीं बता रहे हैं कि यूजीसी की अधिसूचना केवल दिशानिर्देश है और कुलपति अपने विश्वविद्यालय की आवश्यकताओं और प्रकृति को देखते हुए उसे स्वीकार अथवा अस्वीकार कर सकता है। विद्यार्थियों, अध्यापकों और प्रतिष्ठित अध्येताओं ने नई प्रवेश नीति के संबंध में कई चिंताएं और आपत्तियां व्यक्त की हैं परंतु कुलपति उनके सुसंगत तर्कों को सुनना ही नहीं चाहते। इसके कारण, मजबूर होकर विद्यार्थियों को हड़ताल और घेराव आदि का रास्ता अपनाना पड़ रहा है। हर तरह की परेशानियों का सामना करते हुए – जिनमें उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज किया जाना शामिल है – विद्यार्थियों ने पिछले माह संसद तक लांग मार्च निकाला, जिस पर पुलिस ने लाठीचार्ज भी किया। इस समय जेएनयू में शैक्षणिक गतिविधियां पूरी तरह ठप्प हैं और पिछले तीन सप्ताह से तालाबंदी जारी है।

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए वंचित वर्गों के विद्यार्थियों ने एक नए संगठन का गठन किया है जिसे ‘जेएनयू एससी/एसटी/ओबीसी/पीडब्लूडी विद्यार्थी एवं अध्यापक फोरम‘ नाम दिया गया है। एक प्रेसवार्ता को संबोधित करते हुए, फोरम ने नई प्रवेश नीति को भारतीय संविधान पर ‘हमला‘ बताया। यह बिल्कुल उचित था। फोरम ने यह आरोप भी लगाया कि जेएनयू प्रशासन जानबूझकर नई नीति के आरक्षण पर प्रभाव के बारे में भ्रामक तथ्य प्रस्तुत कर रहा है। जेएनयू प्रशासन के दावों का खंडन करते हुए फोरम ने ऐसे आंकड़े प्रस्तुत किए, जिनसे यह जाहिर होता है कि किस प्रकार नई नीति से आरक्षण के संबंध में संवैधानिक दिशानिर्देशों का उल्लंघन होता है। फोरम की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, ‘‘सन् 2017-18 में, एमफिल/पीएचडी कार्यक्रमों में प्रवेश लेने वाले विद्यार्थियों में एससी के लिए आरक्षण नियमानुसार 15 प्रतिशत की जगह 1.3 प्रतिशत, एसटी के लिए 7.5 प्रतिशत के विरूद्ध 0.6 प्रतिशत, ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत के विरूद्ध 8.2 प्रतिशत और विकलांगों के लिए 3 प्रतिशत के स्थान पर 0.3 प्रतिशत था‘‘। वेबसाईट ‘काफिला‘ में 18 फरवरी 2018 को प्रकाशित अपने लेख में जेएनयू की प्राध्यापक निवेदिता मेनन ने आरक्षण संबंधी दिशानिर्देशों के उल्लंघन पर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने लिखा, ‘‘सन् 2017-18 में जेएनयू में एमफिल/पीएचडी कार्यक्रमों में प्रविष्ट विद्यार्थियों की संख्या में, उसके पिछले वर्ष की तुलना में 83 प्रतिशत की कमी आई। कुल 194 सीटों में से केवल 100 पर प्रवेश दिया गया। सन् 2018-19 में शोध कार्यक्रमों में प्रविष्ट विद्यार्थियों की संख्या, सन् 2016 की तुलना में 50 प्रतिशत से भी कम होने की संभावना है‘‘।

शिक्षा तक पहुंच – विशेषकर फुले-आंबेडकर परंपरा में – मुक्ति के द्वार खोलती है। जैसा कि फुले ने अपनी पुस्तक ‘गुलामगिरी‘ (1873) में लिखा था, ब्राम्हण अपना वर्चस्व इसलिए बनाए रख सके क्योंकि उन्होंने जबरदस्ती शूद्रों और अतिषूद्रों को शिक्षा से वंचित रखा। क्या नई प्रवेश नीति, उसी प्राचीन व्यवस्था को फिर से स्थापित करने का प्रयास नहीं है?

प्रतिनिधित्व और राष्ट्रीयता

हाशिए पर पड़े वर्गों के विद्यार्थी और शिक्षक, नई प्रवेश नीति को अपने प्रजातांत्रिक अधिकारों के लिए एक बड़े खतरे के रूप में देखते हैं। परंतु ब्राम्हणवादी-कारपोरेट मीडिया, उनके प्रतिरोध को नजरअंदाज कर रहा है। मीडिया यह प्रचारित कर रहा है कि विद्यार्थी, कुलपति द्वारा उपस्थिति अनिवार्य किए जाने का विरोध कर रहे हैं और स्वयं की जवाबदेही स्वीकार नहीं करना चाहते।

जेएनयू के बापसा संगठन के सदस्यों ने संसद मार्च निकाला (फोटो साभार : बापसा)

स्कूल आॅफ सोशल साईंस (2) में स्थित आंदोलन स्थल में शनिवार की मध्यरात्रि को उपस्थित विद्यार्थी अपने भविष्य के प्रति चिंतित थे। उनमें से एक ने कहा, ‘आरक्षण एक टानिक है। अगर वह नहीं होता तो आज मैं जेनएनयू में नहीं पढ़ रहा होता‘‘। एक अन्य विद्यार्थी का कहना था कि ‘‘चूंकि हम लोग हाशिए पर पड़े वर्गों से आते हैं इसलिए हमारे साथ भेदभाव होता है। अगर आरक्षण की व्यवस्था न होती तो मैं आज यहां नहीं होता‘‘।

इन विद्यार्थियों को यह खेद है कि आरक्षण-विरोधियों ने कभी उसके पीछे के दर्शन और सोच को समझने का प्रयास नहीं किया। आरक्षण-विरोधियों के इस तर्क में कोई दम नहीं है कि इस व्यवस्था को समाप्त कर दिया जाना चाहिए क्योंकि उसके कारण ‘योग्य व्यक्तियों‘ के साथ भेदभाव होता है। एक अन्य गलतफहमी यह है कि आरक्षण, वंचित वर्गों का अधिकार नहीं है बल्कि राज्य की ओर से उन्हें दिया गया उपहार है। सच यह है कि आरक्षण का उद्धेश्य, वंचित वर्गों को सभी क्षेत्रों में उचित प्रतिनिधित्व देना है, विशेषकर ऐसे स्थानाें में जहां महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाते हैं या उनका कार्यान्वयन होता है। इसके अतिरिक्त, आरक्षण की आवश्यकता इसलिए भी है ताकि जातिप्रथा से पीड़ित भारतीय समाज के सभी सदस्यों को भेदभाव से मुक्ति दिलाई जा सके और देश के कामकाज में उनकी बराबरी की सहभागिता सुनिश्चित हो सके।

आंबेडकर ने जाति की संस्था का गहन अध्ययन और विश्लेषण किया था। उन्होंने तर्कों के आधार पर यह साबित किया कि भारतीय समाज का जाति के आधार पर विभाजित होना, देश में बंधुत्व और राष्ट्रवाद की भावना के विकास में बाधक है। बाबासाहेब आंबेडकर का कहना था कि जाति-आधारित समाज के कारण बहुसंख्यकों ने कभी अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा नहीं की। दूसरे शब्दों में, अगर समाज के सभी वर्गों को देश के प्रमुख क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व नहीं दिया जाता तो उससे कमजोर वर्गों के हितों को चोट पहुंचेगी। अपनी पुस्तक ‘मिस्टर गांधी एंड द इमेंसीपेशन आॅफ द अनटचेबिल्स‘ (1943, पृष्ठ 25-26) में वे लिखते है, ‘यह मानना गलत होगा कि सभी परिस्थितियों में, बहुसंख्यक, किसी क्षेत्र के सभी अल्पसंख्यकों की इच्छा का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं‘। अपने एक हालिया लेख (‘वाय प्रजुडिस अगेंस्ट द रिजरवेशन पालिसी‘, क्रिटिकल क्वेस्ट, 2017,

पृष्ठ 3) में जानेमाने अर्थशास्त्री सुखदेव थोराट – जिन्होंने अपने शोध से यह साबित किया है कि जाति, वंचित वर्गों की समान सहभागिता में रोड़ा है – ने आंबेडकर के सरोकारों पर पुनः जोर दिया। उन्होंने लिखा कि आरक्षण की नीति का उद्धेश्य रोजगार, शिक्षा और विधानमंडलों में भेदभाव के विरूद्ध सुरक्षा प्रदान करना और  हाशिए पर पड़े वर्गों की उचित भागीदारी सुनिश्चित करना है।

अप्रतिनिधिक षिक्षक संवर्ग

चूंकि जेएनयू के शिक्षक संवर्ग में वंचित वर्गों को आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं है इसलिए प्रवेश हेतु होने वाले साक्षात्कारों में उनके साथ भेदभाव किया जाता है। इस भेदभाव से निपटने के लिए बहुजन और वामपंथी विद्यार्थी संगठन लंबे समय से यह मांग करते आ रहे हैं कि प्रवेश परीक्षा में साक्षात्कार के अंकों का प्रतिशत, 30 से घटाकर 10-15 किया जाना चाहिए। एम जगदीश कुमार के जेएनयू के कुलपति का कार्यभार ग्रहण करने के पूर्व, जेएनयू प्रशासन ने इस मुद्दे पर विचार करने के लिए अनेक समितियों का गठन किया था जिनमें राजीव भट्ट समिति, थोराट समिति और नाफे समिति शामिल हैं। इन सभी समितियों ने स्वीकार किया कि विश्वविद्यालय में जाति के आधार पर भेदभाव होता है। उन्होंने पाया कि साक्षात्कार में आरक्षित वर्ग के विद्यार्थियों को, सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों की तुलना में, कम अंक दिए जाते हैं – यह तब, जब कि आरक्षित वर्ग के विद्यार्थियों को लिखित परीक्षा – जिसमें उनकी पहचान उजागर नहीं की जाती – में सामान्य श्रेणी के उम्मीदवारों से तुलनात्मक रूप में अधिक अंक मिलते हैं। जाहिर है, ये निष्कर्ष साक्षात्कार के महत्व को घटाने की आवश्यकता प्रतिपादित करते हैं। परंतु इन सिफारिशों पर अमल करने की बजाए, कुलपति कुमार ने प्रवेश की प्रक्रिया को साक्षात्कार-आधारित बना दिया है।

इससे भी ज्यादा बुरी बात यह है कि नई नीति में साक्षात्कार में अर्हकारी अंक बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिए गए हैं। यह भी सामाजिक न्याय की अवधारणा के खिलाफ है। क्या यह नहीं पूछा जाना चाहिए कि जब भारतीय समाज में लोग समान नहीं हैं तो उनके साथ समान व्यवहार कैसे किया जा सकता है।

एम जगदीश कुमार के जेएनयू में पदभार ग्रहण करने के पूर्व के अनुभव से यह स्पष्ट है कि आरक्षण से प्रजातंत्र सशक्त होता है, भेदभाव पर रोक लगती है और सभी की सहभागिता सुनिश्चित होती है। सन् 2007 से जेएनयू में प्रवेश में ओबीसी के लिए आरक्षण की व्यवस्था शुरू की गई। इसके कारण विश्वविद्यालय में ओबीसी विद्यार्थियों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई और बहुत जल्द इन विद्यार्थियों की संख्या एक हजार से अधिक हो गई। सन् 2013-14 में विश्वविद्यालय के 7,677 विद्यार्थियों में से 3,648 दलित बहुजन (1,058 एसी, 632 एसटी और 1,948 ओबीसी) थे। नई प्रवेश नीति के असंवैधानिक प्रावधानों के कारण उनकी संख्या में तेजी से कमी आई है।

विद्यार्थियों में विभिन्न वर्गों के अनुपात में इस परिवर्तन के कारण, विश्वविद्यालय परिसर में दलित-बहुजन संस्कृति और राजनीति का दबदबा बढ़ा। विश्वविद्यालय का विमर्श बदलने लगा। छात्र संघों के नेतृत्व में भी बदलाव आया और वंचित वर्गों के विद्यार्थी, उच्च पदों के लिए चुने जाने लगे। सन् 2014 में बिरसा आंबेडकर फुले स्टूडेंटस एसोसिएशन (बीएपीएसए) का गठन और विश्वविद्यालय में एक शक्तिशाली संगठन के रूप में उसके उभार को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

विश्वविद्यालय में सक्रिय वामपंथी संगठनों को भी यह अहसास हो गया कि वे दलित-बहुजन नायकों को नजरअंदाज नहीं कर सकते। उन्हें आंबेडकर, पेरियार, बिरसा मुंडा और फुले के प्रति अपनी उदासीनता को त्यागना पड़ा। पूर्व के विपरीत, कैंपस में लगे पोस्टरों, पर्चों और विद्यार्थियों द्वारा लगाए जाने वाले बैजों में दलित-बहुजन नायकों और नायिकाओं को माक्र्स, लेनिन, ट्रोटोस्की, स्टालिन और माओ की तुलना में अधिक स्थान मिलने लगा। जेएनयू की राजनीति के बदलते विमर्श का एक प्रतीक था 6 वर्ष पूर्व छात्रसंघ (जेएनयूएसयू) के कार्यालय में फुले और बिरसा मुंडा के तैलचित्रों का अनावरण। इसके अलावा विश्वविद्यालय में बीफ और महिषासुर दिवस से जुड़े आयोजनाें से ब्राह्मणवादी तबकों को गहरा धक्का लगा।

अब, असंवैधानिक कदम उठाकर इन परिवर्तनों की दिशा को पलटने की कोशिश की जा रही है। जेएनयू की नई प्रवेश नीति, कैंपस में दलित-बहुजनों के बढ़ते दबदबे को समाप्त करने के ब्राम्हणवादी/हिंदुत्व षड़यंत्र का हिस्सा है। जैसा कि एक प्रदर्शनकारी विद्यार्थी ने कहा, ‘अगर हम प्रतिरोध नहीं करेंगे तो हमार्रा अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। अगर नई प्रवेश नीति का सामूहिक रूप से विरोध नहीं किया गया तो असंख्य एकलव्यों को अपने अंगूठे खोने पड़ेंगे‘‘।


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  1. Upendra pathik Reply
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