जम्मू-कश्मीर में प्रोफेसर बनना हुआ और मुश्किल, हाईकोर्ट ने सुनाया फैसला

जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने कहा है कि सहायक प्राध्यापकों की भर्ती के लिए यूजीसी द्वारा निर्धारित योग्यता से ज्यादा योग्यता की अर्हता गलत नहीं है। यह फैसला एक और तरह के हाशियाकरण को जन्म दे सकता है क्योंकि उच्चतर योग्यता की यह अर्हता उन्हें इन पदों से दूर रख सकता है। पढ़िए यह रिपोर्ट :

यूजीसी निर्धारित न्यूनतम योग्यता से बड़ी योग्यता की अर्हता गलत नहीं : हाईकोर्ट

एक महत्त्वपूर्ण फैसले में जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने कहा है कि कोई विश्वविद्यालय यूजीसी यानी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा निर्धारित योग्यता से ज्यादा योग्यता का निर्धारण कर सकता है, कम का नहीं। कोर्ट का यह फैसला भले ही शिक्षा के स्तर को बढ़ानेवाला है, पर यह नए तरह के हाशियाकरण को जन्म देगा, ऐसी आशंका है। ऐसे व्यक्ति, विशेषकर दलित और पिछड़े वर्ग के, जिनके लिए न्यूनतम शिक्षा लेना ही विभिन्न कारणों से इतना कठिन होता है, उच्च वर्ग के उच्चतर योग्यता वाले उम्मीदवारों से पिछड़ जाएंगे।    

इस मामले में याचिका को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि कोई भी विश्वविद्यालय यूजीसी द्वारा निर्धारित योग्यता से कम योग्यता का निर्धारण नहीं कर सकता। याचिका में सहायक प्राध्यापक पद पर नियुक्ति के लिए दिए गए विज्ञापन में वानिकी (फोरेस्ट्री) में पीएचडी डिग्री की शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर साइंसेस एंड टेक्नोलॉजी ऑफ जम्मू (एसकेयूएएसटी) की अर्हता को खारिज करने की मांग की थी। यह फैसला न्यायमूर्ति अली मोहम्मद मगरे ने सुनाया।

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अपने फैसले में उन्होंने कहा कि किसी विश्वविद्यालय या संस्थान यूजीसी रेगुलेशन, 2010 के तहत निर्धारित योग्यता से उच्चतर योग्यता का निर्धारण कर सकती है; बशर्ते कि राज्य के नियम, प्रावधान और विश्वविद्यालय/संस्थान इस तरह की उच्चतर योग्यता का निर्धारण कर रखा है।

जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट

पिछले वर्ष 13 मार्च 2017 को एसकेयूएएसटी ने एक विज्ञापन जारी किया था जिसमें सहायक प्राध्यापक के कुछ पदों को अधिसूचित किया गया था। इसमें सहायक प्राध्यापक-सह-कनिष्ठ वैज्ञानिक (वानिकी) का पद भी था और इसके लिए निर्धारित योग्यता के तहत उम्मीदवार को अन्य योग्यताओं के अलावा वानिकी में पीएचडी होना जरूरी था।

याचिकाकर्ता ने भी इस पद पर अपनी उम्मीदवारी जताई पर विश्वविद्यालय ने कहा कि उसके पास केमिकल इंजीनियरिंग में पीएचडी है और इस तरह इस पद के लिए वानिकी में पीएचडी होने की अर्हता वह पूरी नहीं करता।

याचिकाकर्ता अपनी याचिका के माध्यम से यह चाहता था कि कोर्ट एसकेयूएएसटी को यह निर्देश दे कि वह सहायक प्राध्यापक (वानिकी) के पद को दुबारा अधिसूचित करे और इसके लिए योग्यता वह रखे जो यूजीसी ने निर्धारित किया है और आवेदक को इस भर्ती में शामिल होने की इजाजत दे।

शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी ऑफ साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी, जम्मू-कश्मीर

न्यायमूर्ति मगरे ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को रेखांकित करते हुए कहा कि शिक्षा के उच्च स्तर को बनाये रखने के लिए यूजीसी और राज्य या विश्वविद्यालय द्वारा निर्धारित न्यूनतम योग्यता की तुलना में उच्च योग्यता का निर्धारण जिस विनियमन पर प्रश्न उठाया जा रहा है, उसके लक्ष्य के अनुरूप होगा।

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कोर्ट ने कहा कि अगर राज्य या विश्वविद्यालय का कोई नियम यूजीसी की तुलना में ज्यादा ऊंची योग्यता की अर्हता निर्धारित करता है तो यह नहीं कहा जा सकता कि यह नियम यूजीसी के विनियमनों के खिलाफ है।

वहीं इस मामले में जम्मू-कश्मीर एससी, एसटी, ओबीसी कनफेडरेशन के संयोजक आर. के. कलसोत्रा का कहना है कि जम्मू-कश्मीर में आरक्षण के नियमों का अनुपालन नहीं हो रहा है। एसकेयूएएसटी द्वारा यूजीसी द्वारा निर्धारित अर्हता से अधिक अर्हता का निर्धारण करना सीधे-सीधे दलित-बहुजनों को रोकने की कोशिश है। उन्होंने यह भी कहा कि यह पहला मौका नहीं है जब राज्य में इस तरह के षडयंत्र रचे गये हैं। भारत सरकार ने धारा 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को विशेषाधिकार दिया है लेकिन आजादी के बाद से लेकर आजतक इसका दुरुपयोग ही किया जाता रहा है। इसका उदाहरण देते हुए कलसोत्रा ने कहा कि पूरे देश में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षण 1950 में लागू हो गया लेकिन जम्मू-कश्मीर में यह 1970 में हुआ। जबकि एसटी के लि आरक्षण 1990 में। मंडल कमीशन की अनुशंसाओं को भी यहां न्यून करके ही लागू किया गया। बकौल कलसोत्रा जम्मू-कश्मीर में 57 फीसदी ओबीसी हैं। मंडल कमीशन के अनुसार उन्हें 27 फीसदी आरक्षण मिलना चाहिए लेकिन यहां केवल 2 फीसदी आरक्षण दिया जा रहा है।

(कॉपी एडिटर : एफपी डेस्क)


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