जनतंत्र के सजग प्रहरी कुलदीप नैय्यर

कुलदीप नैय्यर आजीवन पत्रकार रहे। अपने जीवन में उन्होंने विभाजन का दंश झेला। वे हमेशा भारत-पाकिस्तान के बीच मधुर रिश्ते के हिमायती रहे। 80 के दशक में जब बिहार में दलित-बहुजनों का नरसंहार का सिलसिला शुरु हुआ तब भी वे खामोश नहीं रहे। आगे बढ़कर विरोध किया। उनके निधन पर श्रद्धांजलि दे रहे हैं प्रेमकुमार मणि :

कुलदीप नैय्यर (जन्म : 14 अगस्त 1923, निधन : 23 अगस्त 2018)

कुलदीप नैय्यर नहीं रहे। खबरों के अनुसार आज 23 अगस्त 2018  की सुबह उन्होंने आखिरी साँस ली। इसी अगस्त महीने की 14 वीं तारीख को आज से 94 वर्ष पूर्व 1923 में वह जन्मे थे। वह उन बदनसीबों में एक थे, जिन्हें वतन से देश की ओर कूच करना पड़ा। उनका जन्म  सियालकोट में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। वहीं बचपन गुजरा और आरंभिक पढाई हुई। उन्होंने दर्शनशास्त्र में पीएचडी किया था और पत्रकारिता में भी डिग्री ली हुई थी। उर्दू पत्रकार के रूप में अपने करियर की शुरुआत की और 1975 की भयावह  इमरजेंसी लागू होने के समय ‘द स्टेट्समैन’ के संपादक थे। वह ब्रिटेन में हाई कमिश्नर भी बनाये गए और राज्यसभा के सदस्य भी; लेकिन एक पत्रकार के मन मिजाज से ही वह देश की सेवा करते रहे। उनकी आत्मकथा का हिंदी अनुवाद ‘एक जिंदगी काफी नहीं’ मैंने पढ़ी है। यह उनकी कथा कम ,देश की कथा अधिक है। यूँ भी एक सच्चे पत्रकार का जीवन बहुवचन हो ही जाता है। कई वर्ष पूर्व यह किताब मैंने पढ़ी थी और इन पंक्तियों के लिखते वक़्त यदि वह पास होती तब उसका लाभ उठाते हुए इस पोस्ट को सारगर्भित करता। लेकिन इतना तो कह ही सकता हूँ कि सामाजिक -राजनीतिक रूप से सजग प्रत्येक देशवासी को उसे पढ़ना चाहिए। यूँ तो हर आत्मकथा एक इतिहास होता है। लेकिन कुलदीप नैय्यर की आत्मकथा में समकाल का जीवन्त इतिहास है। भारत के बंटवारे से लेकर इक्कीसवीं सदी के आरम्भ तक की राजनीतिक धड़कन इसमें चित्रित है।

स्मृतियां रह गयीं शेष : अपने अध्ययन कक्ष में कुलदीप नैय्यर

इस किताब में आप नेहरू युग को भी देख सकते हैं और लालबहादुर शास्त्री के प्रधानमंत्री काल को भी। ताशकंद समझौते के वक़्त नैय्यर वहां थे और शास्त्री जी की मृत्यु का आँखों देखा हाल आप वहां देख सकते हैं। शास्त्री जी के साथ आधिकारिक रूप से भी नैय्यर जुड़े हुए थे, लेकिन उनके आकलन में किसी तरह का कोई पक्षपात नहीं किया है। यदि नैय्यर की मानें तो 1965 का भारत-पाक युद्ध शास्त्री जी ने अपनी छवि जो कुंठा का रूप ले चुकी थी, को दुरुस्त करने के लिए किया था, अन्यथा उसे टाला जा सकता था। शास्त्री जी से संबंधित एक करुण प्रसंग  यह है कि ताशकंद समझौते के बाद रात में शास्त्रीजी ने घर फोन लगवाया। उन दिनों फोन मुश्किल से लगते थे। लेकिन प्रधानमंत्री को तो हॉटलाइन हासिल था, इसलिए बात हुई। बेटी फोन पर आयी और उसने बतलाया, पूरा देश और अपना परिवार भी आपके फैसले से नाराज़ है। शास्त्रीजी ने पत्नी ललिता जी से बात करने की इच्छा की। वह इतना रंज थीं कि कई बार के कहने पर भी लाइन पर नहीं आयीं। शास्त्रीजी गहराई से उदास हो गए। फिर वह सोने चले गए और कुछ ही समय बाद एक परिचारिका ने नैय्यर के कमरे को थपथपाया कि आपके प्राइम मिनिस्टर नहीं रहे।

देखें कुलदीप नैय्यर का भाषण :


इमरजेंसी के इर्द-गिर्द के भी सजीव चित्रण इस आत्मकथा में मिलते हैं। इमरजेंसी के वक़्त वह स्टेट्समैन के संपादक थे। उन्हें गिरफ्तार किया गया और अपराधी  कैदियों की तरह जेल में प्रताड़ित किया गया। गनीमत हुई कि कोर्ट ने उनकी सहायता की और वह जल्दी ही मुक्त किये गए। किस तरह पूरा देश उस वक़्त डरा-सहमा हुआ था इसकी जानकारी इस विवरण से मिलती है कि उन्नीस महीने बाद जनवरी 1977 में जब चुनावों की घोषणा हुई तब जेपी सहित कोई भी नेता चुनाव के लिए मन से तैयार नहीं था। दिलचस्प तथ्य यह भी है कि चुनाव की आधिकारिक घोषणा के पूर्व ही नैय्यर ने एक कांग्रेसी नेता से गपशप के आधार पर अपने अख़बार में चुनाव की खबर छाप दी थी। यह उनकी पत्रकारिता का कमाल था। बातचीत से भी खबरें निकाल लेना वह जानते थे।

चुनाव घोषणा के बाद विपक्षी नेताओं में एक दहशत थी। जेपी दिल्ली इसलिए आये थे कि बुद्धिजीवियों से राय लें कि हमें क्या करना चाहिए। राजनीतिज्ञों पर उनका भरोसा नहीं था। एक महीने बाद चुनाव थे और कोई तैयारी नहीं। नैय्यर ने बुद्धिजीवियों को संयोजित करने और उनका जेपी से सार्थक संवाद कराने में महती भूमिका निभाई। जनता पार्टी का निर्माण हुआ। इंदिरा गाँधी हारीं और मुल्क से इमरजेंसी का खात्मा हुआ।

प्रेस पर पाबंदी के खिलाफ प्रदर्शन करते कुलदीप नैय्यर और साथ में रामनाथ गोयनका व खुशवंत सिंह (फोटो साभार : इंडियन एक्सप्रेस)

कुलदीप ने हमेशा जनतांत्रिक आवेगों को बल दिया। वह किसी राजनीतिक विचारधारा से प्रतिबद्ध नहीं थे, लेकिन जिन विचारधाराओं के समग्र आवेग से हमारा राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन चला था, उन्ही विचारधाराओं और आवेगों से उन्होंने जिंदगी भर स्वयं को चलाया। एक पत्रकार ,राजनयिक और सांसद के रूप में उन्होंने देश की सेवा की और हमेशा उच्च प्रतिमानों को अपनाया। उनका पूरा व्यक्तित्व जनतांत्रिक था। हिन्दू-मुस्लिम एकता, दलितों-वंचितों  की पक्षधरता और भारत -पाक मैत्री के लिए वह हमेशा उत्सुक और सक्रिय रहे। उनकी पत्रकारिता समाज और देश सेवा का एक माध्यम था, कोई पेशा नहीं। 1980 के आसपास की बात है। बिहार में दलितों के विरुद्ध सामंतों की हिंसक कार्रवाइयां थमने का नाम नहीं ले रही थीं। बेलछी ,पिपरा ,पियनियाँ जैसी घटनाओं का सिलसिला लगा हुआ था। इसके विरोध में कुलदीप नैय्यर ने एक यात्रा का नेतृत्व किया था। समाज और देश में हो रहे अन्याय पर चुप बैठना उन्हें गवारा नहीं था।

आज वह नहीं हैं। वह राजनेता नहीं थे कि शोक का स्वांग होगा। दोस्त-मित्र निगम बोध घाट  जुटेंगे और अन्येष्टि हो जाएगी। लेकिन उनकी किताबें, उनका लेखन और उनकी सक्रियता देश के नौजवानों को लम्बे समय तक दिशा-निर्देश करती रहेंगी। कुलदीप नैय्यर जी को समाज भूल नहीं सकता। हम उनके प्रति सम्मान और श्रद्धा निवेदित करते हैं।

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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