मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी को लेकर प्रतिक्रियाओं का दौर जारी

सरकार के भरपूर समर्थन के बीच पुलिस ने लेखकों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को इसलिए गिरफ्तार किया कि वह भारतीय समाज में उपजे असंतोष की आवाज हैं। जबकि इसी असहमति को सुप्रीम कोर्ट ने ‘सेफ्टी वाल्व’ कहा है। इसके बावजूद कथित मुख्य धारा की मीडिया इसे लाल आतंकवाद के रूप में क्यों चित्रित कर रहा है? फारवर्ड प्रेस की रिपोर्ट :

सुप्रीम कोर्ट ने कहा – असहमति लोकतंत्र का सेफ्टी वाल्व, मीडिया की नजर में लाल आतंकवाद!

दलित और मानवाधिकार कार्यकर्ताओँ की देशव्यापी गिरफ्तारी आखिरी किसको बचाने के लिए की गई थी? यह और इस जैसे कई सवाल सरकार और पुलिस सिस्टम के सामने खड़े हो गए हैं।

सवाल यह है कि क्या सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने पुलिस को आईना दिखाकर उसके सामने कानूनी चुनौती खड़ी कर नहीं कर दी है? क्या उसकी कार्यशैली सवालों के घेरे में नहीं आ गई है? क्या यह हैरानी भरा नहीं है कि गिरफ्तारियों को ‘शहरी नक्सली तंत्र’ से लेकर प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश से जोड़ा गया और सब बड़ा झूठ निकला? यह पानी की तरह साफ हो गया है कि सुप्रीम कोर्ट में महाराष्ट्र पुलिस ने जो हलफनामा दिया है वह भीमा-कोरेगांव में हुई हिंसा से ही संबंधित है- और पीएम की हत्या की साजिश में शामिल होने का आरोप किसी भी कार्यकर्ता पर दूर-दूर तक नहीं है।

फारवर्ड प्रेस ने अपनी रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख किया था कि यह पूरी कार्रवाई भीमा कोरेगांव मामले में जून में जेल में डाले गए दलित कार्यकर्ताओँ को रोकने की साजिश प्रतीत होती है क्योंकि इनकी हिरासत अवधि खत्म होने को है। यही बात सुप्रीम कोर्ट ने पूछा है कि अचानक इतनी चुस्ती दिखाने की पुलिस ने क्यों जल्दबाजी की। जाहिर है, कोर्ट अपने हिसाब से जांच करेगा लेकिन इस दरमियान तमाम प्रतिष्ठित मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को टीवी के चित्रों ने बता दिया है कि यही वो चेहरे हैं जो पीएम को मारना चाहते हैं, षडयंत्रकारी हैं, शहरी हिंसक नक्सली हैं… और जाने क्या क्या।

टाइम्स नाऊ न्यूज चैनल द्वारा चलायी जा रही खबर

गिरफ्तारी से सरकार पर उठ रहे सवाल

टाइम्स आफ़ इंडिया के संपादकीय में कहा गया है कि भीमा कोरेगांव में एल्गार परिषद का पूरा कार्यक्रम पुलिस की आंखों के सामने हुआ था। वह किसी पक्ष से अनजान नहीं थी। अब जांच इस बात की भी होनी चाहिए कि अगर उसके पास खुफिया इनपुट था तो उसे प्राथमिकी का हिस्सा बनाना चाहिए था। सुप्रीम कोर्ट ने अगर पांचों आरोपियों को फिलहाल उनके घर में ही नजरबंद रखने की व्यवस्था दी है तो इसके पीछे उसका मकसद इस बात को लेकर पूरी तसल्ली कर लेना है कि इन सभी की गिरफ्तारी केस की जांच के लिए कहां पर ठहरती है।

और यह भी आश्चर्य की बात नहीं है कि पुलिस ने कई मायनों में हद से ज्यादा आगे बढ़कर कार्रवाई को अंजाम दिया जिससे सुप्रीम कोर्ट और दो प्रमुख उच्च न्यायालयों को मामले में संदेह का पर्याप्त आधार मिला। टीओआई ने कहा है कि हद तो तब हुई जब मानव अधिकार कार्यकर्ता और दलित आदिवासियों के लिए काम करने वाली सुधा भारद्वाज और दलित बौद्धिक आनंद तेलतुंबडे जैसे निर्दोष और प्रतिष्ठित नागरिकों को पुलिस ने निशाना बनाया। इसी संपादकीय में कहा गया है कि सरकार के प्रवक्ताओं ने बिना यह देखे कि लोकतंत्र में ‘कहां क्या और कैसे हो रहा है, ये बयान दिया कि गिरफ्तारी शहरी नक्सलियों की हुई है’। हमारा लोकतंत्र असहमति और एक्टिविज्म की इजाजत देता है और इसीलिए “असंतोष लोकतंत्र की सेफ्टी वाल्व बनता है।” (कोर्ट की टिप्पणी)।

बहरहाल, सरकार और पुलिस के रवैये को लेकर देशभर में गुस्सा अभी थमा नहीं है। कई प्रमुख संगठनों की ओर से अब भी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं।

कुछ मीडिया बता रही तख्तापलट से लेकर लाल आतंकवाद की कहानी

सियासी दलों ने भी खोला मोर्चा

भाकपा माले ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर इस मामले में सरकार पर सवाल उठाया है। इसके मुताबकि गिरफ्तार होने वालों में जानीमानी कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज भी हैं, जो एक वकील हैं और आजीवन छत्‍तीसगढ़ के सबसे उत्‍पीडि़त समुदायों के अधिकारों की रक्षा के लिए काम करती रही हैं। उनके अतिरि‍क्‍त वर्नोंन गौंजाल्‍वेस, गौतम नवलखा, वरवरा राव एवं कई अन्‍य प्रसिद्ध हस्तियों को गिरफ्तार किया गया है। मुम्‍बई, दिल्‍ली, रांची, गोवा और हैदराबाद में कई कार्यकर्ताओं के घरों में छापेमारी की गई है। सुधा भारद्वाज को आईपीसी की धाराओं 153ए, 505, 117 और 120 और यूएपीए (अनलॉफुल एक्टिविटीज प्रिवेंशन एक्‍ट) कई अन्‍य धाराओं में गिरफ्तार किया गया है।  ये गिरफ्तारियां और छापेमारी पुणे पुलिस द्वारा भीमा-कोरेगांव मामले में बताई गई हैं, जिसमें कई दलित व नारीवादी कार्यकर्ता और एडवोकेट पहले भी गिरफ्तार किये गये हैं। भीमा-कोरेगांव में हुए बिल्‍कुल ही शांतिपूर्ण कार्यक्रम को आतंकवादी कार्यवाही बताने की कोशिशें निहायत ही आधारहीन और भर्त्‍सना के योग्‍य हैं।

माले ने कहा है कि यह बहुत ही चिन्‍ता का विषय है कि केन्‍द्र और महाराष्‍ट्र में भाजपा की सरकारें अधिकारों के लिए संघर्षरत कार्यकर्ताओं को आतंकवाद के आरोपों में विभिन्‍न दमनकारी कानूनों के तहत गिरफ्तार जा रहा है, जबकि दलितों के प्रति हिंसा कर रहे, आतंकवादी गतिविधियों में लिप्‍त, असहमति की आवाज उठाने वालों की हत्‍यायें करने वाले सनातन संस्‍था और शिव प्रतिष्‍ठान जैसे असली आतंकवादी संगठनों को वर्तमान प्रधानमंत्री समेत तमाम भाजपा नेता ‘राष्‍ट्रवादी’ बता रहे हैं।

यह भी पढ़ें : लेखकों व सामाजिक कार्यकर्ताओं की पुलिस-प्रताड़ना पर देश भर में तीखी प्रतिक्रिया

जैसे जैसे संसद के आगामी चुनाव निकट आ रहे हैं, इन गिरफ्तारियों और छापेमारियों के माध्‍यम से असहमति रखने एवं विरोध में बोलने वाले सभी लोगों को ‘देशद्रोही’ बता कर डराने-घमकाने की कोशिशें हो रही हैं। हम इसकी घोर भर्त्‍सना करते हैं और सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा,वर्नोन गौंजाल्‍वेस, वरवरा राव व अन्‍य सभी आज गिरफ्तार लोगों की तत्‍काल रिहाई की मांग करते हैं। मोदी राज के अघोषित आपातकाल में अधिकारों के लिए संघर्षरत कार्यकर्ताओं और असहमति के स्‍वरों को या तो मार दिया जा रहा है, अथवा छापेमारियों व गिरफ्तारियों के बाद उन्‍हें जेलों में डाला जा रहा है।

असली गुनहगारों को पकड़ो- प्रगतिशील लेखक संघ

पहली जनवरी को हुई भीमा-कोरेगांव की भयावह दलित-विरोधी हिंसा के बाद से पुणे पुलिस असली गुनहगारों को पकड़ने के बजाये लगातार मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को निशाना बना रही है। 6 जून को उसने छह मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और संस्कृतिकर्मियों को ‘टॉप अर्बन माओइस्ट ऑपरेटिव्स’ बताकर गिरफ़्तार किया और यह दावा किया कि भीमा-कोरेगांव की हिंसा के पीछे उनकी भूमिका थी। इसी कड़ी में आज देश के अलग-अलग भागों में सात महत्वपूर्ण बुद्धिजीवियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के घरों पर छपे मारे गए—दिल्ली में गौतम नवलखा, हैदराबाद में वरवर राव, फ़रीदाबाद में सुधा भारद्वाज, मुंबई में वर्नन गोंसाल्विस और अरुण फ़रेरा, रांची में स्टेन स्वामी और गोवा में आनंद तेलतुम्बड़े के घर पर छापा मारकर पुलिस ने उनके अनेक कागज़ात, दस्तावेज़, लैपटॉप आदि जब्त किये। इस बयान के लिखे जाने तक सुधा भारद्वाज, वरवर राव,गौतम नवलखा, वर्नन गोंसाल्विस और अरुण फ़रेरा को यूएपीए के तहत गिरफ़्तार भी किया जा चुका है। गौर करने की बात है कि ये सभी लोग पत्र-पत्रिकाओं से लेकर सरकारी महकमों और अदालतों तक दलित हक़ों की लड़ाई लड़ते रहे हैं।

गिरफ्तारी के विरोध में जारी एक पोस्टर (साभार : नीरज कुमार)

प्रगतिशील लेखक संघ और जनवादी लेखक संघ मध्यप्रदेश इस छापेमारी और गिरफ़्तारी की कठोर शब्दों में निंदा करते हैं। यह विरोध और आलोचना की हर आवाज़ को खामोश कर देने की एक शर्मनाक कोशिश है। भीमा-कोरेगांव में दलितों पर जानलेवा हमले करनेवाले और उस हमले की योजना बनानेवाले बेख़ौफ़ घूम रहे हैं। उन्हें राज्य और केंद्र की हिन्दुत्ववादी सरकारों का वरदहस्त मिला हुआ है। दूसरी तरफ़, उन लोगों को जेल की सलाखों के पीछे धकेला जा रहा है जिन्होंने दलित अधिकारों के लिए हमेशा आवाज़ बुलंद की है। भीमा-कोरेगांव की घटना और उसके बाद का सिलसिला यह बताता है कि हिन्दुत्ववादी शक्तियां एक तीर से दो शिकार करने में लगी हैं। पहले उन्होंने भीमा-कोरेगांव में हुए ऐतिहासिक संग्राम की दो सौवीं जयन्ती के मौक़े पर दलितों को अपना शिकार बनाया और उसके बाद उसी हिंसा के आरोप में उन बुद्धिजीवियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को अपना शिकार बनाना शुरू किया जिनकी आवाज़ उनके लिए हमेशा से असुविधाजनक रही है। यह लोकतंत्र पर खुला हमला है। हम इसकी भर्त्सना करते हैं और इन सजग नागरिकों पर लगाए गए झूठे आरोपों को वापस लेने तथा इन्हें अविलम्ब रिहा करने की मांग करते हैं। (प्रगतिशील लेखक संघ, राजेंद्र शर्मा, राजेश जोशी, शैलेंद्र शैली, मनोज कुलकर्णी- दिल्ली, भोपाल)

गौतम नवलखा ने जारी किया बयान

“यह समूचा केस इस कायर और प्रतिशोधी सरकार द्वारा राजनीतिक असहमति के खिलाफ़ की गई राजनीतिक साजिश है जो भीमा कोरेगांव के असली दोषियों को बचाने के लिए जी जान लगा रही है और इस तरह से उसने अपने उन घोटालों और नाकामियों की ओर से ध्‍यान बंटाने का काम किया है, जो कश्‍मीर से लेकर केरल तक फैली हुई हैं। एक राजनीतिक मुकदमे को राजनीतिक तरीके से ही लड़ा जाना चाहिए और मैं इस अवसर का स्‍वागत करता हूं। मुझे कुछ नहीं करना है।

गौतम नवलखा : आगे भी लड़ाई जारी रहेगी

नवलखा ने कहा कि अपने सियासी आकाओं की शह पर काम कर रही महाराष्‍ट्र पुलिस का असल काम है कि वह मेरे खिलाफ और मेरे संग गिरफ्तार हुए साथियों के खिलाफ अपना केस साबित करे। हमने पीयूडीआर में रहते हुए बीते चालीस साल के दौरान सामूहिक रूप से निडर होकर लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी है और मैं, पीयूडीआर का हिस्‍सा होने के नाते ऐसे कई मुकदमे कवर कर चुका हूं। अब मैं खुद किनारे खड़े रह कर एक ऐसे ही सियासी मुकदमे का गवाह बनने जा रहा हूं।

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)

(आलेख 30 अगस्त 2018 को सायं 5:40 बजे परिवर्द्धित)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। हमारी किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, संस्कृति, सामाज व राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के सूक्ष्म पहलुओं को गहराई से उजागर करती हैं। पुस्तक-सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें 

बहुजन साहित्य की प्रस्तावना 

दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

महिषासुर एक जननायक’

महिषासुर : मिथक व परंपराए

जाति के प्रश्न पर कबी

चिंतन के जन सरोकार

About The Author

Reply