मिर्चपुर कांड : एससी-एसटी एक्ट में हाईकोर्ट ने सुनायी सबसे बड़ी सजा

करीब 8 वर्षों के बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने मिर्चपुर के दलितों को इंसाफ दिया है। 33 अभियुक्तों को दोषी करार दिया गया तथा इनमें से 12 को आजीवन उम्रकैद की सजा मुकर्रर की गयी। साथ ही पीड़ित दलितों को समुचित मुआवजे व पुनर्वास के लिए राज्य सरकार को निर्देशित किया है। एससी/एसटी एक्ट के तहत दी गयी सजा अबतक की सबसे बड़ी सजा है। एक खबर :

33 दोषी 12 को उम्रकैद और राज्य सरकार को पुनर्वास व मुआवजा देने का निर्देश

दलितों पर अत्याचार के मामले में 24 अगस्त 2018 को दिल्ली हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए करीब 8 वर्ष पहले हुए एक घटना को लेकर 33 अभियुक्तों को दोषी ठहराया और इनमें से 12 को उम्रकैद की सजा मुकर्रर की। जबकि निचली अदालत ने इसी मामले में 20 अभियुक्तों को बरी कर दिया था। अपने महत्वपूर्ण फैसले में हाईकोर्ट ने यह माना कि आजादी के 71 साल बाद भी अनुसूचित जाति के लोगों पर अत्याचार कम नहीं हुए हैं। जानकार बताते हैं कि एससी-एसटी एक्ट के तहत अबतक इतनी संख्या में इतनी लंबी सजा नहीं हुई थी।

मिर्चपुर के पीड़ित दलित अभी भी हिसार के तंवर फार्म हाऊस में विस्थापितों का जीवन जी रहे हैं। हाईकोर्ट ने चूंकि राज्य सरकार को उनके पुनर्वास और मुआवजा देने का निर्देश दिया है।

मामला वर्ष 2010 में हरियाणा के हिसार जिले के मिर्चपुर गांव में घटित घटना से जुड़ा है। मिर्चपुर के दबंग जाटों ने दलित समुदाय के बीच विवाद के बाद 21 अप्रैल 2010 को वृद्ध तारा चंद के घर को आग लगा दी गयी थी। इस घटना में वे और उनकी विकलांग बेटी की मौत हो गयी थी। इतना ही नहीं जाटों ने वाल्मीकि समुदाय के 18 घर जला दिए थे। उनके वहशीपन का अनुमान इसी मात्र से लगाया जा सकता है कि उनलाेगों ने वाल्मीकि समुदाय के लडकों को अधमरा होने तक पीटा, उनके मुंह में पेशाब किया, पैखाना खिलाया। इतना ही नहीं लड़कियों, महिलाओं के साथ शारीरिक दुर्व्यवहार के साथ-साथ सामूहिक बलात्कार किया।

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अदालत ने अपने फैसले में 33 दोषियों में से 12 को आईपीसी के तहत हत्या और एससी, एसटी एक्ट कानून के तहत उम्रकैद की सजा सुनायी। न्यायमूर्ति एस. मुरलीधर और न्यायमूर्ति आई. एस. मेहता की पीठ ने कहा कि आजादी के 71 साल बाद भी दबंग जातियों से संबद्ध लोगों द्वारा अनुसूचित जाति से संबंधित लोगों के खिलाफ अत्याचार की घटनाओं में कमी के कोई संकेत नहीं दिखते हैं। पीठ ने अपने 209 पृष्ठ के फैसले में कहा कि ’19 एवं 21 अप्रैल 2010 के बीच मिर्चपुर में हुई घटनाओं ने भारतीय समाज में नदारद उन दो चीजों की यादें ताजा कर दी हैं जिनका उल्लेख डॉ. बी आर आंबेडकर ने 25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा के समक्ष भारत के संविधान का मसौदा पेश करने के दौरान किया था। इनमें से एक है ‘समानता और दूसरा है ‘भाईचारा।

दिल्ली हाईकोर्ट

अदालत ने कहा कि जाट समुदाय के लोगों ने बाल्मीकि समुदाय के सदस्यों के घरों को जानबूझकर निशाना बनाया। इस मामले में जाट समुदाय के सदस्यों का मकसद ”बाल्मीकि समुदाय के लोगों को सबक सिखाना था और आरोपी अपने इस मकसद में पूरी तरह कामयाब भी हुए। इसमें कहा गया कि हरियाणा सरकार दोषियों से जुर्माने के रूप में मिली धनराशि का इस्तेमाल पीड़ितों को आर्थिक राहत एवं पुनर्वास के प्रावधानों के लिये करे।

अब मिला इंसाफ : हिसार के तंवर फार्म हाऊस में रह रहा मिर्चपुर का एक दलित परिवार

उच्च न्यायालय ने मामले में निचली अदालत द्वारा 13 व्यक्तियों की दोषसिद्धी तथा सजा को चुनौती देने वाली उनकी अपील पर यह फैसला सुनाया। पीड़ितों एवं पुलिस ने भी उच्च न्यायालय में दोषियों की सजा बढ़ाने का अनुरोध करने के साथ ही अन्य आरोपियों को बरी किये जाने को चुनौती दी थी। उच्च न्यायालय ने इस मामले में कुछ दोषियों की सजा बढ़ाते हुए उन 13 व्यक्तियों की दोषसिद्धि को भी बरकरार रखा, जिन्हें निचली अदालत ने मामले में दोषी ठहराया था।

मिर्चपुर का एक दलित परिवार जिनका घर जला दिया गया था

बताते चलें कि निचली अदालत ने 24 सितंबर, 2011 को जाट समुदाय से संबद्ध 97 व्यक्तियों में से 15 को दोषी ठहराया था। अपील के विचाराधीन रहने के दौरान दो दोषियों की मौत हो गयी थी। अक्तूबर 2012 में 98वें आरोपी के खिलाफ मुकदमा चला और निचली अदालत ने उसे बरी कर दिया। आरोपी इससे पहले फरार चल रहा था। निचली अदालत ने 31 अक्तूबर, 2011 को भारतीय दंड संहिता की धारा 304 के तहत गैरइरादतन हत्या के अपराध के लिये कुलविंदर, धरमबीर और रामफल को उम्रकैद की सजा सुनायी थी। उच्च न्यायालय ने इन प्रावधानों को संशोधित करते हुए उन्हें आईपीसी की धारा 302 के तहत हत्या के अपराध का दोषी ठहराया। इसके अलावा पांच अन्य बलजीत, करमवीर, करमपाल, धरमबीर और बोबल को दंगा फैलाने, जानबूझकर नुकसान पहुंचाने, हानि पहुंचाने और पीड़ितों के घर को आग के हवाले करने तथा अजा/अजजा (अत्याचार रोकथाम) कानून के प्रावधानों समेत उनके अपराधों के लिये पांच साल जेल की सजा सुनायी गयी थी। वहीं हल्के दंड प्रावधानों के तहत दोषी ठहराये गये सात अन्य दोषियों को निचली अदालत ने परिवीक्षा पर रिहा कर दिया था। इससे पहले निचली अदालत ने मामले में 97 आरोपियों में से 82 को बरी कर दिया था।

अरविंद जैन, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता

फैसला ऐतिहासिक, लेकिन ऐसे मामलों में शीघ्र सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद जैन के मुताबिक अदालत का यह फैसला कई मायनों में खास है। एक साथ इतने लोगों को इतनी लंबी सजा पहली बार मिली है। यहां तक कि बिहार जहां इतने सारे नरसंहार हुए, वहां तो हाईकोर्ट में अभियुक्तों को रिहाई मिली। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में सुनवाई जल्दी से जल्दी होनी चाहिए। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि इस फैसले का हरियाणा में असर दिखेगा। सामान्य तौर पर ऐसा होता है कि दलितों के पक्ष में ऐसा फैसला आने से शोषक वर्ग का दमन बढ़ जाता है।

 

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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