वंचित-पीड़ित समुदाय ने खुद अपने लिए चुना है ‘दलित’ शब्द

ब्लैक लिबरेशन मूवमेंट समुदाय का आंदोलन था। उनको ब्लैक कहलाना पसंद था। वह जीते, उनको ‘ब्लैक पीपुल’ कहा जाने लगा। भारत में सदियों से हो रहे जाति दमन और छुआछूत के खिलाफ इसी समुदाय ने अपने लिए ‘दलित’ शब्द चुना। लेकिन सामाजिक अस्मिता और आंदोलन का पर्याय हो चुके इस शब्द के अस्तित्व के लिए कोर्ट कचहरी में संघर्ष करना पड़ रहा है क्योंकि सरकार भी इसे खत्म करने पर तुली है। फारवर्ड प्रेस की रिपोर्ट :

सरकारी सर्कुलर के खिलाफ एनडीएमजे दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा

‘दलित शब्द पर रोक संबंधी सूचना प्रसारण मंत्रालय के सर्कुलर के खिलाफ दलित संगठनों के राष्ट्रीय समूह ने दिल्ली हाईकोर्ट से गुहार लगाई है। इस समूह ने कहा है कि ये शब्द दलित जातियों ने खुद चुना है जिससे वह समाज में सकारात्मक तरीके से जाने जाते हैं और यह शब्द उनकी राजनीतिक पहचान से भी जुड़ा शब्द है। याचिका में कहा गया है कि छुआछूत की सदियों पुरानी कुरीति के साथ ही ये शब्द दलितों की पहचान से जुड़ा है। दिल्ली हाईकोर्ट में दायर याचिका में कहा गया है कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने हाल में ही एक सर्लुकर जारी करके दलितशब्द को मीडिया से प्रतिबंधित करने को कहा है जो बिल्कुल गैर-जरूरी है।

यह याचिका नेशनल दलित मूवमेंट फॉर जस्टिस (एनडीएमजे) के राष्ट्रीय महासचिव वी.ए. रमेश नाथन ने दायर की।

दिल्ली हाईकोर्ट में न्यायमूर्ति विबू बखरु के समक्ष ये याचिका सुनवाई के लिए आई है। याचिका में कहा गया है कि देश में सदियों से चली आ रही जाति व्यवस्था और छुआछूत के साथ ही दलित शब्द निकला था जिसकी चयन खुद दलितों ने किया है। इससे उनकी ना सिर्फ सकारात्मक तौर पर पहचान चिन्हित होती है बल्कि यह उनकी सियासी तौर मौजूदगी की भी अभिव्यक्ति है।

दिल्ली हाईकोर्ट

याचिका में कहा गया है कि दलित शब्द मूल रूप से संस्कृत से आया है जिसका मतलब टूटे और बिखरे लोगों से हैं। वर्षों से चल रहे दलित आंदोलनों ने इस शब्द को और मजबूती प्रदान की। दलितशब्द भारतभर में चले जातीय और धार्मिक आंदोलनों की चेतना का बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसे अलग नहीं किया जा सकता।”

ऐतिहासिक पहचान मिटाने की साजिश : रमेशनाथन

वी.ए. रमेशनाथन ने फारवर्ड प्रेस से कहा कि मूल बात ये है दलितों पर हर तरफ से अत्याचार बढ़ रहे हैं। बलात्कार, सामूहिक बलात्कार की घटनाएं आम हो चली है। युवा जोड़े खासकर अंतर्जातीय विवाह करने वाले नौजवानों पर हमले हो रहे हैं। हाल में कई ऐसी घटनाएं तेलंगाना और आंध्र में हुई हैं। दूसरा बड़ा मामला ये है कि एससीएसटी एक्ट को प्रभावशाली तरीके से लागू नहीं होने दिया जा रहा। इसलिए अराजकता और बढ़ी है, दलित समाज पर हमले तेज हुए हैं। एससीएसटी एक्ट को बिगाड़ने और इसे कमजोर करने के खिलाफ लोग जगह जगह कोर्ट की शरण में जाने को विवश हैं। कई राज्यों में कोशिशें चल रही हैं कि किस तरह से एक्ट को कमजोर और निष्प्रभावी कर दिया जाए। और सबसे अहम बात कि अब दलितों को दबाने के लिए सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने सर्कुलर जारी किया है ताकि दलित टर्म को तमाम मीडिया और सरकारी कामकाज में इस्तेमाल से बाहर कर दिया जाए। मुझे लगता है यह हमारे संवैधानिक हकों को रोकने का प्रयास और अभिव्यक्ति की आजादी पर भी सवाल है।

एनडीएमजे के महासचिव वी.ए. रमेश नाथन

वह कहते हैं, दलित आंदोलन में इस शब्द का इस्तेमाल गरीबों, पिछड़ों और वंचितों की हालत में सुधार के लिए किया जाता है। बीते समय में दलित समाज को अपमानित करने वाले कई विशेषणों और संबोधनों का इस्तेमाल होता आया था। जो लोग जात पात के जहर से पीड़ित हैं, यह उन्हीं पीड़ितों को कमजोर करने की कोशिश है। सरकार तो चाहती है दलित को दलित नहीं बल्कि किन्हीं हीनभावना में डालने वाले बुरे संबोधनों से बुलाया जाए। हरिजन शब्द इस्तेमाल होता था। वह समय के साथ मिट गया। सरकार दो तरह की राजनीति कर रही है। एक कि वह बताना चाहती है कि सरकार इस समुदाय के बड़ी हितैषी है, लेकिन सच ये है कि दलितों के नाम पर जैसे सहारनपुर और दूसरे हिस्सों में भीम आर्मी या अन्य आंदोलनों की आवाजें तेज हो रही हैं उनसे निपटने के लिए ऐसे तरीके इजाद किए जा रहे हैं।

यह भी पढें : सरकार का फरमान, दलित शब्द पर लगेगा प्रतिबंध

रमेशनाथन ने कहा, जहांं भी आपने देखा होगा जहां भी पहचान पर आधारित समुदायों को दबाने का काम हुआ है, उन पर अत्याचार हुए हैं, वह उस सत्ता के खिलाफ एक हुए हैं, वहां विभिन्न समुदायों ने सरकारों के जुल्म के खिलाफ मोर्चा लिया। वह सामूहिक रूप से एक हुए क्योंकि वह एक खास तरह की पहचान चाहते थे। अमेरिका में ब्लैक पीपुल्स को नीग्रो कहकर अपमानित किया गया। उनको अश्वेत कहकर अपमानित होना पड़ा। जाहिर वे लोग उठे और उनको कहना पड़ा कि हम दुनिया को बताना चाहते हैं हमें लोग काला  कहें, काला ही अच्छा है, यही हमारी पहचान है। ब्लैक लिबरेशन मूवमेंट ने कहा हमें नीग्रो नहीं, ब्लैक कहलाना ही पसंद है। इसलिए उन लोगों को अपनी पहचान के लिए ब्लैक कम्युनिटी कहलाना ही पसंद किया। यह उनकी अपनी पहचान के लिए चला आंदोलन था।

नेशनल दलित मूवमेंट फॉर जस्टिस और दलित महिला अधिकार मंच के एक कार्यक्रम में शामिल प्रतिभागी

रमेश नाथन के शब्दों में, ‘हमारे देश में भी सदियों से पहचान की लड़ाई लड़ी जाती रही है। महाराष्ट्र में आंदोलन चले। ज्योतिबा फुले और आंबेडकर ने आंदोलन चलाया। कई तरह से और कई तरीके के विचार विमर्श और बहसें हुईं और आखिरकार दलित शब्द निकाला गया जो दबे कुचलों की आवाज ही नहीं पहचान भी बना। दलित शब्द संविधान को अपमानित करने वालों और समाज के हाशिए के लोगों को प्रताड़ित करने वाले लोगों के खिलाफ बना शब्द है…। सरकार को इस दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर सोचना चाहिए। वह सिर्फ प्रशासनिक स्तर पर इसके प्रयोग के बारे में देख रही है। सरकार चाहती है दलितों को एससी-एसटी लिखा जाए। कोई दिक्कत नहीं आप कहिए और लिखिए भी। लेकिन एक आंदोलन को खत्म करना चाहते हैं, यह भी बता दीजिए। मीडिया सरकार की आवाज नहीं समाज और समुदायों की आवाज है। वह कैसे इसे रोक सकती है। इस नजरिए से सरकार दलित शब्द को बैन नहीं कर सकती है। देश में ऊंची जातियों के लोग, जिनमें ब्राह्मणों से लेकर जाट और पटेल कई सारे जाति समूह हैं, वह अपनी जातीय पहचान को पुख्ता कर रहे हैं, उन पर तो सरकार कोई फैसला नहीं लेती बल्कि उसे सिर्फ दलित ही दिख रहे हैं कि जिनकी वह पहचान ही मिटा देने पर उतारू है।   

यह भी पढें : क्या दलित शब्द बोलने-लिखने पर लगेगी पाबंदी

रमेश नाथन कहते हैं कि नेपाल ने बाकायदा संविधान में दलित शब्द को जगह दी है। भारत में इसकी कोशिशें क्यों नहीं हो रही हैं। हमारी कोशिश काफी आगे की है। हम इस एडवाइजरी को रद्द कराने की कोशिश में हैं। अभी सरकार की कोशिश सामाजिक और संवैधानिक स्तर पर हर उस प्रावधान को खत्म करना है जो उसे राजनीतिक नफा नुकसान में अपने प्रतिकूल लगता है। हमारा सूचना और प्रसारण मंत्रालय सार्वजनिक तौर पर स्थापित हो चुकी जनचेतना को खत्म करने का प्रयास कर रहा है। संविधान की धारा 19 (1), (सी) और 21 के तहत हमें ये गारंटी मिली है हम खुद तय कर सकते हैं कि हमारी स्वयं की अभिव्यक्ति कैसी चाहते हैं। हम अपनी अभिव्यक्ति के लिए स्वतंत्र है।

पृष्ठभूमि

बतातें चलें कि अगस्त में मंत्रालय ने दलित शब्द को लेकर एडवाइजरी जारी की थी। मंत्रालय ने मीडिया को सलाह देते हुए कहा कि वे दलित शब्द की जगह शेड्युल कास्ट शब्द का इस्तेमाल करें। केंद्र सरकार का ये निर्देश बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच की टिप्पणी के बाद दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि मीडिया संगठन दलित शब्द का इस्तेमाल ना करें। पंकज मेशराम की याचिका पर हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने ये निर्देश दिया था। बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश के अनुपालन में संविधान में उल्लिखित शेड्युल कास्ट का इस्तेमाल अंग्रेजी में करना चाहिए और इसके साथ ही इस शब्द के लिए क्षेत्रीय भाषाओं में उचित शब्द का इस्तेमाल करने की जरूरत है। इसके साथ ही सभी सरकारी कार्यों में, प्रमाण पत्रों में भी शेड्युल कास्ट का ही प्रयोग होना चाहिए।

( कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। हमारी किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, संस्कृति, सामाज व राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के सूक्ष्म पहलुओं को गहराई से उजागर करती हैं। पुस्तक-सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें 

दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

महिषासुर एक जननायक

महिषासुर : मिथक व परंपराए

जाति के प्रश्न पर कबी

चिंतन के जन सरोकार

About The Author

Reply